हार्दिक बधाई सिद्धार्थ! उत्तर प्रदेश पुलिस का रंगरूट बनने के लिए। तुम्हारा परिश्रम रंग लाया। 147 रैंक भी शानदार उपलब्धि है।
इटावा में तुम्हारा समूह सफल रहा। तुम सभी के सभी उत्तीर्ण हुए। सबको बधाइयां।
#UPPolicelnNews
Delighted to address the 60th Annual Convention of ISAE at SKUAST-Kashmir. The themes- "Women-led Engineering Innovations in Smart Farming & AI and Robotics for Gen-Z Farming" reflect our resolve to move beyond food security towards global leadership in agriculture.
Women are the backbone of agriculture and allied sector and their leadership in innovation will shape a sustainable future. Together, let us empower small and marginal farmers with accessible technology.
विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। सृजन एवं शिल्प के देवता भगवान विश्वकर्मा जी सभी के जीवन में सुख-समृद्धि, उन्नति, खुशहाली एवं आरोग्य का आशीर्वाद प्रदान करें, ऐसी प्रार्थना करता हूँ।
स्कूल की टाइमिंग को लेकर मेरे ट्वीट पोस्ट की बहुत सराहना हुई। थोड़ी सी आलोचना भी। लेकिन अधिकांश लोगों ने स्वीकार किया कि वर्तमान टाइमिंग निश्चित करने में कोचिंग सेंटर की अहम भूमिका है। कोचिंग का ज्वर कुसंग के ज्वर से भी भयानक है। दुर्भाग्य से यह बीमारी सबको लगी हुई है। महंगी से महंगी शिक्षा देने वाले निजी विद्यालयों के बच्चे बिना ट्यूशन और कोचिंग के नहीं रह रहे हैं।
बहुत से लोगों का कहना है कि सरकारी विद्यालय अक्षम हैं इसलिए कोचिंग फल फूल रहे हैं। यदि ऐसा है तो निजी विद्यालयों के बच्चे कोचिंग क्यों जा रहे हैं? कोचिंग सेंटर का नेक्सस इतना जब्बर हो गया है कि आप इनसे बच नहीं सकते। यह लोग हर जगह काबिज हैं और अशक्त तथा अक्षम लोगोंको विभिन्न ट्रिक और सेटिंग के बूते जिम्मेदार पदों पर बिठा दे रहे हैं। इनका गठजोड़ बहुत मजबूत हो गया है।
इसका उपाय यही है कि इन कोचिंग सेंटर पर प्रतिबंध लगाया जाए। कितनी विडंबना की बात है कि सरकारी विद्यालय के अध्यापकों को कोचिंग पढ़ाने से रोका जा रहा है लेकिन निजी सेंटर्स को खुली छूट दी गई है। उनको जांचने, समझने का कोई निगरानी तंत्र भी नहीं है। उच्चाधिकारी उनके प्रभाव में हैं।
मैं #SchoolEducation के सम्बन्ध में पुरजोर सिफारिश करूंगा कि कोचिंग संस्थान बंद किए जाएं। इन्हें चलाना अपराध माना जाए।
इसके बाद विद्यालय, शिक्षा आदि की व्यवस्था पटरी पर आ जाएगी।
आप क्या कहते हैं? अपनी राय से अवगत कराएं। सहमत/असहमत भी लिख सकते हैं।
आज जिलेबी खाने के लिए एक प्रतिष्ठित दुकान पर गया तो जब तक छनती और मुझे मिलती, मैं अपने परिवेश का जायजा लेने लगा। वहां एक राष्ट्रीय स्तर की कोचिंग का संचालन होता है जो iit/neet की तैयारी करवाता है। एक बालिका आई, मिष्ठान्न भंडार में जाकर उस कोने में खड़ी हो गई जहां चिप्स/कुरकुरे आदि मिलते हैं। अवश्य ही वह कोई पैकेटबंद फूड खरीदेगी और यही उसका ब्रेकफास्ट होगा।
दो बच्चे आए, कोचिंग में पढ़ने वाले। वहीं रखी कुर्सियों पर बैठ गए। शहर के एक नामी स्कूल दिल्ली पब्लिक स्कूल के दसवीं के विद्यार्थी थे। आज रविवार है तो कोचिंग नौ बजे से है। अन्य दिनों में चार बजे से आठ बजे तक रहती है।
मैंने उनसे पूछा कि घर में कब रहते हो? उसने शायद कभी विचार नहीं किया था। मुस्करा कर बोला - रात को। फिर उसे याद आया कि वह आठ बजे घर जाता है, खाकर सो जाता है और सुबह स्कूल के लिए भागते हुए बस में सवार हो जाता है।
वह खेलता कब है?
उसे याद नहीं है। स्कूल में रहते हुए जितना खेल लेता है उतना ही उसके हिस्से में क्रीड़ास्थल है। फिर दो और बच्चे आए। अभी सोकर उठे ही होंगे क्योंकि लक्षण उसी के अनुरूप थे।
खैर! हमने बच्चों को एकदम से दबा रखा है। उनपर कैरियर का भारी दबाव है। वह डॉक्टर, इंजीनियर बनकर या कार्पोरेट जगत में जाकर नाइन टू नाइन ड्यूटी करते हैं और सोचते हैं कि हम सफल हैं।
सरकार भी शिक्षा नीति बना बना कर हलकान है। कोई समाधान नहीं मिलता।
कोचिंग पर रोक लगा दीजिए। कई समस्याएं सुलझ जाएंगी।
मुझे बच्चों के विद्यालय की टाइमिंग 7:00AM-2:00PM आज तक समझ में नहीं आया। बच्चों की सुबह कभी भी सुखद और सुकून वाली नहीं होती। वह सोकर उठते ही विद्यालय की चिंता करने लगते हैं। न संध्या वंदन और न योगाभ्यास आदि! ठीक से कलेवा करने का अवसर भी नहीं रहता। शायद ही कोई बच्चा पाठ पढ़कर विद्यालय जाता हो, जिसे अध्यापक कक्षा में पढ़ाएंगे!
खड़ी दुपहर को वह लौटते हैं। उन्हें ठोक पीटकर सुलाया जाता है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक नहीं है।
यदि कोई ध्यान से देख रहा है तो वह इस समय सारिणी में बदलाव करने पर विचार करे। सही समय 10 से 4 का ही है।
और हाँ, कोचिंग बंद करो!
#SchoolEducation
सुबह उठते ही विद्यालय की तैयारी में लगे बच्चे के पास इतना समय भी नहीं होता कि वह भगवान जी के समक्ष एक अगरबत्ती जलाकर खड़ा हो जाए। उसे
"कराग्रे वसते लक्ष्मीः,करमध्ये सरस्वती!
करमूले स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते करदर्शनम्॥"
श्लोक याद करा दो तो उसके पास समय नहीं कि वह इसे दोहरा ले। वह इसके प्रभाव को कभी अनुभूत न कर सकेगा। उसके पास सूर्य नमस्कार करने का समय नहीं है। व्यायाम करने का समय नहीं है। जो पाठ उसे सीखना है, उसे देखने का समय नहीं है। कोई खेल खेलता है तो उसके अभ्यास का समय नहीं है।
बच्चा उठता है और जल्दी जल्दी हॉर्लिक्स अथवा चौकोस मिला हुआ दूध पीता है। यही उसका नाश्ता है। पौने छह बजे बच्चा खाए भी तो क्या? जल्दी जल्दी उसका टिफिन रेडी होता है और वह लेकर विद्यालय चला जाता है।
जिन बच्चों को खिलाने में मां, दादी नखरे उठाती हैं और संतान सुख प्राप्त करती हैं, उन बच्चों को एक डिब्बे में रोटी/परांठा ठूंस कर थमाकर भेज दिया जाता है। वह जाने कैसे खाता है, जाने कैसे भोजन मंत्र करता है, किसी को नहीं पता!
इसलिए सुबह सुबह विद्यालय भेजने का यह तरीका अपसंस्कृति का परिचायक है। यह ऐसी पीढ़ी का निर्माण कर रही है जिसने जीवन जीने का सुसंस्कृत ढंग नहीं जाना।
मैं कहूंगा कि सुबह के शिफ्ट में 7:00-2:00 बजे तक के विद्यालय की टाइमिंग बंद करो! बच्चों से उनका बचपन और सीखने का समय न छीनो।
और हाँ, कोचिंग बंद करो।
#SchoolEducation
सुबह उठते ही विद्यालय की तैयारी में लगे बच्चे के पास इतना समय भी नहीं होता कि वह भगवान जी के समक्ष एक अगरबत्ती जलाकर खड़ा हो जाए। उसे
"कराग्रे वसते लक्ष्मीः,करमध्ये सरस्वती!
करमूले स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते करदर्शनम्॥"
श्लोक याद करा दो तो उसके पास समय नहीं कि वह इसे दोहरा ले। वह इसके प्रभाव को कभी अनुभूत न कर सकेगा। उसके पास सूर्य नमस्कार करने का समय नहीं है। व्यायाम करने का समय नहीं है। जो पाठ उसे सीखना है, उसे देखने का समय नहीं है। कोई खेल खेलता है तो उसके अभ्यास का समय नहीं है।
बच्चा उठता है और जल्दी जल्दी हॉर्लिक्स अथवा चौकोस मिला हुआ दूध पीता है। यही उसका नाश्ता है। पौने छह बजे बच्चा खाए भी तो क्या? जल्दी जल्दी उसका टिफिन रेडी होता है और वह लेकर विद्यालय चला जाता है।
जिन बच्चों को खिलाने में मां, दादी नखरे उठाती हैं और संतान सुख प्राप्त करती हैं, उन बच्चों को एक डिब्बे में रोटी/परांठा ठूंस कर थमाकर भेज दिया जाता है। वह जाने कैसे खाता है, जाने कैसे भोजन मंत्र करता है, किसी को नहीं पता!
इसलिए सुबह सुबह विद्यालय भेजने का यह तरीका अपसंस्कृति का परिचायक है। यह ऐसी पीढ़ी का निर्माण कर रही है जिसने जीवन जीने का सुसंस्कृत ढंग नहीं जाना।
मैं कहूंगा कि सुबह के शिफ्ट में 7:00-2:00 बजे तक के विद्यालय की टाइमिंग बंद करो! बच्चों से उनका बचपन और सीखने का समय न छीनो।
और हाँ, कोचिंग बंद करो।
#SchoolEducation
रिलीज होने के लिए रेडी रामायण के संवाद कुमार विश्वास ने लिखे हैं। वैसे तो कुमार विश्वास विगत कई वर्षों से रामकथा कह रहे हैं और माना जा सकता है कि उन्होंने रामकथाएं पढ़ी होंगी। मैंने उन्हें साकेत और राम की शक्तिपूजा से भी वाचन करते सुना है।
लेकिन स्पष्ट रूप से कहना हो तो कहा जाएगा कि कुमार विश्वास ने रामायण के पात्रों के साथ खच्चड़पन किया है। ट्रेलर देखकर कोई भी श्रीराम और भारत की उज्ज्वल परम्परा का प्रेमी दुःखी हो जाएगा।
मुझे कुमार विश्वास को और उनके लिखे संवाद को देखकर केशवदास की स्मृति हो आई। कहते हैं कि केशवदास बहुत प्रतिभा संपन्न थे। उनकी रचना रामचंद्रिका में इतने छंद हैं कि उसे छंदों का अजायबघर कह दिया गया है। रामचंद्र शुक्ल ने तो कहा है कि केशवदास को कवि हृदय नहीं मिला था। और दरबार में रहते हुए केशवदास प्रदर्शनप्रिय हो गए थे।
कहना यह है कि कुमार विश्वास भी इसी तरह के बहुरूपिए हैं। वह दीवाना कहता है, पागल समझता है तो गा सकते हैं, रामायण की कहानी को पात्रों के मुंह से नहीं सुनवा सकते।
आज यदि #ArgentinaVsEspaña में #LionelMessi की टीम #Spain को हरा दे और मैसी हैट्रिक लगा दें तो फ्रांस और इंग्लैंड के मुंह पर कालिख लग जाए। हालांकि स्पेन की टीम खिताब डिजर्व करती है लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यही उचित है कि अर्जेंटीना #fifaworldcup2026 जीते। इसी के साथ #Falkland का विषय दुनिया के समक्ष आए। लोग जानें कि ब्रिटेन 12 हजार किमी दूर के परिक्षेत्र पर अपना कब्जा बता रहा है और अभी भी देशों पर कब्जा जमाये बैठा है।
हैरी केन आज तीसरे स्थान के लिए हुए मुकाबले में नहीं उतरे थे। #Mbappe उतरे , केवल गोल्डन बूट की चाहत में। सारी सेटिंग ध्वस्त हो जाएगी, यदि अर्जेंटीना बम्पर जीत हासिल करेगा।
हम #Final मैच में अच्छा खेल देखना चाहते हैं! यही स्वाभाविक है।
मैंने सिनेमा की दुनिया के लोगों के गरीबी के किस्सों के बारे में सुना है। लगभग सभी गरीब लोगों की एक ही कहानी होती। उनके घर का कोई बीमार होता। बिल चुकाने को पैसे नहीं होते। फिर कोई आता और उबार लेता।
उस गरीब के पास किसी दिन एक रुपए होते।
वो फ्लॉप हो जाता।
फिर उसके लिए कोई राजकपूर आ जाता। कोई धर्मवीर भारती कमलेश्वर अथवा जगजीत सिंह।
एक दिन मथुरा में था तो एक सज्जन शैलेन्द्र और राजकपूर की यही कहानी सुना रहे थे। हमने कह दिया कि यह रूढ़ि है तो वह नाराज हो गए।
आज राही मासूम रजा के बारे में एक वृत्तचित्र देख रहा था तो वहां भी इसी तरह की बात चल रही थी। जबकि मैं जानता हूं कि राही मासूम रजा ने मस्त जीवन जिया।
फिल्मी दुनिया में काम कर चुके प्रेमचंद की गरीबी के किस्से तो किंवदंती बन चुके हैं।