What stops UP Rera, Gr noida and UP govt from taking actions against 3rd class builders? Such low grade life-threatening work is a result of greed of authority (govt as well) and builders. What preventive action responsibles will take now @myogiadityanath@IasAlok@NandiGuptaBJP
#नोएडा प्राधिकरण या ‘बिल्डर संरक्षण बोर्ड’?
15 साल से हजारों करोड़ डकारते रहे बिल्डर, अधिकारी देखते रहे तमाशा
लखनऊ। नोएडा प्राधिकरण के ग्रुप हाउसिंग घोटाले की परतें खुलकर सामने आ रही हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि बिल्डरों पर हजारों करोड़ रुपये बकाया क्यों है — बड़ा सवाल यह है कि आखिर 10-15 साल तक प्राधिकरण के अधिकारी करते क्या रहे?
आज हालत यह है कि:
हजारों करोड़ सरकारी पैसा फंसा है,
लाखों खरीदार बरबाद हैं,
परियोजनाएं अधूरी हैं,
और कई बिल्डर NCLT में जाकर बचाव ढूंढ रहे हैं।
लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा उस “नरमी” की है, जो नोएडा प्राधिकरण ने बड़े #बिल्डरों पर वर्षों तक दिखाई।
डिफाल्टर बिल्डरों की फेहरिस्त: किस पर कितना बकाया?
बिल्डर
अनुमानित बकाया
बकाया कब से
#Unitech
₹13,509 करोड़
2006-11 से
#Amrapali Group
₹5,193 करोड़
2010 से
#Lotus Panache (Granite Gate)
₹1,200 करोड़
एक दशक से अधिक
#AIMS Max Gardenia
₹2,409 करोड़
2010-12 से
#Sikka Infrastructure
₹277 करोड़
2012-13 से
#Supertech
सैकड़ों करोड़
2010 दशक से
#Logix Group
भारी बकाया
वर्षों से
#Gardenia Group
भारी बकाया
वर्षों से
कुल मिलाकर:
नोएडा प्राधिकरण के ग्रुप हाउसिंग सेक्टर में ₹34,000 करोड़ से ज्यादा फंसा हुआ बताया गया है।
सबसे बड़ा सवाल:
बकाया था तो फ्लैट बिकने कैसे दिए?
यहीं से पूरा मामला “डिफॉल्ट” से निकलकर “सिस्टम फेलियर” और कथित “मिलीभगत” की तरफ जाता है।
बिल्डरों ने:
जमीन का पैसा नहीं चुकाया,
लेकिन फ्लैट बेचते रहे,
नए टावर लॉन्च करते रहे,
FAR बढ़वाते रहे,
और खरीदारों से हजारों करोड़ वसूलते रहे।
तो सवाल उठता है:
जब प्राधिकरण को पैसा नहीं मिला था, तब बिक्री की अनुमति किसने दी?
#CAG ने अपनी रिपोर्ट में “builders-officials nexus” का जिक्र किया है।
#Recovery नहीं, ‘राहत’ मिलती रही
आरोप यह है कि:
छोटे आवंटी पर सख्ती,
बड़े बिल्डर पर नरमी।
जब आम आदमी:
एक किश्त चूके तो नोटिस,
लेकिन बड़े बिल्डर:
सालों तक बकाया रखते रहे,
फिर भी उन्हें:
zero period,
ब्याज राहत,
पुनर्गठन,
अतिरिक्त FAR,
और नई अनुमति मिलती रही।
यानी:
“डिफॉल्ट करो, फिर राहत पाओ।”
15 साल तक अधिकारी सोते रहे या…?
सबसे विस्फोटक सवाल यही है।
यदि:
2010 में ही कुर्की होती,
आवंटन रद्द होते,
बैंक खाते फ्रीज होते,
नई बिक्री रुकती,
तो क्या:
आज हजारों खरीदार बर्बाद होते?
हजारों करोड़ डूबते?
लेकिन हुआ उल्टा।
बिल्डर:
खरीदारों से पैसा लेते रहे,
प्राधिकरण इंतजार करता रहा,
और बाद में वही कंपनियां NCLT पहुंच गईं।
खरीदार बोले — “नोएडा प्राधिकरण भी जिम्मेदार”
आज खरीदार मंचों और सोशल मीडिया पर खुलकर आरोप लग रहे हैं कि:
“सिर्फ बिल्डर नहीं, नोएडा प्राधिकरण भी बराबर जिम्मेदार है।”
कारण:
अधूरे प्रोजेक्ट्स को अनुमति,
बकाये के बावजूद NOC,
रजिस्ट्री रोककर खरीदारों को फंसाना,
लेकिन बिल्डरों पर देर से कार्रवाई।
सुप्रीम कोर्ट भी बोल चुका — “Collusion”
Supertech Twin Tower और Amrapali मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार “collusion” शब्द इस्तेमाल किया।
अदालत ने माना कि:
नियम तोड़े गए,
अधिकारियों ने आंखें मूंदी,
और बिल्डरों को फायदा पहुंचाया गया।
असली नुकसान किसका?
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है:
क्या नोएडा प्राधिकरण ने समय रहते कार्रवाई नहीं की…
या जानबूझकर नहीं की?
@PMOIndia@AmitShah@UPCMOffice@cmohry@brajeshpathakup@kpmaurya1@NandiGuptaBJP@ChiefSecyUP@sanjaychapps1@IasAlok@CeoNoida@CeoYeida@InfoDeptUP@UPSIDA@mdhsiidc@OfficialGMDA@DC_Gurugram@_InvestUP@RSSorg@BJP4India
हमारे पास जमीन दुनिया की मात्र 2% है और पानी मात्र 4% है लेकिन हमारी जनसंख्या दुनिया की 20% हो चुकी है।
चौथा बच्चा पैदा करने पर 100% संपत्ति जब्त करने, नागरिकता खत्म करने और न्यूनतम 10 वर्ष की सजा देने के लिए संसद में कानून कब बनेगा?
@HMOIndia@AmitShah@PMOIndia@narendramodi
सिंगापुर में नशा तस्करों को फाँसी होती है और भारत में जमानत मिलती है।
घटिया नियम-कानून कब बदलेगा?
भारत में 05 हजार MLA-MP हैं।
यदि किसी MLA-MP ने नशा तस्करों की 100% संपत्ति जब्त करने, नागरिकता खत्म करने और 01 वर्ष में फाँसी देने के लिए कानून बनाने की माँग किया हो तो नाम बताइए
एक बात याद रखिए
1947 में सबसे पहले नेता भागे थे
2047 में सबसे पहले नेता भागेंगे
आज के नेता 25 वर्ष बाद आपका मठ-मंदिर, मकान-दुकान, खेत-खलिहान, उद्योग-व्यापार और परिवार बचाने नहीं आयेंगे
लेकिन आज का अच्छा नियम-कानून आपकी 25 पीढ़ियों को सुरक्षित रखेगा
इसलिए दल गुलामी छोड़िए🙏
बात कड़वी है....
आज का कायर हिंदू भविष्य का मुसलमान होगा!!
उत्तम नगर में हिंदू आबादी 80%
मुस्लिम आबादी 6%
फिर भी एक हिंदू लड़के को इसलिए पीट-पीटकर मार डाला गया क्योंकि हिंदू कायर हैं!!😡😡
दिल्ली के शेर रिपोर्टर :- सागर जी।
होली पर एक दलित हिंदू युक्त की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। मामला मीडिया से पूर्णतः ग़ायब।
@KumaarSaagar ने ग्राउंड पर जाकर रिपोर्टिंग की। सच्चाई दिखाई। अब परिवार को न्याय की उम्मीद जगी….
फाइनली.. योगजी In Action 🔥
UP पुलिस ने लखनऊ में जबरन सड़क रोककर
ईरानी धार्मिक कट्टरपंथी खामनेई के लिए उपद्रव कर रहे मज़हबी कट्टरपंथियों पर लाठीयां बरसाईं
3000 से ज़्यादा जूते चप्पल बिखरे पड़े मिले
BSD वालों UP पुलिस से निपट नहीं पा रहे
इजराइल से लड़ने की बात कर रहे.. दोगले🖐️
या ख़ुदा रहम कर तेरी क़ौम पर…. इतनी छोटी सी उम्र में क्या सिखा रहे हैं हम अपने बच्चों को?
जो घर की चार दीवारी में बड़े सोचते हैं… वही सरे बाज़ार बच्चे बोलते हैं।
इतनी नफ़रत….
A video shared on Instagram by user gained attention on social media for highlighting concerns over alleged illegal immigration from Bangladesh into Northeast India, focusing on Assam.
The footage depicts rural areas with makeshift housing, which the narrator claims are built by undocumented settlers. The speaker criticizes the substandard living conditions, questions the immigrants’ legal status and integration, and warns of a potential “systematic takeover” that could shift demographics, strain resources, and threaten cultural identity.
Threat to Assam @himantabiswa
जब रेप दोषियों को राहत मिलती है,तो डर सिर्फ एक परिवार में नहीं पूरे समाज में फैलता है।आज पीड़िता सड़कों पर है —और सवाल सिस्टम से है।
#JusticeForUnnaoVictim
Islamist thugs vandalized and set fire to an entire Hindu village named "Banik Para" in Sultanpur under Raujan upzilla in Chittagong district. I am humbly calling upon the international community to immediately raise voice against such extreme atrocities.
@ninarosenwald
हाजी अली दरगाह… मुंबई
एक छोटी सी जाँच-पड़ताल कथा
मुम्बई की मशहूर हाजी अली दरगाह दरअसल किसी उज़्बेकी/अज़रबैजानी मोमिन की मज़ार बताई जाती है।
कितनी पुरानी है?
कहने वाले कहते हैं—500 साल!
देखने वाले कहते हैं—“भाई, पेंट तो अभी सूखा ही लग रहा है!”
मतलब वास्तुकला देखकर 100 साल से ज़्यादा की नहीं लगती।
और मज़ेदार बात ये कि
दरगाह सिर्फ समुद्र में नहीं है,
सरकारी ज़मीन पर भी आराम से टिकी हुई है।
इतना ही नहीं, ऊपर से 4166 वर्गमीटर की प्रीमियम सरकारी ज़मीन लीज पर भी मिल गई—
लोकेशन ऐसी कि रियल एस्टेट वाले भी सलाम ठोक दें।
2009 में दरगाह परिसर में मोबाइल कंपनियों के ट्रांसमिशन टावर लगा दिए गए।
अब टावर से तरंगे ही नहीं,
करोड़ों रुपये सालाना भी निकलते हैं।
पिछले साल BMC ने सोचा—
“चलो, अपनी ज़मीन है, कुछ किराया तो माँग ही लेते हैं।”
माँग रखी गई—सिर्फ 1.80 करोड़ रुपये।
दरगाह ट्रस्ट का जवाब आया—
“न धन्यवाद, न नमस्ते… एक चवन्नी भी नहीं।”
कहते हैं देश की ज़्यादातर मस्जिदें सरकारी ज़मीन पर हैं,
लेकिन सरकार को
न किराया मिलता है,
न टैक्स,
न लीज रेंट—
बस दुआओं से काम चला लो!
फिर नया ट्विस्ट आया—
उद्धव सरकार बनी और
हाजी अली ट्रस्ट को 35 करोड़ रुपये सौंदर्यीकरण के लिए दे दिए गए।
मतलब—
पहले जो मिलना था, वो मिला नहीं,
ऊपर से और दे दिया गया।
इसे कहते हैं सरकारी स्पेशल ऑफर
अब सवाल ये उठता है कि
इतनी अकूत संपत्ति के बावजूद
कभी आपने सुना कि
बाढ़, महामारी या किसी आपदा में
किसी दरगाह ने खुलकर मदद की हो?
अजमेर दरगाह की सालाना आय बताई जाती है—230 करोड़ रुपये।
असल में कितनी है,
ये तो ऊपर वाला ही जानता है।
कोरोना काल में
मंदिरों ने 500 करोड़ से ज़्यादा दान दिया—
अस्पताल, ऑक्सीजन, भोजन—सब जगह।
लेकिन
अजमेर, निज़ामुद्दीन या बड़े चर्चों से
कोई बड़ी घोषणा सुनाई नहीं दी।
विडंबना ये है कि
कुछ मंदिरों की आय देखकर लोगों की आँखें चौंधिया जाती हैं—
जबकि उस आय पर पूरा अधिकार सरकार का होता है।
दूसरी ओर
मस्जिदें, दरगाहें और चर्च—
कमाई शायद हज़ार गुनी—
लेकिन उनसे
न हिसाब पूछा जाता है,
न हिस्सा माँगा जाता है।
बस यही है
हमारे देश का
धार्मिक अर्थशास्त्र—
जहाँ कुछ से सब लिया जाता है
और कुछ से
कुछ भी नहीं।
#religion
#secularism
#finance