@dromsudhaa आरक्षण चाहे जाति के आधार पर हो या EWS के नाम पर, किसी भी प्रकार का नहीं होना चाहिए।
जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, फीस माफी, छात्रवृत्ति और हर जरूरी सहायता मिले—लेकिन चयन में किसी भी प्रकार का आरक्षण नहीं।
समान अवसर, समान प्रतियोगिता और अपनी योग्यता साबित करने का समान अधिकार।
@raviparmarIN कानून को डराने-धमकाने और “आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट” का औजार बना देंगे, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान सामाजिक भरोसे को होगा।
जो सामान्य और पिछड़े वर्ग का आदमी आज गाँव में, व्यापार में या नौकरी में मदद का हाथ बढ़ाता है, कल को किसी विवाद के डर से हाथ पीछे खींच लेगा।
@dromsudhaa आविष्कारों की सूची गिनाने से पहले ये भी देखिए—
कितने भारतीय दिमाग बेहतर अवसरों के लिए विदेश चले गए?
आरक्षण हो या व्यवस्था—सवाल एक है:
क्या हम प्रतिभा को अवसर दे रहे हैं, या प्रतिभ��� को देश से बाहर जाने पर मजबूर कर रहे हैं?
वि��्वगुरु नारे से नहीं, प्रतिभा रोकने से बनेगा।
अगर नकल रोकना भी जाति देखकर अपराध तय होने लगे, तो फिर सवाल सिर्फ परीक्षा का नहीं, कानून और नियमों की समानता का है।
SC/ST एक्ट की धारा PM/CM पर ही लगनी चाहिए!
@raviparmarIN हमेशा दूसरे की ज़मीन,दूसरे के व्यापार में ताक-झाँक करने से बेहतर है कि अपना व्यापार खड़ा करो।
अपना भी कमाओ, मेहनत क���ो, आगे बढ़ो।
अपने समाज के लोगों की मदद करो, अपने रिश्तेदारों का सहारा बनो और सकारात्मक योगदान दो।
क्योंकि सिर्फ़ अधिकार माँगने से समाज मजबूत नहीं होता!
@dromsudhaa अगर “मनु की औलाद” कहना ही सबसे बड़ी ���ाली है, तो फिर जाति का नाम लेकर अपमान करने पर म���कदमा क्यों करवाते हो?
गाली किसी को भी दी जाए, गलत है—चाहे सामने वाला किसी भी जाति का हो।
@raviparmarIN आजकल तो बच्चों को भी पता है कि Victim Card कब और कैसे खेलना है। मेरे बच्चे भी कभी कभी कहानी बनाते हैं।
बिना सच्चाई जाने किसी भी वीडियो या घटना को सही या गलत ठहराना उचित नहीं। अक्सर इंसान सिर्फ अपना पक्ष सामने रखता है—वह भी इस तरह कि अपनी गलती छिप जाए ��र सामने वाला गलत साबित हो।
@tarunjatav50 2023 में SC मामलों की conviction rate 32.4% और ST मामलों की 24.6% थी।
MP High Court Bar Association survey में SC/ST Act के मामलों के आरोपियों में 81% OBC, 14% upper caste और 5% minority बताए गए थे।
उत्तर प्रदेश के लिए SC/ST Act के आरोपियों में OBC+Minirity approx 79%
@KraantiKumar अब समाज सिर्फ वोट देने के काम आता है,
और राजनीति खुद, परिवार और बच्चों का भविष्य बनाने के काम।
वो ज़माना अब खत्म हो गया, जब नेता समाज और जनता के लिए राजनीति किया करते थे।
मायावती ने किस दलित को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया?
मुलायम ने किस पिछड़े को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया?
@KraantiKumar विष्णु देव साय - CM - ST
प्रेमचंद बैरवा — DyCM - SC
जगदीश देवड़ा —DyCM - SC
OBC CM/DCM
सम्राट चौधरी — बिहार — OBC
मोहन यादव — मध्य प्रदेश — OBC
नायब सिंह सैनी - हरियाणा - OBC
केशव प्रसाद मौर्य- उत्तर प्रदेश -OBC
अरुण साव - छत्तीसगढ़ - OBC
हर्ष संघवी - गुजरात - OBC
@dromsudhaa तुम्हारी उम्र भी ठीक-ठाक दिखती है भाई, ज़हर फैलाने के बजाय कभी समाज के लिए कुछ सकारात्मक योगदान भी कर दो। दिनभर बस जाति-जाति-जाति करते रहते हो यार! 😂
सर्टिफिकेट भी खुद बनवाते हो और फिर उसी जाति को लेकर दिनभर ज्ञान देते हो। कोई नहीं कर रहा है तो ��ुम जनेऊ पहन लो और तुम कर लो भाई।
@amitladwal28@dromsudhaa ऐसे कारनामे हर जाति में किसी न किसी व्यक्ति के मिल जाएंगे। इसलिए किस��� पूरे समाज या जाति को उसके कुछ लोगों के कर्मों से परिभाषित क���ना सही नहीं है। हमारे शास्त्रों ने भी कर्म को ही व्यक्ति की पहचान और मूल्यांकन का आधार माना है। जाति से नहीं, कर्म से इंसान ऊँचा या नीचा होता है।
@dromsudhaa अरे भाई, डॉक्टर लिखते हो—पढ़े-लिखे तो हो ही। फिर इतना भी नहीं समझ पाए कि “नीच जाति” जैसी कोई चीज़ नहीं होती, नीच सोच और नीच कर्म होते हैं। जन्म से कोई ऊँचा-नीचा नहीं होता, इंसान अपने कर्मों से अपनी पहचान बनाता है।
@garvirawat यांत्रिक घड़ी से हज़ारों साल पहले ब्राह्मण खगोलशास्त्रियों ने जल-घड़ी, शून्य और पंचांग की खोज की थी। आज भी केवल पंचांग से चंद्र/सूर्य ग्रहण और समय का सेकंड तक सटीक आकलन होता है—ग्रंथों में कृष्ण जन्म '12 बजे' नहीं, 'रोहिणी नक्षत्र व अर्धरात्रि' दर्ज है।
समय के साथ समाज और परिस्थितियाँ बदलती हैं, इसलिए संविधान में भी आवश्यक संशोधन होते रहने चाहिए। जो प्रावधान आज प्रासंगिक नहीं हैं, उन्हें लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया से बदला या पुनर्विचारित किया जा सकता है।
संविधान जड़ दस्तावेज़ नहीं, समय के अनुसार बदलने वाली व्यवस्था है।
देश आज़ादी के बाद संविधान से चला है, मनुवाद से नहीं। मनुस्मृति या मनुवादी व्यवस्था अगर किसी ऐतिहासिक दौर में प्रासंगिक रही भी होगी, तो आज उसका शासन-व्यवस्था से कोई संवैधानिक संबंध नहीं है।
लेकिन इसी तर्क को संविधान पर भी ईमानदारी से लागू करना चाहिए। 1/1
@priyanka2bharti पढ़ी-लिखी हैं तो ज्ञान बाँटने से आगे बढ़कर कंपनी बनाइए, रोजगार और अव��र दीजिए—खासकर पिछड़े व दलित युवाओं को। भाषणों से नहीं, काम से समाज बदलता है।
दूसरों से त्याग और योगदान की उम्मीद करना आसान है!
मैं अप्रैल में झांसी आया और तब से किसी भी दिन ठीक से सो नही पाया। धन्यवाद @UPPCLLKO specially @dvvnlhq ज���ाये रखने के लिए। पहले 10 बजे रात के आस पास काटते थे अब 12 बजे के आस पास। @aksharmaBharat @EMofficeUP पता कराइये इसमे पिछली सरकारों का तो दोष नहीं।
पता - गणेश रेसीडेंसी
@Chandanmaurya21 आपस में योगदान करो, हजारों करोड़ का भव्य मंदिर बनाओ।
मंदिर में योग्य और संस्कारी दलित ��ुजारी नियुक्त करो, पूरी पारदर्शिता से व्यवस्था चलाओ।
जो धन चढ़े, उसका उपयोग गरीबों, जरूरतमंदों समाज की भलाई में करो।
फिर दूसरों को उपदेश देने के बजाय अपने मॉडल से समाज के सामने उदाहरण पेश करो।