हे भगवान!
ईंट पत्थर से लादे जिस ट्रक को जंतर मंतर प्रोटेस्ट साइट पर पार्क किया गया था, @newslaundry के पत्रकार @ImAvdheshkumar की इंवेस्टिगेटिव रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली पुलिस ने उसे चार दिन पहले ज़ब्त किया था!
पढ़िए ये माइंड ब्लोविंग स्टोरी
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💟 BPSC TRE4💟
शिक्षा मंत्री जी TRE 4 में domicile नियम का पालन होना चाहिए।
✅ मत भूलियेगा कि नीतीश कुमार ने शिक्षकों की बहाली में Domicile नीति लागू करने का फैसला लिया था।
✅ अगर TRE 4 के विज्ञापन में domicile नीति का पालन नही किया गया तो राजव्यापि आंदोलन होगा।
@mkrtiwari_bjp
BJP ने इन जैसे धूर्त मक्कारों को सिर्फ इसलिए रखा हुआ है कि जिस भी दिन विपक्ष किसी ज्वलंत मुद्दे को लेकर सरकार पर हमला करें, ये लोग कुछ भी झूठी, मनगढ़ंत अंडबंड बकवास करके न्यूज की हेडलाइन और सोशल मीडिया का नैरेटिव बदल दें
😏और मजे की बात है ये लोग हर बार कामयाब हो भी रहें है!
देश के गृह मंत्री अमित शाह ने चलवाई थी दिल्ली प्रदर्शन में छात्रों पर गोली?
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि छात्रों पर गोली गृह मंत्रालय और गृहमंत्री के इशारे पर चलाई गई। सरकार ने इसे बेबुनियाद बताया।
लेकिन एक बात सोचने वाली है - जिस गृह मंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस आती है, जिस गृह मंत्रालय के अधीन अर्धसैनिक बल आते हैं, CRPF आती है, CISF आती है - क्या उसी गृह मंत्रालय को यह नहीं पता था कि दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे प्रदर्शन में बच्चों पर गोली किसने चलाई?
क्या यह देश के आम नागरिक को नहीं पता कि इस समय गृह मंत्रालय के मंत्री अमित शाह हैं? तो क्या नेता प्रतिपक्ष का यह आरोप बेबुनियाद है?
यह तो जाहिर सी बात है कि जब मंत्रालय अमित शाह का है तो उन्हें इस बात की जानकारी तो होगी ही। और अगर नहीं थी - तो सवाल यह उठता है कि क्या दिल्ली पुलिस या अर्धसैनिक बल अपने आप फैसले ले रहे थे?
यही सवाल और भी गहरा हो जाता है जब हम देखते हैं कि जब कहीं एनकाउंटर होता है, जब आतंकवादियों को मारा जाता है - तो यही सरकार कहती है कि हमने कराया, हम इस ऑपरेशन के मास्टरमाइंड हैं। लेकिन जब दिल्ली में प्रदर्शन पर लाठीचार्ज होता है, गोलियाँ चलाई जाती हैं - तो सरकार कहती है कि जाँच होनी चाहिए।
संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू कह रहे हैं कि यह आरोप बेबुनियाद है और ऐसा होता रहा तो सदन नहीं चलेगा। लेकिन सवाल यह है - क्या किसी को नहीं पता कि गृहमंत्री कौन हैं और पूरी सुरक्षा व्यवस्था किस मंत्रालय के अधीन आती है?
सवाल आप सबके लिए है - क्या इस पर जाँच होनी चाहिए? और अगर हाँ - तो किस आधार पर? क्या दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बल अपने फैसले खुद ले रहे थे और सरकार की कोई भूमिका नहीं थी? बात सोचने की है।