मेरे विचार से भारत में आरक्षण व्यवस्था, 1991 के उपासना-स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के कुछ प्रावधानों की वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप गंभीर और निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।
आरक्षण का मूल उद्देश्य समाज के उन वर्गों को शिक्षा, रोजगार ��र अवसरों की मुख्यधारा से जोड़ना था, जो ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से लंबे समय तक वंचित रहे। किंतु आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे अधिक जरूरतमंद लोगों तक पहुँच रहा है? यदि आर्थिक रूप से अत्यंत संपन्न और पीढ़ियों से लाभान्वित परिवार भी लगातार उसी प्रकार आरक्षण का लाभ लेते रहें, जबकि दूसरी ओर आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के परिवार अवसरों से वंचित रह जाएँ, तो समान अवसर और सामाजिक न्याय की अवधारणा पर व्यापक विमर्श होना चाहिए।
मेरी दृष्टि में आर्थिक रूप से कमजोर प्रत्येक नागरिक को, उसकी जाति से परे, उचित अवसर और संरक्षण मिलना चाहिए। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि किसी भी व्यवस्था के कारण प्रतिभाशाली और मेहनती व��द्यार्थियों के अवसर अनावश्यक रूप से सीमित न हों। सामाजिक न्याय का अर्थ केवल अवसरों का पुनर्वितरण नहीं, बल्कि अवसरों और योग्यता के बीच संतुलन स्थापित करना भी है।
इसी प्रकार, 1991 के उपासना-स्थल अधिनियम पर भी खुली, संवैधानिक और न्यायसंगत समीक्षा होनी चाहिए। भारत की प्राचीन सभ्यता, मंदिरों और धार्मिक स्थलों से करोड़ों सनातन हिंदुओं की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। किसी कानून के कारण यदि समाज के किसी बड़े वर्ग को यह अनुभव हो कि उसकी ऐतिहासिक, धार्मिक या सांस्कृतिक आस्थाओं से जुड़े प्रश्नों पर न्यायिक विमर्श का मार्ग सीमित हो गया है, तो उस कानून की समीक्षा लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से की जानी चाहिए। अंतिम निर्णय संसद और न्यायपालिका को संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप करना चाहिए।
एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों को जातिगत उत्पीड़न और अत्याचार से सुरक्षा प्रदान करना है और इस उद्देश्य का सम्मान होना चाहिए। किंतु किसी भी कानून का दुरुपयोग होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए यह भी आवश्यक है कि कानून निर्दोष व्यक्ति के विरुद्ध उत्पीड़न या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई का माध्यम न बने। शिकायतों की निष्पक्ष जाँच, कानून का उचित प्रयोग और झूठे मामलों में न्यायपूर्ण कार्रवाई—ये सभी सामाजिक सद्भाव के लिए आवश्यक हैं।
किसी व्यक्ति द्वारा देवी-देवताओं, किसी धर्म अथवा क���सी समुदाय की आस्था के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना सामाजिक सौहार्द को आहत कर सकता है। लेकिन इसका प्रतिकार भी कानून और संविधान की मर्यादा में होना चाहिए, हिंसा या व्यक्तिगत प्रतिशोध के माध्यम से नहीं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक सम्मान—दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है।
अजीत भारती जैसे किसी भी नागरिक के मामले में, आरोपों की सत्यता का निर्णय केवल निष्पक्ष जाँच और न्यायिक प्रक���रिया के आधार पर होना चाहिए। किसी व्यक्ति के विरुद्ध कानून का प्रयोग उसकी पहचान, विचारधारा या लोकप्रियता के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों और विधि के आधार पर होना चाहिए।
भारत को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें वंचित को संरक्षण मिले, गरीब को अवसर मिले, प्रतिभा को सम्मान मिले, निर्दोष को न्याय मिले और किसी भी कानून का दुरुपयोग न हो। यही वास्तविक सामाजिक न्याय और सामाजिक सद्भाव का मार्ग है।
--- डॉ. समरेंद्र के दास, अधिवक्ता
#AjeetBharti @narendramodi #AmitShah
मेरे विचार से भारत में आरक्षण व्यवस्था, 1991 के उपासना-स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के कु�� प्रावधानों की वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप गंभीर और निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।
आरक्षण का मूल उद्देश्य समाज के उन वर्गों को शिक्षा, रोजगार और अवसरों की मुख्यधारा से जोड़ना था, जो ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से लंबे समय तक वंचित रहे। किंतु आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे अधिक जरूरतमंद लोगों तक पहुँच रहा है? यदि आर्थिक रूप से अत्यंत संपन्न और पीढ़ियो��� से लाभान्वित परिवार भी लगातार उसी प्रकार आरक्षण का लाभ लेते रहें, जबकि दूसरी ओर आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के परिवार अवसरों से वंचित रह जाएँ, तो समान अवसर और सामाजिक न्याय की अवधारणा पर व्यापक विमर्श होना चाहिए।
मेरी दृष्टि में आर्थिक रूप से कमजोर प्रत्येक नागरिक को, उसकी जाति से परे, उचित अवसर और संरक्षण मिलना चाहिए। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि किसी भी व्यवस्था के कारण प्रतिभाशाली और मेहनती विद्यार्थियों के अवसर अनावश्यक रूप से सीमित न हों। सामाजिक न्याय का अर्थ केवल अवसरों का पुनर्वितरण नहीं, बल्कि अवसरों और योग्यता के बीच संतुलन स्थापित करना भी है।
इसी प्रकार, 1991 के उपासना-स्थल अधिनियम पर भी खुली, संवैधानिक और न्यायसंगत समीक्षा होनी चाहिए। भारत की प्राचीन सभ्यता, मंदिरों और धार्मिक स्थलों से करोड़ों सनातन हिंदुओं की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। किसी का���ून के कारण यदि समाज के किसी बड़े वर्ग को यह अनुभव हो कि उसकी ऐतिहासिक, धार्मिक या सांस्कृतिक आस्थाओं से जुड़े प्रश्नों पर न्यायिक विमर्श का मार्ग सीमित हो गया है, तो उस कानून की समीक्षा लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से की जानी चाहिए। अंतिम निर्णय संसद और न्यायपालिका को संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप करना चाहिए।
एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित जा���ियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों को जातिगत उत्पीड़न और अत्याचार से सुरक्षा प्रदान करना है और इस उद्देश्य का सम्मान होना चाहिए। किंतु किसी भी कानून का दुरुपयोग होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए यह भी आवश्यक है कि कानून निर्दोष व्यक्ति के विरुद्ध उत्पीड़न या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई का माध्यम न बने। शिकायतों की निष्पक्ष जाँच, कानून का उचित प्रयोग और झूठे मामलों में न्य���यपूर्ण कार्रवाई—ये सभी सामाजिक सद्भाव के लिए आवश्यक हैं।
किसी व्यक्ति द्वारा देवी-देवताओं, किसी धर्म अथवा किसी समुदाय की आस्था के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना सामाजिक सौहार्द को आहत कर सकता है। लेकिन इसका प्रतिकार भी कानून और संविधान की मर्यादा में होना चाहिए, हिंसा या व्यक्तिगत प्रतिशोध के माध्यम से नहीं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक सम्मान—दोनों के बीच संतुलन आवश्यक ���ै।
अजीत भारती जैसे किसी भी नागरिक के मामले में, आरोपों की सत्यता का निर्णय केवल निष्पक्ष जाँच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। किसी व्यक्ति के विरुद्ध कानून का प्रयोग उसकी पहचान, विचारधारा या लोकप्रियता के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों और विधि के आधार पर होना चाहिए।
भारत को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें वंचित को संरक्षण मिले, गरीब को अवसर मिले, प्रतिभा को सम्मान मिले, निर्दोष को न्याय मिले और किसी भी कानून का दुरुपयोग न हो। यही वास्तविक सामाजिक न्याय और सामाजिक सद्भाव का मार्ग है।
@narendramodi @AmitShah @AshwiniUpadhyay @AlternateMediaX @Thakur312Manish @mishra_satish @ajeetbharti
@Bhim11090322 With the advent of Modi-ji, the words of many prominent figures have lost their value; in their desperation, they cheapen and demean themselves by saying just about anything.
युवा शक्ति के नाम गंभीर संदेश
जब भारत निरंतर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहा है, विज्ञान, शिक्षा, खेल, तकनीक, आयुर्वेद और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों को छू रहा है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आखिर कौन-सी म���नसिकता कुछ युवाओं को नकारात्मकता, हिंसा और अराजकता की ओर धकेल रही है?
भारत क��� युवा देश की सबसे बड़ी शक्ति है। उसके हाथों में किताब हो तो ज्ञान का निर्माण होता है, खेल का मैदान हो तो विश्व में तिरंगा लहराता है, प्रयोगशाला हो तो नए आविष्कार जन्म लेते हैं और समाज सेवा का भाव हो तो राष्ट्र मजबूत होता है। लेकिन जब उसी युवा के हाथ में पत्थर पकड़ा दिया जाता है, उसके मन में बड़े-बुजुर्गों के प्रति घृणा भर दी जाती है, उसे गाली-गलौज और हिंसा के लिए उकसाया जाता है तथा पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था पर हमला करने के लिए प्रेरित किया जाता है, तब सबसे अधिक नुकसान स्वयं उस युवा और देश के भविष्य का होता है।
हमें गंभीरता से सोचना होगा कि आखिर अराजकता से किसका भला होता है? क्या हिंसा रोजगार देती है? क्या पत्थर फेंकने से शिक्षा बेहतर होती है? क्या किसी बुजुर्ग का अपमान करने से समाज मजबूत होता है? क्या पुलिस अधिकारी को घायल करने से न्याय और व्यवस्था स्थाप��त होती है?
उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
मतभेद होना लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन हिंसा लोकतंत्र की शक्ति नहीं, उसकी कमजोरी है। विरोध करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार हो सकता है, परंतु विरोध के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, पुलिसकर्मियों पर हमला करना, बुजुर्गों को अपमानित करना और समाज में भय फैलाना किसी भी स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा नहीं हो सकता।
मेरे देश के युवाओं से वि���म्र आग्रह है—किसी के बहकावे में मत आइए। सोशल मीडिया की उत्तेजना, राजनीतिक उकसावे या किसी भी प्रकार की भ्रामक विचारधारा को अपनी बुद्धि पर हावी मत होने दीजिए। प्रश्न पूछिए, सरकार से जवाब मांगिए, अपनी बात रखिए, लेकिन अपनी ऊर्जा को हिंसा और विनाश में नष्ट मत कीजिए।
याद रखिए, जो लोग आपको पत्थर उठाने के लिए उकसाते हैं, वे अक्सर अपने बच्चों के हाथों में किताब ही देना चाहते हैं।
भारत को आज ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो पढ़ें, सोचें, खेलें, शोध करें, उद्यम करें, आयुर्वेद और विज्ञान को आगे बढ़ाएँ, गरीबों की सहायता करें और अपने राष्ट्र को विश्व की अग्रणी शक्ति बनाने में योगदान दें।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें—
हमारी असहमति होगी, पर हिंसा नहीं।
हमारे विचार अलग होंगे, पर राष्ट्रहित सर्वोपरि होगा।
हम प्रश्न पूछेंगे, पर सम्मान नहीं छोड़ेंगे।
हम विरोध करेंगे, पर कानून और शांति का मार्ग नहीं छोड़ेंगे।
युवा शक्ति किसी भी राष्ट्र का वर्तमान भी होती है और भविष्य भी। इसलिए किसी भी अराजक सोच को अपने भविष्य पर अधिकार मत करने दीजिए।
पत्थर नहीं, पुस्तक उठाइए।
नफरत नहीं, ज्ञान अपनाइए।
अराजकता नहीं, अनुशासन चुनिए।
और सबसे बढ़कर—अपने भारत के निर्माण में अपनी युवा शक्ति लगाइए।
भारत का भविष्य शोर मचाने वालों के हाथ में नहीं, बल्कि सोचने, सीखने, निर्माण करने और राष्ट्र के लि�� सकारात्मक योगदान देने वाले युवाओं के हाथ में है।
Dear X,
if you have any enmity with my account then tell me because why is there no progress on my reach? Please tell the reason otherwise I will have to go to the court of India.