खुलेआम ये गुंडा आख़िर किसे ललकार रहा है - कानून को या पुलिस-प्रशासन को?
सरकारी संरक्षण तो है ही, लेकिन क्या पुलिस ने भी इसे गुंडागर्दी का ‘लाइसेंस’ दे रखा है?
आख़िर इतना बेख़ौफ़ होने की ताक़त इन्हें कौन दे रहा है?
यही खासियत है चिराग पासवान की ।
स्पष्ट-बिना किंतु परंतु के अपनी बात रखी।
चिराग पासवान लंबी राजनीति के खिलाड़ी हैं। इसीलिए वह नई पीढ़ी में भी लोकप्रिय है!
इस व्यक्ति का सुबह-सुबह नाम लेना भी गुनाह जैसा है. आप ही सोचिये, देश को 'विश्वगुरु' और 'विकसित भारत' बनाने वाले सिस्टम में कैसे-कैसे लोग पाले जा रहे हैं! स्वयं मीडिया को दिये इंटरव्यू में यह व्यक्ति खुलेआम बता चुका है कि एक साथ वह कई भूमिकाओं में रहता है--'वह भारत को एक खास अल्पसंख्यक समुदाय(मुस्लिम) से ���ुक्त करने के अभियान का हिस्सा है, वह 'गौ रक्षक' है, वह 'सनातनी'' है, वह 'आरक्षण विरोधी' है और 'सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर' भी है(कितना सोशल या एंटी-सोशल है ऐसा मीडिया!)!' इसके अलावा वह पुलिस की खास स्टिक और खास जूता पहनकर 'जंतर-मंतर' जैसी जगहों पर जाकर लोगों का सिर भी फोड़ता है. पुलिस में मामला दर्ज होने के बावजूद उसका कभी बाल-बांका नहीं होता! क्योंकि उसे बचाने के लिए पूरी 'सत्ता संरचना' मौजूद रहती है! बड़े-बड़े मंत्री उसके संरक्षक हैं.
मौजूदा तंत्र में इसका भविष्य उज्ज्वल है. अगर अगले चुनाव में टिकट नहीं मिला तो कम से कम सरकार में पिछले दरवाजे से इस 'सनातनी' के लिए कोई जगह तो बनती ही है!
अमन चोपड़ा — “Godi Media की कई definitions हैं…”
सौरव दास — “नहीं, Godi Media का मतलब है जो सरकार का एजेंडा चलाए।” 🔥
बस… दो लाइन में पूरी परिभाषा साफ़ कर दी! 😂
क्या @DelhiPolice ऐसी नफरती, दंगाई और देश का माहौल बिगाड़ने वाली मानसिकता रखने वालों पर कोई कार्रवाई करेगी या नहीं..?
या फिर सत्ता के संरक्षण में ये लोग इसी तरह खुलेआम घूमते रहेंगे और नफरत फ���लाते रहेंगे..?
दिल्ली की एक मुस्लिम पत्रकार का दर्द सुनकर आपकी रूह काँप जायेगी , पत्रकार शाहीन की आप बीती सुनकर आपको रोना आ जायेगा ,
शाहीन नाम की मुस्लिम पत्रकार ने जब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से सवाल पूछा तो उसके साथ पुलिस ने नाम पूछने के बाद शाहीन के साथ मारपीट की ,
“बना लो, वायरल कर देना… अखिलेश यादव को दे देना!”
मैनपुरी के CO City अशोक सिंह का यह अंदाज़ देखिए। वर्दी का रौब, सत्ता की अकड़ और ऊपर से मूंछों पर ताव!
योगी राज में यूपी पुलिस पर “ठाकुरवाद” और सत्ता-संरक्षित जातीय वर्चस्व के आरोप यूँ ही नहीं लगते। जब वर्दी में बैठा अफ़सर जनता से कानून की भाषा में बात करने के बजाय विपक्ष के नेता का नाम लेकर चुनौती देने लगे, तो सवाल सिर्फ़ एक पुलिसवाले के व्यवहार का नहीं रह जाता - सवाल उस सत्ता-संस्कृति का होता है, जिसने ऐसी अकड़ को बेख़ौफ़ बनाया है।
क्या यूपी पुलिस संविधान से चलेगी या सत्ता की जातीय हनक से?
2.6% के 2 और 6 को जोड़ें तो टोटल 8 होता है. और मेरा हैप्पी बड्डे 17 को होता है और उसके 1 और 7 को जोड़ें तो उसका टोटल भी 8 होता है और 8, 7 के बाद आता है...यानी 7.8 !!!
मल्लब जिसे तुम 2.6% समझ रे हो वो एक्चुल्ली में 7.8% है...समझ गये...?? तो काट के सही लिखो...