दो ही जातियां देश मे रह गई हैं ,एकगरीब और दूसरी गरीबी से निकालने वाले ।दोनों को जिंदा रखो,जिसका जितना पेट हो उसको उतना ही दो ताकि एक नोट दे सके और एक वोट
इतिहास मे हुए अन्याय का बदला लेने के लिए क्या आज अन्याय का इतिहास रचना उचित होगा?या इस तरह इतिहास की गलतियां सुधारने क�� बात महज बहाना है,एक बड़ा वोटबैंक असली निशाना है?
सरकारें यह जताने में इतना खर्च क्यों करती हैं कि उन्होंने लोगों को क्या क्या सुविधाएं दीं।सूरज और चांद तो ऊष्मा, शीतलता और रोशनी को लेकर कोई होर्डिंग नहीं लगाते?