कुछ दिन पहले IAS से त्यागपत्र दिया था और आपके मन में कई सव��ल छोड़ दिए थे। अपनी बात इस वीडियो में कह दी है। अगर आपको लगे कि ये आपकी भी बात है, तो 9198956957 पर whatsapp मैसेज करिए।
डियर कॉमरेड,
तुम्हारा जन्म दिन आ गया है और हर साल की तरह इस बार भी तुम बहुत याद आए। रम के पेग अकेले लगाने की तमन्ना नहीं है लेकिन तुम्हारी ग़ैर मौजूदगी में कोई और चारा भी नहीं है। उम्मीद है बिस्मिल,अशफ़ाक, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर और आज़ाद के साथ कल रात अच्छी पार्टी हुई होगी। तुम से तो यह भी नहीं पूछ सकता कि जन्नत कैसी होती है, तुम तो नास्तिक हो। क्या पता तुम इंद्र की सभा में भी किसी दिन बम फेंक आओ। पिछले साल तुम्हारी जेल डायरी मिली थी, यार गज़ब की किताबें पढ़ते हो, और ये बताओ बिना इंटरनेट के इतनी किताबें मिल कैसे जाती थीं तुम्हें? लाइब्रेरियन को कैसे मना लेते थे? यहाँ तो अब न लाइब्रेरियन है न लाइब्रेरी है। ख़ैर छोड़ो! आज तो कॉमरेड, तुम्हा���ा जन्म दिन है, कुछ तुम्हारी बात करता हूँ। मुझे लाहौर का हाल चाल मिला, कुछ दोस्त सरहद उस पार बनाए हैं मैंने, तुम्हारा घर लायलपुर बिलकुल महफूज़ है वहाँ और लाहौर यूनिवर्सिटी भी, कभी आना तो साथ में पंजाब घूमेंगे। खेतों में बंदूक़ वाली फ़सल अभी भी बाक़ी है लेकिन गुज़रे दिनों खेतों में कुछ काले कानून उग आए थें, उनको साफ़ किया है। बिस्मिल से कहना की गोरखपुर उनको रोज़ याद करता है, आज़ाद कंपनी गार्डन में अगर कभी टहलने आएँ तो बता देना मैं भी सुबह जल्दी उठ कर सैर पर निकल पडूँगा। ख़ैर! तुम को एक नई बात बताता हूँ, तुम हिंदुस्तान से प्यार करते हो लेकिन अब लोग हिंदुस्तान बोलने में शर्म महसूस कर रहे हैं, कुछ बुरा हो गया है तुम्हारे हिंदुस्तान के साथ लेकिन घबराने की ज़रूरत नहीं है कॉमरेड, हम हैं ना, लड़ रहे हैं, तुम्हारे जज़्बे के साथ। तुम्हारा ड्रीम लैंड हमारा होम लैंड है ।
पिछली बार तुमने पूछा था गांधी के हत्यारों का क्या हुआ?
कॉमरेड, ये सवाल तुम न ही पूछते तो अच्छा था। तुम्हारा तहरीर किया ग़ालिब का शे'र याद आया -
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
अच्छा एक बात तो बतानी ही रह गई है, मैंने पिछले साल फिलोसॉफी पढ़नी शुरू की है, तुम्हारी तरह किताबों का शौक़ पाल लिया है । कुछ कुछ लिखता भी रहता हूँ, अगर कभी ग़ालिब और मीर से फुरसत मिले तो काफ़ को मौक़ा देना, तुमको अपनी ग़ज़लें सुनाने का बहुत मन है। इस सिलसिले में पिछले हफ़्ते मैंने एक ख़ाब भी देखा है, लाहौर यूनिवर्सिटी में किसी शाम तुम एक जो़रदार भाषण देकर सी���़ियों से उतर रहे हो और दोस्तों ने तुमको घेर रखा है, तुम मेरे साथ कैम्पस से बाहर आते हो और हम किसी खुफ़िया जगह पे ओल्ड मॉन्क के पेग लेकर बैठे हैं तुम ग़ालिब की ग़ज़ल सुना रहे हो और आज़ाद दाद दे रहे हैं। पंडित शराब की बात पर बिस्मिल हो गए हैं। और फिर तुम मुझसे कहते हो काफ़ कोई ग़ज़ल सुनाओ जानी।
कॉमरेड तुम याद आते हो, बेशुमार याद आते हो ।
तुम्हारा जानी
काफ़
धर्म से बड़ा देश होता है। मातृभूमि होती है। सिख धर्म में बाल कटवाना वर्जित है, लेकिन अपने देश के लिये मैं बाल तो क्या गर्दन भी कटवा सकता हूँ।
~ शहीद भगत सिंह
अपने हक़ के लिए खड़ा होना सीखो!
करोड़ों भारतीय महिलाएँ आज भी दबी-कुचली, सहमी ज़िंदगियाँ बिता रही हैं। अपने हक़ के लिए खड़े होना सीखो। आवाज़ उठाने का मतलब है-जो सही है, उस पर अडिग रहना। घर में हो या कॉलेज में, सच के साथ बेवफ़ा�� स्वीकार नहीं की जा सकती।
आत्मनिर्भर औरत के चेहरे पर डर नहीं होता
दक्षिण में आपको महिलाएँ ऑटो चलाती, पेट्रोल पंप पर काम करती, बस चलाती और बस में कंडक्टर का काम करती दिख जाएँगी। उनका अपना बैंक अकाउंट है, अपनी आमदनी है, अपने अधिकार हैं। उन्हें हर समय “खूबसूरत दिखो, वरना तुमसे शादी कौन करेगा?” वाले दबाव में नहीं जीना पड़ता। वह शिक्षित है और कहती है - “कोई मुझे छोड़कर चला जाए, जाने दो, मैं अपने लिए कमा लूँगी।” यही उनके चेहरे पर एक स्वाभाविक आत्मविश्वास लाता है।
बिहार की भाजपा सरकार जवाब दे - एक बेटी को सड़क पर हाथ जोड़���र अपनी सुरक्षा की भीख क्यों माँगनी पड़ी?
‘बेटी बचाओ’ के नारे मंचों से बहुत गूँज चुके। सवाल अब सीधा है - आख़िर कब तक बेटियाँ डर में जीएँगी और सरकार सुरक्षा की जगह सिर्फ़ नारे देती रहेगी?
New phone, new EMI… same old bills! 😂 Maybe it’s time we queue up to make a difference, not just upgrade our phones. The real upgrade is a better society. ❤️
प्रकृति को खुद से अलग मानोगे, तो उसका दोहन करते रहोगे
जब तक आपको दिखाई नहीं देता कि आप पृथ्वी ही हो, आप प्रकृति और बाकी प्रजातियों को अपने से अलग मानते रहोगे और अपनी lifestyle maintain करने के लिए दुनिया को बर्बाद करते रहोगे। आप इसी मिट्टी से उठे हो और आपको यहीं जाना है आप कहीं और के नहीं हो। समूचा अध्यात्म आपको यही बताने के लिए है कि आप अलग नहीं हो।
अक्सर हम सोचते हैं—जो हमें सबसे ज्यादा प्रेम देता है, उसी से मन दूर क्यों होने लगता है?
मनोविज्ञान की दृष्टि से इसका एक कारण यह हो सकता है कि जब कोई व्यक्ति प्रेम में अपनी सीमाएँ ही मिटा देता है—हर समय उपलब्ध रहता है, हर बात मानता है और हर गलती माफ करता ��ै—तो उसकी मौजूदगी धीरे-धीरे स्वाभाविक लगने लगती है।
समस्या प्रेम ��्यादा करने में नहीं,
प्रेम में खुद को खो देने में है।
रिश्ते में प्रेम जरूरी है, लेकिन उसके साथ
आत्मसम्मान, सीमाएँ और अपनी पहचान भी जरूरी हैं।
क्योंकि स्वस्थ प्रेम में किसी को बाँधा नहीं जाता,
दो लोग अपनी स्वतंत्रता के साथ एक-दूसरे को चुनते हैं।
डॉ. धीर सिंह धाभाई
#psychology