कल यूथ कांग्रेस द्वारा किए गए प्रदर्शन को लेकर बहुत सी बातें कही जा रही हैं कि प्रदर्शन ग़लत था, इससे देश की बदनामी हुई। क्या प्रदर्शन अप्वाइंटमेंट लेकर किया जाता है... नहीं।
सरकार चाहती है कि आप उससे पूछकर उसकी बताई हुई जगह पर विरोध करें और तय हुए समय पर जगह खाली कर दें। इस तरह धरना प्रदर्शन करने पर सरकार को कोई फ़र्क पड़ेगा, मीडिया उसकी कवरेज करेगा?...नही।
आज से कुछ साल पहले प्रोफेसर जी०डी० अग्रवाल जो IIT कानपुर में प्रोफेसर थे। गंगा की सफ़ाई को लेकर आमरण अनशन पर बैठे थे। अपने अनशन के दौरान उन्होंने मोदी जी को तीन चिट्ठियां लिखी थी। एक का भी जवाब मोदी जी ने नहीं दिया। इंतजार करते-करते 111 दिन बाद उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। मीडिया ने भी तब इस ख़बर को लगभग गायब कर दिया था। आज यही मीडिया यूथ कांग्रेस पर देश को बदनाम करने का आरोप लगा रहा है।
नेता प्रतिपक्ष को इस बजट सत्र में बोलने नहीं दिया गया। कांग्रेस के 8 सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। मोदी जी जवाब देने की बजाए मलेशिया चले गए। भारत के पूर्व थल सेना प्रमुख की किताब को आप 2 साल क्लियरेंस ही नहीं दे रहे। मीडिया पर आपका टोटल कंट्रोल है। इतना सब होने के बाद विपक्ष के पास ऑप्शन क्या बचता है? AI समिट एक बड़ा इवेंट है। इस इवेंट का प्रयोग अगर विपक्ष ने विरोध करने के लिए या अपनी बात रखने के लिए कर लिया तो क्या गलत किया?
Shivraj Singh was picked up by police, allegedly brutaIIy to*tured in custody by UP's Hamirpur police and is currently in critical condition. Police later figured that they had detained the wrong Shivraj.
The shock on his face. Can barely speak.
In Kanpur
Danish ali was beaten & his auto was seized despite showing all the documents
Police allegedly trashed him saying " Musalman ko marunga aur Jail mein dalunga
"katwo se bolte kyu ho" says another police
This is the level of hate & Discrimination Muslim faces in India
पता है, भारत की सिर्फ़ 5 परीक्षाओं - NEET, JEE, SSC, UPSC और RRB की तैयारी पर छात्र और उनके परिवार ��र साल कितना ख़र्च करते हैं?
₹3.5 लाख करोड़।
यानी भारत सरकार के पूरे शिक्षा बजट का लगभग तीन गुना। शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम, विज्ञान और महिला-बाल विकास - इन पाँच मंत्रालयों के कुल बजट के बराबर।
और बदले में करोड़ों युवाओं को क्या मिलता है? तनाव, अनिश्चितता, बेरोज़गारी, और टूटते सपने।
जो ख़र्च सरकार की ज़िम्मेदारी है, उसका बोझ आज परिवार उठा रहे हैं।
#ChhatronKiGoonj
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अनिल शारदा,
आपके जवाब का शुक्रिया। मैं अपनी बात फिर से, इस बार साफ़ तरतीब में रखता हूँ।
पहली बात। आपको वैचारिक योद्धा मैं कभी नहीं मानूँगा, ये भूल मैं कर ही नहीं सकता। वैचारिक योद्धा से मैं इतनी बेसिक बहस नहीं करता।
मेरे सवाल पत्रकार से ही थे, और सिर्फ़ पत्रकार से हो सकते थे। झूठ को झूठ कहने के लिए किसी विचारधारा की वर्दी नहीं चाहिए, बस ईमानदारी चाहिए।
जब आपके स्टूडियो में बैठकर कोई एक के बाद एक कोरे झूठ बोले जाए और आप उसे एक बार भी न ठोकें, तो उँगली आप पर उठेगी ही। ये आप पर हमला नहीं, आपके पेशे की बुनियादी उम्मीद है।
दूसरी बात, और सबसे ज़रूरी। आपने लिखा कि इस्लाम की आलोचना हो तो सवाल बनें, हिंदुत्व की आलोचना हो तो सवाल बनें। पर ये तुलना ही ग़लत बुनियाद पर खड़ी है।
इस्लाम एक धर्म है, उसका समानांतर हिन्दुइज़्म है। हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है, उसका समानांतर इस्लामिज़्म है।
ये कोई बारीक अकादमिक पेच नहीं, बेसिक श्रेणी है। सावरकर ने खुद हिंदुत्व को धर्म नहीं, ���क राजनीतिक-सांस्कृतिक विचारधारा के तौर पर परिभाषित किया था।
एक धर्म और एक विचारधारा को एक ही तराज़ू में रखना, इसके लिए न नज़र चाहिए न नज़रिया, सिर्फ़ सतही जानकारी चाहिए। और वो भी हर "पत्रकार" के पास होनी चाहिए।
तीसरी बात। आपने अपनी ज़िम्मेदारी को "मेहमान के विचार दर्शकों तक पहुँचाना" तक सीमित कर दिया। तो पूछना बनता है, क्या इस उसूल की कोई हद है?
हिंसक धार्मिक और राजनीतिक विचारधारा क्या स���र्फ़ एक ��रफ़ बुरी होती है, या हर तरफ़? अगर मंच देना ही पत्रकारिता है, तो ये कसौटी सब पर एक-सी लगेगी या चुनकर?
चौथी बात, सेक्युलरिज़्म पर। ये आपकी एक नागरिक के तौर पर ज़िम्मेदारी है। मैंने उस पर आपसे इसलिए सवाल किया क्योंकि संविधान का कर्ता ही "हम भारत के लोग" हैं, और अनुच्छेद 51A के मूल कर्तव्य सीधे नागरिक को संबोधित करते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भाईचारे तक।
यानी सेक्युलर भाव सिर्फ़ राज्य की मशीनरी क��� गुण नहीं, हर नागरिक के पैक्ट का हिस्सा है। यही ज़िम्मेदारी आपकी भी है। आप जब चाहें इसे छोड़ सकते हैं, और तब हमें भी पता चल जाएगा कि आप कहाँ खड़े हैं।
और आख़िर में, असल मुद्दा। मेरी चिट्ठी पाँच ठोस, विषय-केंद्रित बिंदुओं पर थी। आपका जवाब इनमें से किसी एक पर भी सीधे नहीं उतरा। आपने पूरी बहस को "विषय" से उठाकर "भूमिका" पर रख दिया। इसे जवाब नहीं, टालमटोल कहते हैं। सुनने वाले को लगता है जवाब आ गया, जबकि असल सवाल वहीं खड़े रह जाते हैं।
पत्रकार दरअसल सत्यान्वेषी होता है। सत्य की खोज करने वाला।
शरदिंदु बंद्योपाध्याय के ब्योमकेश बख्शी खुद को जासूस नहीं, सत्यान्वेषी कहते थे। मैंने ये शब्द वहीं पहली बार पढ़ा और सीखा। शायद ये बारहवीं की बात है।
ब्योमकेश ने इसे कभी परिभाषित नहीं किया, पर उनकी खोज बेमक��सद नहीं थी। जब वो क़ातिल को ढूँढते थे, तो मक़सद सिर्फ़ जिज्ञासा नहीं, इंसाफ़ था।
आप भी जितनी जल्दी अपनी पत्रकारिता का मक़सद ढूँढ लें, उतनी जल्दी आपके लिए भी आसानी होगी, और हमारे लिए भी।
सादर
दाराब फ़ारूक़ी
इस वीडियो ने मुझे झकझोर दिया।
ये उस भारत के लाचार युवा हैं - जिसकी सरकार अपने अरबपति दोस्तों पर लाखों करोड़ लुटा देती है, पर अपने ही छात्रों को एक सुरक्षित सफ़र तक नहीं दे सकती।
चुनाव के वक़्त यही सरकार पूरी-पूरी ट्रेनों का इंतज़ाम कर लेती है। और परीक्षा देने जा रहे छात्रों के हिस्से में आती है - भीड़, घुटन, और बेबसी।
इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि मोदी सरकार छात्रों की गूंज सुनना ही नहीं चाहती।
पर ��ैं वादा करता हूँ - हम यह आवाज़ उन बहरे कानों तक पहुँचाएँगे। हर छात्र को उसका हक़ मिलेगा, उसका न्याय मिलेगा।
17 जून, कोटा। यही गूंज, अब हुंकार बनेगी।
#ChhatronKiGoonj
अगर पुराना वक्त होता तो न्यूक्लिक को फ़र्ज़ी फँसाये जाने के मामले में राष्ट्रव्यापी आंदोलन चल रहा होता और फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर दोषियों पर मुक़दमा चलाये जाने की माँग उठ रही होती। इस मामले में आम नागरिकों की चुप्पी चीख-चीख कर कह रही है कि लोकतांत्रिक समाज के रूप में हम मर चुके हें।
After Vote Chori and Sarkar Chori - the BJP-EC jugalbandi has finished the contest before it has even begun with Seat Chori.
Look at what happened in the recent Rajya Sabha elections.
Congress candidate Meenakshi Natarajan ji submitted every document. No pending cases. The EC cancelled her nomination on a frivolous BJP objection.
Parimal Nathwani ji, the BJP-backed independent, got his own name wrong on the form and skipped multiple mandatory disclosures. The EC gave him an extension to fix everything.
Same Election Commission. Two candidates. One was disqualified without even a hearing. The other was rewarded despite not following the rules.
When the Congress sought a meeting, the EC first tried to evade us. When we finally met, they did not say one word.
Expect to see much more of this - because for the BJP, it is far easier to fix the election than to win it.
सच यही है कि BJP-RSS की कोशिश केवल का सरकार बनाने की कभी नहीं थी। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता के बाद बने भारत के उदारवादी-संवैधानिक मॉडल को हटाकर उसकी जगह एक जातीय-राष्ट्रवादी (Ethno-Nationalist) विकल्प स्थापित करना ह���।
India in 1947 was not some muscular modern state with highways, nukes, forex reserves and surplus food. It was a broke, traumatised, newly partitioned country with a freshly divided army, a refugee crisis and a food crisis.
Pakistan was not a powerless NGO either. It had inherited roughly a third of the divided British Indian Army, about 140,000 men to India’s 260,000, plus tribal lashkars from FATA and NWFP.
Also, in the sectors that were actually lost, Gilgit and the western Poonch-Mirpur belt, large sections of the local population were pro-Pakistan, and anti-Dogra. So Delhi was not just fighting tribals and Pakistani units. In several pockets, the ground under its feet was hostile too.
Despite these adverse factors, India still held the Valley, Jammu and Ladakh, including the core population centres and strategic spine of the state.
For a nearly bankrupt country with weak logistics, limited state capacity and no easy military depth in the northern sectors, that was nearer the ceiling than the floor. "Nehru gifted it" is a childish way to describe a very ugly strategic constraint.
अपनी बात
यह स्वत:स्फूर्त आंदोलन होता युवाओं का तो हम समर्थन करते, जैसे किसान आंदोलन का किया था जैसे एंटी CAA आंदोलन का किया था, जैसे महिला प��लवानों के आंदोलन का किया था।
कई मित्रों के सवाल आए कि इतना विर��ध क्यों?
क्योंकि 2011-14 के अन्ना आंदोलन की तरह यह भी संघ की सत्ता को स्थापित और मज़बूत करने की साज़िश लगता है मुझे। क्योंकि यह न तो स्वतःस्फूर्त लगता है न ही आर्गेनिक।
संभव है इससे जुड़े अनेक लोग बेहद ईमानदार हों, उनकी नीयत शानदार हो, उनकी इच्छा सकारात्मक हो, लेकिन इसके पीछे कौन है यह संदिग्ध है और इस 'कथित' आंदोलन का पूरा स्वरूप अनेक सवाल खड़े करता है।
देश एक अजीब दौर से गुज़र रहा है। भयावह आर्थिक संकट दरवाज़े पर है। परीक्षाओं के पेपर्स लीक होना सिर्फ़ एक लक्षण है, रोग बहुत बड़ा है। साम्प्रदायिकता समाज को भीतर से दीमक की तरह खा रही है।
सोशल मीडिया एक दुधारी तलवार है और कोई एक पीढ़ी क्रांति नहीं करती। नेपाल या बांग्लादेश में भी कोई क्रांति नहीं हुई। अरब दुनिया में हुई कथित '��ुलाबी क्रांति' ने उन देशों को और पीछे पहुँचा दिया।
ठीक उसी तरह 'अन्ना क्रांति' ने देश को सांप्रदायिक तत्त्वों के हवाले करने में बड़ी भूमिका निभाई। याद कीजिए जिस लोकपाल पर सबसे ज़्यादा शोर था, अब उसकी बात भी नहीं होती।
जो आज बीस-पचीस साल के हैं, उन्हें 15 साल पुराना वह फ़साना याद नहीं होगा ठीक से। यह उम्र सपने देखने और कुछ कर गुज़रने के जज़्बे वाली है। इसका उत्साह समझ आता है।
मध्यवर्ग नाखून क��वा के शहीद होने के सपने देखता है। अपनी ज़िंदगी में एक परिवर्तन देखना चाहता है बड़ा। सड़क, आंदोलन उसे आकर्षित करता है लेकिन देखा हमने कि वह उसमें जाकर शामिल नहीं हो सकता, बस टीवी/मोबाइल स्क्रीन पर देखकर मुग्ध होता है।
उसका एक हिस्सा तब भी मुग्ध था, अब भी मुग्ध है।
वह इस पर विचार ही नहीं करना चाहता कि एक विचारधाराहीन आंदोलन, जिसके लगभग सभी मु��्य संचालक अन्ना आंदोलन से निकली पार्टी के हिस्सा रहे हैं, किस तरह का आंदोलन खड़ा करेंगे!
यह कोई तीन घंटे की सुखांत फिल्म नहीं है। हमारे महान राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
इसमें मंच के नीचे खड़े युवा कोई एक्टर नहीं हैं, जीते-जागते इंसान हैं।
हमने देखा है पिछले आंदोलन में नौकरियाँ छोड़कर शामिल हुए लोगों का हश्र।
हमने देखा है एक आंदोलनकारी कवि को राज्यसभा न मिलने पर भक्ति प्रवचनकर्ता बन सत्ता के क़रीब जाते।
हमने देखा है कांग्रेस के अंत की कामना से कांग्रेस के क़रीब जाते उसी आंदोलन के एक नेता को।
हम नहीं चाहते कि यह पीढ़ी भी अपने सपनों की क़ब्र पर ऐसे लोगों के महल बनते देख पछताए।
हमने इतना कुछ देखा है कि सड़क पर नारेबाज़ी देखकर उछलने की जगह रुककर सोचना सीख लिया है। जिस दौर में ज़रा सा विरोध बर्दाश्त नहीं करती सरकार, उसमें एक कथित आंदोलन के नेताओं को मिली सुरक्षा और स��विधा हमें सशंकित करती है।
संख्या बड़ी बात नहीं है, लेकिन बताती है कि सोशल मीडिया और ज़मीन में कितनी दूरी है। आखिर उस कथित आंदोलन के नेता भी तो तिरछे कैमरे की तस्वीरों से 'संख्या' का ही दावा कर रहे हैं।
देश के भीतर कोई मानीखेज आंदोलन एक लंबी लोकतांत्रिक और वैचारिक लड़ाई से सत्ता परिवर्तन का ही हो सकता है।
अभी इतना ही।
आपकी असहमति का स्वागत, लेकिन 'ले दे के अपने पास फ़क़त एक नज़र तो है, क्यों देखे��� ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम'
I visited the southernmost tip of India.
I stood at Indira Point. I walked under trees that have stood for centuries. I dove into coral reefs among the most vibrant on earth.
And I sat with the people who live there. Tribal communities, whose land is being taken away by violating the Forest Rights Act. Settlers, many of them former soldiers, placed on these islands by the Indian government, who aren’t getting fair compensation.
The Modi government and BJP tells you Great Nicobar Project is about defence. It is not.
Expand INS Baaz - we will back the government fully. The Navy has been asking for expansion for five years - it has been ignored.
They tell you it is about a transhipment port. It is not. India is already building one in Kerala, which is on the mainland.
What it actually is: 1.5 crore trees felled. Coral reefs erased from official maps. Soldiers and tribals displaced - so one businessman can build hotels and casinos on India’s most irreplaceable ecological land.
Every young Indian I have spoken to understands this. You know that no amount of profit is worth destroying what can never be recovered.
I stand for ecologically balanced development. These islands can be the most extraordinary sustainable destination the world has ever seen. That is the India worth fighting for.
#GreenOverGreed
#NicobarMatters
#WorldEnvironmentDay
इस देश मे कुछ सवाल सिर्फ राहुल गांधी के लिए रिजर्व हैं।
जिनका दायरा, मोहम्मद गोरी लेकर खलजी, बाबर, औरंगजेब, अंग्रेज, नेहरू, इन्दिरा, मनमोहन तक फैला हो सकता है।
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राहुल की क्वालिफिकेशन के बारे मे रामचन्द्र गुहा का सवाल, ऐसा ही स्पेशल सवाल है। भारत के 99% नेता, नेता बनने के पहले क्या करते थे, इसकी जानकारी न तो आम लोगो है,
न वे इसकी परवाह करते हैं।
मसलन, बिना कोई अनुभव , बिना कोई चुनाव लड़े, डायरेक्ट शपथ लेकर अनिर्व���चित मुख्यमंत्री बनने के पहले, हमारे प्रधानमंत्री क्या करते थे??
पब्लिक डोमेन में इसकी सूचना शून्य है।
अब भले वे खुद स्वीकार करें, कि वे पढ़े लिख नही पाये, स्टेशन पर चाय बेची, 35 वर्ष भिक्षाटन करते रहे - तो भी इससे किसी को फर्क नही पड़ता।
मगर राहुल के बारे मे जानना है।
गहराई से, और तथ्यपरक जानना है।
और नकारना है।
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दरअसल राहुल से उसकी योग्यता नही पूछी जाती, उन्हें प्रच्छन्न रूप से निर्योग्य घोषित किया जाता है। और निर्योग्यता का एक ही कारण है- गांधी सरनेम के साथ पैदा होना..
और दर��सल यही गुहा जैसो का ऑब्जेक्शन है। वरना तो 5 बार का सांसद, 4 राज्य सरकारो का पॉवर सेंटर, केंद्रीय सरकार में 10 साल तक निर्णय बदलने की ताकत रखने वाला शख्स.
जिसे विभिन्न संसदीय समितियों में दो दशक का अनुभव हो,
पब्लिक पॉलिसी की पुख्ता समझ हो, कैम्ब्रिज मे पढ़ा हो और और अर्थव्यवस्था की दशा दिशा की बार बार सटीक पू��्वसूचना देता हो, अगर किसी और दल या देश में में 100 सांसद लेकर बैठा होता..
तो उससे यह सवाल करने की हिम्मत किसी मे न होती।
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लेकिन आप राहुल से पूछ सकते है।
क्योकि राहुल से डर नही लगता।
रामचन्द्र गुहा का वह वीडियो हमने देखा है, जिसमे सरकार के विरुद्ध तख्ती लेकर खड़े हो जाने भर से पुलिस उन्हें कुत्तो की तरह घसीटकर ले गई। इसके बाद वे दोबारा सरकार के नाम की तख्ती लेकर चौराहे पर नही गए।
राहुल के नाम ���ी तख्ती सेफ है।
गुहा को पता है।
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और यही "सेफ" फीलिंग राहुल की उपलब्धि है। उसके 20 साल के पोलिटिकल करियर का एसेंस है।
रामचन्द्र गुहा इस देश मे भाजपा/ मोदी की हेजेमनी को राहुल पर थोपते है, तो उनके इतिहासकार होने की समझ पर शक होता है।दरअसल, जो वे स्वीकार करने से बच रहे है, वो यह कि आज देश की राजनीतिक हालात, एक आम चुनावी राजनीति नही, एक कंट्रोल्ड सामाजिक परिवर्तन है।
यह परिवर्तन, मीडिया, ज्युडिशयरी, चुनाव आयोग, ब्यूरोक्रेसी और एजेंसियों के शीर्ष पर कठपुतलियां बिठाकर थोपा गया है। जिसके नीचे जनाक्रोश उबल रहा है।
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इस आक्रोश की प्रतिक्रिया को विस्फोटक, और विध्वंसक होने से बचाने, और गृहयुद्ध समान हालात टालने के लिए किसी भी विपक्ष को बहुत धैर्यवान, सॉफ्ट होने की जरूरत है।
वरना जिस स्ट्रीट फाइट, सँगठनीकरण और आक्रामक राजनीति की अपेक्षा, राम गुहा आज राहुल गांधी से कर रहे है- उसका नतीजा पिछले 1 माह का बंगाल, और 3 साल से मणिपुर देखकर समझ लेना चाहिए।
आप पूरे देश मे ऐसा चाहते हैं???
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गम्भीर इतिहासकार जानता है, कि ऐसी सत्ता अपनी कब्र खुद बड़ी गहरी खोदती है।
मौजूदा दौर उन भावनाओ का एक्सप्रेशन है, जिसे हमारे समाज ने 70 साल तक ऐसे छिपा रखा था रखी थी, जैसे कोई बूढा अपने किशोर उम्र के कुटैव छिपाकर रखता है। बेहयाई को मान्यता मिलते ही वह धारा खुलकर खेल रही है।
लेकिन तमाम धन, ताकत, नंगई और मैनिपुलेशन के बावजूद 37-38% जनसमर्थन उसका पीक था। अब तो आगे सिर्फ ढलान है।
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गुहा हों, या उनकी तरह डेस्परेट दूसरे लोग, जान लें कि हिंदुस्तान की आत्मा इस तरह बहुत देर कुचली नही जा सकती।
इस झँजवात से बाहर निकलने का रास्ता, यह देश जल्द तय करेगा। पर उस उबाल का पथ प्रदर्शक कोई ईमानदार, दूरदर्शी, और नैतिक मूल���यों पर ठहराव रखने वाला ऐसा शख्स होना चाहिए। जो शांति, साहचर्य और मेल मिलाप का चेहरा हो।
इस वक्त, बिलाशक..
वह राहुल है।
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इस दौर का बुद्ध है।
जिसे महज राजघराने की पैदाइश की वजह से खारिज कर देना, और खास तरह की प्रतिक्रियाओं की आशा रखना, बौद्धिक नही- बायस्ड होने के लक्षण हैं।
जो राम गुहा कई बार प्रदर्शित कर चुके ��ैं। उनका फैन होने के नाते उन्हें सप्रेम सलाह है कि वे समाज मे अपनी उम्र औऱ अनुभव का आडम्बर बनाये रखें। भ्रम और खीज की शिकार जुबान को विराम दें।
और मौन की शक्ति महसूस करें।