मुसलमानों से कागज़ माँगेंगे, खुद के कागज़ नहीं दिखाएंगे! कागज़ तो संघ के भी बनेंगे.. पूरा वीडियो, आज शाम 7 बजे, सिर्फ Sohit Mishra Official पर! @rajuparulekar
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हज़रत इमाम हुसैन जी का संघर्ष, त्याग और बलिदान हमें असत्य, अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध मानवता की सबसे मज़बूत ढाल बनने की सीख देता है।
आज मुहर्रम के दिन हमें उनके बताए हुए रास्ते पर चलने की प्रेरणा लेनी चाहिए।
मोदी सरकार का दोमुँहापन देखिए....जिन्हें रामभक्तों का हत्यारा और भ्रष्ट कहती है, उन्हें ही पद्म पुरस्कारों से सम्मानित भी करती है।
या तो बीजेपी और मोदी सरकार झूठ बोल रही है या फिर वह ऐसे दाग़दार लोगों को महान समझती है।
सड़क पर चलते-चलते गाड़ियाँ ख़राब हो जा रही हैं।
जिनकी गाड़ी ख़राब हुई उनके चेहरे पर परेशानी देखिए और दूसरी तरफ़ गडकरी जी के चेहरे की मुस्कान!
सरकार जनता के लिए नहीं, अपने बेटे-बेटियों के लिए काम कर रही है!
Massive Breaking : योगीकाल
अगर अधिक लिखेंगे या बोलेंगे बाबा कहेंगे भाषण मत दो फिर भी बोले तो दो चार केस और ठुकवा देंगे ।
#मध्यप्रदेश हो या #उत्तरप्रदेश
अयोध्या उज्जैन हो या लखनऊ
सब जगह #धर्म#शिक्षा की आड़ में घोटाले चल रहे है लेकिन योगी बाबा भी क्या करे हाथ बंधे है कुछ भी हो जाए #FIR नहीं कर पाएंगे
सब जगह डबल इंजन सरकार में जमीनों का खेल चल रहा है ।
सब के सब घोटालेबाज #BJP के है ।
इन बेनामी जमीनों की खरीद फरोख्त की #तारीख देखिए सब हमारे ईमानदार बाबा के शासन काल की है और करीबी की लेकिन मजाल हाल बाबा कुछ कर ले ।
-ये भी तो आपातकाल है-
आतंक का साया गहराया,
जन मन में डर समाया।
राहु-केतु संविधान पर बैठे,
आज़ादी के कान उमेठे।
लोकतंत्र की बिगड़ी चाल
सद्भाव का टूटा सुर-ताल।
झुकी रीढ़ और नत है भाल
फिर भी कहते देश खुशहाल।
ये भी तो आपातकाल है।
बुल्डोज़र-राज की देखो झाँकी,
इंसाफ़ कहाँ रह गया बाक़ी?
कहीं न कोई सुनवाई है,
हर आवाज़ दबाई है।
मीडिया पर पहरा भारी,
सच की साँस हुई दुश्वारी।
झूठ गूँज रहा दरबारों में,
न्याय फँसा इनकारों में।
मुश्किल में अब हर सवाल है,
साज़िशों का फैला जाल है।
ये भी तो आपातकाल है।
जनता को ख़ामोश करो,
झूठे वादों का जोश भरो।
जो सवाल करे, वो गद्दार,
जो सच बोले, वो गुनहगार।
जेलों में भर दो मतभेद,
भाटों से लिखवाओ नए वेद।
असहमति पर ताला डालो,
लोकलाज को छीलो-छालो।
राजा को बस यही ख़याल है,
उसको न कोई मलाल है।
लोकतंत्र बना फुटबाल है।
ये भी तो आपातकाल है।
न रोज़ी-रोटी, न रोज़गार है,
बोले तो लाठियों की मार है।
तिजोरी भर रही सेठों की,
मित्र हो रहे मालामाल हैं।
किसानों और मजूरों का,
हर दिन और बुरा हाल है।
उनकी थाली में छप्पन भोग,
अपना तो बस खाली थाल है।
राजा को इससे क्या मतलब
उसके गाल तो लाल-लाल हैं
ये भी तो आपातकाल है।
विचारों पर बंदिश भारी
रातों-रात होती गिरफ़्तारी
होंठ सीं दिए, जुबाँ पर ताले
ऐसे हैं ये आज़ादी के रखवाले
डर के साये में जीना सीखो,
सच को झूठ कहना सीखो।
कानून भूला अपनी चाल है
अदालतों का भी यही हाल है
कैसा यह लोकतंत्र विशाल है,
जहाँ आम आदमी बदहाल है?
ये भी तो आपातकाल है।
जब सत्ता सत्य बन जाए,
और प्रश्न असभ्य हो जाए,
जब अधिकार कुचले जाएँ,
और झूठ के नगाड़े बजाए जाएँ,
जब डर शासन की ढाल हो,
जब ज़ुल्म-ओ-सितम का माहौल हो
तब समझो आपातकाल है
ये भी तो आपातकाल है।
-मुकेश कुमार
सरकार ने अचानक ये कहकर नए विवाद को जन्म दे दिया है कि पासपोर्ट अब नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाएगा। अगर कानूनी तौर पर देखा जाए तो उसका ये कहना सही है, मगर सचाई ये है कि व्यावहारिक तौर पर पासपोर्ट, वोटर आईडी और आधार कार्ड नागरिकता के दस्तावेज़ माने जाते हैं।
ऐसे में सवाल उठाया जा रहा है कि सरकार बार-बार इन दस्तावेज़ों को अस्वीकार क्यों कर रही है। और अगर सवाल उठा रही है तो ये क्यों नहीं बताती कि कौन सा दस्तावेज़ नागरिकता का सबूत माना जाएगा।
देश में कोई एक ऐसा मास्टर डाक्यूमेंट नहीं है जिसे अंतिम तौर पर नागरिकता का प्रमाण पत्र मान लिया जाए। तो क्या सरकार ये विवाद इसलिए खड़ा कर रही है कि वह सिटिज़न कार्ड जैसा कोई कार्ड लाना चाहती है....
और अगर लाना चाहती है तो क्या इसका संबंध नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़नशिप या एनआरसी से है....क्या वह पहले एनआरसी करवाएगी और फिर कार्ड जारी करेगी। यानी एनआरसी के ज़रिए वह अपना एजेंडा लागू करेगी।
आशंका यही है और इसीलिए सरकार की घोषणा को लेकर बवाल खड़ा हो गया है। ये पूरी कवायद एसआईआर जैसी है। ये तो सिदध् हो चुका है कि एसआईआर को मताधिकार से वंचित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। जिन वोटर को हटाना था उन्हें चुनाव आयोग के ज़रिए हटवा दिया गया और चुनाव भी जीत लिया गया।
अब एनआरसी के ज़रिए बड़े पैमाने पर लोगों की नागरिकता छीनी जाएगी या फिर उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर कर दिया जाएगा।
ये एक हथकंडा भी है पूरे देश को बाँटने का, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके 2029 के लिए चुनावी तैयारियों का अंजाम देने का। सावरकर-गोलवलकर का एजेंडा लागू करना तो इसका छिपा हुआ मक़सद है ही।
आशंकाएं और भी हैं। मसलन, क्या सरकार कोई ऐसी योजना पर काम कर रही है जिसके तहत वह देश भर के नागरिकों का हर डाटा अपने नियंत्रण में ले सके और फिर अपने हिसाब से उसका इस्तेमाल करे....
एक आशंका ये भी है कि अगले साल की शुरुआत में पंजाब में चुनाव हैं और वहाँ क़रीब एक मतदाता पासपोर्ट होल्डर हैं। ये बीजेपी के मतदाता कतई नहीं होंगे इसलिए अब इन्हें एसआईआर के ज़रिए मतदाता सूची से बाहर किया जाएगा ताकि मामूली आधार वाली पार्टी पंजाब को भी अपने पॉकेट में डाल ले.....
-ये भी तो आपातकाल है-
आतंक का साया गहराया,
जन मन में डर समाया।
राहु-केतु संविधान पर बैठे,
आज़ादी के कान उमेठे।
लोकतंत्र की बिगड़ी चाल
सद्भाव का टूटा सुर-ताल।
झुकी रीढ़ और नत है भाल
फिर भी कहते देश खुशहाल।
ये भी तो आपातकाल है।
बुल्डोज़र-राज की देखो झाँकी,
इंसाफ़ कहाँ रह गया बाक़ी?
कहीं न कोई सुनवाई है,
हर आवाज़ दबाई है।
मीडिया पर पहरा भारी,
सच की साँस हुई दुश्वारी।
झूठ गूँज रहा दरबारों में,
न्याय फँसा इनकारों में।
मुश्किल में अब हर सवाल है,
साज़िशों का फैला जाल है।
ये भी तो आपातकाल है।
जनता को ख़ामोश करो,
झूठे वादों का जोश भरो।
जो सवाल करे, वो गद्दार,
जो सच बोले, वो गुनहगार।
जेलों में भर दो मतभेद,
भाटों से लिखवाओ नए वेद।
असहमति पर ताला डालो,
लोकलाज को छीलो-छालो।
राजा को बस यही ख़याल है,
उसको न कोई मलाल है।
लोकतंत्र बना फुटबाल है।
ये भी तो आपातकाल है।
न रोज़ी-रोटी, न रोज़गार है,
बोले तो लाठियों की मार है।
तिजोरी भर रही सेठों की,
मित्र हो रहे मालामाल हैं।
किसानों और मजूरों का,
हर दिन और बुरा हाल है।
उनकी थाली में छप्पन भोग,
अपना तो बस खाली थाल है।
राजा को इससे क्या मतलब
उसके गाल तो लाल-लाल हैं
ये भी तो आपातकाल है।
विचारों पर बंदिश भारी
रातों-रात होती गिरफ़्तारी
होंठ सीं दिए, जुबाँ पर ताले
ऐसे हैं ये आज़ादी के रखवाले
डर के साये में जीना सीखो,
सच को झूठ कहना सीखो।
कानून भूला अपनी चाल है
अदालतों का भी यही हाल है
कैसा यह लोकतंत्र विशाल है,
जहाँ आम आदमी बदहाल है?
ये भी तो आपातकाल है।
जब सत्ता सत्य बन जाए,
और प्रश्न असभ्य हो जाए,
जब अधिकार कुचले जाएँ,
और झूठ के नगाड़े बजाए जाएँ,
जब डर शासन की ढाल हो,
जब ज़ुल्म-ओ-सितम का माहौल हो
तब समझो आपातकाल है
ये भी तो आपातकाल है।
-मुकेश कुमार
अगर देश के लाखों,करोड़ों छात्रों की पीड़ा पर चर्चा करना राजनीति है तो हर राजनैतिक दल को एैसी राजनीति करनी चाहिये।
मैं देश के मीडिया कर्मियों से भी अनुरोध करूँगा कि आपके भी बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, आप भी छात्रों का साथ दीजिये, शिक्षा मंत्री को कटघरे में खड़ा करके सवाल पूछिये।
@ShayarImran
कांग्रेस ने देशभर में 40 दिवसीय "छात्रों की गूंज" अभियान की शुरुआत की।
30 जून से देश के 28 शहरों में छात्र संपर्क अभियान चलाया जाएगा, जबकि 1 अगस्त को कलेक्टरेट घेराव और 9 अगस्त को दिल्ली में संसद घेराव का कार्यक्रम प्रस्तावित है।
पूर्णिया सांसद पप्पू यादव ने ग्वालियर में प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया।
सवाल ये नहीं शीशा बचा के टूट गया
सवाल ये है कि पत्थर किधर से आया था।
“छात्रों की गूँज” प्रेस कॉंफ्रेंस में रॉंची में मीडिया के साथियों से संवाद किया और राहुल गॉंधी जी के शिक्षा के भविष्य को बचाने के ऑंदोलन को छात्रों और युवाओं से साझा किया।
@RahulGandhi@kcvenugopalmp@ShayarImran@priyankagandhi@IYC
-ये भी तो आपातकाल है-
आतंक का साया गहराया,
जन मन में डर समाया।
राहु-केतु संविधान पर बैठे,
आज़ादी के कान उमेठे।
लोकतंत्र की बिगड़ी चाल
सद्भाव का टूटा सुर-ताल।
झुकी रीढ़ और नत है भाल
फिर भी कहते देश खुशहाल।
ये भी तो आपातकाल है।
बुल्डोज़र-राज की देखो झाँकी,
इंसाफ़ कहाँ रह गया बाक़ी?
कहीं न कोई सुनवाई है,
हर आवाज़ दबाई है।
मीडिया पर पहरा भारी,
सच की साँस हुई दुश्वारी।
झूठ गूँज रहा दरबारों में,
न्याय फँसा इनकारों में।
मुश्किल में अब हर सवाल है,
साज़िशों का फैला जाल है।
ये भी तो आपातकाल है।
जनता को ख़ामोश करो,
झूठे वादों का जोश भरो।
जो सवाल करे, वो गद्दार,
जो सच बोले, वो गुनहगार।
जेलों में भर दो मतभेद,
भाटों से लिखवाओ नए वेद।
असहमति पर ताला डालो,
लोकलाज को छीलो-छालो।
राजा को बस यही ख़याल है,
उसको न कोई मलाल है।
लोकतंत्र बना फुटबाल है।
ये भी तो आपातकाल है।
न रोज़ी-रोटी, न रोज़गार है,
बोले तो लाठियों की मार है।
तिजोरी भर रही सेठों की,
मित्र हो रहे मालामाल हैं।
किसानों और मजूरों का,
हर दिन और बुरा हाल है।
उनकी थाली में छप्पन भोग,
अपना तो बस खाली थाल है।
राजा को इससे क्या मतलब
उसके गाल तो लाल-लाल हैं
ये भी तो आपातकाल है।
विचारों पर बंदिश भारी
रातों-रात होती गिरफ़्तारी
होंठ सीं दिए, जुबाँ पर ताले
ऐसे हैं ये आज़ादी के रखवाले
डर के साये में जीना सीखो,
सच को झूठ कहना सीखो।
कानून भूला अपनी चाल है
अदालतों का भी यही हाल है
कैसा यह लोकतंत्र विशाल है,
जहाँ आम आदमी बदहाल है?
ये भी तो आपातकाल है।
जब सत्ता सत्य बन जाए,
और प्रश्न असभ्य हो जाए,
जब अधिकार कुचले जाएँ,
और झूठ के नगाड़े बजाए जाएँ,
जब डर शासन की ढाल हो,
जब ज़ुल्म-ओ-सितम का माहौल हो
तब समझो आपातकाल है
ये भी तो आपातकाल है।
-मुकेश कुमार
पेपर लीक के मुद्दे पर कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के राष्ट्रीय चेयरमैन और सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि, "जैसे डायपर बदलने से दस्त नहीं रुकते और थर्मामीटर बदलने से बुखार नहीं उतरता, वैसे ही पेपर वायुसेना के विमान से पहुंचाने से पेपर लीक की समस्या खत्म नहीं होगी।"
#ImranPratapgarhi #CongressParty #PaperLeak #Education #CBI #Politics
-ये भी तो आपातकाल है-
आतंक का साया गहराया,
जन मन में डर समाया।
राहु-केतु संविधान पर बैठे,
आज़ादी के कान उमेठे।
लोकतंत्र की बिगड़ी चाल
सद्भाव का टूटा सुर-ताल।
झुकी रीढ़ और नत है भाल
फिर भी कहते देश खुशहाल।
ये भी तो आपातकाल है।
बुल्डोज़र-राज की देखो झाँकी,
इंसाफ़ कहाँ रह गया बाक़ी?
कहीं न कोई सुनवाई है,
हर आवाज़ दबाई है।
मीडिया पर पहरा भारी,
सच की साँस हुई दुश्वारी।
झूठ गूँज रहा दरबारों में,
न्याय फँसा इनकारों में।
मुश्किल में अब हर सवाल है,
साज़िशों का फैला जाल है।
ये भी तो आपातकाल है।
जनता को ख़ामोश करो,
झूठे वादों का जोश भरो।
जो सवाल करे, वो गद्दार,
जो सच बोले, वो गुनहगार।
जेलों में भर दो मतभेद,
भाटों से लिखवाओ नए वेद।
असहमति पर ताला डालो,
लोकलाज को छीलो-छालो।
राजा को बस यही ख़याल है,
उसको न कोई मलाल है।
लोकतंत्र बना फुटबाल है।
ये भी तो आपातकाल है।
न रोज़ी-रोटी, न रोज़गार है,
बोले तो लाठियों की मार है।
तिजोरी भर रही सेठों की,
मित्र हो रहे मालामाल हैं।
किसानों और मजूरों का,
हर दिन और बुरा हाल है।
उनकी थाली में छप्पन भोग,
अपना तो बस खाली थाल है।
राजा को इससे क्या मतलब
उसके गाल तो लाल-लाल हैं
ये भी तो आपातकाल है।
विचारों पर बंदिश भारी
रातों-रात होती गिरफ़्तारी
होंठ सीं दिए, जुबाँ पर ताले
ऐसे हैं ये आज़ादी के रखवाले
डर के साये में जीना सीखो,
सच को झूठ कहना सीखो।
कानून भूला अपनी चाल है
अदालतों का भी यही हाल है
कैसा यह लोकतंत्र विशाल है,
जहाँ आम आदमी बदहाल है?
ये भी तो आपातकाल है।
जब सत्ता सत्य बन जाए,
और प्रश्न असभ्य हो जाए,
जब अधिकार कुचले जाएँ,
और झूठ के नगाड़े बजाए जाएँ,
जब डर शासन की ढाल हो,
जब ज़ुल्म-ओ-सितम का माहौल हो
तब समझो आपातकाल है
ये भी तो आपातकाल है।
-मुकेश कुमार