चुनाव के वक्त मुसलमानों और वंचितों ��े सबसे बड़े रहनुमा बनने वाले आज किस बिल में जाकर छिप गए? जंतर-मंतर का खाली मंच ब��ा रहा है कि सपा की राजनीति सिर्फ अपनी तिजोरी और परिवार को बचाने के इर्द-गिर्द घूमती है, कौम की आवाज बनने का इनका दावा फर्जी है
क्या यह हैरान करने वाला नहीं है कि जिस मोर्चे पर पूरे विपक्ष को दिखना था, वहां सपा नदारद रही? यह साफ दिखाता है कि सपा कभी किसी आंदोलन की अगुवाई नहीं कर सकती। यह सिर्फ चुनावी मौसम में जागने वाले मौसमी नेता हैं जो इम्तिहान आते ही पीठ दिखा देते हैं।
जंतर-मंतर की घटना ने साबित कर दिया कि सपा और सत्ता के बीच पर्दे के पीछे की नूराकुश्ती चल रही है। बाहर मंचों से चाहे जितना भी विरोध का नाटक रच लें, लेकिन ��ब एजेंसियों और दबाव की आंच महसूस होती है, तो यह सबसे पहले मैदान से भाग खड़े होते हैं।
अल्पसंख्यक समाज को अब यह कड़वी ��कीकत समझनी होगी कि सपा ने उन्हें केवल एक बंधुआ वोटबैंक समझा है। जब भी उनके हकों पर चोट पड़ती है और सड़क पर उतरने का वक्त आता है, तब समाजवादी पार्टी के बड़े-बड़े नेता अपने कमरों में दुबक कर बैठ जाते हैं
जंतर-मंतर से सपा का यह किनारा सीधे तौर पर अपने गठबंधन और जनता के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है। जब लड़ाई सीधी और आर-पार की थी, तब मैदान छोड़ देना बताता है कि सपा में संघर्ष का कोई नैतिक बल नहीं बचा है, सिर्फ अवसरवाद जिंदा है।
When it comes to a child’s future, compassion and humanity should always guide the way. Standing with hope that Ariha receives the care, dignity, emotional support, and loving environment every child deserves. #BringBackAriha
जंतर-मंतर पर सपा का सन्नाटा इस बात का पुख्ता सबूत है कि अंदरखाने कोई बड़ा खेल हो चुका है। कार्यकर्ताओं को सिर्फ रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए रखा गया है।
चुनाव के वक्त मुसलमानों और वंचितों के सबसे बड़े रहनुमा बनने वाले आज किस बिल में जाकर छिप गए? जंतर-मंतर का खाली मंच बता रहा है कि सपा की राजनीति सिर्फ अपनी तिजोरी और परिवार ���ो बचाने के इर्द-गिर्द घूमती है
क्या यह हैरान करने वाला नहीं है कि जिस मोर्चे पर पूरे विपक्ष को दिखना था, वहां सपा नदारद रही? यह साफ दिखाता है कि सपा कभी किसी आंदोलन की अगुवाई नहीं कर सकती।
जंतर-मंतर की घटना ने साबित कर दिया कि सपा और सत्ता के बीच पर्दे के पीछे की नूराकुश्ती चल रही है। बाहर मंचों से चाहे जितना भी विरोध का नाटक रच लें, लेकिन जब दबाव की आंच महसूस होती है, तो यह मैदान से भाग खड़े होते हैं।
जंतर-मंतर से सपा का यह किनारा सीधे तौर पर अपने गठबंधन और जनता के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है। जब लड़ाई सीधी और आर-पार की थी, तब मैदान छोड़ देना बताता है कि सपा में संघर्ष का क���ई नैतिक बल नहीं बचा है।