@p_sahibsingh जी आपके JE या अधिकारी फोन नहीं उठाते whatsapp ���र जवाब नहीं देते 1916 वाले इन्हें कुछ बोल नहीं सकते ऑथोरिटी नहीं है उन्हें
आपसे बिनती 48 घंटे से पानी नहीं आ रहा इसे ठीक करवाए plz
@gupta_rekha @CMODelhi
🙏 यह पाँच-भाग की शृंखला मेरी मार्गदर्शक, श्रीमती शीला दीक्षित
जी को समर्पित — मेरी नज़र में, आज के आधुनिक दिल्ली की निर्माता।
पिछले कुछ दिनों में दिल्ली सरकार ने ईंधन संकट को लेकर कई सलाहें जारी की हैं — मेट्रो लीजिए, साथ में सवारी कीजिए, ग़ैर-ज़रूरी सफ़र कम कीजिए। ये सलाहें अपने-आप में ग़लत नहीं हैं। पर ये "हमें", यानी आम लोगों को, बताती हैं कि हमें क्या करना है। पहले सवाल का जवाब इनमें न��ीं है — क्या वह "विकल्प" है भी? क्या दिल्ली का सार्वजनिक परिवहन इतना तैयार है कि परिवार जब अपनी गाड़ियाँ घर पर छोड़कर निकलें, तो उन्हें ढो सके?
एक बात पहले ही साफ़ कर दूँ। आगे जो भी मैं रखूँगा, उसका मक़सद आलोचना नहीं है। ये सुझाव हैं, सद्भावना के साथ, दिल्ली सरकार के लिए — ताकि वह काम आगे बढ़ाया जा सके जो 2013 में शीला जी के कार्यकाल के समाप्त होने तक चल रहा था। यहाँ जो भी आँकड़े आप देखेंगे, वे सिर्फ़ ���रकारी दस्तावेज़ों से हैं : भारतीय रिज़र्व बैंक, दिल्ली सरकार के अपने ऑडिटेड खाते, दिल्ली मेट्रो की वार्षिक रिपोर्टें, और दिल्ली का आर्थिक सर्वेक्षण।
आँकड़ों से पहले एक छोटी सी बात समझ लेते हैं। CAPEX — यानी पूँजीगत व्यय — सरकार के बजट का वह हिस्सा है जो "बनाता" है। मेट्रो लाइनें, डिपो, फ़्लाईओवर, सड़कें। ऐसी संपत्तियाँ जो दशकों तक चलती हैं।
दूसरा हिस्सा, राजस्व व्यय, ख़र्च होता है वेतन, सब्सिडी और बिजली
के बिल पर। दोनों ज़रूरी हैं — शहर चलाने के लिए दोनों चाहिए। पर
शहर "बनाता" सिर्फ़ CAPEX है।
अब देखिए — तीस सालों में दिल्ली की चार चुनी हुई सरकारें रहीं। हर सरकार ने परिवहन पर जो रुपया ख़र्च किया, उसमें से वास्तव में
"बनाने" पर कितने पैसे लगे :
🔸 बीजेपी, 1993–98 : 54 पैसे।
🔸 शीला दीक्षित / INC, 1998–2013 : 73 पैसे। दिल्ली की किसी भी
सरकार से सबसे ज़्यादा, और बहुत बड़े अंतर से।
🔸 आम आदमी पार्टी, 2014–25 : सिर्फ़ 33 पैसे। सबसे कम, बहुत बड़े
अंतर से।
🔸 बीजेपी, 2025–26 (बजट अनुमान) : 51 पैसे अनुमानित। पर यह सिर्फ़
एक बजट-अनुमान वर्ष है, आँकने के लिए बहुत जल्दी। दिन 2 में हम इसकी ईमानदारी से जाँच करेंगे।
यही, एक आँकड़े में, फ़र्क़ है — एक बने हुए शहर में, और एक उस
शहर में जो ज़्यादातर सिर्फ़ "घोषित" हुआ हो।
2013 के अंत ���ें शीला जी ने पद छोड़ा। और उसके बाद से, दिल्ली में बुनियादी ढाँचे के विकास की रफ़्तार बस ठहर सी गई है। मेट्रो का
फ़ेज़ चार — जिसकी योजना-स्तर की मंज़ूरी उनकी सरकार ने 2011 में दे दी थी — केंद्र की मंज़ूरी के लिए 2019 तक इंतज़ार करता रहा।
डीटीसी का बेड़ा आज 2010–11 के अपने शिखर से, चौदह साल बाद, अब भी छोटा है। और बजट का जो हिस्सा कभी निर्माण पर ख़र्च होता ��ा, वह अब लगभग ग़ायब है।
अगले चार दिन, एक दिन एक सवाल :
📊 दिन 2 · CAPEX, पैसा-पैसा। दिल्ली ने वास्तव में क्या बनाया,
क्या बनाना बंद किया, और क्या सिर्फ़ "घोषित" किया। रसीदों और
ऑडिट के साथ।
🚇 दिन 3 · दिल्ली मेट्रो। मंज़ूरी किसने दी, बनाया किसने, और
फ़ेज़ चार को सिर्फ़ एक मंज़ूरी के लिए छह साल इंतज़ार क्यों करना
पड़ा।
🚌 दिन 4 · डीटीसी। सर्वकालिक शिखर, उसके बाद की गिरावट, और जो ऑडिट रिपोर्टें अब चुपचाप प���रकाशित नहीं हो रहीं।
🧍 दिन 5 · बसें और लोग। दिल्ली को कितनी बसें चाहिए, कितनी हैं, और क्यों ज़्यादातर दिन आपको एक भी बस नहीं मिलती।
हर आँकड़ा सरकारी रुपये में होगा। कुछ वर्षों में अंतराल हैं — हर
एक को मैं वहीं ईमानदारी से बताऊँगा।
पाँच सवाल, पाँच दिन। आँकड़े बोलेंगे। उसके बाद फ़ैसला आप कीजिए।
दिल्ली परिवहन — तीस साल, तीन दौर — मामला अब खुला है।
#DelhiTransport #दिल्लीपरिवहन #CAPEX #DelhiMetro #DTC
#SheilaDikshit