हमें कम आँक करके खुद को बेहतर मान बैठे हैं
कि जुगनू आजकल खुदको दिवाकर मान बैठे हैं
संवारी किस्मतें जिनकी हम ही ने हाथ से अपने
वही ख़ुद को हमारा अब मुकद्दर मान बैठे है
ओशो कहते हैं कि स्त्री पुरुष को उकसाती है, लेकिन आक्रमण नहीं करती. वह तुम्हें बुलाती है, लेकिन चिल्लाती नहीं. उसका बुलाना भी बड़ा मौन है. वह तुम्हें ��ब तरफ से घेर लेती, लेकिन तुम्हें पता भी नहीं चलता.
मनुष्य को प्रेम की आवश्यकता इसलिए नही होती कि वो अकेला है,बल्कि इसलिए होती है कि उसके अंदर अनगिनत भावनाएं होती है। जिन्हें सुनने वाला कोई एक हृदय चाहिए।
किताब-ए-इश्क़ 💌
कभी तुम्हें पूरा लिखूँ, फिर कभी अधूरा लिखूँ,
मैं रातों में बैठकर तुम्हें सवेरा लिखूँ!
मैं जब भी लिखूँ, बस इतना लिखूँ,
ख़ुद को तेरा, और तुझको मेरा लिखूँ!!🤌♥️