मिश्रा परिवार जमीन पर कहाँ है?
सतीश मिश्रा BSP के राष्ट्रीय महासचिव हैं, मीडिया मैनेजमेंट उनके हाथ में है, लेकिन न तो वह कभी BSP का प्रचार करते हैं और न ही मीडिया मैनेजमेंट करते दिखाई देते हैं।
हां, चुनाव आते ही पूरा समय अपने बेटे कपिल मिश्रा के साथ हेलीकॉप्टर पर घूमते हैं। दामाद परेश मिश्रा मीडिया मैनेजमेंट के नाम पर बस इन्हीं सबका चेहरा चमकाते हैं। पत्नी से लेकर बेटी तक को मीडिया में बैठाकर गुणगान किया जाता है। ये जनाब हर साल बहन जी को बस यही बताते हैं कि अबकी बार ब्राह्मण बसपा के साथ आ रहा है। बस इसी छलावे को रचकर उन्होंने अपने और अपने बेटे-बेटी-दामाद, सभी को सेटल कर दिया है। हालांकि सच यह है कि इनसे कोई ब्राह्मण नहीं जुड़ता। जब ये क���ी बसपा का प्रचार करते ही नहीं, तो ब्राह्मण जुड़ेगा कैसे? मीडिया इनके हाथ में है, तो माहौल बना लेते हैं।
दूसरी बात, एक खूब हवा बनाई जाती है कि सतीश मिश्रा जी बसपा का सारा कानूनी मामला देखते हैं। अच्छी बात है, फिर मनु मीडिया द्वारा बसपा और बहन जी के खिलाफ फैलाए जा रहे दुष्प्रचार पर उन्होंने आज तक संज्ञान क्यों नहीं लिया?
कुछ ही महीने पहले TV9 भारतवर्ष ने बहन मायावती के नाम को एप्सटीन फाइल से जोड़ा था। हालांकि न तो सतीश मिश्रा ने इस पर एक शब्द बोला और न ही कोई कार्रवाई की। आखिरकार हमने इसके खिलाफ मुहिम छेड़ी और चैनल को माफी मांगने पर मजबूर किया।
इसी तरह, पत्रकार आशुतोष और अभय दुबे ने बयान दिया कि "अमित शाह जैसा नचाते हैं, मायावती वैसे नाचती हैं।" इस पर भी मीडिया मैनेजमेंट संभाल रहे सतीश मिश्रा ने इन प�� कोई कार्रवाई नहीं की। आप कल के ही चित्रा त्रिपाठी के आज तक द्वारा माननीया बहन जी को 'मायावी' कहते हुए शो करने पर भी उन्होंने कोई संज्ञान नहीं लिया।
बहुजन समाज के साथी जानते हैं कि मनु मीडिया के पत्रकार आए दिन बहन जी और बसपा के खिलाफ उल-जुलूल, अभद्र और अनर्गल बयान देते रहते हैं। चूंकि बसपा इस पर कोई कार्रवाई नहीं करती है, इसलिए टुच्चे यूट्यूबर्स भी बहन जी के खिलाफ कुछ भी अपमानजनक बातें बोलकर पार्टी को B टीम से जोड़ देते हैं। अब सवाल यह है कि जब मीडिया की जिम्मेदारी सतीश मिश्रा देख रहे हैं, तो ऐसे चैनलों पर कार्रवाई करवाने की जिम्मेदारी कौन लेगा? इन्होंने ने अपने जीवन में आज तक कभी बहुजन मूवमेंट के लिए समर्पित दलित बहुजन यूट्यूबर्स के साथ तो एक मीटिंग तक नहीं की है। उन्हें सपोर्ट करना तो दूर की बात है।
सतीश चंद्र मिश्रा आज बहन जी के बाद पार्टी में दूसरे सबसे बड़े नेता ह���ं। ऐसे में क्या वह केवल बहन जी की मीटिंगों में शामिल होने के लिए जिम्मेदारी ग्रहण किए हुए हैं? वह केवल चुनाव के समय दूसरे स्टार प्रचारक बनकर अपने बेटे के साथ हेलीकॉप्टर से घूमने के लिए ही क्यों सक्रिय होते हैं? मीडिया के जरिए बसपा का माहौल बनाने की बजाय केवल उनके परिवार का महिमामंडन क्यों होता है? वहीं प्रदेश के ब्राह्मणों को जोड़ने के लिए उनसे कोई प्रयास तक नहीं होता है। पार्टी के प्रचार अथ��ा कैडर विस्तार की बात तो भूल ही जाइए। आलम यह है कि इन्होंने बहन जी से परशुराम तक की मूर्ति लगवाने की बात करवा दी, लेकिन फिर भी ढेला भर ब्राह्मण जोड़ने में असमर्थ रहे।
अब जबकि यूपी का चुनाव सिर पर है, आकाश आनंद ने पार्टी के पक्ष में मस्त माहौल बना दिया था, तो सतीश मिश्रा एवं उनके चहेते प्रभारियों ने बहन जी को गुमराह करके आकाश आनंद को पार्टी से बाहर निकलवा दिया। इतना ही नहीं, बल्कि ईशान आनंद को आगे लाकर परिवार में और भी आंतरिक कलह पैदा कर दी। अंत में मेरा समाज से बस यही सवाल है कि आप ही बताइए कि आकाश आनंद को पार्टी से बाहर करके किसका फायदा हो रहा है?
बहन जी, आपसे निवेदन है कि किसी पदाधिकारी के काम का मूल्यांकन उसके पद अथवा जाति से नहीं, बल्कि उसके कामों के परिणाम से किया जाए। जो आकाश आनंद पार्टी को जमीन से जुड़े युवाओं को जोड़ने का काम कर रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ाया जाए या फिर उन्हें कमजोर कर रहे सतीश मिश्रा को? जिस व्यक्ति के पास मीडिया और संगठन से जुड़ी इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, उनके कार्यों की समीक्षा कब होगी?
- सूरज कुमार बौद्ध
@Mayawati @AnandAkash_BSP
@raviadi7793 जिसको सिर्फ अच्छा अच्छा सु ने की आदत हो गई हो उसका यही हाल होता है। तथाकथित लॉर्ड पदाधिकारी अच्छा अच्छा सुनते रहते है और कूपमण्डुक की तरह गुणगान करते रहते हैं। पार्टी का ग्राफ 2012 चुनाव से चुनाव दर चुनाव गिरता जा रहा है कोई आल��चना नहीं न ही जबदेही?????इसकी जिम्मेदारी किसकी ?
सबसे बड़ी बात है जानते सब हैं लेकिन बोलता कोई नही है.
आदिवासी लोन लेते हैं तो पूरा भरते हैं.
दलित लोन लेते हैं तो पूरा भरते हैं.
पिछड़ा वर्ग भी लोन की हर क़िस्त भरता है.
मुसलमान भी लोन भरने में सबसे आगे हैं.
भारत में 1,68,624 बैंकों के ब्रांच हैं. लोन डिफॉल्टर की लिस्ट जारी होनी चाहिए.
सबसे ज्यादा लोन डिफॉल्टर वहीं है जो सिस्टम को मैनेज करने की ताकत रखते हैं. सिस्टम को मैनेज करने वालों का नेक्सस हैं.
यह नेक्सस कुछ जाति वर्ग का है. राष्ट्र को जानना है सीना तानकर लोन नही भरने वालों का सरनेम क्या है ?
चन्द्रशेखर को समझना चाहिए कि वो सांसद है। उनमे तार्किकता व मैच्योरिटी उच्च स्तर की होनी चाहिए। काहे दो टके के लोगो से बहस करना चाह रहा है। अपने स्टेटस के अनुसार लोगो से बात करे। न कि Payout पर जीवन यापन कर रहे लोगो को बहस के लिए आमंत्रित करें। चिराग पासवान की यह ��ात अच्छी लगी कि आरक्षण पर कोई चर्चा नही होगीं। क्योंकि चर्चा का स्थल संसद है न कि दो टके के लोगो के साथ चर्चा करें।
1.में कई बार लिख चुका हूं कि कोई कहे कि आरक्षण खत्म करो तो जवाब ही न दे। अगर दे भी तो कह दे कर दो। अगर करवा सकते हो। इससे ज्यादा चर्चा न करे। आरक्षण केवल एससी से सम्बंधित नही है।
ओबीसी को 27% मिलता है।।
एसटी को 7.5% मिलता है।
अल्पसंख्यक को आर्टिकल 30 में संस्थान में 50% मिलता है।
इसलिए "आ���क्षण" नाम आते ह�� स्वयं मत मैदान में मत कूदो। इन्ही हरकतों कर कारण मुँह हाथ नाभि से पैदा होने का क्लेम करने वाले;
एससी को पानी नही मिला।
एससी को गालिया दे रहे है।
जबकिं आरक्षण ओबीसी, एसटी, अल्पसंख्यक को भी मिल रहा है।।
2.आप इन लोगो से बहस में नही जीत सकते है। यह आपको कुतर्क के उस स्तर पर ले जाएंगे जँहा आप स्वयं कन्फ्यूज हो जाएंगे। यह ओशो तक ने कई बार अपनी वाणी में कही है।।ओशो ने कई बार यह कहा है कि इन लोगो का कुतर्क की वर्ण व्यवस्था "कर्म आधारित" थी अथार्त अच्छे कर्म करके शुद्र (ओबीसी) ब्राह्मण बन सकता है जबकि आज तक इतिहास में एक भी व्यक्ति का उदाहरण नही दे सके जो कि ओबीसी से कर्म आधार पर ब्राह्मण बन गया हो। एक भी ऐसा उदाहरण नह मिला कि माधुरी गुप्ता पाकिस्तान में गद्दारी करके सजा पाई और उसे कर्म के अनुसार वैश्य से अन्य वर्ण मर ट्रांसफर कर दिया गया। कभी हुआ ऐसा? नही न?
लेकिन कुतर्क है। बार बार दिया जाता है। सभी को पता है कि वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित है।
3.सीधी बात है कि
न तो यह कहो कि हमारा शोषण हुआ इसलिए दो।
न यह कहो कि जब तक जाति है तब तक दो।
न यह कहो कि गटर में उतर कर देखो।
सीधा यह एक पैराग्राफ में कह दो की;
"भारत मे अलग अलग वर्ग है। इसलिए प्रत्येक वर्ग को संसाधनों में हिस्सेदारी/प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। हमे भी दो"
4.सबसे महत्वपूर्ण की;
"ब्राह्मण या क्षत्रिय, वैश्य या अन्य से आरक्षण पर आप काहे बहस करे। यह है कौन? आपका सीधा संवाद सरकार से है। केंद्र सरकार से है। उससे संवाद करो कि सभी को प्रतिनिधित्व दो।। हमे भी दो। आरक्षण बढाने, लागू करने के लिए केंद्र से संवाद करो। उसे टारगेट करो। माँग नही मानने पर उन्हें चुनाव में टाइट करो। लेकिन 8% से 10% वाले इन तीनो वर्गों से काहे बहस करना चाह रहे हो। किस कैपेसिटी से यह बहस होगी"
5.इसलिए चन्द्रशेखर भाई इस बहस में न पड़ो। आरक्षण पर कैंची चलाने पर सरकार को घेरों। न कि दो टके के कोई दुबे, अजित भ���रती जैसे बतमीजी, अनुराधा या किसी त्यागी से ��हस करो। न तो इनकीं हैसियत आरक्षण देने की है। न इनकीं हैसियत आरक्षण खत्म करने की है। फिर काहे इन्हें बहस की चुनौती देकर इनकीं हैसियत बढ़ा रहे हो।।
यह सोशल मीडिया पर "Payout" के खिलाड़ी है। इन्हें ज्यादा महत्व न दो।।
विकास कुमार जाटव
@BhimArmyChief
@iChiragPaswan
इनका नाम सतेंद्र सोनी है ,आपने इन्हें महारानी वेब सीरीज और " लापता लेडीज" में देखा होगा ,इनका अभिनय शानदार होता है .दुख होता है जब सबको हंसाने वाला रो दे ,
प्रिय @MPPoliceDeptt@sp_maihar मामले को संज्ञान में लीजिए, और उचित कार्यवाही करते हुए सतेंद्र सोनी जी को पैसे दिलवाने का कष्ट करे ,ये बहुत मेहनती और संघर्षशील व्यक्ति है,
जिन क्रिकेटर और अभिनेताओं को हम पलकों पर बिठाए रहते है वो लोग भावनाओं के बिजनेसमैन है। इनकी संवेदनाएं देश के नागरिकों के प्रति शून्य होती है��� देश की समस्याओं के प्रति जानबूझकर विचारशून्य और मौन रहते है।कोई शादी का महानायक बना बैठा है तो कोई भगवान😀
@vkjatav84 @ambedkariteIND
अब @imVkohli इंग्लैंड में रहकर भारतीय युवाओ की भावनाओं(जो क्रिकेट और कोहली से जुड़ी हुई है) का उपयोग करके पैसा ��माएंगे ।और जिनसे पैसा छापेंगे उनकी समस्याओं पर चुप रहेंगे।कभी देश की समस्याओं के बारे में एक शब्द नहीं, केवल एडवर्टाइजिंग वीडियो बनाए है।
@vkjatav84 @raviadi7793
देवदासी व डोला प्रथा एससी/आदिवासी लड़कियों से नही बल्कि ओबीसी समाज से जुड़ी प्रथा थी।
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एक ओबीसी सैनी बन्धु मुझे एकाएक आकर कहते है कि "डोला प्रथा" से छुटकारा मिला या नही। यह अजीब बात है मतलब स्वयं की महिलाओ से हुई ज्यादती पर शोषण कारियो से प्रश्न पूछने की जगह जिसका इससे सम्बन्ध नही, उंसके कंधे पर डाला जा रहा है।
ऐसी मूर्खताएं पहल��� से होती आई है। क्योंकि ओबीसी समझता है कि शुद्र वर्तमान के अनुसुचित जाति वर्ग है। काफी मूर्ख एससी सन��गठन भी खुद ही कह कहकर की हाँ में शुद्र हूँ, इसे जबरदस्ती अपने से जोड़ते रहे। खैर जब भी डोला प्रथा व देवदासी पर मुझे कुछ कहता है, जिसमे 99% ओबीसी होते है। उसे में अपने पूर्व का यह लेख पकड़ा देता हूँ।
"
एक ओबीसी मित्र कह रहे थे कि लालू प्रसाद यादव ने अपने शासनकाल में डोला प्रथा पर कड़ाई से लागू करके एससी पर एहसान किया था। जाटव भाई एहसान मानो लालूजी का।
मेने उसे बुड़बक कहकर बताया कि;
1."देवदासी और ड��ला प्रथा में उन वर्गो की लड़कियों का शोषण होता था जो ब्राह्मण, छत्रिय, वैश्य नही थे लेकिन गांव में रह सकते थे। अब गांव में अछूत व आदिवासी नही रहते थे।।गांव में शुद्र जातिया रहती थी।जिनका कार्य श्रम के माध्यम से ब्राह्मण, छत्रिय, वैश्य की जरूरतों को पूरा करना था। अब वो जातिया थी।
भैंस/गाय पालकर दूध की व्यवस्था करने वाला।
नदियो को पार करवाने वाले नाविक
लकड़ी के सामान की पूर्ति करने वाला बढई
लोहे के समान बनाने वाला
खेतो में फल/पूजा के लिए फूल व सब्जियां उगाने वाली काछी जातिया ( मौर्या, कुशवाह, सैनी वगैरह)
इसके अलावा मकान बनाने से जुड़ी कुर्मी वगैरह
बकरियां वगैरह चराने वाली गड़रिया या ऐसी जातिया।
अन्य श्रम से जुड़ी जातिया
2.अछूत/आदिवासी जातिया गांव में नही रहती थी।मंदिर व ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के घर की चौखट तक से दूर रहती थी। मनुस्मृति म���ं एससी को अवर्ण अथार्त "अत्यंज" कहा गया है।
3.देवदासी प्रथा = इसमे गांव में रहने वाली शुद्र जातियो की लड़कियों को देवताओं से शादी करवाने के नाम पर मंदिर में दान में लिया जाता था, बाद में जो उनके साथ होता था ,अगर इस समय सामने आ जाये तो पोस्को की गम्भीर धाराएं लगेगी। हालाँकि इसके खिलाफ दक्षिण के राज्यो ने 1982 में देवदासी एक्ट बनाया।
डोला प्रथा = बिहार के एरिया में गांवों में रहने वाली शुद्र जातिया जो ब्राह्मण की चौखट पर चढ़ सकती थी, मंदिर में जा ��कती थी, उनमे जब विवाह होता था तो गांव में सर्वोच्च वर्ण उनका शुद्धिकरण करते थे। अब इस शुद्धिकरण में शुद्र अथार्त ओबीसी जाति का दूल्हा और दुल्हन गांव के उच्च वर्ण के इंहा जाकर तीन दिन तक उसके घर मे रहती थी। दूल्हा घर की साफ सफाई करता था और दुल्हन के साथ एक तरह का बलात्कार किया जाता था। 3 दिन तक ऐसा होता था। इसे ही डोला प्रथा कहते है। यह एक तरह का सहमति का ब्लात्कार था।
4. अब प्रश्न यह था कि देवदासी व डोला प्रथा किस वर्ग की लड़कियों के साथ होता था?.
5.इसका उत्तर है। जो जाति गांव में रह सकती थी, जिसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य की चौखट पर जाने की इजाजत थी, मंदिर में जा सकते थे जिससे मंदिर की श्रम करके जरूरत पूरी कर सके और यह केवल शुद्र जाति करती थी। शुद्र अथार्त ओबीसी जातिया। क्योंकि यह अछूत नही बल्कि सछुत जातिया थी अथार्त ऊपर के तीनों वर्गो की सेवा करेंगे और उन्हें ब्राह्मण, छत्रिय, वैश्य छू भी सकते थे।जबकि अछूत अथार्त एससी को छू नही सकते थे।
6.अब हर कुरीतियो के खिलाफ हम ओबीसी के साथ है। लेकिन कम से कम विषय तो सही से पता होना चाहिए। शुद्र अथार्त ओबीसी जातिया अभी तक सोचती थी कि देवदासी व डोला प्रथा एससी लड़कियों के साथ होती थी। जबसे हमने उन्हें पूरा विषय समझाया है, जिसमे इन प्रथाओं में ओबीसी जातियो की लड़कियो का शोषण हुआ है तबसे उनमे अपने अधिकारों के लिए चेतना आ रही है।। क्योंकि अभी तक एससी को आगे करके आंदोलन करवाकर, ओबीसी जातिया खुद उसी व्यवस्था से जकड़े है। इसलिए अब एससी संगठनों को खुलकर ओबीसी को बताना चाहिए कि वर्ण व्यवस्था में शुद्र ओबीसी है, उन्ही का शोषण वर्ण व्यवस्था से जुड़ी कुरीतियां जन्म देकर किया गया है। जब तक ऐसा नही किया जाएगा, ओबीसी जागेगा नही।
7.मेने ��ब यादव मित्र को जब यह बताकर पूछा कि अब बता भाई लालू प्रसाद यादव जी ने डोला प्रथा पर कड़ाई करके किसका शोषण रोका। यादव का या अनुसूचित जाति का।
बन्दा गायब है। अनुसुचित जाति वर्ग को अब सही तथ्य बताते रहना चाहिए इससे ओबीसी को कम से कम उंसके साथ व पूर्वजो के साथ हुए शोषण का एहसास होगा, जिससे वो एससी/एसटी के विरुद्ध मानसिकता में बदलाव लाएगा।
विकास कुमार जाटव
मायावती सदन में चीख रही थीं कि बैलेट पेपर से चुनाव हो, #EVM से भाजपा वोट चोरी करती है...
उस समय कोई भी विपक्षी दल मायावती का साथ नहीं दे रहा था आज पूरा विपक्ष रो रहा है..
पूरे विपक्ष को #मायावती की लाइन पर आना होगा, रीट्वीट करो और विपक्ष को जगाओ वरना हर बार इंसल्ट सहते रहो