@parvezahmadj ऐसे लोगों को समाज भले ही आदर्श मानता है। अनुकरण करता है लेकिन ये सब सिर्फ व्यक्तिगत स्वार्थ को ही अधिक महत्व देते हैं। और अनजाने में ही सही, पर समाज को एक गलत दिशा की ओर प्रेरित करते हैं।
@Pritamkrbauddh@BhimArmyChief ये कैसी न्याय की आवाज उठायी गयी है। पीड़ित परिवार से पूरा ध्यान हटवा दिया।अब मीडिया का सारा ध्यान फटी शर्ट पर चला गया है। बाबा साहेब डा अम्बेडकर ऐसी सीख नहीं दिये हैं।
भीम आर्मी वाले कहते हैं कि हम जेल-मुकदमों से नहीं डरते हैं। इनकी हरकतें देखिए। थाने में कान पकड़कर बैठे हुए हैं।
प्रयागराज की घटना आपक�� याद ही होगी, जहां भीम आर्मी वालों के हिंसक प्रदर्शन एवं हुड़दंगई के चलते सैकड़ों लड़कों पर FIR हुई, उन्हें थाने में बैठाकर अपमानित किया गया।
ध्यान देने वाली बात यह है कि घटना के बाद चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें पहचानने और भीम आर्मी का कार्यकर्ता होने से तक इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि ये लड़के अकेले पड़ गए। इन पर भयंकर ��ुल्म हुआ। कुछ दिन बाद इस प्रदर्शन के दौरान हुए हमले में एक दलित युवक की मौत की भी खबर आई थी।
यह सिर्फ प्रयागराज की घटना नहीं है। आजमगढ़ में भी यही हुआ था, जहां चंद्रशेखर आजाद की भड़काऊ राजनीति के चलते प्रशासन ने दलित समुदाय की 80 से अधिक गाड़ियां जब्त कर ली थीं। सैकड़ों लड़कों पर एफआईआर हुई थी। आलम यह रहा कि डर के मारे ये लड़के अपनी गाड़ियां तक नहीं छुड़वा सके। ध्यान देने वाली बात है कि इनमें से अधिकांश गाड़ियां वे थीं, जिन्हें समाज के लोगों ने अपनी बहन-बेटियों की शादी के लिए खरीदा था।
अब जरा आप ही सोचिए, बाबासाहेब जिस दलित समाज को Governing Class और मान्यवर कांशीराम जिसे हुक्मरान समाज बनाना चाहते थे, चंद्रशेखर आजाद की राजनीति के चलते आज वे थाने में कान पकड़कर बैठे हैं। क्या यही है तुम्हारी वीरता?
अब उत्तराखंड के टिहरी में द्विज हिंदू लड़की से प्रेम करने पर दलित युवक केतन हत्याकांड क�� ही देख लो। घटना घटित हुए 19 दिन हो गए हैं। मैंने स्वयं इस पर सबसे पहले पोस्ट किया था। एक नहीं, अनेक पोस्ट किए। उत्तराखंड के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस मुद्दे पर मजबूती से आवाज उठाई। तब जाकर यह मामला राष्ट्रीय पटल पर पहुँचा।
इस मामले में SC-ST Act के तहत FIR दर्ज है। दो हत्यारे गिरफ्तार भी हो चुके हैं। अब 19 दिन बाद चंद्रशेखर आज़ाद कौन-सा न्याय दिलाना चाहते हैं कि जाने के एक दिन पहले प्रशासन को हड़का��े हैं और फिर हजारों युवाओं का जत्था लेकर पीड़ित परिवार के यहाँ कूच करने पर उतारू हैं? ऐसे में कानून-व्यवस्था के मद्देनजर प्रशासन तो उन्हें रोकेगा ही। यह सिर्फ भोले-भाले युवाओं को बरगलाने का एक तरीका है और कुछ नहीं।
मेरे मन में चंद्रशेखर आजाद के प्रति कोई घृणा भाव नहीं है। हम तो बस यह समझा रहे हैं कि आप अपनी हवाबाजी के चक्कर में मासूम लड़कों के करियर की बलि मत दीजिए। किसी घटना में पीड़ित परिवार से मिलने जाना है, तो शांति से जाइए। जाने से पहले ही प्रशासन को ललकारकर युवाओं को बरगलाना बंद कीजिए।
हजारों uncaderised लड़कों का जत्था लेकर, शोर-शराबा और नारेबाजी करते हुए किसी पीड़ित के यहां जाना न केवल कानून-व्यवस्था को चुनौती देना है, बल्कि यह पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदनहीनता की भी पराकाष्ठा है। मत भूलिए कि आप दलित समाज में रेप, हत्या एवं अत्याचार से पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे हैं। यह उनके मातम की घड़ी होती है, आप उसे शादी-बारात और ऑर्केस्ट्रा डांस मत बनाइए।
बाबासाहेब ने अपने बच्चों को कुर्सी पर बैठाने का सपना देखा था, थाने में कान पकड़कर बैठाने का नहीं। एक केस में न्याय दिलवाने के बदले 100 युवाओं पर केस करवा देना कौन-सी बुद्धिमानी है?
समाज के युवाओं, लड़ने का एक तरीका होता है। आपको बस इसलिए समझा रहा हूं। हमने सोशल मीडिया के जरिए ही सैकड़ों जातिवादियों पर FIR करवाकर उन्हें जेल भेजवाया है। संविधान को ताक पर रखकर संविधान बचाने क�� बात करना न केवल मूर्खता है, बल्कि यह बाबासाहेब के अथक संघर्षों का अपमान भी है। इसलिए गंभीर बनकर गहराई से विचार कीजिए, समझ जाएंगे।
नीट का exam फिर से हो गया। एडमिशन भी हो जाएगा। लेकिन अनुसुचित जाति के संगठनों से एक प्रश्न है कि उन्होंने इस बात पर कितना ध्यान दिया कि;
"बहन कुमारी मायावती जी ने स्पेशल कम्पोनेंट प्लान अनुसुचित जाति के कल्याण के लिए रखे फंड से जो चार मेडिकल कॉलेज सहरानपुर, जालौन, अम्बेडकरनगर, कन्नौज में ब��ाये थे, उनमे एडमिशन बहनजी द्वारा दी गयी व्यवस्था से होंगे या फिर आर्टिकल 30 में विशेष आरक्षण प्राप्त साबरा अहमद व उनके यादव वकील द्वारा हाईकोर्ट से रद्द करवाए अनुसार होगा?"
1.इन चारों मेडकिल कॉलेज में 340 के लगभग शीट है।
2.बहनजी ने मुस्लिम के आर्टिकल 30 में मेडिकल, इंजीनियरिंग या किसी भी प्रकार के अल्पसंख्यक संस्थान में अल्पसंख्यक के लिए आरक्षित 50% शीट की तर्ज पर इन चारों संस्थान में 70% सीट एससी व 20 शीट एसटी के लिए लिए आरक्षित करी थी। जिसे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया ओर राज्य सरकार ने स्वीकार करके 70% से सीधा 21% पर ला दिया। जब हम लोगो ने विरोध किया तब इस साल की छूट देकर सुप्रीम कोर्ट जाने की जानकारी दी।।
3.बहनजी के अनुसार एडमिशन पर =
एससी = 248 शीट
एसटी = 20 शीट
ओबीसी = 44 शीट
सामान्य = 20 शीट
4.साबरा अहमद व यादव वकील की पिटीशन पर निर्णय के बाद स्तिथी यह है कि;
एससी = 340 का 21% = 68 शीट
अथार्त नुकसान है;
248-68 = 180 शीट का है।
5.आप समझ सकते है कि मेडिकल की एक एक शीट कितनी कीमती होती है।।अनुसुचित जाति के 180 डॉक्टर कम बनेंगे।
इंहा ध्यान देने वाली बात है कि यह मेडिकल कॉलेज अनुसुचित जाति के कल्याण के लिए रखे फंड से बने थे। जिसमे एससी से अलग ओबीसी, एसटी, सामान्य तक को शीट दी गयी। इसलिए इसके लिए राज्य सरकार से कोई विशेष फंड नही allot हुआ जिससे साबरा अहमद या अन्य को दिक्कत होती।
6.अब बहनजी ने सत्ता में रहते एस��ी के लिए कार्य कर दिया। उन्हें बचाने की जिम्मेदारी एससी समाज �� उनके संगठनों की है। एससी के अधिकतर सन्गठन ऐसे मामलों पर गायब मिलते है। इंहा तक कि;
"चन्द्रशेखर से लेकर चिराग पासवान व अन्य अम्बेडकर के नाम पर सभा/महासभा वाले दलित नेता तक इसपर कोई बयान देते नही दिखते"
7.अब नीट में एडमिशन होने वाला है। इन 4 संस्थान में किस प्रकार एडमिशन होंगे यह पूछने वाला कोई नही है?
मजेदार बात यह है कि;
"अधिकतर अपने घर मौज मस्ती करते हुए मुझे कहते है कि आप क्यो नही रिट दाखिल ���रते। जबकिं यह मामला मेने ही वायरल किया, जिसके कारण राज्य सरकार को डबल बैंच से आदेश पर रोक लगवाकर 1 साल की छूट दिलवाई गयी व असीम अरुण ने बताया कि इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा रहे है। नही तो मामला ही सामने नही आ पाता। अब;
"घर बेचकर इसी काम मे लगा दूँ क्या। मतलब मेने इतना बड़ा नुकसान बताया तो यह मेरी ही जिम्मेदारी है कि इसे में ही देखूं"
अब राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गए या नही। अगर गए तो निर्णय तक कि�� प्रकार एडमिशन होंगे, इसकी किसी को जानकारी ��ही है"
विकास कुमार जाटव
चंद्रशेखर की फटी शर्ट।
आज नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद का एक वीडियो वायरल है, जिसमें उनकी शर्ट फटी हुई है। दरअसल, वह उत्तराखंड के टिहरी में केतन के परिवार से मिलने जा रहे थे, जिसकी एक द्विज हिंदू लड़की से प्रेम करने पर हत्या कर दी गई थी।
प्रशासन ने उन्हें रास���ते में ही रोक दिया और इस धक्का-मुक्की में उनकी शर्ट फट गई। इसे देखकर दलित समाज के नए-नए लड़के इसे क्रांति समझ रहे हैं और सुबह से ही शोर मचा रहे हैं। अब इस कहानी का दूसरा पहलू समझिए।
चंद्रशेखर आजाद ने कल ही एक वीडियो बनाकर पोस्ट किया था कि वह उत्तराखंड के टिहरी में पीड़ित परिवार से मिलने आ रहे हैं। उन्होंने सरकार को हड़काते हुए कहा कि प्रशासन उन्हें रोके नहीं। अगर उन्हें रोका गया, तो वह सीधे मु���्यमंत्री आवास का घेराव करेंगे। अब ऐसा सुनते ही भोले-भाले लड़कों में जोश आ जाता है और वे चंद्रशेखर आजाद की रैली में हजारों की संख्या में इकट्ठा हो जाते हैं।
जाहिर सी बात है कि इस स्थिति में कोई भी सरकार सुरक्षा की दृष्टि से चंद्रशेखर को रोकेगी क्योंकि भीम आर्मी के युवाओं में कोई कैडर नहीं है। दरअसल, चंद्रशेखर आजाद स्वयं भी यही चाहते हैं, क्योंकि यही सब करके उन्हें प्रशासन से भिड़ने का मौका मिलता है। अब नए-नए लड़कों को यही तो चाहिए कि उनका नेता न्याय भले न दिलाए, बस साउथ के एक्टर्स की तरह धूम-धड़ाका करता रहे।
चंद्रशेखर आजाद तो चले आते हैं, लेकिन ��नके हर आह्वान पर बुलाई गई भीड़ में सैकड़ों लड़कों पर एफआईआर हो जाती है। वे बेचारे सालों तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाते रहते हैं। अब चंद्रशेखर आजाद से मेरा सिंपल सा सवाल है:
जिन दलित परिवारों में किसी की हत्या हुई हो, लड़की का रेप हुआ हो, वे दर्द से विलख रहे हों, वहां हजारों की भीड़ लेकर हुड़दंग करना, "शेर आया-भालू आया" के नारे लगवाना और गाड़ी पर खड़े होकर हाथ हिलाते हुए एंट्री लेना शोभा देता है क��या? आप किसी परिवार के मातम में शामिल होने जा रहे हैं या उनके यहां बारात में ऑर्केस्ट्रा देखने जा रहे हैं?
अब तो आप सांसद हो गए हैं। पीड़ित परिवारों की लाश पर राजनीति करने की क्या जरूरत है? क्या जरूरत है कि आप किसी पीड़ित के यहां जाने से पहले ही युवाओं को इकठ्ठा होने का आह्वान कर देते हैं? मातम में परिवार से मिलने जा रहे हैं तो ये सब नौटंकी क्यों? आपकी वजह से गांव-गली के बगलबच्चा लड़के भी "आ रहा हूं फलाने तारीख को" जैसी नौटंकी करते हैं। अब आप सांसद हो गए हैं। रैली सार्वजनिक स्थानों पर की जाती है। मृतक परिवार के घरों पर नहीं। थोड़ा गंभीर बनिए। आप पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने जाते हैं, बेचारे समाज के लड़कों को आपके न्याय की लड़ाई लड़नी पड़ती है।
समाज के युवाओं और पीड़ित परिवारों के भविष्य और उनकी भावनाओं से मत खेलिए। जातिगत उत्पीड़न के मामलों में शांतिपूर्वक 2-4-10 गाड़ियां (जो भी आपको उचित लगे) लेकर जाइए और परिवार से मिलकर उन्हें संबल दीजिए। बेवजह पुलिस को ललकारने और हजारों युवाओं का जत्था लेकर पीड़ित के घर बारात ले जाने वाली ओछी हरकतें बंद कीजिए।
अखिलेश : अरे लक्ष्मणवा
लक्ष्मण : जी भै��ा जी
अखिलेश : तुम इतना ब्राह्मणवाद, मनुवाद, पाखंड, अंधविश्वास पर एक बढ़िया सा दलितो को भाषण देकर आओ, इतना में परम पूजनीय शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का आशीर्वाद लेकर आता हूँ।।
☺️😊😊😊☺️😊
काल्पनिक कथा
कानपुर यूनिवर्सिटी का नाम छत्रपति शाहूजी महाराज के नाम पर रखना सिर्फ एक नाम बदलना नहीं था, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को उनके गौरवशाली इतिहास से जोड़ना था।
बहनजी ने पिछड़ों को सम्मान की ज़िंदगी दी है।
#ShahuJiMaharaj#MayawatiJi
हमारे लिए तो यही गर्व की बात है की बहन जी किसी पूंजी पतियों से चंदा नहीं देता, इलेक्टोरल बांड मैं बसपा का कहीं भी नाम नहीं,बसपा पार���टी के कार्यकर्ता ही इतनी मजबूत हैं,उनके चंदे से ही पार्टी चलती है,भाइयों आपको समझना होगा जब चुनाव आता है तभी बसपा को कमजोर करने की कोशिश की जाती है
@upbhaskar
महोदय!
जनता लोकतंत्र के चौथे स्तंभ, विश्व में निष्पक्षता के लिए विख्यात भारतीय मीडिया से जानना चाहती है कि कम से कम एक ऐ��ी मुख्य पार्टी/नेता का नाम बताएं जो अपने धान/गेंहू/खेत बेचकर चुनाव लड़ती है।न तो कोई बांड लेती हो और न ही कोई अन्य अप्रत्यक्ष सहयोग।
है हिम्मत???
अरविंद केजरीवाल को सभी जगह से फंडिंग मिली। अन्ना आंदोलन में भी और बाद में भी। केजरीवाल ने पार्टी बना ली।।
केजरीवाल की पार्टी चुनाव लड़ने की घोषणा करती है। सबसे बड़ा प्रश्न की;
"चुनाव बिना पैसे के नही लड़ा जा सकता। पैसा कँहा से आएगा"
केजरीवाल ने घोषणा करी की उनसे मिलने के लिए "20000 की फी�� देनी पड़ेगी" जिसमे डिनर भी मिलेगा। यह 2014 में था। इन 12 साल में 20000 कई क्रय शक्ति कई गुणा बढ़ गई है। वर्तमान में 60 से 1 लाख इसे मानकर चलिए। एक व्यक्ति पर आम आदमी पार्टी का डिनर खर्च 625 रुपया ओर मिला 20000 रुपया।
केजरीवाल को;
1.विदेशों स फंडिंग हुई।
2.उधोगपतियों ने शुरू से फंडिंग करी।
3.बाकी शराब घोटाला व अन्य घोटाले के आरोप है।।
बसपा को;
1.विदेशों से छोड़ो देश से फंडिंग नही हुई।
2.उधोगपति अनुसु��ित जाति की पार्टी होने के कारण एक रुपया नही देते।
3.बसपा पर कोई घोटाले का आरोप नही है। चीनी मिल का चर्चा होती है लेकिन सबूत नही दे पाए न केस दर्ज हुआ।।
लेकिन मूर्खो को ;
1.केजरीवाल की "डिनर डिप्लोमेसी" दिख रही है और इस मामले में बुद्धिजीवी बनकर कह रहे थे कि चुनाव लड़ने के लिए पैसा चाहिए ही।
2.बसपा व बहनजी को भी चुनाव खर्च पूरा करना है।।बहनजी ने कह रखा है कि पार्टी पदाधिकारी से अलग जो कूपन से पैस��� इकट्ठा करके 5 लाख रुपया पार्टी फंड में जमा करेगा, उससे ही मिलेगी। यह अपराध हो गया। उन्हें लगता है कि बसपा के पास आसमान से पैसा आता है लेकिन सपा-आरजेडी-ममता-केजरीवाल-वामदलों पर आसमान से नही आता इसलिए उन्हें उधोगपतियों से लेना पड़ता है।
जिसे लगता है कि बिना पैसा चुनाव हो सकता है। पार्षद का चुनाव लड़कर दिखा दे। दिन में तारे दिख जाएंगे। अजीब तब है जब;
"नौशिखिया व अपरिपक्व य���वाओ का एक ग्रुप" जिनकी पार्टी राजकीय स्तर पर रजिस्टर्ड तक नही हुई अथार्त राज्य की पार्टी का दर्जा तक नही है। उंसके नौशिखिया व अभी अभी निकर से पेंट में आये कह रहे है कि वो "स्तब्ध" है यह देखकर। मुझे लगता है कि ज्यादा स्तब्ध मत होकर अपने साथ कुछ गलत मत कर लेना"
विकास कुमार जाटव
इलेक्ट्रोरल बॉन्ड के 400 पन्नों में बसपा का एक बार भी जिक्र नहीं है दैनिक भास्कर शायद यह बताना भूल गया.
बहुजन समाज पार्टी देश की इकलौती ऐसी राष्ट्रीय पार्टी है जो किसी बड़े उद्योगपति, कॉरप���रेट घराने या चंदे के धंधे पर नहीं चलती। #बसपा अपने स्वाभिमानी कार्यकर्ताओं, जमीनी कैडर और करोड़ों शोषित-वंचित समाज के लोगों के दम पर चलने वाला एक मिशन है। जब-जब शोषितों और बहुजनों की आवाज बुलंद होती है, तब-तब जातिवादी मीडिया घराने बौखलाकर इस आंदोलन को बदनाम करने की साजिशें रचने लगते हैं। यह तथाकथित स्टिंग उसी कुंठा का नतीजा है । जो मीडिया घराने सत्ता के गलियारों में बैठकर बड़े-बड़े घोटालों पर आंखें मूंद लेते हैं, वे आज एक स्वाभिमानी आंदोलन के खिलाफ मनगढ़ंत कहानियां गढ़ रहे हैं।
@bspindia का एक-एक कार्यकर्ता अपनी पार्टी, अपने नेतृत्व और अपने आत्मसम्मान की रक्षा करना अच्छी तरह जानता है। बिकाऊ मीडिया के ऐसे किसी भी प्रायोजित प्रोपेगैंडा से बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम जी के विचारों की यह मशाल बुझने वाली नहीं है ।
#मिशन_2027 पर टिके रहो साथियों