मुख्यमंत्री फड़नवीस जी,
अब कौन है “भाड़े का …?”
कौन है “जिन्हें कुत्ता नहीं पूछ रहा” वो इसके बारे में सवाल पूछ रहे हैं?
क्या यह “महाराष्ट्र का अपमान” नहीं है?
महाराष्ट्र को धोखा कौन दे रहा है?
जवाब दीजिए
पत्रकार महोदय,
विचारों का विरोध कीजिए, तथ्यों का नहीं।
आपने जिस तरह एक नेता के पूरे राजनीतिक जीवन को दो चार अधूरी बातों में समेटने की कोशिश की है, उससे ज़्यादा आपके पूर्वाग्रह दिखाई देते हैं, तथ्य नहीं।
जिस व्यक्ति पर आप सवाल उठा रहे हैं, क्या आपने यह जानने की कोशिश की कि उसने किन परिस्थितियों में कौन-कौन से चु��ाव लड़े? कौन-सी जिम्मेदारियाँ पार्टी नेतृत्व ने सौंपीं? किन मौकों पर उसने संगठन के कहने पर कठिन राजनीतिक फैसले स्वीकार किए? या फिर आपकी पूरी रिसर्च किसी की लिखी हुई स्क्रिप्ट तक ही सीमित थी?
राजनीति में हार जीत किसी की योग्यता का अंतिम प्रमाण नहीं होती। अगर ऐसा होता, तो देश के अनेक दिग्गज नेताओं का राजनीतिक अस्तित्व ही समाप्त हो गया होता। चुनावी हार का हवाला देकर किसी क�� पूरे योगदान को नकार देना न निष्पक्ष विश्लेषण है, न पत्रकारिता।
आपने यह भी मान लिया कि किसी नेता ने खुद को एक क्षेत्र तक सीमित रखा। क्या यह जानकारी आपको पार्टी के अंदर से मिली, या यह भी आपकी कल्पना का हिस्सा है? किसी नेता की संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ सार्वजनिक मंचों पर घोषित नहीं की जातीं। इसलिए अनुमान को तथ्य बनाकर परोसना उचित नहीं।
पत्रकार का काम सवाल पूछना है, लेकिन सवाल सभी से समान मानद���ड पर पूछे जाने चाहिए। यदि जवाबदेही तय करनी है, तो फिर हर उस व्यक्ति के योगदान और जिम्मेदारी पर भी समान ईमानदारी से लिखिए, न कि केवल उसी पर जिसे निशाना बनाना सुविधाजनक लगे।
आज सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि पत्रकार सवाल पूछ रहे हैं। समस्या यह है कि कुछ लोग पहले निष्कर्ष तय कर लेते हैं और बाद में उसके समर्थन में तर्क खोजते हैं।
पत्रकारिता का मूल मंत्र है,तथ्य पहले, राय बाद में।
यदि क्रम उल्टा हो जा��, तो वह पत्रकारिता नहीं, केवल प्रायोजित विमर्श बनकर रह जाती है।
हम लोग खबर और नैरेटिव का फर्क समझते हैं।
@RubikaLiyaquat इधर उधर की बात न कर रुबिका,
ये पूछ जिस राम मंदिर के नाम पर 35 सालों से भाजपा आरएसएस वाले राजनीतिक रोटी सेकते हुए सत्ता में आए हैं उनके चौकीदार ने चौकीदारी क्यों नहीं किया,
“भाड़े के टट्टे”
“जिनको कुत्ता नहीं पूछता”
“छोड़ूँगा नहीं”
यह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की सदन में भाषा है
धराशायी होते इंफ्रास्ट्रक्चर पर सवाल पूछने वालों को गरिया रहे हैं
यह लोकतंत्र है देवेंद्र जी, और जिसको आप कोस रहे हैं वह जनता है
सत्ता का यह नशा उतरेगा ज़रूर
इंदिरा_गांधी अपने पिता नेहरू के साथ सोवियत रूस की यात्रा कर चुकी थीं। नेहरूजी की तरह वे भी वहां बड़ी लोकप्रिय थीं। उस समय कई सोवियत नागरिकों ने अपनी बेटियों का नाम इंदिरा रखा था।
Ploshchad_Indiry_Gandhi सर्च कर लेना। मॉस्को में एक पार्क का नाम है उनके सम्मान में। मूर्तियां लगी हैं इनकी।
सोवियत प्रमुख ब्रेज़्नेव ने इंदिरा गांधी से मदद मांगी थी, जानते हैं? व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़े होंगे।
"मुझे अफगानिस्तान से बाहर निकलना है। रास्ता बताइये?"ब्रेज़्नेव ने इंदिरा जी से पूछा।
"The way out is the same as way in" इंदिराजी का ���त्तर था।
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शरद पवार से एक किस्सा सुना है। आप लोग भी पढिये और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के छात्रों को ज़रूर पढाईयेगा।
इंद्रकुमार गुजराल, जो बाद में प्रधानमंत्री बने, भारत के राजदूत थे सोवियत में।
इंदिरा गांधी आधिकारिक दौरे पर गईं।
हवाई अड्डे पर आगवानी के लिए गुजराल थे, और सोवियत के अन्य अधिकारी।लेकिन सोवियत प्रमुख नहीं थे।
प्रधानमंत्री के रुकने का इंतज़ाम क्रेमलिन में किया गया था।
इंदिरा गांधी ने गुजराल ���े कहा सीधे भारतीय दूतावास चलो। वहां वे बैठ गईं भारतीय दूतावास के अधिकारियों और कर्मचरियों के बच्चों के साथ और उनसे हिल मिल गईं।
यहाँ ब्रेज़्नेव इंतज़ार कर रहे थे। पता चला मैडम जी तो दूतावास हैं, वे वहाँ पहुँचे और हवाई अड्डे पर न आने के लिए क्षमा मांगी और कहा आपके अनजाने में हुये अपमान के लिए खेद है।
इंदिरा जी ने कहा "अपमान मेरा हुआ होता तो कोई बात न थी, ये भारत की जनता का अपमान हुआ था और मैं भ��रत की जनता का अपमान बर्दाश���त नहीं कर सकती।"
और ये न भूलिएगा कि उस समय सोवियत भारत का सबसे भरोसेमंद और सच्चा मित्र था।
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हीरालाल को कौन लेने आते हैं हवाई अड्डे पर और वो कूद कर टैक्सी में घुस जाते हैं। ये व्हाट्सएप में जरूर भेज देना उसके भक्तों को।
#VijayShukla
दिलीप सिंह राठौर जी राजस्थान से श्री राम म���दिर निर्माण में लगने वाले पत्थर सेवा भाव से मुफ्त देना चाहते थे।
पर निर्माण करने वाले ट्रस्ट ने वो पत्थर कई गुना दाम म���ं ख़रीदना बेहतर समझा!
कमीशन का खेल?
India’s Prime Minister Narendra Modi actually said this👇
• India celebrated Republic day on 26th January. 2+6 =8
• Indonesian President’s birthday is on 17th. 1+7 =8
With this IQ, this man wants to be Nehru!
🤦♀️🤦♀️
ये नेहरूजी इसका पीछा क्यों नहीं छोड़ते😂😂
शक्ल देखो घोचेंद्र की...
(वीडियो में कहे गए शब्दों का हिंदी अनुवाद
"यही सर्वोच्च राजकीय सम्मान भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी प्रदान किया गया था। उन्हें भी उनके योगदान और भारत-इंडोनेशिया के संबंधों में निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका के सम्मान में यह अलंकरण दिया गया था।")
ईर्ष्यालु की सबसे बड़ी त्रासदी यह होती है कि जिससे वह ईर्ष्या करता है, वही उसे हर जगह दिखाई पड़ता है।
आज इंडोनेशिया की संसद में नरेंद्र मोदी ने पूरे सम्मान के साथ बीजू पटनायक का नाम लिया।
अच्छी बात है।
बहुत अच्छी बात है।
लेकिन इतिहास ने उसी क्षण एक और सवाल भी पूछ लिया...
क्या केवल बीजू पटनायक ही थे?
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1947...
भारत अभी-अभी आज़ाद हुआ था।
अपना घर भी पूरी तरह संभल नहीं पाया था��
देश विभाजन के घावों से लहूलुहान था।
लाखों शरणार्थी सड़कों पर थे।
अर्थव्यवस्था कमजोर थी।
लेकिन उसी समय, हज़ारों किलोमीटर दूर इंडोनेशिया भी डच साम्राज्यवाद से अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहा था।
उस समय भारत ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया।
"हम केवल अपनी आज़ादी का जश्न नहीं मनाएँगे...
हम हर गुलाम राष्ट्र की आज़ादी के साथ खड़े होंगे।"
यह पंडित जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति का मूल दर्शन था।
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जब दुनिया की कई बड़ी शक्तियाँ चुप थीं...
भारत बोला।
जब कई देशों ने अपने व्यापारिक हित देखे...
भारत ने नैतिकता देखी।
भारत ने डच जहाज़ों और विमानों के बहिष्कार का समर्थन किया।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इंडोनेशिया की स्वतंत्रता का पक्ष लिया।
1949 में एशियाई देशों को एकजुट कर डच उपनिवेशवाद पर नैतिक और कूटनीतिक दबाव बनाया।
यही वह भार�� था...
जो केवल अपने लिए नहीं...
दूसरों की स्वतंत्रता के लिए भी लड़ता था।
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और इसी दौर में सामने आते हैं...
बीजू पटनायक।
एक साहसी पायलट।
जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर इंडोनेशिया के नेताओं को सुरक्षित निकालने का साहसिक अभियान पूरा किया।
इंडोनेशिया ने उनका ऋण कभी नहीं भुलाया।
उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक से सम्मानित किया।
और यह सम्मान बिल्कुल उचित था।
क्योंकि वीरता का कोई विकल्प नहीं होता।
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लेकिन ��़रा सोचिए...
यदि बीजू पटनायक उस मिशन के वीर नायक थे...
तो वह मिशन किस भारत की सोच से जन्मा था?
किस नेतृत्व ने तय किया था कि एक नया आज़ाद भारत किसी दूसरे देश की आज़ादी के लिए भी जोखिम उठाएगा?
उस प्रश्न का उत्तर है...
जवाहरलाल नेहरू।
एक ने कॉकपिट से इतिहास लिखा...
दूसरे ने विश्व मंच से।
एक ने विमान उड़ाया...
दूसरे ने भारत की नैतिक प्रतिष्ठा।
इतिहास दोनों का है।
किसी एक का नहीं।
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यही बात हमे��� बेचैन करती है।
आज जब किसी विरोधी दल के नेता का नाम लिया जाता है तो उसकी प्रशंसा होती है...
लेकिन उसी कहानी के सबसे बड़े पात्रों में से एक का नाम धीरे-धीरे गायब कर दिया जाता है।
क्या यह संयोग है?
या फिर इतिहास को सुविधानुसार संपादित करने की आदत?
इतिहास कोई फ़िल्म नहीं...
जहाँ पसंद न आने वाले पात्र का दृश्य काट दिया जाए।
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आज वही लोग भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा की बात करते हैं...
लेकिन यह बता��े से बचते हैं कि स्वतंत्र भारत की वह प्रतिष्ठा रातों-रात नहीं बनी थी।
उसे बनाने में वर्षों लगे।
उसमें स्वतंत्रता आंदोलन का नैतिक बल था।
नेहरू की गुटनिरपेक्ष सोच थी।
एशियाई एकजुटता का सपना था।
उपनिवेशवाद के खिलाफ स्पष्ट आवाज़ थी।
और उस विचार को ज़मीन पर उतारने वाले साहसी लोग थे...
जिनमें बीजू पटनायक भी शामिल थे।
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इसलिए आज बीजू पटनायक का सम्मान कीजिए...
ज़रूर कीजिए।
लेकिन उसी साँस में नेहरू को भी याद कीजिए।
क्योंकि इतिहास में किसी एक की रो���नी बढ़ाने के लिए दूसरे का दीपक बुझाने की ज़रूरत नहीं होती।
महान राष्ट्र अपने नायकों को जोड़ते हैं...
तोड़ते नहीं।
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याद रखिए...
राष्ट्रवाद का अर्थ केवल अपने पसंदीदा नामों का जयघोष नहीं होता।
राष्ट्रवाद का अर्थ है...
सत्य को उसके पूरे स्वरूप में स्वीकार करना।
बीजू पटनायक की वीरता भी भारत की है।
नेहरू की दूरदृष्टि भी भारत की है।
और भारत...
किसी एक विचारधारा की जागीर नहीं।
वह उन सभी ल���गों की साझी विरासत है जिन्होंने अपने साहस, अपने विचार और अपने त्याग से दुनिया में उसका सिर ऊँचा किया।
इतिहास को पूरा पढ़िए...
क्योंकि अधूरा इतिहास केवल अ��्ञान नहीं पैदा करता...
वह आने वाली पीढ़ियों से उनका सच भी छीन लेता है।
वैसे तुम्हारे द्वारा नेहरू जी का नाम एडिट कर देने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि नेहरू जी ने जिनका साथ दिया, वो आज भी उन्हें याद करते हैं।
देख लो वीडियो
#VijayShukla
पिछले सप्ताह हुई UGC-NET परीक्षा को लेकर सामने आए गंभीर आरोप बेहद चौंकाने वाले हैं।
NEET पेपर लीक के कुछ ही हफ्तों बाद अब खबरें आ रही हैं कि -
- UGC-NET परीक्षा से ठीक पहले 100 पन्नों की एक PDF प्रसारित हुई।
- यह PDF उस question paper setting की है, जो सिर्फ़ NTA के पास उपलब्ध होती है।
- PDF के लगभग 90 सवाल Sociology के असली प्रश्नपत्र से मेल खाते हैं।
- वही प्रश्नपत्र ₹2.25 लाख में बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान में बेचा जा रहा था।
- इसी नेटवर्क ने CSIR-NET, HTET और ADA जैसी आगामी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने का भी दावा किया।
NEET और NET में बार-बार सामने आए घोटालों के बाद भी मोदी सरकार आंखें मूंदकर सो रही है, क्योंकि लाखों छात्रों की रात-रात जागकर की गई सालों की मेहनत उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।
सारा देश जानता है कि प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री से किसी भी तरह की जवाबदेही या कार्रवाई की उम्मीद बेकार है - न जांच होगी, न छात्रों को न्याय मिलेगा।
बदलाव का एकमात्र औज़ार हमारी सम्मिलित आवाज़ है - देश भर के छात्रों की गूंज, जो भारत में शिक्षा revolution लाकर रहेगी।
यह राम मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरी हैं
बता रहे हैं ख़ुद कुछ नहीं करते थे
किसी को महीने के 5 दिन अयोध्या भेज देते थे जो आकर हिसाब किताब देखता था
यह करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा दी भेट और चढ़ावे के प्रति उदासीनता नहीं प्रभु राम का अपमान है - आस्था के साथ खिलवाड़ है
जिन लोग ने भगवान राम का इस्तेमाल 2 सांसदों से 303 सांसद बनाने के लिये किया वो पापी हम पर राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगा रहे हैं ।
आपने लूट नहीं की होती तो हम आप पर इल्ज़ाम क्यो लगा रहे होते!
ये शमिक भट्टाचार्य है..बीजेपी का स्टेट प्रेसिडेंट...
बीजेपी की जीत के बा'द मीडिया इसे बुद्धिजीवी बताने लगा है..मगर आज भी शाम को अटल कर्म करते हुए ही मिलता है
इस ने बताया कि श्यामाप्रसाद कोलकाता के महम्मद अली पार्क में सभा कर रहा था..
नेताजी के पत्थर मार कर श्यामा प्र���ाद का सर फोड़ दिया था.. ख़ूब मारा था
शमिक कहता है कि श्यामा प्रसाद चाहता तो नेताजी को मार सकता था..मगर श्यामा प्रसाद ने ऐसा नहीं किया
अभी एक ट्विस्ट है ,
महम्मद अली पार्क कांग्रेस अध्यक्ष महम्मद अली जौहर के नाम पर है..
अब बीजेपी चाहती है कि मोहम्मद अली पार्क का नाम महाबली पार्क किया जाए.. ताकि श्यामा प्रसाद को पिटाई का सुबूत मिट जाए
महम्मद अली पार्क के अलावा नेताजी ने कोलकाता यूनिवर्सिटी के सामने भी श्यामा प्रसाद को कूटा था..मगर कोलकाता यूनिवर्सिटी का नाम बदलना नामुमकिन है
नेताजी सुभाष ने जिस श्यामा प्रसाद को सड़कों पर कूटा हो वो श्यामा प्रसाद देशभक्त कैसे हुआ?
शमिक ने श्यामा प्रसाद की पोल खोल दी
अंधभक्तों , सुनो
जय नेताजी सुभाष चंद्र बोस
जय हिंद
जय कांग्रेस...
#VijayShukla