दिल्ली के जंतर-मंतर पर सिविल ड्रेस में डंडे लेकर घूम रहे ये लोग कौन थे?
जब छात्रों ने उनकी पहचान पूछी, तो उन्होंने जवाब क्यों नहीं दिया?
क्या वे पुलिसकर्मी थे, किसी अन्य एजेंसी से थे, या किसी और के भेजे हुए लोग?
इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और सच्चाई सामने आनी चाहिए।
🚨🤔 T बेले का भी “विकास” हो गया—अब उसे स्कूल कह सकते हैं! 🐄📚
जहाँ स्कूलों की हालत T बेले जैसी हो और शिक्षा पर सवाल पूछना ही “देश-विरोध” समझा जाए, वहाँ हर समस्या का समाधान बस एक ही है—
“V श्वगुरु भारत” का बोर्ड लगा दो! 🇮🇳😂
क्योंकि जब जनता की मूलभूत सुविधाओं से ज़्यादा ज़रूरी नारे हो जाएँ, तो फिर अनपढ़ों का सत्ता तक पहुँचना भी “उपलब्धि” कहलाने लगता है।
V श्वगुरु भारत 🇮🇳 — जहाँ रिपोर्ट कार्ड जनता का, और नंबर नेताओं के! 😏
#Asslamu_alaikum_#GM
नंगेपन की आज़ादी आपको मुबारक हो, मैं इस्लाम की क़ैद में बहोत खुश हूँ!
अगर आज़ादी के माइने जिस्म की नुमाइश करना है तो मैं ऐसी आज़ादी से मौत को बेहतर समझती हूँ !😍
उनके नाम मत पूछो, न यह पूछो कि वे कहाँ रहते हैं।
मत पूछो कि उनका ताल्लुक़ किस उम्मत से है। 😭
न पूछो कि वे किस सरज़मीन के रहने वाले हैं،
और न यह पूछो कि उम्मत ने उनके साथ कैसी बेवफ़ाई की। 😭
क्योंकि ऐसे छोटे-बड़े न जाने कितने बच्चे हैं, जो ग़ज़ा में घिरे हुए लोगों के लिए बची हुई ज़मीन के एक-एक टुकड़े पर बिखरे पड़े हैं।
कितने ही लोग इन बच्चों की तरह एक निवाले की तलाश में हैं, या फलों के बचे हुए टुकड़ों और अवशेषों के लिए भटक रहे हैं—जिन्हें वे खरीद नहीं सकते, यहाँ तक कि उनकी कीमत पूछने की भी सामर्थ्य नहीं रखते।
ये बच्चे सबसे खूबसूरत और होनहार बच्चों में से हैं, मगर इनका कोई पुरसाने-हाल नहीं।
कितने ही लोग रात के अँधेरे में और सुबह-सवेरे यही काम करते हैं, ताकि कोई उन्हें देख न सके, कैमरे उनकी तस्वीरें न ले सकें और जिज्ञासा में लोग उनके आसपास जमा न हों।
ये बच्चे कचरे के ढेरों में अंगूर के बचे-खुचे दाने तलाश कर रहे हैं।
यह दृश्य ग़ज़ा के बच्चों से छिन चुके बचपन की दर्दनाक हक़ीक़त और लगातार घेराबंदी व तबाही के साये में बिगड़ती मानवीय स्थिति को उजागर करता है। 😭💔
🌸✨ السلام علیکم ورحمۃ اللہ وبرکاتہ ✨🌸
🌷 صبح بخیر 🌷
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یہ تصویر فقط ایک منظر نہیں لگتی،
میری حیا کی خاموش خبر لگتی ہے،
سیاہ لباس میں جو وقار جھلکتا ہے،
وہ جیسے کسی دعا کا اثر لگتی ہے۔
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نزاکت بھی ہے، مگر نمائش نہیں،
حُسن بھی ہے، مگر کوئی فرمائش نہیں،
پردے میں جو میں وقار سنبھالے چلوں،
میری شان کو لفظوں کی گنجائش نہیں۔
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اٹھتی ہوئی ہر نظر ٹھہر سی جائے،
میرے پردے کی شان سے دل سنور جائے،
نہ کوئی دعویٰ، نہ فخرِ حُسن کا گماں،
بس ادب ہو تو دل خود بخود جھک جائے۔
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سیاہ لباس میں بھی اک نور سا ہے،
میری خاموشی میں ادب کا دستور سا ہے،
دنیا حُسن کو آنکھوں سے تولتی رہے،
میری حیا کے آگے ہر نمائش بےنور سی ہے۔
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🌹✨🌹✨🌹
क्या कहेगा, कभी मिलने भी अगर आएगा वो,
अब वफ़ादारी की कसमें तो नहीं खाएगा वो।
हम समझते थे कि हम उसको भुला सकते हैं,
वो समझता था हमें भूल नहीं पाएगा वो।
कितना सोचा था, पर इतना तो नहीं सोचा था,
याद बन जाएगा वो, ख़्वाब नज़र आएगा वो।
सबके होते हुए एक रोज़ वो तन्हा होगा,
फिर वो ढूँढेगा हमें, और नहीं पाएगा वो। ❤️🩹