सपा विधायक अतुल प्रधान जी आज विधानसभा दूध लेकर पहुंचे है..
चढ़ावा चोरी के मामले को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि हमे कुछ दिन का समय दीजिए दूध का दूध पानी का पानी कर देंगे..
लेकिन अभी तक दूध का दूध पानी का पानी नहीं हुआ इसलिए आज अतुल प्रधान जी दूध लेकर विधानसभा पहुंच गय..😂😂
Started the season with belief. Ended with back to back titles. 🏆
This team lived every emotion together. The highs, the pressure, the hurdles, and the unwavering support. It feels extra special because… this place is HOME! ❤️ @RCBTweets
संसद में में सपा सांसद @IqraMunawwar_ की आवाज़ सामाजिक न्याय की मजबूत अभिव्यक्ति बनकर सामने आई। उन्होंने महिला आरक्षण के साथ OBC और वंचित समाज की महिलाओं के प्रतिनिधित्व का सवाल मजबूती से उठाया। उनका तर्क स्पष्ट था - महिलाओं की भागीदारी तभी सार्थक होगी जब उसमें समानता और न्याय का संतुलन हो।
वाह क्या कविता लिखी आनंद भदौरिया जी नें,
जो बात बोल के नहीं समझी जाती उसको कविता के माध्यम से बेहतरीन शब्दों में समझाया जा सकता है,
समाजवादियों का कोई मुकाबला ही नहीं 👌
"जिस तरह भारतीय जनता पार्टी उस बिल में और चीजों को छुपा कर ला रही थी उसका विरोध था। सेंसस चल रहा है, सेंसस पूरा हो जाए, उसके बाद इस बात को आगे बढ़ाते तो शायद सब पक्ष में होते।"
- माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव जी
'हम सबका तुम्हे समर्थन है, बस थोड़ा सा संशोधन कर दो'
'जो संख्या अभी है, उसमें ही आरक्षण दे दो'
◆ सपा सांसद आनंद भदौरिया ने सुनाई पंक्तियाँ
@BhadauriyaAnand | Women Reservation Bill || #WomenReservationBill
एक दौर था जब समाजवादी आंदोलन केवल सत्ता पाने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की मशाल हुआ करता था। उस दौर के नेता संसद में भी गर्जते थे और सड़कों पर भी संघर्ष करते थे। मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों को लागू कराने की लड़ाई हो या पिछड़ों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का सवाल - इन नेताओं ने हर कठिन मोड़ पर इतिहास में गहरी लकीर खींची।
लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, गोपीनाथ मुंडे और नीतीश कुमार जैसे नेताओं का तेवर देखिए - उन्होंने सत्ता को लक्ष्य नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का साधन माना। कुर्सी के लिए सिद्धांत नहीं बदले, बल्कि सिद्धांतों के लिए कुर्सी तक दांव पर लगा दी। उनके लिए राजनीति अवसर नहीं, सामाजिक परिवर्तन का संकल्प थी।
लेकिन समय की धारा में पिछड़ों की आवाज़ों में से कई आवाज़ें धीमी पड़ती चली गईं। संघर्ष की जगह समझौतों ने ले ली, और विचारधारा की जगह सत्ता की राजनीति ने। यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक न्याय की मूल भावना के लिए भी एक गंभीर चुनौती है।
महिला आरक्षण के सवाल पर भी समाजवादी परंपरा ने साफ कहा - जब तक आरक्षण के भीतर आरक्षण नहीं होगा, तब तक प्रतिनिधित्व अधूरा रहेगा। पिछड़ी और दलित महिलाओं के लिए अलग हिस्सेदारी की मांग केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि समान भागीदारी के लोकतांत्रिक सिद्धांत का प्रश्न है।
आज भी अनेक पिछड़े और दलित संगठन सत्ता के विभिन्न खेमों में मौजूद हैं। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि इतिहास केवल सत्ता के समीकरण नहीं देखता - वह यह भी दर्ज करता है कि किसने अपने समाज की आवाज़ बुलंद की और किसने उसे दबा दिया।
अंतरात्मा की आवाज़ कभी पूरी तरह ख़ामोश नहीं होती। सवाल केवल इतना है - क्या हम उसे सुनने का साहस रखते हैं? क्योंकि इतिहास का न्याय देर से होता है, पर होता ज़रूर है।
अभी अखिलेश यादव पर निशिकांत दुबे बेवजह टिप्पणी करने लगे,
सपा के सभी सांसद विरोध शुरू कर दिए, लेकिन किसी तरह जगदंबिका पाल जी ने मोर्चा संभाला।
शायद निशिकांत दुबे भूल गए हैं कि अब 5 नहीं बल्कि 37 सांसद बैठे हैं।
लेकिन फिर भी सिर्फ दो लाइन में अखिलेश यादव ने उनको रगड़ दिया 😂
ये समाजवादी पार्टी के नेता देवेंद्र कुमार गौतम है इतनी कम उमर इतनी मैच्योर बाते कर रहे हैं।
बाबा साहब की जयंती पर ईन्होंने समाज के लोगो से आग्रह किया कि आप बाबा साहब का संविधान पढ़िए, अगर आप नहीं पढ़ पा रहे हो तो अपने बच्चों को जरूर पढ़ाइए.
अखिलेश यादव जी एक मात्र ऐसे नेता है जो राजनीतिक फायदे के लिए अपने कार्यकताओं को किसी के प्रति नफरत करना नहीं सिखाते है।