1988 में राज्य प्रशासनिक सेवा में चयनl2006 बैच , भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रोन्नति। मेरे उपन्यास- ग्लोबल गाँव के देवता, गायब होता देश, गूँगी रूलाई का कोरस।
अखिल जन साहित्य में लोग सुनते थे और संवाद भी करते थे. कवि अखिल नायक की मां मंच पर आईं. कविता-कहानी से अलग जो आलेख लिखकर भी समाज की चेत��ा जगाने का काम कर रहे हैं, ऐसे व्यक्ति को सबने सम्मानित किया. यहां जो किताबें बिकीं वह राशि अखिल ट्रस्ट को गई. इस तरह यह जन साहित्य सम्मेलन हुआ.
कोविड के वक्त एक युवा आर्टिस्ट ओड़िशा के एक आदिवासी गांव में रह गए. कई दिनों तक. वह लोगों के हो गए. लौटने लगे तो उन्हें नाचते गाते हुए सबने विदा किया. वह शहर लौटकर बहुत रोए. आर्टिस्ट आशीष,बिकारी,सरोज जी ने अखिल जन साहित्य सम्मेलन का बैनर माटी से बनाया. लोग जुटे. सार्थक संवाद हुआ.
क्रूरता की संस्कृति से लबरेज समाज किसी भी तरह के फासीवाद के खिलाफ़ खड़ा होने का नैतिक साहस खो देता है. कैसे कोई समाज फासीवाद को जन्म देता है. अखिल जन साहित्य सम्मेलन,ओड़िशा में झारखंड के चर्चित उपन्यासकार, कथाकार, कवि रनेंद्र जी साहित्यिक सिद्धान्तकार ऐजाज़ अहमद को कोट करते हुए.
रणेन्द्र झारखंड के चर्चित उपन्यासकार हैं. कहते हैं " पूरे उत्तर भारत के हिंदी बेल्ट की मेधा आर्य किधर से आए और वेद के इर्द-गिर्द घूमती रही. जब कि देश के 90 प्रतिशत लोग द्रविड़, ऑस्ट्रो-एशियाई, साइनो-तिब्बतियन भाषा परिवारों से हैं" उनका वक्तव्य सुनना चाहिए.
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प्रिंसेप घाट..
लार्ड डलहौजी जब गपागप चेरी खा रहे थे, कलकत्ते की एशियाटिक सोसायटी में प्रिंसेप के मुरीदों ने 1853 में इस मेमोरियल को बनवाया।
���थेंस में एथेना के मंदिर की लगभग प्रतिकृति, हुगली के किनारे ये मेमोरियल अंग्र���जो ने बनाया, मगर इस शख्स का असल कर्जदार हिंदुस्तान का इतिहास है।
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महज 300 साल पहले भारत को अपने इतिहास का कोई ज्ञान नही था। न हम किसी मौर्य साम्राज्य को जानते थे, न सिंधु घाटी सभ्यता को..
इतिहास के नाम पर रासौ साहित्य था। वेद पुराण थे, गप्पें थी। जगह जगह सिर्फ भीम की लाठी, और पांडव गुफाएँ थी।
उसे कपोल गल्प से जमीन पर खड़ा करने वाले स्कॉलर्स, ब्रिटिश थे।
यह शर्म की बात है।
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जो "वामपन्थी इति���ासकार' आज गरियाये जाते हैं उनमें सबसे बड़े दो नाम है- जेम्स प्रिंसेप और जॉन मार्शल..
और इन दोनों का वामपंथ से कोई लेना देना न था। वे तो बस खोजी थे, उत्सुक थे, उत्कट इच्छा से भरे थे।
भारत के इतिहास ज्ञान का रोआँ रोआँ इन दोनों का, और इनके साथ लार्ड कर्ज�� का कर्जदार है।
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प्रिंसेप घाट आकर जेम्स प्रिंसेप को श्रद्धा से याद करना दरअसल, इतिहास के हर विद्यार्थी के लिए देवी सरस्वती को याद करने से कम नही।
यहाँ बस, यही सूझा।
तो यही लिखा।
कितनी सदियाँ देख पा रहे हैं..
दिल्ली, एक टाइम मशीन है। दुनिया मे कुछ ही शहर होंगे जिनमे एक साथ, अगल-बगल कई दौर खड़े है।
दिल्ली उनमे से एक है।
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महरौली जिसे कह��े है, इसके पीछे जो जंगल से देख रहे हैं, संजय उद्यान है। और इन जंगलों के बीच दिल्ली का पहला शहर है- लालकोट
और इसका केंद्र था- वो चबूतरा जिस पर लौह स्तम्भ लगा है।
वही, जिस पर जंग नही लगता। पहले नगर को बसाते समय इस चबूतरे को केंद्रबिंदु माना गया।
पास थे जैन मंदिर.. दिल्ली में बुद्धिस्ट नही थे, पर जैन पर्याप्त थे। लौह स्तम्भ के पास जैन मंदिर इस जगह की सबसे पुरानी इमारतें हैं।
दसवीं शताब्दी में यह��ं, बस यही था।
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300 साल तोमरो के हाथ रहने के बाद ये किला, चौहानो को गिफ्ट में मिला। 100 साल गुजर गए।
उन्हें हराया मोहम्मद घोरी ने। दिल्ली जीती, ताकत दिखाने को जैन मंदिर तोड़े, और उन्ही पत्थरो से मस्जिद तामीर की।
ये 1192 की बात है। अपने गुलाम कुतबुद्दीन ऐबक को शासन सौंपा, और लौट गया। 15 साल बाद वह गजनी में चल बसा।
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तो 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक आजाद हुआ। उसने कुतुब मीनार बनानी शुरू की। नीचे के दो मंजिल उसने बनवाई। मर गया..
उसके दामाद बाबू ने एक और मंजिल बनवाई। आपको तीसरी मंजिल गहरे लाल पत्थर की दिखेगी। वो इल्तुतमिश का बन��या हुआ है।
और बनाया पीछे का मदरसा- यही सामने कोर्टयार्ड, जिसमे जलसे होते। एक खास घटना होने वाली थी।
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वो अपनी बेटी को उत्तराधिकारी बना गया। मगर लड़की सुल्तान कैसे बन सकती है भला। उसके भाई को सुल्तान चुन लिया गया।
जलसे के दिन, रजिया लाल कपड़े में आई, और जनता से, अफसरों से फरियाद की। अपना हक मारे जाने को ��ेकर बढ़िया स्पीच दी।
जिसने लोगो का, नोबल्स का दिल जीता। रजिया सुल्तान बना दी गयी। कम से कम 4 साल वो सुल्तान रही।
लाल कपड़े पहन कर, सन 1230 के आसपास, उसकी डेयरिंग स्पीच इसी मदरसे के कोर्टयार्ड में हुई थी।
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गुलाम वंश के बाद, खिलजी शासन आया। चचा को मारकर अलाउद्दीन, शनशाह बना। वीर, क्रूर, और फोर्सफुल।
पहली बार दिल्ली सल्तनत ने दक्षिण में विस्तार किया, और उत्तर में मंगोलों को भारत मे घुसने से रोका। अलाउद्दीन न होता, तो आधा उत्तर भारत छोटी आंखों, चपटी नाक वाला होता, बुद्धिस्ट होता और मंगोली भाषा बोलता।
बहरहाल, अलाउद्दीन सल्तनत युग का नेपोलियन था। फिर उसका घमंड सर चढ़कर बोलने लगा।
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ऐसे तो अलाउद्दीन ने एक नया किला, अलग शहर बनाया। जिसे दिल्ली का तीसरा शहर, या सीरी फोर्ट कहते हैं।
मगर खास जगह तो महरौली थी। यहां उसकी निशानी चाहिए थी। कुतुब के ब��ल में एक मस्जिद बनाई। एक।मेहराबदार दरवाजा है, अलाई दरवाजा कहते हैं।
काम्प्लेक्स के दूसरी तरफ वो अपनी विजय मीनार बनवाने लगा। ये अलाई मीनार कुतुब मीनार से दोगुनी चौड़ी, दोगुनी ऊंची होनी थी।
आखिर वो सबसे बड़ा बादशाह जो था।
मगर भूल गया, उससे बड़ा बादशाह तो ऊपरवाला है। अधबीच में ऊपरवाले का बुलावा आया गया। अलाउद्दीन की मीनार सदा के लिए अधूरी रह गयी।
अधूरी बनी अलाई मीनार की एक मंजिल, उसके अध��रे सपने की दास्तान है।
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खलजी खत्म हो गए, तुगलक आये। गयासुद्दीन के बाद मोहम्मद बिन तुगलक, वही पागल बादशाह - सांकेतिक सिक्को, और राजधानी बदलने वाला..
जब वो मरा, तो सल्तनत युग का सबसे शानदार बादशाह आया। बादशाह फीरोज तुगलक..
फीरोज तुगलक ने पांचवी सिटी बसाई जिसे फिरोजशाह कोटला कहते हैं। नही, वो नाम बदल कर अरुण जेटली स्टेडियम की बात नही कर रहा।
वहीं पास में एक रुइन्स हैं, फोर्ट है। जिसे फिरोजशा��� कोटला कहते हैं। इस रुइन्स मे सम्राट अशोक का एक स्तम्भ है।
��हते हैं फिरोज उसे, अंबाला से उठवा कर लाया था। सेमल की रुई और मखमल में सुरक्षित कर 24 चक्के की बैलगाड़ी में लाकर बाइज्जत, अपने महल के सामने लगाया।
उसी फिरोजशाह कोटला के रुइन्स में भगतसिंह ने साथियों के साथ वो मीटिंग की जिसमे बम फोड़ने का प्लान बना था।
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बहरहाल, फिरोज तुगलक ने कुतुब मीनार की ऊपर की दो मंजिलें बनवाई।
आप जो संगमरमर का फ्लोर देख रहे है, वह फिरोज तुगलक का कराया निर्माण है। इसके ऊ��र कुछ पत्थर की जालियां (रेलिंग) अंग्रेजो की लगाई हुई हैं।
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यही कही एक सूफी की दरगाह है। दरगाह में बहादुरशाह जफर के वालिद दफनाए गए हैं। वहीं पास में एक खाली कब्र है..
इस कब्र में बहादुशाह को दफनाया जाना था। पर जलावतन बादशाह की तो मौत रंगून में हुई। दो गज जमीन भी न मिली कू ए यार में....
और वो न मिल सकी जमीन, यहाँ महरौली में है। उसका खालीपन मुगलिया दौर के अस्त होने का प्रतीक है।
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और अंग्रेजो का स���रज उग जाने का। दूर कहीं दिख रही इमारतें लुटियन जोन की हो सकती है।
क्या आपकी निगाहें एक ही तस्वीर में भारत के इतिहास का एक हजार साल देख रही हैं।
पुलिस का एक यह भी चेहरा।
मैं तो इनके व्यवहार का क़ायल हो गया हूँ। 🌸❤️
इस पुलिस वाले साहेब हो आप 10 में से कितना नंबर देंगे..?
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राँची में 18 से 24 दिसंबर, 2023 तक राजकमल प्रकाशन और डॉ. रामदयाल मुण्डा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में ‘किताब उत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है।
इस सात दिवसीय कार्यक्रम में आप सादर आमंत्रित है!
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उदयपुर जिले के लसाडिया में पुलिस द्वारा जातिगत अपमान करते हुए आदिवासी महिला के साथ मारपीट कर पैर तोड़ना बहुत ही शर्मनाक हरकत है।
माननीय @ashokgehlot51 महोदय, प्रदेश में आमजन में विश्वास और अपराधियों में डर का ठीक उल्टा हो रहा है, इसमें दोषी पु���िसकर्मियों को निलंबित किया जावे।
कला और संस्कृति के महाकुंभ में आप सभी का स्वागत!
इस राष्ट्रीय शिविर में केरल से हिमाचल के लगभग 80 आदिवासी और लोक चित्रकार भाग लेंगे जहां अद्भुत चित्रकारों की बेहतरीन पेशकश देखने को मिलेगी।
स्थान : पतरातू लेक रीसॉर्ट, झारखण्ड
दिनांक : 28 जनवरी से 3 फरवरी '23
@HemantSorenJMM
'Saheb Saheb ek topi': Tribal Icon Birsa Munda, after he quit missionary school. Became a healer, preacher and saw how the silent resistance of tribal chieftans between 1858-1896 did not bear any fruit. Then there was a call for 'Ulgulan'. @Ranendrakumar7
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#लाल_बहादुर_शास्त्री_जयंती प्रधानमंत्री की सच्चे मायनों में सहधर्मिणी ललिता जी अपनी रामरसोई में। मेरा सौभाग्य, कि यहां उनसे दो बार बातचीत की, उनके हाथ का अमृत तुल्य प्रसाद पाया।
ऐसी निष्कपट सादगी भरे युगल को सादर नमन।🌹🙏🌹