नित जीवन के संघर्षो से,
जब टूट चूक��� हो अंतर मन।
तब सुख के मिले समंदर का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
जब फसल सूख कर जल के बिन,
तिनका तिनका बन गिर जाये।
फिर होने वाली वर्षा का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
सम्बन्ध कोई भी हो लेकिन,
यदि दुःख में साथ न दे अपना।
फिर सुख के उन संबंधों का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
छोटी छोटी खुशियों के क्षण,
निकले जाते हैं रोज जहाँ।
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
मन कटु वाणी से आहात हो,
भीतर तक छलनी हो जाये।
फिर बाद कहे प्रिय वचनो का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
सुख साधन चाहे जितने हों,
पर काया रोगों का घर हो।
फिर उन अगनित सुविधाओ का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
- दिनकर
आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ
कौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले?
बम बारूद के इस दौर में मालूम नहीं
ऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले।
~गोपालदास नीरज
@himantabiswa Hello @himantabiswa, This is Misleading. The price of subsidised 14.2 kg LPG cylinder in 2014 was ₹ 414. We had debunked this misleading claim in 2021. Here is @AltNews article https://t.co/14Dm3usatR