लखीमपुर खीरी में किसानों को गाड़ियों से जानबूझकर कुचलने का यह वीडियो किसी की भी आत्मा को झखझोर देगा।
पुलिस इस वीडियो का संज्ञान लेकर इन गाड़ियों के मालिकों, इनमें बैठे लोगों, और इस प्रकरण में संलिप्त अन्य व्यक्तियों को चिन्हित कर तत्काल गिरफ्तार करे।
#LakhimpurKheri@dgpup
खराब चीज़ें बस बेची जाती हैं, खरीदी नहीं जाती! बच्चें जिन हॉस्टल में रह रहे हैं, उस बिल्डिंग में कभी भी उसका मालिक नहीं रहेगा, क्योंकि उसे अपने जान की परवाह है, बच्चों की नहीं.
Watch Full Video On News Pinch YouTube:
https://t.co/TMfj8DuBlp
@Abhinavpinch
दुनिया को सच दिखाओ तो ये(गर्ल्स pg के मालिक) यही करेंगे.
यह #jist की रिपोर्टर हैं मेधा यादव जो अपने जमीनी ग्राउंड रिपोर्ट्स और खास कवरेज के लिए जानी जाती हैं जब सत्य निकेतन के आसपास के pg का सच दिखा रहीं थी तो इन्हें धक्का दिया गया इनके साथ के कैमरामैन के साथ भी धक्का मुक्की की गई.
#medhayadav #jist
Every year, lakhs of students leave their homes to chase a dream in another city. But are we giving them a safe place to live?
In Delhi, around 7 lakh students are enrolled, while hostel capacity is barely 30,000 — just 1 in 31 gets a hostel.
Why not identify vacant government land around universities and allow/build safe, affordable student hostels there? Universities could also be given additional building permissions to create more on-campus accommodation.
Students get safety. Parents get peace of mind. Universities and governments generate revenue. And, most importantly, we protect lives.
Sometimes, a small change in policy can protect someone’s biggest dream. ❤️
आज देशभर में आरक्षण व्यवस्था, उसके लाभ, उसकी पात्रता और उसमें सुधार को लेकर अलग-अलग स्तर पर चर्चा हो रही है। मेरा व्यक्तिगत मत है कि इस विषय को केवल “आरक्षण के पक्ष या विपक्ष” के रूप में देखने के बजाय हमें सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक न्याय और समान अवसर के दृष्टिकोण से भी देखना चाहिए।
भारत में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए अनेक संवैधानिक एवं सरकारी व्यवस्थाएं हैं। इसी प्रकार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अन्य वंचित वर्गों के लिए केंद्र और राज्यों में विभिन्न आयोग, निगम, योजनाएं एवं वित्तीय सहायता उपलब्ध हैं।
ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण एवं अनारक्षित वर्ग के परिवारों के लिए भी ऐसी मजबूत और संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे केवल इसलिए कोई युवा, विद्यार्थी, किसान, छोटा उद्यमी या जरूरतमंद परिवार पीछे न रह जाए कि वह आरक्षण की किसी श्रेणी में नहीं आता।
गुजरात का मॉडल देश के लिए उदाहरण बन सकता है;
गुजरात में अनारक्षित वर्ग के आर्थिक एवं शैक्षणिक विकास के लिए निगम/आयोग जैसी संस्थागत व्यवस्थाएं बनाई गई हैं। इनके माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों को शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, स्वरोजगार तथा अन्य क्षेत्रों में सहायता देने का प्रयास किया जाता है।
मेरा मानना है कि इसी प्रकार केंद्र सरकार के स्तर पर भी एक मजबूत व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
केंद्र सरकार द्वारा “राष्ट्रीय आर्थिक रूप से कमजोर अनारक्षित वर्ग आयोग” और “राष्ट्रीय आर्थिक रूप से कमजोर अनारक्षित वर्ग विकास निगम” जैसी संस्थागत व्यवस्था बनाने पर विचार किया जाना चाहिए।
इसके लिए प्रारंभिक तौर पर लगभग ₹2,500 करोड़ का वार्षिक बजट निर्धारित किया जा सकता है, जिसे आवश्यकता और परिणामों के आधार पर आगे बढ़ाया जा सके।
इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह होना चाहिए कि इसका लाभ जाति के आधार पर नहीं, बल्कि स्पष्ट आर्थिक एवं सामाजिक-शैक्षणिक मानकों के आधार पर दिया जाए।
आय, संपत्ति, परिवार की आर्थिक स्थिति, शिक्षा और अन्य वस्तुनिष्ठ मानकों को ध्यान में रखकर पात्रता तय की जा सकती है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि वास्तव में जरूरतमंद परिवारों तक सहायता पहुंचे।
साथ ही, EWS के लिए संविधान में उपलब्ध 10% आरक्षण की व्यवस्था अपनी जगह बनी रहे, लेकिन उसके साथ-साथ शिक्षा, रोजगार की तैयारी, स्वरोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए अलग से मजबूत सहायता तंत्र विकसित किया जाए।
आरक्षण व्यवस्था का मूल उद्देश्य जिन सामाजिक एवं ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करना है, उसे समझना और उसका सम्मान करना आवश्यक है। इसलिए इस विषय को किसी वर्ग के खिलाफ खड़ा करने के बजाय हमें ऐसी नीति की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए जिसमें सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और समान अवसर—तीनों का संतुलन हो।
मेरा मानना है कि किसी गरीब विद्यार्थी की प्रतिभा केवल इसलिए नहीं रुकनी चाहिए क्योंकि वह ऐसी श्रेणी से आता है जिसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
इसलिए देश में आरक्षण व्यवस्था पर व्यापक और तथ्यात्मक चर्चा के साथ-साथ आर्थिक रूप से कमजोर अनारक्षित वर्ग के लिए ₹2,500 करोड़ के प्रारंभिक बजट वाली राष्ट्रीय संस्था बनाने पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
VIDEO | Patna: Jan Suraaj leader Prashant Kishor meets Bihar Chief Secretary.
He says, “The meeting with the Chief Secretary was a follow-up to the previous meeting we had with the DGP. Apart from issues related to the police, we also discussed matters concerning other departments. In addition to the Chief Secretary and DGP, five senior officials from the concerned departments were present, including officials from the Transport Department, Urban Development Department and the Patna Municipal Corporation...Among the issues discussed and agreed upon, the first was the traffic situation in Patna...The second issue on which there was agreement in the previous meeting was beggary and street children...The third issue concerned alleged illegal collections by the police from roadside vendors and people who have encroached on public spaces. The DGP had assured us during the previous meeting that if there was any such problem anywhere in the city, we would provide a list and action would be taken against those concerned..."