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“यद् भ्राजति विश्वेन संनादति यज्ज्योतिषां ज्योतिरुक्तं पुरस्तात्।
विश्वं यद्विश्वेन संनादति यत्तद्विदुः परं ब्रह्म यद्वै यदात्मा॥”
- मुण्डकोपनिषद् २.१.४
यह मंत्र ब्रह्म की स्वयंप्रकाशता, सर्वजगत् में व्याप्ति औ�� आत्मरूपता को प्रकट करता है। यह मंत्र कहता है जो स्वयं प्रकाशित है, जिससे समस्त जगत् गूँज रहा है, जो समस्त प्रकाशों का भी प्रकाश है वही आत्मा है, वही परब्रह्म है।
भगवत्पाद भाष्यकार आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी बताते हैं कि ब्रह्म इन्द्रियातीत होते हुए भी ज्ञानरूप है — “ज्योतिषां ज्योतिः” अर्थात् जो सूर्य, अग्नि आदि को भी प्रकाश देता है। जगत् की गूँज उसी ब्रह्म का प्रतिफलन है। यह कार्य-जगत्, उस कारण-ब्रह्म की प्रतिध्वनि मात्र है।
यह मंत्र अद्वैत का प्रतिपादन करता है — आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। “यद्वै यदात्मा” इस सत्य को उद्घाटित करता है कि आत्मा ही परम तत्त्व है। ब्रह्म को जानना ही मुक्ति है, और यही अत्यन्त शान्ति का स्रोत है।
इस मंत्र का सार यही है “बाह्य में नहीं, अपने भीतर उस चैतन्य का अनु���व करो जो सब कुछ प्रकाशित कर रहा है।” आत्मा में ही ब्रह्म का प्रकाश प्रकट होता है।
मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र आत्मा और ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप का गहन उद्घाटन है। शंकर भाष्य इसकी पुष्टि करता है कि आत्मा ही परम प्रकाश, परम ब्रह्म है । यह जानो और मुक्त हो जाओ।
“न हि अन्यत् अस्ति — आत्मा एव ब्रह्म।”
यही उपनिषद् का अन्तर्नाद है।
Muṇḍakopaniṣad 2.1.4
That which shines, that by which the universe resounds, that which is the Light of all lights—this, the wise know as Supreme Brahman. Indeed, that is the Self (Ātman).
This mantra declares that Brahman is the source of all light and consciousness. It is the inner light that illumines the sun, moon, fire, and even the mind. The world vibrates and exists through this Brahman, just as echoes arise from sound.
Śaṅkarācārya’s commentary clarifies that this all-pervading Brahman is none other than our own Self. The mantra teaches the core Advaitic truth: Ātman is Brahman. The divine is not separate; it is your own inner being.
Muṇḍakopaniṣad 2.1.4 guides the seeker to realize the inner light of awareness as the highest reality. Knowing this Self as Brahman is the path to liberation.
“That which illumines the universe is within you. Realize it — and be free.”
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तदेतत् सत्यं यथा सुदीप्तात् पावकाद् विष्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः। तथाऽक्षराद् संभवते विश्वमेतत्।
सत्यं तं विद्धि शान्तिमत्यन्तमेति ॥
- मुण्डकोपनिषद् २.१.१
भारतीय वैदिक परम्परा में उपनिषद् ब्रह्मविद्या के परम शिखर हैं। मुण्डकोपनिषद्, जो कि एक आरण्यक उपनिषद् है, विशेष रूप से ज्ञानयोग ��े पथिकों हेतु अद्वैत ब्रह्मविद्या का गहन प्रकाश प्रस्तुत करता है। इसके द्वितीय मुण्डक के प्रथम मंत्र में प्रस्तुत उपमा — अग्नि और विष्फुलिङ्ग “चिंगारी” की वेदान्त सिद्धान्त के अद्वैत रहस्य को सहज, प्रतीकात्मक रूप में उद्घाटित करती है।
मंत्र कहता है कि जैसे एक प्रज्वलित अग्नि से असंख्य चिंगारियाँ उत्पन्न होती हैं, जो अग्नि के ही समान होती हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व उस अक्षर ब्रह्म ���े उत्पन्न हुआ है। यह उत्पत्ति कोई वास्तविक परिवर्तन “परिणामवाद” नहीं, अपितु अभाव्य परिवर्तन “विवर्तवाद” है जैसा भगवद्पाद शंकराचार्य प्रतिपादित करते हैं। यह उपमा दर्शाती है कि सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म से भिन्न नहीं है, उसी की अभिव्यक्ति है, यद्यपि रूप और नाम के माध्यम से भिन्न प्रतीत होती है।
आदि शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि —
“अक्षर” शब्द यहाँ निर्गुण ब्रह्म का बोधक है, जो नित्य, अविनाशी, अचल और सर्वव्यापक है।
“विष्फुलिङ्गाः” प्रतीक हैं जीवों एवं जगत् के, जो मूलतः ब्रह्मस��वरूप हैं, किन्तु माया के प्रभाव से सीमित और पृथक प्रतीत होते हैं। आद्य शंकराचार्य जी के अनुसार यह सारा दृश्य जगत् केवल ब्रह्म का प्रकट प्रतिबिम्ब है — “ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः” का सजीव दृष्टान्त।
‘तम् विद्धि’ — ज्ञान का आह्वान !
मंत्र का अंतिम चरण “तम् विद्धि शान्तिमत्यन्तमेति” उपनिषद् का साधन और साध्य दोनों स्पष्ट करता है। ‘तम् विद्धि’ अर्थात् उस अक्षर ब्रह्म को जानो — यह जानना केवल शास्त्रपाठ नहीं, अपितु स्वानुभूति द्वारा आत्मबोध है। यही बोध साधक को अत्यन्त शान्ति — अर्थात् मोक्ष — की ओर ले जाता है, जहाँ न शोक है, न मोह, न पुनर्जन्म का भय।
यह उपमा हमें आत्मा और ब्रह्म के एकत्व का बोध कराती है। जब साधक यह अनुभव करता है कि “मैं चिंगारी नहीं, अग्नि ही हूँ”, तब उसके भीतर से भेद का अज्ञान समाप्त हो जाता है। वह जगत् को अभिन्न ब्रह्मस्वरूप रूप में देखने लगता है।
मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र वेदान्त की आत्मा है — जो जगत् और ब्रह्म के सम्बन्ध को सौन���दर्यपूर्ण प्रतीक के माध्यम से प्रकट करता है। यह उपमा केवल दार्शनिक सिद्धान्त नहीं, अपितु मुक्ति का द्वार है।
जिसने उस ब्रह्म को जान लिया, उसने शाश्वत शान्ति को पा लिया !
Muṇḍaka Upaniṣad 2.1.1 — The Sparks from the Fire
“This is the truth —
Just as thousands of sparks emerge from a blazing fire,
all of them sharing its nature,
so too does this entire universe arise from the imperishable Brahman.
Know That — and you will attain supreme peace.”
This mantra offers a beautiful image: from fire, sparks fly out — all glowing like their source. Similarly, from Akṣara, the changeless Brahman, the whole world arises. Though the world appears diverse, it is not separate from Brahman — just as the spark is not separate from fire.
Ādi Śaṅkarācārya explains:
Brahman is Nirguṇa — without form or qualities.
The universe is a projection, not a true transformation — like a dream or mirage.
We, too, are like those sparks — not different from the Fire.
This realization — not as theory, but as direct inner knowledge — brings atyantikā śānti, the highest peace. It is liberation from suffering, fear, and rebirth.
The world is not to be rejected, but rightly seen — as Brahman in many forms.
When the seeker truly knows:
“I am not the spark. I am the Fire.” then, freedom is attained.
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सनातन हिन्दू वैदिक धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्त्व है। यद्यपि प्रत्येक एकादशी की अपनी विशिष्ट महिमा और फल है, तथापि ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी, जिसे "निर्जला एकादशी" कहा जाता है, विशेष रूप से भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। शास्त्रों में वर्णित है -
“वृषस्थे मिथुनस्थेऽर्के शुक्ला ह्येकादशी भवेत्
ज्येष्ठे मासि प्रयत्नेन सोपवास्या जलवर्जिता।”
अर्थात्, जब सूर्य वृषभ राशि से मिथुन में प्रवेश करता है और उस समय ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी आती है, तब जल का भी त्याग करते हुए इस व्रत को करने का विशेष विधान है।
यह व्रत उन साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो किसी कारणवश वर्ष भर एकादशी का पालन नहीं कर पाते। "निर्जला एकादशी" का व्रत करने से वर्षभर की सभी एकादशियों के व्रतों का फल प्राप्त होता है। इसीलिए इसे ‘व्रतराज’ भी कहा गया है।
महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार, पांडवों में भीमसेन भोजन प्रिय और अत्यंत शक्तिशाली थे। उनके उदर में वृक नामक अग्नि विद्यमान थी, जिससे वे निरन्तर भोजन की आवश्यकता अनुभव करते थे। इस कारण वे एकादशी का व्रत नहीं कर पाते थे। जब उन्होंने यह समस्या महर्षि वेदव्यास के समक्ष रखी, तब उन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को अन्न-जल का पूर्ण त्याग कर व्रत करने का निर्देश दिया। इस क���िन व्रत को भीम ने सम्पन्न किया, इसलिए इसे "भीमसेनी एकादशी" भी कहा जाता है।
"निर्जला एकादशी" व्रत केवल धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं है, यह जीवन की शुद्धि, संयम, आरोग्य और आत्म-विकास का अनुपम माध्यम है।
• आध्यात्मिक रूप से यह व्रत साधक को आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, भगवद्कृपा और मोक्ष प्रदान करता है।
• शारीरिक रूप से, उपवास की स्थिति में शरीर की कोशिकाएँ Autophagy की प्रक्रिया से निकलती हैं, जिसमें वे स्वयं को न��ीनीकृत करती हैं और अना��श्यक तत्वों को बाहर निकालती हैं।
• मानसिक रूप से, उपवास से मन शान्त और एकाग्र होता है, इन्द्रियों पर नियंत्रण बढ़ता है, और आत्म-संयम का विकास होता है।
आयुर्वेद के अनुसार, व्रत शरीर में संचित विषाक्त द्रव्यों को बाहर निकालता है, जिससे तनाव, वात और रोग में कमी आती है। यही कारण है कि उपवास को डिटॉक्सिफिकेशन और ऊर्जा-संतुलन का प्रभावशाली उपाय माना गया है।
व्रत की विधि और अनुष्ठान --
यह व्रत दशमी की रात्रि से प्रारम्भ होकर द्वादशी की प्रातः तक चलता है। इस अवधि में साधक को पूर्ण संयम रखना चाहिए — निद्रा, क्रोध, आलस्य, असत्य वाणी और विवादों से बचना चाहिए।
भगवद्भक्ति से श्रीविष्णु पूजन, श्रीविष्णु सहस्रनाम, गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र, श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ भगवन्नाम संकीर्तन एवं गुरु द्वारा उपदेशित मंत्र का जप करें !
"निर्जला एकादशी" व्रत धार्मिक, आध्यात्मिक, शारीरिक और मानसिक सभी द���ष्टियों से अत्यन्त कल्याणकारी है। ��तः हर व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक बार इस व्रत का पालन अवश्य करना चाहिए। यह व्रत इष्ट की प्राप्ति, आत्मशुद्धि और मोक्ष का सशक्त साधन है।
"Nirjala Ekadashi", observed on the Shukla Ekadashi of the month of Jyeshtha, holds a special place in Sanatan Dharma. Unlike other Ekadashis, this fast is observed without water (nir-jala), making it the most austere and spiritually rewarding of all.
This indicates that when the Sun transitions from Taurus to Gemini and Jyeshtha Shukla Ekadashi occurs, one must undertake the fast with full discipline, abstaining even from water.
According to the Mahabharata, Bhima, known for his great appetite, couldn’t observe all Ekadashis. When he expressed this concern to Sage Vyasa, the sage advised him to observe just one — "Nirjala Ekadashi" — with full austerity, to gain the merit of all 24 Ekadashis. Since then, it’s also called "Bhimaseni Ekadashi".
Spiritual & Scientific Relevance
•Spiritually, it grants health, long life, wealth, divine grace, and liberation.
•Physiologically, fasting triggers autophagy, a process where cells cleanse and rejuvenate themselves.
•Mentally, it enhances focus, calms the mind, and strengthens self-control.
•Ayurvedically, fasting helps detoxify the body and reduce stress, vata, and disease.
The fast begins the night before (Dashami) and ends the next morning (Dwadashi). Devotees should avoid anger, falsehood, laziness, and disputes. Worship of Lord Vishnu through Vishnu Sahasranama, Gajendra Moksha, Bhagavad Gita, and mantra japa is encouraged.
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@AshwiniVaishnaw mera PNR no 6344362110 hai,is train me cleaning Zero, hai, pantry me drinking water nahi ha,khana ka bill mange par misbehave karta hai.