तो क्या हम उल्टा यह नहीं पूछ सकते कि वेनिस (इटली), फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में इसलिए तरक्की है क्योंकि वहां कोई भी स्वयंभू भगवान के मुंह से पैदा हुआ जन्मजात मेरिटधारी नहीं बैठा है
जो सदियों से पद–प्रतिष्ठा–दौलत–अवसरों पर एकाधिकार जमा कर दूसरों को इंसान से जानवर बनाने पर तुला हो?
वहां इसलिए तरक्की है क्योंकि वहां जन्म से ऊंच–नीच नहीं तय होती। वहां जाति नहीं, कौशल मायने रखता है। वहां सदियों तक समाज के बड़े हिस्सों को शिक्षित होने, आगे बढ़ने और इंसान कहलाने से रोका नहीं गया। वहां संविधान, क़ानून और अवसर सबके लिए समान हैं
भारत में आज आरक्षण है क्योंकि यहां हजारों साल तक बहुजन समाज के करोड़ों लोगों को पढ़ने, लिखने, जमीन रखने, संपत्ति प्राप्त करने, मंदिर में जाने, सत्ता में बैठने, और इंसान की तरह जीने तक का अधिकार नहीं दिया गया।
और सच ये भी है भारत में अगर सदियों से दलित–बहुजन–आदिवासियों को शिक्षा और अवसर मिलते रहते, अगर जाति व्यवस्था लोगों की गर्दन न दबाती, अगर मेरिट को पैदा होने की जगह मेहनत से तय किया जाता,
तो आज हमें आरक्षण की ज़रूरत ही न पड़ती और देश भी यूरोप से ज़्यादा विकसित होता।
आरक्षण विकास में रुकावट नहीं है। रुकावट तो वह मनुवादी मानसिकता है जो चाहती है कि देश में बराबरी कभी न आए।
भारत में सरकारी और प्राइवेट में मिलाकर सिर्फ 3 प्रतिशत नौकरियों में 49.5 प्रतिशत आरक्षण है (वो भी भरा नहीं जाता है) बाकी 97 प्रतिशत नौकरियों में देश में कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है और जहाँ आरक्षण नहीं है, वहाँ 97 प्रतिशत नौकरियों में SC/ST/OBC को कोई जॉब नहीं है। होगा भी तो बहुत कम, उँगलियों पर गिनने इतने लोग वहाँ सर्विस में लगे है। जो चंद लोग वहाँ लगे है वो जातिवाद होने की डर से अपनी पहचान छुपाते रहते है, फिर भी उनको करियर प्रॉग्रेशन नहीं मिलता है। जहाँ आरक्षण नहीं है वहाँ बहुत भयंकर जातिवाद है। जातिवाद ने देश को बर्बाद कर दिया है। गरीबी और पिछड़ापण जातिवाद की वजह से है।
जब कोई “भीमटी” कहता है तो “भीम” का नाम गूंजता है , जब कोई “नीलचट्टी” कहता है तो नीला रंग याद आता है जो समता और सामाजिक न्याय का प्रतीक है।
ये शब्द हमें मज़बूत करते हैं। हम महिलाओं से ना कोई हमारी आवाज़ छीन सकता है, ना समाज और ना ही समाज का समर्थन।
चाहे मैं हूँ, “कंचना यादव” हों या “सारिका पासवान” तीनों बहुजन महिलाएं हैं, जिन्होंने बेड़ियों में बंधने से इनकार किया है।
बाबा साहब ने हमारी बेड़ियों से हमें मुक्त किया, उन बेड़ियों में हम दुबारा क़ैद नहीं हो सकते।
नफ़रत, हिंसा, पितृसत्ता और जातिवाद के ख़िलाफ़ “उलगुलान” था, है और जारी रहेगा।
We can be defeated but cannot be destroyed. We’ll rise from own ashes and wipe out the casteist and communal forces.
Together we stand , together we rise.
मनुवादी लोग RJD की तेज तरार और फायर ब्रांड प्रवक्ता PRIYANKA BHARTI को ट्रोल कर अपमानित कर रहे हैं.
उनकी ओर से कहा जा रहा है, न्यूज़ डिबेट में उल्टा सीधा बोलती है. लाउड होकर जवाब देती है,
बीजेपी प्रवक्ताओं के खिलाफ खराब भाषा का प्रयोग करती है. न्यूज़ एंकरों तक से बदतमीजी करती है. आरोप बेबुनियाद है.
मनुवादी हज़म नही कर पा रहे हैं. 1000 सालों से इन लोगों केवल बोलने की आदत पड़ी है, सुनने की आदत नही है. वो लोग चाहते हैं, प्रियंका भारती उनका अहंकार और उनकी बात बर्दाश्त करे.
बहुजन समाज की बेटी प्रियंका भारती पीएचडी स्कॉलर है, वो जानती कब सम्मान करना है और कब जस को तस जबाब देना है.
सुबह के छह बज गए हैं और कांशीराम जी स्मारक स्थल खचाखच भर चुका है।
अभी तो बहनजी आई भी नहीं हैं, अभी तो और भी लोगों का हुजूम आना बाक़ी हैं।
जय भीम जय बसपा जय कांशीराम
भारत के अटॉर्नी जनरल का कोर्ट में दिया बयान पढ़िए, और सोचिए कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से आरक्षण के खिलाफ जजमेन्ट क्यों पास होता है?
यह लोग बयान देते हैं कि मैं व्यक्तिगत तौर पर खिलाफ हूँ लेकिन क़ानून को बताने के लिए खड़ा हूँ। आपकी व्यक्तिगत राय किसने पूछा।
देश के स्पेशल मेडिकल कॉलेज में रिजर्वेशन की पेटीशन पर राष्ट्रीय मीडिया में ख़बर छप रही है।
दलितों के नाम पर खड़ी हुई मीडिया चुप रही।
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2017 में बहन मायावती जी ने EVM का मुद्दा पूरे जोर शोर से उठाया था.
राज्य सभा में EVM के मुद्दे पर बोलते हुए कहा EVM संदिग्ध है.
BAMCEF सुप्रीमों वामन मेश्राम ने भी EVM पर काफी काम किया है. वो भी EVM को संदिग्ध मानते हैं.
EVM को केवल मतदाता ही नही, पूरी दुनिया संदिग्ध मानती है. इसी कारण भारत और ब्राज़ील के अलावा दुनिया में कहीं भी EVM से चुनाव नही होता है.
यहां तक EVM बनाने वाले जापान में भी बैलेट पेपर पर चुनाव कराया जाता है. आदरणीय बहन मायावती जी को EVM को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना चाहिए.