Gyanesh Kumar must go!
Demand 1: Initiation of criminal proceedings against Gyanesh immediately, and an answer to the question: Who gave him the orders?
Demand 2: Put all upcoming elections on hold. Freeze the SIR and restore the January 2025 voter list. Set up an independent inquiry into the entire SIR decision-making process. We also demand that the Supreme Court immediately take custody of all SIR-related files to ensure no records are destroyed, altered or go missing.
Demand 3: Repeal the 2023 law on the appointment of the Election Commissioners of India and enact a new law that inspires public confidence, with the active participation of members of civil society.
मैं तीन साल से वोट चोरी का पर्दाफ़ाश करता आ रहा हूँ। अब चुनाव आयुक्त खुद इसे स्वीकार कर सच्चाई उजागर कर रहे हैं।
ज्ञानेश कुमार ने देशद्रोह किया है। वो अभी इस्तीफ़ा दें और approver बन जाएं।
वोट चोरी की साज़िश में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पूरी जांच होगी।
Vote chori is a crime against the Indian people and a direct attack on our constitution.
The BJP, RSS and EC who organised it have committed an act of treason.
Justice will be served.
The chief of the unregistered organisation, which was formed in 1925 to sleep with the British to keep them in power forever by backstabbing our freedom fighters have no right to decide whether India should be secular or not.
India is for all Indians. Shut up and get yourself registered.
पहले शिवसेना, फिर NCP और अब तृणमूल कांग्रेस।
हर बार एक ही पैटर्न - BJP और चुनाव आयोग मिलकर एक पार्टी को तोड़ते हैं। फिर उसका चुनाव चिन्ह छीन लिया जाता है।
जब पूरी की पूरी पार्टी चोरी हो सकती है, तो करोड़ों भारतीयों के वोट चोरी होना भी हैरानी की बात नहीं।
वोट चोरी। सरकार चोरी। अब पार्टी चोरी - ये हमारे लोकतांत्रिक पतन के प्रतीक बन गए हैं।
ECI की संवैधानिक ज़िम्मेदारी जनादेश की रक्षा करना है - मगर उल्टा वो उन ताकतों की मदद कर रहा है, जो जनता के फैसले को ही पलट देते हैं।
यह लड़ाई सिर्फ़ ममता बनर्जी जी की नहीं है। यह हर राजनीतिक दल, हर मतदाता की लड़ाई है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहता है।
The 10 Benefits of Being an Atheist
1. You stop wasting your time, money, energy, and brain cells on useless religious bullshit and empty rituals.
2. Your life is finally free from stupid fears of imaginary demons, jinn, hellfire, and an angry sky daddy watching you jerk off.
3. This life becomes priceless. No fake afterlife means you actually treasure every moment instead of treating it like a shitty waiting room.
4. You escape the built-in religious hatred, no more forced misogyny, homophobia, ethnocentrism, tribalism, or treating outsiders like garbage.
5. Your brain stays open and honest. You can learn real shit without some 2000-year-old book cockblocking your intelligence.
6. You never have to embarrass yourself defending talking snakes, virgin births, global floods, or other Bronze Age fairy tales.
7. You become a decent human because you actually give a fuck about people, not because you’re scared of eternal torture.
8. You quit the pointless prayer addiction and start doing real shit that actually fixes problems.
9. You see the universe for what it is: cold, indifferent, and fucking beautiful, without pretending some insecure cosmic tyrant is in charge.
10. You live without guilt or shame for being human. No more self-hate for natural thoughts, desires, or doubts. Fuck that eternal damnation nonsense.
Be atheist. Be happy ❤️
Guia prático de posicionamento político.
"Sou de esquerda" = é de esquerda.
"Sou de direita" = é de direita
"Sou de centro" = é de direita
"Não sou nem de esquerda, nem de direita" = é de direita
"Não tenho preferência" = é de direita
"Não gosto de política" = é de direita
सात्यकी, श्रीकृष्ण के भतीजे थे।
महान योद्धा थे। अर्जुन के शिष्य थे, औऱ कृष्ण के कृपापात्र। ज़ब श्रीकृष्ण ने, दुर्योधन से कहा- एक तरफ मेरी सेना लड़ेगी, और दूसरी तरफ से मैं। अब तुम्हें जिसे चुनना है चुन लो।
तो दुर्योधन ने यादव की सेवा को चुन लिया। पूरी यादवी सेवा कौरवों की तरफ से लड़ी। मगर उसमे एक ही यादवी योद्धा था - जो श्रीकृष्ण से अनुमति ले, पांडवों के की तरफ से लड़ा।
वह सात्यकी थे।
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कुल की जगह धर्म को चुनने वाला सात्यकी द्वापर में था। कलयुग मे सात्यकी सावरकर ने, विनायक दामोदर सावरकर को बचाने का इंडिफेन्सेबल कर्म चुना।
रा��ुल गांधी पर उन्होंने सावरकर की मानहानि का आरोप लगाया। मामला कोर्ट में ले गए। पर राहुल ने माफी मांगने की जगह इस केस को समरी ट्रायल में बदलवा दिया। और अपने हर फैक्ट को साबित करने लगे।
इस तरह सात्यकी सावरकर को इतिहास, पोस्ट ट्रुथ युग के सबसे बड़े फैक्ट चेकर के रूप में याद करेगा।
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पहला फेक्ट चेक यह की सावरकर ने 6-7 नहीं पूरे 10 माफ़ीनामे में लिखे थे। उन्होने स्वीकार किया उसी दौर के क्रांतिकारियों जैसे राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, अशफाकउल्ला खान ने दया याचिका नहीं दी।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अंत तक अपने सिद्धांतों और विचारधारा पर अडिग रहे तथा किसी रियायत से इनकार किया। सात्यकी ने स्वीकार किया कि उन्हें कुछ विवरणों की जानकारी नहीं थी।
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उन्हे��� वीर की उपाधि किसी सरकारी संस्था ने नहीं दी। पहली बार लेखक सदाशिव रानडे की जीवनी में इस्तेमाल हुई। जनता द्वारा दी गई हो, इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण उनके पास नहीं था।
उन्होंने माना कि सावरकर गाय को देवी नहीं, उपयोगी पशु मानते थे। वे गौ पूजन के विरुद्ध गाय पूजा थे। उन्होंने सावरकर की किताबों के ��न अंशों से सहमति जताई जिनमें अनुष्ठानों की आलोचना, ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल और गाय पूजा की निंदा है।
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सावरकर ने द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय युवाओं को ब्रिटिश सेना में भर्ती के लिए अपील की थी। उन्होंने माना कि सावरकर ने रत्नागिरी में ब्रिटिश सरकार से गुजारा भत्ता मांगा था।
पर इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण, औऱ जरूरी फैक्टचेक वह था ज़ब 17 अगस्त 2026 को राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि मामले क��� जिरह के दौरान, वकील मिलिंद पवार के सवाल पर, सत्यकी सावरकर ने अदालत में साफ कहा:
“It is true to say that my grandfather Gopal Godse and Nathuram Godse were active members of Rashtriya Swayamsevak Sangh.”
(यह सच है कि मेरे नाना गोपाल गोडसे और नाथूराम गोडसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय सदस्य थे।)
यह स्वीकारोक्ति, गाँधी हत्या के बाद, RSS द्वारा हत्यारों से पल्ला झाड़ने की कोशिश का पर्दाफाश करती है।
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राहुल गांधी पर मुकदमा खत्म हो चुका है। इस दौरान सात्यकी से एक बार ट्विटर पर मेरी बकझक हो चुकी है। उस वक़्त तक गुस्से में कई बार मै अंधभक्तों को "गोडसे पुत्र" अथवा "सावरकर पुत्र" कह देता था।
मेरी निगाह में, ये हाइपोथेटिकल कनेक्शन, एक गाली होती थी। पर जरा सोचिये, कि किसी के रक्त में सचमुच ही, सावरकर और गोडसे दोनों दौड़ रहे हों।
सात्यकी के पिता सावरकर के पुत्र थे।
औऱ उनकी माता गोपाल गोडसे की पुत्री थी।
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इन परिवारों का मिलन, या तो दोनों परिवारों के संबंधों की गहराई को बताता है। या फिर उस सोशल एक्सक्लूजन पर जिसमे कोई उन दोनों परिवारों मे अपना बेटा या बेटी न ब्याहना चाहता था।
सात्यकी पर मुझे करुणा आती है।
जन्म पर तो किसी का नियंत्रण न���ीं होता। सत्यकी ने भी इस ब्लडलाइन का चयन नहीं किया।वे सामान्य शिक्षित युवक हैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। पर जन्म के हादसे की वजह से वे ऐसी बदनामी से आजीवन जूझते रहने को अभिशप्त है..
जिसमें उनका कोई फाल्ट नहीं।
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अपने पुरखों पूर्वजों के सम्मान रक्षा के लिए, सात्यकी सावरकर ने जो कुछ भी किया, किसी भी पुत्र,पौत्र को यही करना चाहिए। मैं सात्यकी को सलाम करता हूं।
लेकिन उन्हें सामने रखकर हर किसी को बताना चाहता हूँ कि जो आज गोडसे के फैन बने है, जो सावरकरवाद को जीवन का फलसफा बनाये हैं।
जिन्होंने अपनी पार्टी, शाखा या व्हाट्सप के असर मे आकर हिंसा, रक्तपात, नफरत और विभाजन को अपने जीवन के तरीकों में शुमार कर लिया है उन्हें याद रखना चाहिए,
कि उनकी आने वाले निर्दोष पीढ़ीयां, उनके कुकर्मो की रक्षा के लिए, झुकी ��िगाहों के साथ, हारने को अभिशप्त संघर्ष करती पायी जाएंगी।
🙏
अंकिता भंडारी के परिव��र से 2 दिन पहले मिला। चार साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी वो न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं - अपनी बच्ची के ख़िलाफ़ एक ऐसे अपराध के लिए जिसकी कोई माफी नहीं।
सिर्फ 19 साल की अंकिता वनंतरा रिज़ॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट थीं जहां एक "VIP" मेहमान की शर्मनाक मांग का विरोध करने पर चीला नहर में डुबो कर उनकी हत्या कर दी गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने हिंसा और डुबोने के सबूतों की पुष्टि भी की।
मगर, रिज़ॉर्ट में अंकिता क��� रूम को किसी भी तरह की जांच ह��ने से पहले ध्वस्त कर दिया गया जो खुद में संदेहपूर्ण है।
इस दुखद मामले में सबसे शर्मनाक बात है कि राज्य सरकार खुद आज तक उस "VIP" को संरक्षण दे रही है। क्यों? क्योंकि वह BJP-RSS का बड़ा नेता है।
यही BJP की विकृत मानसिकता है बलात्कारियों और अपराधियों को बचाना, उनका राजनीतिक संरक्षण करना, यहां तक कि बलात्कार के दोषियों का फूल-मालाओं से स्वागत करना। दुनिया में सबसे घिनौने इंसान वो होते हैं जो बलात्कारिय��ं की रक्षा करते हैं और BJP में ऐसे लोगों की भरमार है।
भारत तब तक आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक महिलाओं को पुरुषों के इस्तेमाल की वस्तु समझने वाली यह अमानवीय मानसिकता खत्म नहीं होती। भारत तभी आगे बढ़ेगा, जब भारत की महिलाएं आगे बढ़ेंगी - सम्मान, सुरक्षा, समानता और न्याय के साथ।
भाजपा ‘अवध एक्सप्रेस’ से सत्ता में आई थी, ‘अयोध्या एक्सप्रेस’ से उसकी वापसी तय है।
दानपात्र में हाथ डालनेवाले भाजपाई और उनके संगी-साथियों के ख़िलाफ़ ‘दानपात्र’ के साथ सपा के सांसदों ने संसद के सामने जो सांकेतिक ��्रदर्शन किया, उसे देखकर शर्मिंदगी में डूबे भाजपाई लोग, सबसे निगाह चुराकर चुपके से आते-जाते देखे गए।
जनता कह रही है, हम उदार हृदय भारतीय लोग, भाजपाइयों की सौ क्या हज़ार चोरी भी माफ़ कर देते लेकिन धर्म के पैसे चुराने का महापाप हम कभी माफ़ नहीं करेंगे। जनता ये भी कह रही है कि जो भगवान के नहीं हुए, वो हमारे क्या होंगे।
जो भाजपा का साथी, वो रामघाती-महापापी!
मोनू मूछड़ वैसे तो बिना मतलब जगह जगह घूमकर ज्ञान पेलता है, इतने बच्चे पैदा करो, ऐसे काम करो, वैसे रहो, वंदे मातरम बोलो।
लेकिन खुद की ज़िम्मेदारी के सवाल पर वंदे भारत से भी तेज भाग निकला