“ऊँच-नीच जात-पात के आधार पर सोचना भी पाप है। संघ के स्वयंसेवकों के मन में ऐसे घृणित और समाज विघातक विचारों को कभी स्थान नहीं मिलना चाहिए। हिन्दुस्थान के प्रति भक्ति रखने वाला प्रत्येक हिन्दू मेरा भाई है - यही दृढ़ भावना प्रत्येक स्वयंसेवक की होनी चाहिए।” -डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
“ऊँच-नीच जात-पात के आधार पर सोचना भी पाप है। संघ के स्वयंसेवकों के मन में ऐसे घृणित और समाज विघातक विचारों को कभी स्थान नहीं मिलना चाहिए। हिन्दुस्थान के प्रति भक्ति रखने वाला प्रत्येक हिन्दू मेरा भाई है - यही दृढ़ भावना प्रत्येक स्वयंसेवक की होनी चाहिए।” -डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
पू. सरसंघचालक मोहनजी भागवत और मा. सरकार्यवाह भय्याजी जोशी का वक्तव्य:
"रा.स्व.संघ देश की प्रभुसत्ता,अखंडता एवं आत्मसम्मान की रक्षा हेतु लद्दाख के गलवान घाटी क्षेत्र में सीमाओं की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देकर वीरगति को प्राप्त करने वाले सैनिकों को श्रद्धावनत नमन करता है।.."
"RSS pays homage to those valiant soldiers who made the supreme sacrifice in line of duty,at the borders in the Galwan Valley region of Ladakh to protect the sovereignty, integrity & dignity of the nation."- Stmt by Sarsanghchalak Dr.Mohanji Bhagwat & Sarkaryavah, Bhaiyaji Joshi
पू. सरसंघचालक मोहनजी भागवत और मा. सरकार्यवाह भय्याजी जोशी का वक्तव्य:
"रा.स्व.संघ देश की प्रभुसत्ता,अखंडता एवं आत्मसम्मान की रक्षा हेतु लद्दाख के गलवान घाटी क्षेत्र में सीमाओं की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देकर वीरगति को प्राप्त करने वाले सैनिकों को श्रद्धावनत नमन करता है।.."
वीर सावरकर भारत की आजादी के संघर्ष में एक महान ऐतिहासिक क्रांतिकारी थे। वह एक महान वक्ता, विद्वान, विपुल लेखक, इतिहासकार, कवि, दार्शनिक और सामाजिक कार्यकर्ता थे। सावरकर दुनिया के अकेले स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्हें… https://t.co/SZtQlzGA03
सफलता और अवसान
.पू. 1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने… https://t.co/UNYsuyFQT1
मजदूर सड़कों पर हैं। लाखों की संख्या में। वे घर वापसी कर रहे हैं।कंधे पर बच्चे,साथ में परिवार।सैकड़ो किमी का सफर।इनमें से कई की कहानियां तो इतनी हृदयविदारक हैं की न तो कहते बनती है न ही सुनते। ज्यादातर मजदूर पैदल ही चल रहे हैं।चप्पलें टूट गई हैं,नंगे पैरों में छाले पड़ गये है।
पर रुकना नहीं है।इस दौरान हुए हादसों में कई मजदूरों की जान भी चली गई।उधर सरकारें भी चिंतित हैं।केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हमने मजदूरों के लिए श्रमिक ट्रेनों की व्यवस्था की है। कई राज्य अपनी सीमा तक उन्हें बसों में छोड़ रहें है। पर उसके बाद कोई सुविधा नहीं है।
लॉकडाउन के 53 दिनों बाद भी लाखों मजदूर ऐसे हैं जिनकी ट्रेनों में चढ़ने की बारी नहीं आयी।ऐसे में उनके पास पैदल चलने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।वहीं कुछ ऐसे लोग भी है जो विदेशों से लाये जा रहें हैं ।वे भी घर वापसी कर रहे हैं उनके लिए विमानों की व्यवस्था की गई है।
आज हमें इन मजदूरों के लिए और सवेंदनशील होकर सोचने की जरूरत है।बहुत से छोटे छोटे प्रयास स्थानीय स्तर पर किये जा रहे हैं।कोई इन्हें पानी पिला ला रहा है, कोई खाना खिला रहा है, जूते चप्पल भी मुहैया कराने की कोशिश जारी है।पर इतने से संकट का निदान नहीं होगा।
सरकारों को ठोस उपाय करने होंगे।इनकी आंखों के आँसू भी पोछने होंगे और बेहतर भविष्य के लिए दिलासा भी देनी होगी।आखिर हमारे जीवन के तमाम सुखों को साकार करने में इन मजदूरों की अहम भूमिका है।इन्होंने अपना पूरा जीवन देश के निर्माण में होम कर दिया है।