एक छोटी-सी तकनीकी गलती…
और सपनों से भरी एक ज़िंदगी थम-सी गई।
चतुर्थ श्रेणी भर्ती का अभ्यर्थी महावीर आज सिस्टम के दरवाज़ों पर सिर झुकाए खड़ा है।
न हाथ में नियुक्ति है,
न जेब में पैसे…
बस आंखों में एक सवाल— मेरी गलती इतनी बड़ी थी क्या?
आवेदन फॉर्म भरते वक्त मल्टीपल डिसेबिलिटी के कॉलम में हुई एक अनजानी भूल,
आज महावीर के पूरे भविष्य पर भारी पड़ गई।
वो कहता है— गलती मेरी थी, लेकिन माफ़ी की कोई गुंजाइश भी तो होनी चाहिए थी।
RSSB के दफ्तर… लंबी कतारें…
और हर चक्कर के साथ टूटती उम्मीदें।
कई बार भूखा, कई बार प्यासा,
लेकिन फिर भी इंसाफ की आस में खड़ा महावीर।
सवाल सिर्फ एक अभ्यर्थी का नहीं है…
सवाल उस सिस्टम का है
जहां एक मानवीय भूल सपनों की सजा बन जाती है।
अब सबकी नजरें RSSB पर हैं—
क्या महावीर की आवाज़ सुनी जाएगी?
या फिर एक और सपना, फाइलों के बोझ तले दबकर खामोश हो जाएगा?
@alokrajRSSB@BhajanlalBjp
@AKTrickyMath@alokrajRSSB गुरु जी चरण स्पर्श.....
गुरु जी आपकी वजह से यह पोस्ट करने की हिम्मत हुई हैं.....
आपसे गणित नहीं पढ़ते तो आज हम भी इसी दौड़ में शामिल रहते.....
एक बार पुनः चरण स्पर्श 🙇🏻♂️
कपिल, मानना पड़ेगा आपका अंदाज और फ्रैंकनेस।
Yes, कुछ लोग ऐसा करते होंगे, मगर बच्चों के आरोप भी हमारे लिए फीडबैक है।
वैसे जब सिस्टम पर उंगलियां उठ रही हैं, मतलब काम तो हो रहा है, उँगलियों के उठने से इंप्रूव भी होता है, no issues.