संसार में एकमात्र भगवान ऐसे हैं जो हर स्थिति में प्यार करते हैं।
और संसार में प्यार करने वाला तब तक प्यार करेगा जब तक उसे कुछ स्वार्थ की पूर्ति हो रही है।
जिस दिन स्वार्थ के पूर्ति बंद हो जाए वह तुम्हें ��ोड़ देगी
यही संसार का हकीकत है
संसार का प्यार झूठा है
संसार का सुख झूठ है।
मणिपुर का ये वीडियो देखा आपने ? ये वीडियो ट्वीट किया ?
नहीं करोगे क्योंकि इसमें मैतेई हिंदुओं के जले हुए शव पड़े हुए ���ैं जो तुम्हारे एजेंडे में फिट नहीं हैं.
ये वीडियो मणिपुर के मैतेई गांव Sugnu-Serou का है, जहां कुकी उन्मादियों ने Mid-June में हमला कर ��ूरे गांव को जलाकर राख कर दिया था.
क्या ये वीडियो उस वीडियो से कम बर्बर है, जिसमें दो महिलाओं के साथ बर्बरता की गई है?
इस वीडियो में जो जल हुए शव दिख रहे हैं, उसमें कई माताएं-बहनें हैं. आप लोगों को इनका दर्द सुनाई क्यों नहीं देता ?
भारत के लिब्रांडू, बॉलीवुड अभिनेता, क्रिकेटर्स इस वीडियो को ट्वीट या रिट्वीट करने की हिम्मत दिखा पाएंगे ?
ये समय आरोप-प्रत्यारोप नहीं बल्कि मणिपुर को जलने से बचाने क��� है, विकास की राह पर चल रहे मणिपुर को तबाह होने से बचाने का है लेकिन आपका फोकस इस पर है कि चाहे कितने भी लोग मर जाएं, तबाह हो जाएं लेकिन मोदी बदनाम हो जाए ताकि आप एजेंडा चला सकें
दो. पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।
बोली गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि ॥ ११९ ॥
अर्थ : बार बार प्रभु के चरण कमलों को पकड़कर गिरिजा मानो प्रेम रस से सानी हुई श्रेष्ठ वाणी बोलीं ।
व्याख्या : बार बार चरणस्पर्श से शिष्या की शुश्रूषा दिखलाई। अथवा चरणग्रहण से कर्मणा प्रेम, 'वचन वर' बोलने से बाचा और 'प्रेमरस सानि' से मनसा प्रेम दिखलाया ।
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी ॥
तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ ॥
अर्थ : चन्द्र की किरणों के समान आपके वचन सुनकर शरद ऋतु की धूप के समान मेरे मोह का भारी ताप मिट गया। हे कृ���ालु ! आपने सारे सन्देह हर लिये। मुझे रामजी का स्वरूप जान पड़ा ।
व्याख्या : शिवजी ने स्वयं कहा था: सुनु गिरिराजकुमारि, भ्रमतम रविकर वचन मम । परन्तु भगवती ने शीतलता का अनुभव किया। इसलिए कहती हैं कि : ससिकर सम सुनि गिरा तुम्हारी। शशिकर में मृगतृष्णा का भ्रम भी नहीं होता । अन्धकार भी ��िटता है और शरद काल की चित्रा(१) की कड़ी धूप का ताप भी मिटता है । यथा : सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई । सो उमा कहती हैं कि चन्द्र के किरण सी आपकी वाणी सुनकर मोहरूपी शरद काल की कड़ी धूप का ताप मिट गया। विनती की थी कि जेहि विधि मोह मिटै सोइ करहू । सो अब कह रही हैं कि मिटा मोह । चौथी विनती के उत्तर में ही सब संशय मिट गया। अतः पाँचवें विनय अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। के उत्तर की आवश्यकता नहीं रह ���ई । चन्द्र के किरण सी वाणी से मोहरूपी शरदातप का मिटना कह आई हैं। अब उससे संशयरूपी अन्धकार का नाश भी कहती हैं। और उसके प्रकाश में रामजी के स्वरूप की जानकारी का होना भी कहती हैं। शिवजी ने कहा था कि मुकुर मलिन अरु नयन विहीना । रामरूप देखह किमि दीना । सो कहती हैं कि तुम्ह कृपालु सब संसउ हरेक । रामसरूप जानि मोहि परेऊ । राम सच्चिदानंद दिनेसा से राम सो परमात्मा भवानी तक रामजी के स्वरूप का निरूपण शिवजी ने किया है। उसी पर कहा राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ।
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा ॥
अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड नारि अयानी ॥
अर्थ : हे नाथ ! आपकी कृपा से मेरा विषाद जाता रहा।आपके चरणों के प्रसाद से मैं सुखी हो गई। यद्यपि मैं स्वभाव से ही जड़ तथा अनजान स्त्री हूँ। फिर भी आप मुझे अपनी दासी जानकर:
व्याख्या: पहिले संशय के रहने से विषाद था । यथा: संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता । दुखद लहरि कुतर्क बहु व्राता। शिवजी के वचनों स��� संशय जाता रहा। उसी के साथ विषाद भी मिट गया। अतः कहती हैं नाथ कृपा अब गयउ विषादा । और रामजी के स्वरूप का ज्ञान हुआ । अतः कहती हैं सुखी भइउँ प्रभु चरन प्रसादा ।
सती से शिवजी ने कहा था: सुनहि सती तब नारि सुभाऊ । संसय अस न धरिअ उर काऊ । सो सती का शरीर छूटकर पार्वती देह मिलने पर भी वही संशय उठा । इसलिए अपना जड़त्व तथा अज्ञान स्वीकार करती हैं। अथवा पार्वती शरीर होने से अपने में जड़त्व और अज्ञान मान र���ी हैं। यथा: सत्य कहहु गिरि भव तनु एहा ��� हठ न छूट छूटे बरु देहा। फिर भी अपने को शिवजी की दासी मानती हैं। अपना निवास शङ्कर रूप कल्पवृक्ष के नीचे बतलाती हैं। इस भाँति श्रवण में अपना अधिकार द्योतित करती हैं।
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू ॥
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी ॥
अर्थ : हे प्रभो ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो जो बात मैंने आपसे पहिले पूछी थी उसे कहिये । रामजी ब्रह्म, चिन्मय और अविन���शी हैं। सबसे रहित और सबके उररूपी पुर में निवास करते हैं।
व्याख्या : अब शेष तीन विनयों के उत्तर की भी आवश्यकता नहीं रह गई। अतः पहिले प्रश्न की ओर ध्यान दिलाती हैं। यथा प्रथम सो कारन कहहु विचारी । निगुन ब्रह्म सगुन वपुधारी। और उसी बात को स्पष्ट करती हैं। ब्रह्म, चिन्मय, अविनाशी, सर्वरहित, सब उरपुर वासी। ये पाँचों विशेषण ऐसे हैं जिससे रामजी के नर तन धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं प्रतीत होती । और प्रयोजन क�� बिना कार्य में प्रवृत्ति होती नहीं । केवल इसी बात का उत्तर चाहती हैं।
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू ॥
उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता ॥
अर्थ : हे नाथ ! हे वृषकेतु ! यह समझाकर कहिये कि उन्होंने मनुष्य का शरीर किस कारण से धारण किया ? उमा के अत्यन्त विनीत वचन सुनकर और राम कथा पर पवित्र प्रेम देखकर :
व्याख्या : ब्रह्म, चिन्मय, अविनाशी, सर्वरहित और सर्वान्तर्यामी का नर शरीर धारण करना किसी भाँति उपयुक्त नहीं है। यदि शरीर धारण करना ही था तो देव शरीर धारण करते। नर देह तो भवपार उतरने के लिए है। यथा: नरतन भववारिधि कहूँ बेरो । परमेश्वर तो नित्य मुक्त हैं। उन्हें तो भवपार उतरना नहीं है कि नर शरीर धारण करें। अतः समझाकर कहने के लिए प्रार्थना करती हैं।
उमा के वचन परम विनीत हैं। यथा: सुखी भइउ प्रभुचरन प्रसादा। अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड़ नारि अयानी। तथा रामकथा पर पुनीत प्रेम है । यथा: नाथ धरेउ नर तनु केहि हेतू । मोहि समुझाइ कहहु वृषकेतु : वृषकेतु सम्बोधन का भाव यह है कि आप वृषकेतु हैं। वृषो हि भगवान् धर्मः । भगवान् धर्म ही वृष है। अतः ��प धर्म की सूक्ष्म गति जानते हैं। नरतन धारण करने में भी धर्म ही कारण होगा। सो आप बतला सकते हैं। प्रीति पुनीत स्वार्थरहित प्रीति का ग्रहण है। यथा: प्रीति पुनीत भरत के देखी । सकल सभा सुख लहेउ बिसेखी।
दो. हिँयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान
बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान ॥ १२०(क) ॥
अर्थ : कामदेव के शत्रु, सुजान, कृपानिधान शिवजी मन में प्रसन्न हुए और उमा की अनेक विधि से प्रशंसा करके ��िर बोले ।
व्याख्या : शिवजी कामारि हैं। भक्ति देखकर ही हर्षित होते है। सहज सुजान हैं। अतः विनीत वचन से सुखी होते हैं। विधि से प्रशंसा की। पहले कृपा करके
रामकथा पर प्रीति देखकर उन्होंने बहु संशय हरण कर लिया। फिर भी कृपा करके शेष विनयों का उत्तर देते हैं। किसी विनय की उपेक्षा नहीं होने देते अतः कृपानिधान कहा ।
सो. सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।
कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड ॥ १२०(ख) ॥
संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।
सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ ॥ १२०(ग) ॥
��रि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु ॥ १२०(घ ॥
अर्थ : हे भवानि ! रामचरितमानस की शुभ कथा सुनो जिसे कागभुसुण्डि ने वखानकर कहा था और पक्षिराज गरुड़जी ने सुना था। .
वह उदार संवाद जिस भाँति हुआ इसे मैं आगे कहूंगा। अभी तुम रामचन्द्रजी के अवतार का परम सुन्दर और पापरहित चरित सुनो।
हरि के गुण और नाम अपार हैं। कथा के रूप भी अगणित और असीम हैं। हे उमा ! मैं अ��नी बुद्धि के अनुसार कहता हूँ । आदर पूर्वक सुनो।
व्याख्या : अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। इस पाँचवें विषय का उत्तर पाँचवें सुनु शब्द से सूचित करते हैं। भाव यह कि
प्रसङ्ग प्राप्त बचे बचाये संशय के निरसन के लिए गरुड़ भुसुण्डि संवाद अन्त में कहेंगे। यहाँ से चारों घाट की कथाएँ प्रारम्भ हुईं ।
कहहु पुनीत रामगुन गाथा । इस छठे विनय का उत्तर देते हैं। कहते हैं कि वह संवाद उदार है । अर्थात् सुन्दर है । यथा: उदार अंग विभूषणम् । भाव यह कि इस कथा का ऐमा ��ाहात्म्य है कि यदि काक प्रेम से कथा कहने बैठे तो विहङ्गनायक साक्षात् प्रभु की विभूति गरुड़ सुनने के लिए आजावें । इस समय रामकथा कहेंगे। भुसुण्डि गरुड़ संवाद होने की विधि आगे चलकर कहेंगे। क्योंकि उक्त संवाद में ही उमा के चार प्रश्न नवें, दशवें, ग्यारहवें और बारहवें का उत्तर है । इस समय उन्हें कहने से उत्तर का क्रम भङ्ग हो जायगा ।
बरनहु रघुवर बिमल जस। इस सातवें विनय का उत्तर देते हैं कि हरि ��े असीम होने से उनके नाम और गुण भी अपार हैं। कल्प भेद हरि चरित सोहाए । भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए। कल्प कल्प प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नाना विधि करहीं । अतः कथारूप अगणित हैं। और उनमें से एक एक का रूप अमित है। ऐसी अवस्था में मति अनुसार ही कहा जा सकता है। अब सादर सुनने के लिए आज्ञा देते हैं । सादर न सुनने से कथन का प्रभाव नहीं पड़ता । यथा एहि विधि अमित जुगुति मन गुनेऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनेऊँ। ���र कथा का अनादर होता है।
सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद ��िगमागम गाए ॥
हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई ॥
अर्थ: हे पार्वती सुनो ! वेद और शास्त्रों ने भगवान् के सुन्दर, विस्तृत और निर्मल चरित का गान किया है। हरि का अवतार जिस कारण होता है वह कारण यह है और ऐसा ही है। इस रूप से नहीं कहा जा सकता ।
व्याख्या : रघुपति कथा कहहु करि दाया। इस आठवें विनय का उत्तर देते हैं। सुहावा न कहकर बहुवचन सुहाए का प्रयोग करते हैं। अर्थात् एक कल्प की कथा कहेंगे��� यह दिखलाने के लिए कि लीलाएँ सामान्यतः एक रूप की होती हुई भी विस्तार में प्रत्येक की विशेषता है।
प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन वपुधारी अथवा सर्व रूप सब रहित उदासी । नाथ धरेहु नर तनु केहि हेतु मोहि समुझाइ कहहु वृषकेतू । ये दोनों प्रश्न एक ही हैं और एक ही मानकर उमा ने पूछा है। यथा प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहु । उसी प्रथम प्रश्न का उत्तर आरम्भ होता है । इदमित्थम् का अभिप्रा��� यह है कि निश्चय करके एक कारण का नाम नहीं लिया जा सकता ।
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी ॥
तदपि संत मुनि बेद पुराना। ज�� कछु कहहिं स्वमति अनुमाना ॥
अर्थ : हे भवानी ! सुनो मेरा मत तो यह है कि रामजी में बुद्धि मन और वाणी से तर्क चल नहीं सकता। फिर भी सन्त, मुनि, वेद और पुराण जैसा कुछ अपनी बुद्धि की गति के अनुसार कहते हैं :
व्याख्या: राम में तर्क की गति नहीं है। यदि तर्क की गति होती तो उनके अवतार के विषय में इदमित्थम् कुछ कहा जा सकता था। बुद्धि, मन और वाणी द्वारा ही तर्क की प्रक्रिया होती है। सो बुद्धि, मन और वाणी की गति समीप : परिच्छिन्न पदार्थों में होती है। अनादि अनन्त पदार्थ बुद्धि में आ ही नहीं सकता। किं पुनः राम सर्वाश्चर्यमय देव में यथा सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् । वहाँ न चक्षु की पहुँच है न वाणी की पहुँच है न मन की पहुँच है। हमलोग नहीं जानते कि उसे कैसे बतलावें । वह जाने हुए और न जाने हुए से पृथक् हैं। यथा : न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि । श्रुतिः । इसलिए शिवजी कहते हैं कि रामजी बुद्धि मन वाणी से अतर्क्यं हैं । अतः उनके अवतार के विषय में भी तर्क नहीं चल सकता। ��हाँ पर मुनि, वेद, पुराण तथा सन्तों का कथन भी उनकी बुद्धि की गति के अनुसार ही माना जायगा । इदमित्थं कहने की उन्हें भी योग्यता नहीं है । उमा ने अपने को जदपि सहज जड़ नारि अयानी कहा था। अतः शिवजी उनका प्रोत्साहन करते हुए सयानी कहकर सम्बोधन करते हैं।
(१) जब सूर्य चित्रा नक्षत्र पर जाते हैं उस समय की धूप कड़ी कही जाती है।
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Goa inquisition ( हिंदुओं का नरसंहार )
"हिन्दू स्त्रियों के स्तनों को धारदार हथियारों से काट दिया गया। गरम लाल चिमटों से शरीर के मांस निकाले गए। लाल गर्म सरिया महिलाओं की योनि और पुरुषों के मलद्वार में डाले गए। उनके शरीर पर तेजाब डाला गया"और यह सब कुछ सिर्फ धर्म परिवर्तन के लिए।
8 मार्च 2024 महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर आगामी ‘’पंचम कन्या विवाह महोत्सव’’ के आमंत्रण हेतु पूज्य बागेश्वर धाम सरकार आज भारत की प्रथम नागरिक और राष्ट्रपति महामहिम द्रौपदी ��ुर्मू जी से मिलने राष्ट्रपति भवन पहुँचे…