यद्यत् परवशं कर्म तत्तद्यत्नेन वर्जयेत् ।
यद्यदात्मवशं तु स्यात् तत्तत् सेवेत यत्नतः ।।
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुख दुःखयोः ।।
जो जो पराधीन कार्य हैं, उनका यत्नपूर्वक त्याग करें और जो जो स्वाधीन कार्य हैं, उन्हें यत्नपूर्वक करें। पराधीन सभी कार्य दुःख का और स्वाधीन सभी कार्य सुख का कारण हैं। संक्षेप से इसे सुख-दुःख का लक्षण जानें।
[हम आनन्द के उपासक हैं, फिर हम यहाँ दुःखी क्यों रहें? आनन्द हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, साम्राज्यसुख हमारी बपौती है, स्वाधीनता हमारा आराध्य मन्त्र है। कोई नरराक्षस यदि हमारी स्वाधीनता, इहलौकिक सुख, शान्ति, उपासना, ज्ञानचर्चा, वाणिज्य, कलाकौशल, आदि यानि जीवन पद्धति में हस्तक्षेप करेगा, आक्रमण करेगा तो हम ज्ञान-उपासना-दैनिक कार्य आदि सब छोड़कर अपनी स्वाधीनता, अपने अधिकार के लिए कर्तव्य कर्म रूप संघर्ष-युद्ध करेंगे (युद्धाय कृतनिश्चयः) जो कि श्रीकृष्ण की शास्त्राज्ञा है। क्योंकि हम जानते हैं कि पराधीन का कोई धर्म नहीं, कोई शास्त्र नहीं, क्षणभर को भी सुख नहीं।]
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।
(श्रीमद्भगवद्गीता, ३/२१)
श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करते हैं।
[भारतीय सांस्कृतिक-शाश्वत-धर्मक्षेत्र में प्रचारप्रवृत्ति को, अनुयायी बनाने की प्रवृत्ति को न केवल उपेक्षणीया ही, अपितु सर्वथा त्याज्या ही मान लिया गया है। सांस्कृतिक धर्म आचार का क्षेत्र है, प्रचार का नहीं, प्रदर्शन का नहीं। धर्म का अनुशीलन हुआ करता है, तदनुगत आचरण हुआ करता है, तदनुगत अनुसरण हुआ करता है, जिसके द्वारा सामान्य-जन भी अनुकरण करने लगता है। इस प्रकार आत्मानुबन्धी धर्मानुशीलन, बुद्ध्यनुबन्धी धर्माचरण, मनोनुबन्धी धर्मानुसरण एवं शरीरानुबन्धी धर्मानुकरण भेद से चार भागों में विभक्त धर्म का प्रचार-प्रदर्शन से यत्किञ्चित् भी तो सम्बन्ध नहीं है।
धर्मप्रचार से धर्म का आचारात्मक पक्ष उत्तरोत्तर शिथिल होता है और धर्म के व्याज से दिग्देशकालानुबन्धी तात्कालिक मतवादों, सम्प्रदायवादों का ही प्रचार-प्रदर्शन हुआ करता है, होता आया है। प्रचार-व्यामोहन जागरूकता से धर्म का आचारपक्ष अन्तर्मुख बन जाता है। शासकों में मतवादात्मक धर्म-प्रचार की एषणा जागृत होने पर राष्ट्र वैभव, पौरुष, कौशल, आदि शून्य को प्राप्त हो जाते हैं और राष्ट्र श्री-समृद्धि विहीन पराभव को। 'आचारनिष्ठा' का स्थान 'प्रचारभावुकता' द्वारा ग्रहण कर लिए जाने पर उन्मुक्ततापूर्वक बड़ी-बड़ी उद्घोषणाएँ होती हैं, किन्तु धर्म का, तद्भिन्ना संस्कृति का आचारात्मक पक्ष सर्वथा अभिभूत हो जाता है।]
ऐतरेय ब्राह्मण
(अध्याय ३, खण्ड ३)
नानाश्रांताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम ।
पापो नृषद्वरो जनः ।
इन्द्र इच्चरतः सखा ।
चरैवेति चरैवेति ।।१।।
हे रोहित राजपुत्र ! (अ-श्रांताय) जो परिश्रम करके थक नहीं जाता उस सुस्त मनुष्य के लिये (श्रीः) धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, प्रभुत्व आदि (न अस्ति) नहीं प्राप्त होता है। (इति शुश्रुम) ऐसा हम सुनते आये हैं। (नृ-षद्वरो जनः) जो मनुष्यों में सुस्त मनुष्य होता है वही (पापः) पापी होता है। (इत्) निश्चय से (इन्द्रः) प्रभु (चरतः सखा) पुरुषार्थ प्रयत्न करने वाले उत्साही मनुष्य का मित्र है। इसलिये (चर एव) पुरुषार्थ करो, निश्चय से परम् पुरुषार्थ करो।
पुष्पिण्यौ चरतो जंघे भूष्णुरात्मा फलग्रहिः ।
शेरेऽस्य सर्वे पाष्मानः श्रमेण प्रपथे हताः ।।
चरैवेति चरैवेति ।।२।।
जो (चरतः) चलता रहता है उसी की (जंघे) जाँघे (पुष्पिण्यौ) फूलकर पुष्ट होती हैं। पुरुषार्थी मनुष्य का आत्मा ही (भूष्णुः) अभ्युदय प्राप्त करने वाला और (फलग्रहिः) फल मिलने तक प्रयत्न करने वाला होता है। इसी से सब पाप मार्ग के बीच में ही (श्रमेण हताः) परिश्रम के कारण नष्ट हो जाते हैं। इसलिये पुरुषार्थ करो, अवश्य निश्चयपूर्वक पुरुषार्थ करो।
आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः ।
शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगः ।।
चरैवेति चरैवेति ।।३।।
(आसीनस्य) जो बैठा है उसका (भगः) ऐश्वर्य (आस्ते) बैठा रहता है। (तिष्ठतः) जो खड़ा है उसका ऐश्वर्य ऊपर खड़ा रहता है। (निपद्यमानस्य) जो सोता है उसका ऐश्वर्य भी (शेते) सो जाता है। और (चरतः भगः) पुरुषार्थ करने वाले का ऐश्वर्य (चरति) उसके साथ चलता हुआ आता है। इसलिये पुरुषार्थ करो, निश्चय से अवश्य पुरुषार्थ करो।
कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः ।
उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरन् ।।
चरैवेति चरैवेति ।।४।।
(शयानः) सोना ही कलियुग (भवति) होता है। (संजिहानः) आलस्य छोड़ देना ही द्वापर युग है। (उत्तिष्ठन्) उठाना त्रेतायुग होता है और (चरन्) पुरुषार्थ करना ही कृतयुग (संपद्यते) बन जाता है। इसलिये पुरुषार्थ करो, निश्चय से पुरुषार्थ करो।
चरन्वै मधु विन्दति चरन्त्स्वादुमुदुंबरम् ।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन् ।।
चरैवेति चरैवेति ।। (५)
मधु मक्षिका (चरन्) निश्चय से पुरुषार्थ करने के कारण ही (मधु विन्दति) शहद प्राप्त करती है। पक्षी (चरन्) भ्रमण करके ही (स्वादुं उदुम्बरं) मीठे फल प्राप्त करते हैं। (पश्य) देखो (सूर्यस्य श्रेमाणं) सूर्य की शोभा इसीलिये है कि (यः) वह (चरन्) भ्रमण करता हुआ भी (न तंद्रयते) नहीं थकता। इसलिये पुरुषार्थ करो, निश्चय से पुरुषार्थ करो।
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ।।
(कठोपनिषद्, १/३/५)
काम्यकर्म तत् फलादि रूप अविद्या के चक्कर में फंसे हुए और स्वयं को धीर और शास्त्रकुशल पण्डित मानने वाले बहुत से अविवेकी मनुष्य जन्म-जरा-रोगादि दुःखभार से पीड़ित होते हुए इस संसार के चक्र में घूमते हैं। वे स्वयं को भ्रष्ट करते हुए दूसरे को भी भ्रष्ट करते देखे जाते हैं, यह वैसा ही है जैसे एक अन्धा दूसरे अन्धे को मार्ग दिखाता है और अपने साथ दूसरे को भी कूप में गिराता है।
[चतुष्पर्वा (शरीर-मन-बुद्धि-आत्मायुक्त) मानव तीसरे बुद्धिपर्व को अपनाने पर इस बुद्धिसम्पर्क से विचारविमर्शपथ का अनुगामी बन बुद्धिवादी मानव कहलाता है। आत्मयोगवंचित ऐसा बुद्धिवादी मानव मनःशरीरपरायण प्राकृत मानव की तुलना में कहीं अधिक स्वरूपविमुग्ध होता है क्योंकि 'बुद्धिवादी' बनना एक पक्ष है और 'बुद्धिमानी' करना अन्य पक्ष है। बुद्धिमानी के भ्रम से ऐसा आत्मवंचितमानव 'अविद्या-अस्मिता-आसक्ति-अभिनिवेश' नामक चार महादोषों के प्रभाव से 'मनमानी' करता है। सत्त्वगुण को अभिव्यक्त करने वाली ज्ञानसहकृता विज्ञानविद्या ही विद्या है जिसमें अभ्युदय और निःश्रेयस प्रतिष्ठित हैं। इसके विपरीत रजोगुण-तमोगुणपूर्णा, आत्मविद्याविहीन भूतविद्या ही अविद्या है, यही लोकविद्या अज्ञान कहलाती है। अविद्याग्रस्त बुद्धिवादी असत् को सत् तथा सत् को असत् प्रमाणित करता है। ऐसे बुद्धिवादी के श्रेयोभाव त्याज्य और प्रेयोभाव संग्राह्य बन जाते हैं। ऐसा बुद्धिवादी अपने समतुलन में किसी को भी कुछ भी नहीं मानता, समझता। अतएव इसके मन को जैसा जो कुछ प्रिय-रुचिकर लगता है वैसा ही ही इसकी अविद्यापूर्ण-मनोवशवर्तिनी बुद्धि अच्छा-उपयोगी मानने लग जाती है। आत्मविद्यामूला संस्कारों से वंचित और भूतमूला पर-शिक्षायुक्त ऐसा मानव दम्भपूर्ण बुद्धिवाद में प्रवृत्त होता है, स्वयं की मानसिक-मान्यताओं के आधार मन को अच्छा लगने कार्य-भावों को ही सही मानता है। पद-प्रतिष्ठा से व्यामुग्ध, ख्यातिकामुक, प्रदर्शनकुशल किन्तु आत्मपुरुषवंचित ऐसा प्रकृतिपाश में जकड़ा प्राकृत मानव अविद्या को बुद्धिमानी मानता हुआ स्वयं से इतर मानवों को भी ऐसा ही मानने के लिये प्रयासरत रहता है, किंवा विवश करता है, मानो एक अन्धा अन्य अन्धों को मार्ग दिखलाने का अभिनय करता हुआ अविद्या के कल्पनाजगत में विचरता है और अन्य को भी लक्ष्यभ्रष्ट करता है।]
सुभाषित
संदिग्धे परलोकेऽपि कर्तव्यः पुण्यसंचयः ।
नास्ति चेन्नास्ति नो हानिरस्ति चेन्नास्तिको हतः।।
परलोक में संशय हो तो भी पुण्य का संचय करते चलो। अगर परलोक नहीं है तो आस्तिक को कोई नुकसान नहीं है; कहीं परलोक सत्य हुआ तो नास्तिक मारा जाएगा।
सुभाषित
नित्यं मनोपहारिण्या वाचा प्रह्लादयेज्जगत् ।
उद्वेजयति भूतानि क्रूरवाग्धनदोऽपि सन् ।।
नित्य मनोहर वचनों से जगत् को आनन्दित करना चाहिए। क्योंकि यदि धन देने वाला कुबेर के समान भी हो जाय किन्तु वह क्रूर वाणी बोलता है तो मनुष्यों को उद्विग्न ही करता है।
अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति ।
ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ।।
मनुष्य अधर्म कर पहले (लौकिक) उन्नति करता है, बाद में कल्याण देखता है, शत्रुओं पर विजय पाता है और कुछ समय बाद ही समूल नष्ट हो जाता है।
[अधार्मिक अपने आर्थिक तन्त्रात्मक-सर्वशोषक वणिक्धर्म को निष्कण्टक करने के लिए एवं अपनी तदाशंकाओं के उन्मूल हेतु सत्ता-नीतिज्ञ तन्त्र शासकीय संस्थानों को दूषित करता है। लोकनीति-राजनीति से धर्म का पार्थक्य कर देता है, अतः राज्याधीन होने से सांस्कृतिक-धार्मिक परम्पराएँ अन्तर्मुख हो जाती हैं। तदनन्तर प्रजा सत्तातन्त्रों के कुचक्रों के प्रति भी निरपेक्ष-तटस्थ बन जाती है।
इसप्रकार स्वछन्द वणिक् शासकों द्वारा राष्ट्र को सर्वथा वणिक् भाव में परिवर्तित किये जाने से ब्रह्म-क्षत्र भाववर्ग अन्तर्मुख बन गया है और पौष्णवर्ग पदीय-आर्थिक प्रलोभन द्वारा वणिक् वाद का समर्थक। इसप्रकार वणिक् विजय का मार्ग इस सत्तातन्त्र ने निष्कण्टक कर दिया है। वणिक् निष्ठा के अनुग्रह से ही विभिन्न आयोजन-घटना-आपदा भी लोकचतुरों के लिए व्यवसाय के ही साधक बन गए हैं। संस्कृति-धर्म आचार-आयोजन के क्षेत्र नहीं रहे, अपितु व्यवसाय-व्यापार के आधार बन गए।
'अधर्म' की घोषणा कर लोकतन्त्रों में प्रवृत्त मानव कुछ दिन तो लौकिक सुख की भ्रान्ति कर लेता है, किन्तु धर्म के व्याज से आचरण करने वाला सर्वथैव पतित बन जाता है। धर्म का नाम लेकर अधर्म करना ही धर्मव्याज कहलाता है। सबको धोखा दिया जा सकता है, धर्म को नहीं।
जो व्यक्ति नैतिकताओं की प्रतिक्षण घोषणा करता हुआ इसके व्याज से प्रतिक्षण ही असत्य-असुरधर्म-भ्रष्टाचार पथों का नवीन-नवीन साज-सज्जाओं से उल्लाससहित आविष्कार करता रहता है, वह दूसरों के दीखने मात्र में सुखी-वैभवशाली-कुशल बना रहता हुआ भी अपने इन प्रच्छन्न पापों से अपने आप में सदा ही दुःखी-अशान्त-उद्विग्न-दीन-दरिद्री-अकुशल प्रमाणित होता है।
धर्म को न मानने वाला धर्मनिरपेक्ष को फिर भी क्षम्य है किन्तु वे कदापि क्षम्य नहीं है जो नाम लेते हैं संस्कृति और धर्म का किन्तु व्यवहारपक्ष में हैं ठीक इसके विपरीत। देवता का आमन्त्रण न करना किसी सीमापर्यन्त ठीक कहा जा सकता है, किन्तु आमन्त्रण कर उसे अपमानित करने वाला तो कभी सुखी नहीं रह सकता।
कहा जाता है कि मनःशरीरानुबन्धी प्राकृत मानव संसार में सभी को धोखा देकर अनन्त काल-सीमा पर्यन्त अपनी वित्त-लोकैषणाओं में सफलता प्राप्त कर सकता है। किन्तु कालबद्धता का निर्णय राजर्षि ने यह कह कर किया है कि "जो अधर्मपूर्वक (छल-माया-कपट-धूर्तता पूर्वक) लोकतन्त्रों में प्रवृत्त होता है, वह तत्काल-शीघ्र ही लोक-वैभवों का भोक्ता बनने लगता है। इसी वित्त-वैभव से वह सत्ताबल का क्रय कर लेता है। वित्त-सत्ता-सम्मानादि से समन्वित होकर यही तन्त्रायी (लोकचतुर-चाणाक्ष-धूर्त-वञ्चक) बड़े-बड़े लोकसुख भोगता है। इसी वित्त-सत्ताबल से वह अपने प्रतिपक्षी दलों को भी पराजित करता है। किन्तु अन्ततोगत्त्वा मूलसहित ही सदा के लिए उच्छिन्न हो जाता है।]
कर्मफल
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
कर्म को प्रारम्भ करने की दशा में ही यदि मनुष्य का ज्ञानकर्ममय आत्मा फल की ओर झुक जाएगा तो इसकी ज्ञान-कर्मशक्ति बंट जाएगी। आधा ज्ञानकर्म फल पर चला जायेगा और आधा ज्ञानकर्म साध्य कर्म पर रह जायेगा। परिणाम इसका यह होगा कि साध्यकर्म की सिद्धि के लिए जितना कर्म अपेक्षित होना चाहिए, उतना नहीं होने से कर्म अधूरा रह जायेगा। इसलिए कर्म करने के समय में फल को अनुभव करने में कर्म को खर्च नहीं करते हुए पूर्ण रूप से कर्म में ही लीन हो जाना चाहिए। ऐसा करने की स्थिति में जिसकी सिद्धि में सन्देह उत्पन्न हो जाय, फल की आशा के परित्याग से वह कर्म शीघ्र एवं अवश्य ही सफल बन जायेगा।
कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता। आग पर रखा पानी अवश्य ही गरम होगा। आप अनन्यभाव से कर्म करें और फल न हो यह सर्वथा असम्भव है। परन्तु फल उत्पन्न करना आपका काम नहीं है। आप कर्म को सिद्ध कर दीजिए, प्राकृतिक नियम के अनुसार सिद्ध कर्म स्वयं फल का जनक बन जायेगा।
फल पर दृष्टि रखना अनधिकार चेष्टा है, जो बल कर्मसिद्धि का संपादक है, उसे निरर्थक खर्च करना है। आपकी आशा से फल उत्पन्न नहीं होता, अपितु आपके कर्म से फलसिद्धि होती है।
अगर कोई मनुष्य विद्वान् है तो उसकी विद्वता से ईर्ष्या करना बुरा है। अपितु जिस कर्म से उसे विद्याफल मिला है, उस हेतुभूत कर्म के साथ ईर्ष्या करनी चाहिए। धनवान व्यक्ति से अथवा उसके धन से ईर्ष्या करने से पतन होता है, जिस कर्म से वह धनिक बना है उस कर्म के साथ ईर्ष्या करने से अभ्युदय होता है। यह उन्नति का सबसे उत्कृष्ट मार्ग है।
फल को कर्मसिद्धि का हेतु मत बनाओ, बल्कि कर्म को कर्मसिद्धि का हेतु बनाओ। फल आशा त्याग से कर्म सिद्ध हो जाएगा।
सुभाषित
दधि मधुरं मधु मधुरं द्राक्षा मधुरा सुधापि मधुरैव ।
तस्य तदेव हि मधुरं यस्य मनो यत्र संलग्नम् ।।
दही मीठा है, शहद मीठा है, दाख भी मीठी है और अमृत भी मीठा है, परन्तु जिसका मन जहाँ लगा हुआ है, उसके लिये वही मीठा है ।
सुभाषित
प्रत्यहं प्रत्यवेक्षेत नरश्चरितमात्मनः ।
किंनु मे पशुभिस्तुल्यं किं वा सत्पुरुषैरिति ।।
मनुष्य प्रतिदिन अपने चरित्र की परीक्षा करे कि मुझमें पशुओं के तुल्य कितना है और कितना सत्पुरुषों के तुल्य है।
માટી ને નમન, વીરો ને વંદન!
આદરણીય પ્રધાનમંત્રી શ્રી @narendramodi જી ના આહ્વાનના મેરી માટી, મેરા દેશ અભિયાન અંતર્ગત અસારવા વિધાનસભા ના શાહીબાગ વોર્ડ ખાતે વિવિધ વિસ્તાર માં ઘરે ઘરેથી અમૃત કળશમાં માટી અને ચોખા એકત્રીત કર્યા અને રહીશો સાથે સંવાદ કર્યો.(1/2)