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@srofficial2012 Maine TRE 4 ka form fill karte samay STET ke application no me ' BS26...... ' ke jagah ' bs26...... ' fill kar diya h . Isase koi problem to nhi n hogi??
@BiharCMQRT@samrat4bjp AIIMS पटना में आज सुबह एक गंभीर रूप से बीमार बच्चे को भर्ती क���या गया। बच्चे को दौरे पड़ने की समस्या है और उसकी हालत को लेकर परिवार चिंतित है। अब हमें बताया जा रहा है कि इमरजेंसी में बेड उपलब्ध नहीं है और दूसरे अस्पताल ले जाने को कहा जा रहा है।
भोजपुरी के अपराध और हथियार वाले गाने बिहार में बढ़ा रहे हैं अपराध, युवाओं को भटका रहा है यह ट्रेंड; ऐसे गानों पर लगे रोक
भोजपुरी संगीत बिहार और पूर्वांचल की पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कभी भोजपुरी के गीतों में मिट्टी की खुशबू, लोक संस्कृति, प्रेम, रिश्ते, सामाजिक ज��वन और गांव की तस्वीर दिखाई देती थी। लेकिन अब भोजपुरी संगीत के एक हिस्से में कट्टा, पिस्टल, गोली, बदला, दबंगई और अपराध को जिस तरह से गीतों और वीडियो में पेश किया जा रहा है, उसने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आज कई गानों में हथियारों को ताकत और रुतबे का प्रतीक बनाकर दिखाया जाता है। गाने के बोल में गोली चलाने और धमकी देने की बातें होती हैं, जबकि वीडियो में हथियारों के साथ स्टाइल और दबंगई दिखाई जाती है। सोशल मीडिया पर ऐसे गाने और उनके छोटे वीडियो तेजी से फैलते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर उन युवाओं पर पड़ता है जो लगातार इस तरह के कंटेंट के संपर्क में रहते हैं।
गानों में अपराध का ग्लैमर युवाओं को दे रहा गलत संदेश
जब किसी गाने में बार-बार यह दिखाया जाता है कि हथियार रखना ताकत है, किसी को धमकाना रुतबा है और अपराध करना बहादुरी है, तो ��िश्चित रूप से यह एक गलत सामाजिक संदेश देता है। युवा उम्र में व्यक्ति अपने आसपास दिखाई देने वाली चीजों से प्रभावित होता है। ऐसे में मनोरंजन के नाम पर लगातार अपराध और हथियारों का प्रदर्शन चिंता का विषय है।
बिहार में समय-समय पर भोजपुरी या स्थानीय गानों के साथ हथियारों के प्रदर्शन की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। पूर्णिया में भोजपुरी गाने पर कट्टा लहराते और फायरिंग करते हुए युवक का वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस जांच में जुटी थी। वहीं वैशाली के हाजीपुर में शादी समारोह के दौरान भोजपुरी गाने पर हथियार लेकर डांस करने का वीडियो भी सामने आया था।
ये घटनाएं इस बात पर चर्चा को जरूरी बनाती हैं कि संगीत और सोशल मीडिया के जरिए हथियारों की संस्कृति को सामान्य या आकर्षक बनाने का असर समाज पर किस तरह पड़ रहा है।
बिहार में पहले से उठते रहे हैं ऐसे गानों पर सवाल
बिहार में अश्लील और दोहरे अर्थ वाले भोजपुरी गानों के खिलाफ प्रशासन पहले भी कार्रवाई के निर्देश दे चुका है। मार्च 2025 में बिहार पुलिस मुख्यालय ने सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे गानों के प्रसारण के खिलाफ विशेष अभियान और कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
2026 में भी बिहार में अश्लील, आपत्तिजनक और जातिसूचक गीतों के सार्वजनिक प्रसारण पर कार्रवाई को लेकर प्रशासनिक स्तर पर सख्ती की बात सामने आई। कला एवं संस्कृति विभाग ने ऐसे गीतों के प्रसारण पर निगरानी और आवश्यक कानून��� कार्रवाई के लिए गृह विभाग को पत्र भेजा था।
इससे साफ है कि समस्या केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गई है। स���र्वजनिक स्थानों पर बजने वाले ऐसे गानों को लेकर प्रशासन और समाज दोनों स्तरों पर चिंता मौजूद है।
सवाल भोजपुरी संगीत पर नहीं, अपराध को ग्लैमराइज करने वाले कंटेंट पर है
यहां यह समझना जरूरी है कि भोजपुरी भाषा या भोजपुरी संगीत समस्या नहीं है। भोजपुरी में आज भी बड़ी संख्या में ऐसे गीत बन रहे हैं जो बिहार की संस्कृति, लोक परंपरा और सामाजिक जीवन को सामने लाते हैं।
समस्या उन गानों से है जिनमें अप��ाध और हथियारों को मनोरंजन और स्टाइल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
अगर किसी गाने में बंदूक को फैशन, गोली को ताकत और अपराधी छवि को प्रतिष्ठा बनाकर पेश किया जाएगा, तो ऐसे कंटेंट पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कलाकारों और निर्माताओं की भी जिम्मेदारी
भोजपुरी कलाकारों की पहुंच करोड़ों लोगों तक है। एक गाना कुछ ही समय में गांव से लेकर शहर और सोशल मीडिया तक पहुंच जाता है। इसलिए कलाकारों, गीतकारो���, संगीत निर्माताओं और वीडियो निर्माताओं की जिम्मेदारी भी बड़ी है।
लोकप्रियता हासिल करने के लिए अपराध और हथियारों को बार-बार केंद्र में रखने के बजाय भोजपुरी संगीत को बिहार की संस्कृति, लोकगीत, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक ��ुद्दों, प्रेम और सकारात्मक कहानियों से जोड़ा जा सकता है।
अब ऐसे गानों पर रोक जरूरी
बिहार में अपराध की समस्या से निपटने के लिए पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर भी प्रयास जरूरी हैं। हथियारों और अपराध को बढ़ावा देने वाले कंटेंट को सामान्य मनोरंजन मानकर नजरअंदाज करने के बजाय उसकी समीक्षा होनी चाहिए।
भोजपुरी संगीत को रोकने की जरूरत नहीं है, लेकिन ऐसे गानों पर सख्ती जरूरी है जो अपराध, हथियार और हिंसा को युवाओं के सामने आकर्षक बनाकर पेश करते हैं।
भोजपुरी हमारी भाषा और संस्कृति की पहचान है। इसे कट्टा, गोली और अपराध की पहचान बनने से रोकना कलाकारों, दर्शकों, समाज और प्रशासन सभी की जिम्मेदारी है।
जब भोजपुरी फिल्मों और गीतों के ज़रिए एक पूरी पीढ़ी के सामने लगातार फूहड़ता, अश्लीलता और स्त्री-देह को मनोरंजन की वस्तु बनाकर परोसा जा रहा था, तब सरकारें चुप थीं। बुद्धिजीवी चुप थे। नेता चुप थे। पक्ष-विपक्ष चुप थे । और बॉलीवुड के बड़े-बड़े नाम भी चुप थे ।
किसी ने नहीं पूछा कि हम अपनी अगली पीढ़ी के मन में क्या भर रहे हैं ।
आज वही लड़के बड़े हो चुके हैं। जिन आँखों ने वर्षों तक गीतों में स्त्री के अंग-प्रत्यंग को उपभोग की वस्तु की तरह देखा, जिन कानों ने लगातार वही भाषा सुनी, जिन कल्पनाओं को उसी फूहड़ता ने आकार दिया—उनमें से कुछ अब उस कल्पना को वास्तविक जीवन में छूना चा���ते हैं, आज़माना चाहते हैं। अपने हाथों से, अपनी आँखों से, अपने शब्दों से ।
मैं यह नहीं कह रहा कि समाज में महिलाओं के प्रति हिंसा, यौन अपराध या विकृत सोच के लिए केवल भोजपुरी की अश्लीलता जिम्मेदार है। समाज इतना सरल नहीं होता। इसके पीछे पितृसत्ता है, शिक्षा की कमी है, सत्ता और सामाजिक संरचनाएँ हैं, इंटरनेट और पोर्नोग्राफी है, घर और परिवार का संस्कार है, कानून का भय और उसके क्रियान्वयन की कमजोरी है—बहुत कुछ है ।
लेकिन ये ब��त इसलिए निकलेगी क्यूंकि जिन्होंने औरतों के अंगो पर गाने और फिल्मे बनाकर अपना जेब भरा वो आज देश के "हीरो" हैं, युवा कलकारों की पीढ़ी को सन्देश ये जा रहा है की ये करोगे तो राजा की जिंदगी जियोगे और युवा डूबता ही रहा ऐसी चीज़ों में ।
लेकिन यह सवाल पूछना भी ज़रूरी है कि अगर किसी समाज को दो दशकों तक लगातार फूहड़ता, स्त्री-विरोधी भाषा और नग्न उपभोग की संस्कृति के ह��ाले कर दिया जाए, तो क्या उसका कोई असर नहीं होगा ?
असर होता है । ज़रूर होता है । और देर-सबेर दिखाई देता है । सबसे भयावह बात सिर्फ अश्लीलता का फैलना नहीं थी। उससे भी भयावह था हमारा सामूहिक मौन।
हममें से बहुत लोग इस सबको पसंद नहीं करते थे। घर के बंद दरवाज़ों के पीछे इसकी आलोचना भी करते थे। लेकिन सार्वजनिक रूप से बोलने की हिम्मत नहीं थी। क्योंकि बोलने पर लोग कहते—“अरे, मनोरंजन है… जाने दीजिए ।”
हमने जाने दिया । फिर थोड़ा और जाने दिया ।
फिर इतने साल जाने दिया कि एक दिन हमें पता चला—हमने सिर्फ गाने नहीं सुने थे, हमने एक संस्कृति को सामान्य बना दिया था ।
और अब जब उसका असर समाज में दिखाई दे रहा है, तो हम अचानक पूछ रहे हैं—ये लड़के ऐसे क्यों हो गए ?
बिहार तो चारो तरफ से मारा गया, बॉलीवुड वाला नीरज पांडे जैसे अपने हिंदी फिल्म में डालता है "आइये हमरे बिहार में कट्टा ठोक दें कपार में वहीँ प्रियं���ा चोपड़ा ��े कहती है अपनी भोजपुरी फिल्मे की "सइयां जी रहेलन हमरा पे हावी बोलेरो के चाभी से खोद देलन नाभी ।" ये बड़े लोग हैं, इज़्ज़तदार लोग हैं ।
लेकिन सवाल यह भी होना चाहिए—
जब युवा पीढ़ी को लगातार यही सिखाया जा रहा था कि स्त्री एक देह है, एक वस्तु है, एक तमाशा है, बिहार में तो यही सब होता है — तब हम कहाँ थे ?
हम चुप थे ।
मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने चेताया था -
“इस पीढ़ी को एक दिन अपने किए पर पछताना पड़े। ��ेवल बुरे लोगों के कटु शब्दों और हिंसक कृत्यों के लिए नहीं, बल्कि उन अच्छे लोगों की भयावह चुप्पी और उदासीनता के लिए भी ।’”
“We will have to repent in this generation. Not merely for the vitriolic words and the violent actions of the bad people, but for the appalling silence and indifference of the good people.”
विपक्ष का शासन था तो ऐसी घटनाएं हर सप्ताह होती थी... तेजस्वी यादव के घर में महिला की प्रताड़ना की जा रही थी…
जमुई की घटना पर बिह��र BJP अध्यक्ष संजय सरावगी
हे ज्ञानी महापुरुष, अवतारी पुरुष!
आपके इस बहुमूल्य सुझाव पर देवताओं द्वारा पृथ्वी लोक पर पुष्पवर्षा की गई।
क्या आपने अपने कैबिनेट सहयोगी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को पत��र लिख बिहार में दौरा कर इस विनाशकारी बाढ़ का जायजा व आंकलन कर किसी प्रकार की वित्तीय सहायता प्रदान करने संबंधित कोई आग्रह किया है? (बात करने की हिम्मत नहीं है इसलिए पत्र लिखने का जिक्र है)
क्या आपको पता है बिहार में बाढ़ और सुखाड़ से लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसल नष्ट हो चुकी है? लाखों लोग प्रभावित है। क्या आपकी अपने संसदीय क्षेत्र में ही खड़ी केले की फसल के नुकसान का आपको अंदाजा भी है? आपके पूर्व के संसदीय क्षेत्र और आपके जीजा के क्षेत्र जमुई में कल जघन्य कांड हुआ है क्या वहाँ दौरा किया? पीड़ित��ं की मदद की?
अब रही बात, बिहार के सांसदों और विधायकों के एक महीना के वेतन दान करने की तो….हे मोदी जी के परम अंधभक्त! बिहार में कुल विधायक-विधान पार्षद 318 तथा लोकसभा-राज्यसभा सांसद मिलाकर 56 सांसद है।
सबकी सैलरी जोड़ेंगे तो कुल 8 करोड़ रुपए भी नहीं जुड़ रहे है। इतने तो आप लोगों ने बिहार में आपके प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर 100 करोड़ के दीये और तेल जलाकर फूंक दिए। हवाई सर���वेक्षण के नाम पर CM और अधिकारियों के हेलीकॉप्टर का ही खर्चा 12 करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है। वैसे इससे अधिक तो 18-20 वर्ष पूर्व आपके एक फ़िल्म बनने का खर्चा हुआ होगा? है कि नहीं?? वैसे एक महीना क्यों? एक साल का वेतन क्यों नहीं?
सरकार में बैठे मलाई चापने से बेहतर होता कि आप यह पूछते कि बिहार आकस्मिक निधि का 15,000 करोड़ रुपए कहाँ गया? सरकारी खजाना ख़ाली क्यों है? केंद्र सरकार बिहार की वित्तीय मदद क्यों नह���ं कर रही? ये पूछने की हिम्मत है या ख़ाली मेरे प्रधानमंत्री मेरे प्रधानमंत्री का ही जाप करते रहिएगा??
You guys enjoyed this song on Youtube for years and protest against Jamui molestation on x.
Tell us the difference between what is happening in this song and what happened in Jamui.
How hypocrite we are. isn't it?
बुरा ना मानिए लेकिन जमुई का वीडियो देखकर बहुत हैरान ना होइए
जिस तरह के आर्केस्ट्रा के वीडियो बिहार से आते हैं वो शर्मनाक होते हैं
100 रुपये की नोट उंगली में फँसाए युवक क्या नहीं करना चाहते ?
मंच पर चढ़कर शर्मसार करने वाली बेह��दगी और शारीरिक छेड़छाड़ करते हैं।
बुजुर्ग, बच्चे, महिलायें सामने होती हैं, कुछ के शायद माँ बाप भी होंगे, वावजूद इसके उनकी आँखों में शर्म नहीं दिखती।
भोजपुरी गाने ढोढ़ी कमर से आगे नहीं बढ़ पाये हैं।
ये कानून से ज़्यादा सामाजिक पतन है।
साल 2014 की बात है उत्तर प्रदेश में लोक मनोरंजन के गिरते स्तर पर दूरदर्शन के लिए एक स्टोरी करनी थी.. नाटक, नौटंकी, बिरहा आल्हा ये सब कभी ग्रामीण मनोरंजन के साधन थे।
खैर उस स्टोरी के लिए कानपुर के रम्मत सिंह भदौरिया से बात हुई। उस समय रम्मत के नाम का डंका बजता था, लोग उन्हें “रम्मत हरामी” के नाम से जानते थे,डबल मीनिंग कॉमेडी के लिए विख्यात थे,
उन्होंने कानपुर देहात और हरदोई के बीच किसी गाँव की नौटंकी में आने को बोला। नौटंकी 12 बजे शुरू हुई और ��ोग 9 बजे से कड़ाके की सर्दी में आकर अपनी जगह पर बैठ गए थे। कलाकार के नाम पर 6-7 लड़कियां डांस करने के लिए थीं।
उनकी ड्रेस ऐसी थी कि मुझे रम्मत और उनकी (शायद ) पत्नी शशिबाला से निवेदन करना पड़ा कि इन्हें कुछ और कपड़े भी पहना दीजिए ताकि शूट हो सके।
माहौल बनाकर रम्मत को अपने मुद्दे पर लाए।
इतनी डबल मीनिंग कॉमेडी और ये डांस ही नौटंकी है क्या?
उन्होंने बताया एक जमाना पहले वो सुल्ताना डाकू, अकबर बीरबल, और जाने कितने मुद्दों पर मंचन करते थे , लोग आते थे, बीच में हल्की फुल्की कॉमेडी के लिए जोकर हुआ करता था, वो भी जोकराइ करते थे, फिर भीड़ आना कम हो गई, लोगों ने उनकी कंपनी को बुलाना बंद कर दिया। कुछ साल इंतज़ार के बाद उन्होंने ये शुरू किया।
रम्मत ने ये भी बताया कि जैसे ही ये डांस बंद होना लोग चले जाएँगे और ऐसा ही हुआ।
जमुई जैसी घटना रोकने का सबसे बढ़िया साधन ��ूता है, माँ बाप अपने बेटों को आर्केस्ट्रा वाली हरकतों पर कायदे से जूते के प्रसाद दें।
जमुई के नक़ाबपोशो को फ़ास्ट ट्रैक अदालत में फाँसी तक पहुँचाया जाए, #SIT की खानापूर्ति नहीं चलेगी
बिहार हो या कोई और राज्य… समाज उठकर खड़ा हो और बोले ये नंगई और बेहूदी अब नहीं चलेगी।
आँखों का पानी ज़िंदा कीजिए, ज़्यादा खुलेपन और एडवांस मॉडर्न दिखने का ढोंग बंद कीजिए