क्या लक्ष्मीबाई और मंगलपाड़े क्रांतिकारी थे?
क्या भारतीय एजुकेशनल सिलेबस जातिवादी है?
भारत की इतिहास की किताबों में कुछ नाम बार-बार चमकाए जाते हैं—लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे, तात्या टोपे, नाना साहेब। लेकिन सवाल यह है कि जिन SC, ST, OBC और बहुजन नायकों ने जल, जंगल, जमीन, सम्मान और आज़ादी के लिए संघर्ष किया, वे मुख्य अध्यायों में क्यों नहीं दिखते?
यहीं से सवाल उठता है—क्या भारतीय एजुकेशन सिस्टम ने “क्रांतिकारी” की परिभाषा भी जाति देखकर तय की?
क्रांतिकारी कौन है?
क्या वह जो अंग्रेजों की गोली से मारा गया?
क्या वह जिसे फाँसी हुई?
या वह जो जनता, शोषितों और अन्याय के खिलाफ खड़ा हुआ?
रानी लक्ष्मीबाई को वीरांगना बताया जाता है। लेकिन उनके संघर्ष का मुख्य कारण झाँसी राज्य का उत्तराधिकार विवाद था। अंग्रेजों की “Doctrine of Lapse” नीति के तहत गोद लिए गए उत्तराधिकारी को मान्यता नहीं मिली और झाँसी को अंग्रेजी शासन में मिलाने की कोशिश हुई। ऐसे में सवाल उठता है—क्या यह भारत की जनता को स्वतंत्र कराने की लड़ाई थी, या अपने राज्य और सत्ता को बचाने की लड़ाई?
मंगल पांडे को 1857 की क्रांति का पहला नायक बताया गया। लेकिन वे अंग्रेजी सेना में सिपाही थे। विद्रोह तब हुआ जब कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी की बात फैली और उन्हें मुँह से काटना पड़ता था। सवाल यह है—अगर कारतूस का धार्मिक विवाद न होता, तो क्या मंगल पांडे अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करते?
अब दूसरी तरफ देखिए—बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, झलकारी बाई, ऊदा देवी पासी और ऐसे हजारों लाखो बहुजन योद्धा, जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता, सामंती शोषण और सामाजिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया। सिने पर गोलिया भी खाई और फाँसी पर भी चढ़े लेकिन पाठ्यपुस्तकों में उनका स्थान सीमित क्यों रहा?
समस्या यह नहीं कि लक्ष्मीबाई और मंगल पांडे को क्यों पढ़ाया गया। समस्या यह है कि बहुजन नायकों को बराबर जगह क्यों नहीं दी गई।
जब राजघरानों और तथाकथित उच्च जातियों से जुड़े पात्रों को “राष्ट्रीय नायक” बनाया जाता है, लेकिन दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के विद्रोहों को “स्थानीय आंदोलन” बनाकर छोटा कर दिया जाता है, तो यह इतिहास लेखन की भूल नहीं, साफ़ साफ़ ब्राह्मणवादी जातिवादी पक्षपात दिखता है।
जातिवाद सिर्फ गाली या भेदभाव का नाम नहीं है। जातिवाद यह भी है कि इतिहास में किसे नायक बनाया जाए और किसे भुला दिया जाए। किस संघर्ष को “क्रांति” कहा जाए और किसे “विद्रोह” बताकर किनारे कर दिया जाए या इतिहास के पन्नो से नाम ही गायब कर दिया जाय।
इसलिए सवाल फिर वही है—क्या भारतीय एजुकेशनल सिलेबस जातिवादी है?
अगर लक्ष्मीबाई और मंगल पांडे क्रांतिकारी हैं, तो बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, झलकारी बाई, ऊदा देवी और हजारों लाखो SC, ST, OBC योद्धा इतिहास के केंद्र में क्यों नहीं हैं?
अब इतिहास को श्रद्धा से नहीं, सवालों से पढ़ने का समय है।
क्योंकि इतिहास केवल अतीत नहीं बताता, वह यह भी तय करता है कि आने वाली पीढ़ी किसे अपना नायक मानेगी, अंडभक्त बनेगी या वैज्ञानिक चेतना के साथ खड़ी होगी।
चोरी का क्या है, वो तो वर्षों से चल रही थी, है और चलती रहेगी। चोरों का चरित्र ही ऐसा है।
आप ये देखिये कि माहौल ऐसा बना दिया है चोरों ने कि ये बेचारे लोग महीनों चुप बैठे रहे और चोरी के बारे में अब बता रहे हैं।
ये समर्थ लोग हैं। कमजोर लोग जो अपनी गाढ़ी कमाई का एक हिस्सा श्रद्धा भाव से दान कर के गए, वो तो कभी बोल भी नहीं पाएंगे।
अपने काले धन को ठिकाने लगाने के लिए ही ऐसे देशों की यात्रा करता रहता है पीएम मोदी!
ऊपर से भारतीय जनता की गाढ़ी कमाई के सैकड़ों करोड़ उड़ाकर वो चोर बाजारी मेडल भी खरीद लेता, ताकि विदेश यात्रा की उपलब्धि भाड़े के भक्तों को दिखा सके!! लात मार कर निकालो इसे!!
#EVM_हटाओ_बदमाश_भगाओ
काला कांच क्यों? जून 2017 के बाद चुनाव आयोग ने #VVPAT से पारदर्शी कांच हटाकर काला कांच लगाना शुरू किया! क्यों? वर्षों से सवाल खड़े किए जा रहे, मगर @ECISVEEP ने कोई जवाब नहीं दिया! काले कांच की आड़ में #EVM_GHOTALA छुपाया जा रहा!!
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❗मोदी,शाह साबित करें कि वे भारत के नागरिक हैं..!
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कहीं ऐसा तो नहीं कि देश से सबसे बड़े पदों पर विदेशी नागरिक बैठे हों?
क्या कहता है पासपोर्ट एक्ट...
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#RSS में लड़केबाजी यानी लौण्डेबाजी पुरानी बात है! मंदिरों में बैठे संघियों को इसके बिना नींद नहीं आती! यही है संघियों की "संस्कृति"! इसी संस्कृति पर टिका है इनका तथाकथित सांस्कृतिक संगठन!!
#BanEVM_BanRSS
केदारनाथ में सोना चोरी मामले का क्या हुआ? सुना गया कि वहां भी चोरों को क्लीनचिट दे दी गयी!!
सारे मंदिरों में लाखों करोड़ के सोने जेवर इत्यादि बहुमूल्य सम्पत्ति पर भाजपा सरकार के चोरों की नज़र है!!
#EVM_हटाओ_चोरलुटेरे_भगाओ
सुप्रीम कोर्ट ने एक सुनवाई में कहा कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की चयन की प्रक्रिया (कॉलेजियम के फैसले) आरटीआई और न्यायिक समीक्षा के बाहर है! जजों की चयन प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा भी नहीं की जा सकती है!!
#कॉलेजियम_हटाओ#EVM_हटाओ_न्यायपालिका_बचाओ#RTI_बचाओ