विजयदेव नारायण साही हिंदी साह���त्य के प्रमुख आलोचक और चिंतक थे, अमीर खुसरो पर उनकी असहमतियाँ विशेष रूप से खुसरो के काव्य और व्यक्तित्व को लेकर समकालीन और पारंपरिक दृष्टिकोण के आलोचनात्मक विश्लेषण में दिखाई देती हैं।
पढ़िए परिचय दास जी का लेख।
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मौलाना आज़ाद ने धर्मग्रंथों का क्रांतिकारी विश्लेषण किया। मुख्य रूप से कुरान का भाष्यकार के रूप में उन्होंने 1930 में अपना ग्रंथ प्रकाशित किया।
पढ़िए डॉ. सुरेश खैरनार जी का लेख।
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अमर्त्य के जन्म से आठ साल तक उन्हें रवींद्रनाथ की सोहबत मिली, और पाठभवन की स्थापना के समय से ही विश्व स्तर के अतिथियों का शांतिनिकेतन में आना-जाना लगा रहता था।
पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार जी का लेख।
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दूसरी बार राष्��्रपति बनने के बाद ट्रंप अपने बयान से मुकर भी सकते हैं। कथनी और करनी को जोड़कर चलने की बाध्यता उन्होंने आजतक नहीं महसूस की है।
पढ़िये चंद्रभूषण जी का लेख।
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हुसैन को जितना सम्मान भारत ने दिया, हिन्दू देवी देवताओं से संबंधित, उनकी विवादित पेंटिग्स ने उतना ही कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों को सबसे ज्यादा आहत किया.। उसका असर ये हुआ कि 2006 में हुसैन के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन हुए।
पढ़िए विनोद कोचर जी का लेख
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यह देश के तमाम स्वतंत्रता सेनानियों और नेताओं की तरह डॉ. भीमराव अंबेडकर का भी महा स्वप्न था, यह स्वप्न किस हद तक साकार हो सका है, यह अलग विचार का बिन्दु है।
पढ़िए रणधीर कुमार गौतम जी का लेख।
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हिन्दू राज और मुस्लिम राज के जमानों के पक्षपातप��र्ण दांडिक कानूनों में बुनियादी फेरबदल अंग्रेजी राज के जमाने में हुए थे। ‘अंग्रेजी शासन ने सबसे पहला परिवर्तन दंड व्यवस्था में किया।
पढ़िए समाजवादी नेता मधु लिमये जी का विचार।
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हिन्दू समाज का ये बंटवारा मुसलमानों ने तो नहीं किया था! इसके लिए तो हिन्दू समाज में सदियों से चली आ रही जाति व्यबस्थाही जिम्म���दार है।
पढ़िए विनोद कोचर जी का लेख।
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भारत में सरकारी शैक्षिक नीतियां एक राजनीतिक एजेंडा है जो ऐतिहासिक औपनिवेशिक मानसिकता का परिणाम हैं। भारतीय समाज में यह दलीलें राजनीतिक ऐजेंडा है कि शैक्षिक संस्थान एवं शैक्षिक नीतियां समाज में समानता स्थापित करेगा।
पढ़िए अम्बेदकर कुमार साहु का लेख।
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लोग हमे भला कहे, सर्वत्र हमारी किर्ति हो, सभी हमे इज्जत दे यह बड़ी दुर्बलता है वासनाये तीन प्रकार की होती हैl पुत्र वासना, वित्त वासना, और लोकवासनाl
पढ़िए लोक वासना के बार�� में बाबा विनोबा के विचार।
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आज आचार्य नरेंद्र देव की जयंती है। उन्हें पिछली पीढ़ी 1948 में अयोध्या में विधानसभा चुनाव हरवा कर भुला चुकी है और नई पीढ़ी जब गूगल के माध्यम से विकीपीडिया पर सर्च करती है तो बेहद सीमित सूचनाएं प्राप्त होती हैं।
पढ़िए अरुण कुमार त्रिपाठी जी का लेख।
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बारूद भरे पटाखों में मुझे ऐसी कोई भी बात नजर नहीं आती जो किसी त्योहार की गरिमा को बढ़ाती हो। वैसे भी यह सना��नी वैदिक संस्कृति का हिस्सा नहीं। हमारी संस्कृति टिमटिमाते हुए दीयों की है।
पढ़िए जयराम शुक्ल जी का लेख।
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विजय देव नारायण साही को उनके जन्म शताब्दी वर्ष में याद करके हम अपने एक यशस्वी पुरखे की उपलब्धियों की चमक में अपने आत्मविश्वास औ रकर्तव्य–बोध को संजीवनी प्रदा कर रहे हैं।
पढ़िए @_ProfAnand जी का लेख।
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इस आपाधापी में एक महापुरुष जो प्रतिभा व व्यक्तित्व की दृष्टि से नेहरू और पटेल से इक्कीस ही था हर साल भुला दिया जाता है। इस महापुरुष का नाम है आचार्य नरेंद्र देव..।
पढ़िए जयराम शुक्ल का लेख!
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सोचिये कि अगर भीमराव आंबेडकर जैसी तेजस्वी प्रतिभा का जन्म नहीं हुआ होता तो भारत में बौद्ध धर्म क्या पुनर्जीवित हो पाता?
पढ़िए विनोद कोचर जी का लेख।
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अनूठे लोकतंत्र सेनानी और निष्ठावान कम्युनिस्ट कॉमरेड रणवीर नहीं रहे।जेपी आंदोलन के दौर तक उ प्र में देश की सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दिल्ली की रानी के साथ और सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के विरुद्ध थी।
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हैरिस की रेटिंग सबसे ज्यादा डेनमार्क (85 फीसद���)और फिनलैंड (82 फीसदी) में है जबकि, यूरोप में डॉनल्ड ट्रंप के सबसे ज्यादा प्रशंसक सर्बिया (59 फीसदी) और हंगरी (49 फीसदी) में हैं,ये दोनों ही देश तेजी से निरंकुश होते जा रहे है
पढ़िए शैलेन्द्र चौहान जी का लेख
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