"असल में सब कुछ कृष्ण ही हैं"
◆ न्यूयॉर्क के इस्कॉन मंदिर पहुंचने के बाद RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा
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विशाखापट्टनम के समीप स्थित गुड़िलोवा के 'विज्ञान विहार' विद्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 'अखिल भारतीय समन्वय बैठक' आज प्रातः प्रारंभ हुई। बैठक का शुभारंभ पू. सरसंघचालक जी और माननीय सरकार्यवाह ने भारत माता के चित्र पर पुष्पार्चन करके किया। बैठक 21 अगस्त की शाम तक चलेगी।
अगर SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर नहीं होगी, तो आरक्षण का लाभ सबसे जरूरतमंद तक कैसे पहुंचेगा?
अमीर और अमीर, गरीब और गरीब—यह व्यवस्था कब बदलेगी?
गरीब दलितों, उठो और अपने अधिकार के लिए आवाज उठाओ। ✊
है न कमाल की संस्कृति हमारी ?
हम आज(नाग पंचमी) के दिन विषधर को दूध पिलाते हैं!
ऐसे में कुछ सपोल जो स्वयं को दिमागी नक्शल कहने में गर्व महसूस कर रहे हो
वह क्या ही बिगाड सकता है हमारा ?
हाॅ हम महादेव(गले में विषधर लपेटे मस्त रहने वाले देवता) के अंधे भक्त हैं !
॥सुंदर कांड॥
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥
भावार्थ:-हनुमान्जी को बुद्धि और बल में निपुण देखकर जानकीजी ने कहा- जाओ। हे तात! श्री रघुनाथजी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ॥
#RamCharitManas#SundarKand
भारत में रहते हुए भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों के अनुरूप जीवन जीना चाहिए। अन्य देशों की जीवनशैली को बिना विचार किए अपनाने के बजाय भारतीय दृष्टिकोण के आधार पर समाज और परिवार व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। #RSSorg#vskmalwa
आज परिवार में संवाद बंद हो गया है, लोग घर आते ही अपने-अपने फोन में व्यस्त हो जाते हैं। हमें संवाद करने की जरूरत है।
डॉ. मोहन भागवत जी
सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
'कारगिल विजय दिवस' भारतीय सेना के अदम्य शौर्य और अद्भुत पराक्रम का प्रतीक है। वर्ष 1999 में हिमालय की दुर्गम बर्फीली चोटियों पर विषम परिस्थितियों और शत्रु के ऊँचाई पर स्थित मोर्चों के बावजूद, हमारे वीर जवानों ने 'ऑपरेशन विजय' के माध्यम से दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
'कारगिल विजय दिवस' पर उन सभी वीर सपूतों का स्मरण कर नमन करता हूँ, जिन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान देकर देश की अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखा।
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्ष-स्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः ।
अनादिमत् त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ।।४।।
(चतुर्थोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मंत्र वैदिक दर्शन की उस विराट् अनुभूति का अद्भुत उद्घोष है, जिसमें समस्त दृश्य और अदृश्य जगत् एक ही परम सत्ता का बहुविध प्रकाश माना गया है। यहाँ ऋषि प्रकृति के विविध रंगों, रूपों, ऋतुओं, समुद्रों तथा सम्पूर्ण विश्व की ओर संकेत करते हुए यह उद्घोष करते हैं कि इन सबका मूलाधार एक ही अनादि, अनन्त और सर्वव्यापक ब्रह्म है। नील आकाश की गम्भीरता, हरित पृथ्वी की जीवनदायिनी शक्ति, रक्तवर्ण प्रभात की आभा, विद्युत् की दीप्ति, कालचक्र की ऋतुएँ और असीम समुद्र ये सब उसी एक परम चेतना की अनन्त अभिव्यक्तियाँ हैं।
भगवत्पाद भगवान् आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि उपनिषद् का उद्देश्य ब्रह्म को वस्तुओं का केवल बाह्य कारण बताना नहीं है, बल्कि यह प्रतिपादित करना है कि वही ब्रह्म समस्त विश्व का अधिष्ठान, आत्मा और परमार्थसत्य है। जो कुछ नाम और रूप के रूप में दिखाई देता है, वह अपने स्वतंत्र अस्तित्व से युक्त नहीं है। उसकी सत्ता ब्रह्म पर ही आश्रित है। जैसे स्वर्ण के बिना आभूषण का कोई अस्तित्व नहीं और मिट्टी के बिना घट की कोई सत्ता नहीं, वैसे ही ब्रह्म के बिना जगत् का कोई स्वतंत्र सत्य नहीं।
मंत्र में उल्लिखित नील, हरित और लोहित वर्ण केवल प्रकृति के रंग नहीं हैं; वे सृष्टि की अनन्त विविधता के प्रतीक हैं। संसार निरन्तर परिवर्तनशील है। प्रत्येक क्षण रंग बदलता है, ऋतुएँ बदलती हैं, जल प्रवाहित होता है, बादल उमड़ते हैं, विद्युत् चमकती है और जीवन के असंख्य रूप प्रकट होकर पुनः लीन हो जाते हैं। किन्तु इन सभी परिवर्तनों के पीछे जो अपरिवर्तनशील सत्ता है, वही ब्रह्म है। परिवर्तन दृश्य जगत् का धर्म है; अपरिवर्तन ब्रह्म का स्वरूप है।
“अनादिमत् त्वं विभुत्वेन वर्तसे” - यह पद अद्वैत वेदान्त का सार प्रस्तुत करता है। परमात्मा का न कोई आरम्भ है, न कोई अन्त। वह काल से परे है, देश से परे है, कारण-कार्य की समस्त सीमाओं से परे है। उसका विभुत्व केवल व्यापकता नहीं, अपितु सर्वाधारता है। वह प्रत्येक कण में है, किन्तु किसी कण तक सीमित नहीं; वह प्रत्येक रूप में प्रकट है, किन्तु किसी रूप से बँधा नहीं; वह सबका आत्मस्वरूप है, फिर भी उपाधियों से सर्वथा असंग है।
भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार जगत् की उत्पत्ति ब्रह्म में किसी वास्तविक परिवर्तन का परिणाम नहीं है। ब्रह्म न घटता है, न बढ़ता है, न विकृत होता है। यह सम्पूर्ण विश्व उसकी मायाशक्ति के कारण अनुभूत होता है। जैसे स्वप्न जाग्रत पुरुष को वास्तविक प्रतीत होता है, किन्तु जागरण पर उसका पृथक् अस्तित्व सिद्ध नहीं होता, वैसे ही आत्मज्ञान के उदय पर नाम-रूपमय जगत् का मिथ्यात्व स्पष्ट हो जाता है और केवल ब्रह्म की अखण्ड सत्ता प्रकाशित रहती है।
इस मंत्र का आध्यात्मिक संदेश अत्यन्त गम्भीर है। जब साधक प्रकृति के प्रत्येक रूप में उसी एक परमात्मा का दर्शन करता है, तब उसके भीतर पृथ्वी के प्रति श्रद्धा, जल के प्रति पवित्रता, वनस्पतियों के प्रति संवेदना और सम्पूर्ण जीवजगत् के प्रति करुणा स्वतः जागृत हो जाती है। तब प्रकृति केवल भोग की वस्तु नहीं रहती; वह ब्रह्म की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति बन जाती है। यही दृष्टि मनुष्य को पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी बनाती है और समस्त सृष्टि के साथ उसके आध्यात्मिक सम्बन्ध को पुनः स्थापित करती है।
भगवत्पादाचार्य के अद्वैत में विश्व का निषेध नहीं, बल्कि उसके वास्तविक आधार का उद्घाटन है। वे जगत् को ब्रह्म से पृथक् नहीं मानते; अपितु यह बताते हैं कि जगत् का सत्य ब्रह्म है। इसलिए ज्ञानी की दृष्टि में प्रत्येक रंग ब्रह्म की शोभा है, प्रत्येक ऋतु ब्रह्म की लय है, प्रत्येक समुद्र ब्रह्म की गम्भीरता है और सम्पूर्ण विश्व उसी अनन्त चैतन्य का दृश्य विस्तार है।
अतः यह मंत्र साधक को बाह्य विविधताओं में उलझने के स्थान पर उस एक अखण्ड सत्ता का साक्षात्कार करने की प्रेरणा देता है, जिससे समस्त लोक, समस्त भुवन और समस्त अस्तित्व प्रकट हुए हैं। यही भगवत्पाद भगवान् आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त का परम निष्कर्ष है कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है; वही अनादि, अनन्त, सर्वव्यापक और सर्वाधार चैतन्य है। समस्त विश्व उसी का नाम-रूपात्मक प्रकाश है। जब यह अनुभूति जागृत होती है, तब साधक के लिए सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वरमय हो जाती है और उसके जीवन में ज्ञान, करुणा, समत्व तथा परम आनन्द का अविरल उदय होता है।
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'बच्चों को प्यार दें, उनके सवालों के जवाब दें
पहले आज्ञा पालन का दौर था लेकिन अब बच्चे हर बात पर तर्क मांगते हैं, इसलिए उन्हें प्यार, समय और संवाद देना जरूरी है।
घर में डिप्रेशन नहीं बल्कि डिस्कशन होना चाहिए और आदेश देने की बजाय संवाद करना चाहिए।'
: डॉ मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ