सत्ता के अहंकार में डूबी मोदी सरकार अब इस मुकाम पर पहुँच गई है कि अपने अधिकारों, निष्पक्ष परीक्षाओं और सुरक्षित भविष्य की मांग करने वाले छात्रों को ही शिक्षा मंत्री “आतंकवादी” कह रहे हैं।
ज़रा सोचिए - जिसकी नाकामी से इतने पेपर लीक हुए, जिसके राज में 20 बच्चों ने जान दे दी, जिसने करोड़ों युवाओं का भविष्य अंधेरे में धकेल दिया - वो आज पीड़ित बच्चों और उनकी आवाज़ उठाने वालों को “दहशतगर्द” बता रहा है।
पर यह कोई नई बात नहीं: अन्नदाता किसानों को "आंदोलनजीवी और परजीवी" कहा। सवाल पूछने वाले को “Anti-National” कहा। और अब युवाओं को “दहशतगर्द।”
जो भी सरकार से सवाल पूछे - उसे देशद्रोही बता दो, यही इनकी पूरी राजनीति है।
धर्मेंद्र प्रधान जी, देश के करोड़ों युवाओं से तुरंत माफ़ी माँगिए और अपनी नाकामियों के लिए इस्तीफ़ा दीजिए।
और रही मेरी बात - आप मुझ पर जितने चाहें हमले कर लीजिए। मैंने कोटा में कहा था, और फिर कहता हूँ: यह शिक्षा व्यवस्था आज सिर्फ़ एक वसूली तंत्र बन गई है। मैं इसे ऐसे ही नहीं रहने दूँगा।
हर बच्चे को सस्ती, अच्छी शिक्षा और निष्पक्ष परीक्षा मिले - इस आवाज़ को उठाना मैं कभी बंद नहीं करूँगा।
#ChhatronKiGoonj
#ChhatraJodo
सुनो! खुद की तेरी दो कौड़ी की इज्ज़त नहीं होगी तभी खान सर को गाली दे रहा। खान सर टीचर नहीं मसीहा हैं जो गरीबों को पढ़ाते हैं, तो वहां के बाकी के कोचिंग संस्थान जलते हैं। लानत है आप लोगों पर जिसने, गरीबों को लगभग मुफ्त पढ़ाया, हॉस्पिटल बनवाया, उसका सम्मान नहीं कर पा रहे, लानत है।
@ImGauravYadav9 ये शिक्षकों का नहीं देश का दुर्भाग्य है।आजादी के इतने सालों बाद भी भारत में ये स्थिति है। बिहार कितना पिछड़ा है इससे दिख रहा वो लोग अपने एक शिक्षक की रक्षा नहीं कर पा रहे।सर जो देशभक्ति व समाज सेवा में लगे रहते हैं उनको क्या मिला! पुरस्कार तो नहीं सजा! हमें खुद शौक है शोषण का!
@BJP4India हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र भारत की शासन व्यवस्था का आधार तो है ही साथ ही साथ जीवन शैली का एक तरीका है। चौथे स्तंभ मीडिया (157 रैंक)और अशिक्षित वर्ग की व्यापकता की चुनौती को भारतीय युवा स्वीकार कर चुका है। समय रहते जाग जाइए बेहतर होगा।
@BJP4India इतिहास कहता है कि रावण, दुर्योधन से लेकर धनानंद, MBT, फिर अंग्रेज, कांग्रेस का इमरजेंसी का दौर, साथ ही साथ विश्व इतिहास में नेपोलियन बोनापार्ट से एडॉल्फ हिटलर तक आदि से साबित हुआ कि अति सर्वत्र वर्जयेत! सरकार को भी आत्ममूल्यांकन की आवश्यकता है?
क्योंकि ऐसा देखा गया है कि एक ही चयनित व्यक्ति विभिन्न को कोचिंग संस्थानों में किसी न किसी रूप में नज़र आता है जिससे नए नए कैंडिडेट में भ्रम की स्थिति होती है। आपसे आशा है इस संबंध में उचित जांच की जाए और जिम्मेदारों पर कार्यवाही की जाए।
धन्यवाद
एक आम नागरिक। जय हिंद।
@DrMohanYadav51 माननीय मुख्य मंत्री जी से निवेदन है कि इंदौर स्थित सिविल सेवा की तैयारी कराने वाले विभिन्न कोचिंग संस्थानों के लिए उचित गाइडलाइन बनाई जाए साथ ही साथ चयनित अभ्यर्थियों से अपेक्षा की जाए कि उनके आचरण से अभ्यर्थियों में भ्रम की स्थिति पैदा न हो।
मन बैरागी, तन अनुरागी, क़दम-क़दम दुश्वारी है
जीवन जीना सहल न जानो, बहुत बड़ी फ़नकारी है
औरों जैसे होकर भी हम बाइज़्ज़त हैं बस्ती में
कुछ लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी है
- निदा फ़ाज़ली
- सूर्यभान 'सूरी'🌷
(कविता: गाँव से बना हूँ)
मुझे कभी लगता था
कि गाँव एक भूगोल है...
नक़्शे पर बना हुआ एक छोटा-सा धब्बा जैसा।
फिर धीरे-धीरे समझ आया,
गाँव दरअसल
मेरे भीतर रखा हुआ एक कमरा है,
जहाँ मैं हर बार लौटता हूँ
जब दुनिया बहुत तेज़ हो जाती है।
मैंने शहर में
बहुत कुछ सीखा...
तेज़ चलना,
बोलना कम,
और महसूस करना ।
पर गाँव ने
मुझे देखना सिखाया था।
वहाँ
सुबहें अलार्म से नहीं खुलती,
खुलती थीं
किसी अनजानी-सी शांति से...
जैसे धरती खुद कह रही हो,
"उठो, आज भी जीना है।"
संघर्ष वहाँ
किसी भाषण का हिस्सा नहीं था।
वह बस था...
जैसे हवा होती है।
पिता खेत से लौटते थे
तो उनके शरीर पर मिट्टी होती थी,
और चेहरे पर
एक अजीब-सी निश्चितता।
वह कभी नहीं कहते थे
कि सब ठीक हो जाएगा,
पर उनके हाथों की दरारों में
मुझे यकीन दिखता था।
गाँव में
भविष्य की कोई बड़ी योजनाएँ नहीं बनती थी,
फिर भी हर बीज
भविष्य में निवेश होता है।
मैंने पहली बार
यकीन वहीं देखा था...
जब सूखी ज़मीन पर भी
बीज डाला जाता था।
जैसे कहा जा रहा हो...
"मैं हार मानने की जल्दी में नहीं हूँ।"
देशीपन वहाँ
कोई दिखावा नहीं था।
एक स्वीकार था...
कि हम मिट्टी से बने हैं,
और मिट्टी में ही
अपना अर्थ ढूँढते हैं।
शहर में
मैंने महत्वाकांक्षा देखी,
पर गाँव में
मैंने धैर्य देखा है।
और अब जब कभी
मैं बहुत उलझ जाता हूँ,
तो अपने भीतर उस पगडंडी पर चलता हूँ
जो कच्ची सी है,
धूल से भरी हुई
पर सच्ची है।
मुझे समझ आने लगा है...
गाँव पीछे छूटी हुई जगह नहीं है।
वह मेरी बनावट है।
वहीं से
मेरे आवाज़ की सादगी,
मेरे सपनों की जड़,
डर की ईमानदारी...
सब वहीं से आए हैं।
संघर्ष ने वहाँ
किसी को कठोर नहीं बनाया,
बस ज़्यादा यथार्थ बनाया है...
और यथार्थ में
एक अजीब-सी शांति होती है।
अब मैं जानता हूँ...
अगर कभी सब कुछ छूट भी जाए,
तो भी मैं नहीं टूटूँगा।
क्योंकि
मैं शहर में रहता हूँ,
पर बना
गाँव से हूँ।
@MyGovHindi@narendramodi आपने नागरिकों को तो बता दिया क्या करना है, आपको क्या करना है वह तो तय करें ?
क्या इसका तात्पर्य यह है? कि आप कोरोना की तरह हाथ खड़े कर रहे! वैसे आप कुछ भी कर सकते हैं जनता तो सो रही है।
हालांकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि " कर्म लौटके आते हैं।"
लोक सेवा के पद विगत कुछ वर्षों से 200 से कम आ रहे हैं।
#MPPSC_भर्ती_सत्याग्रह_2
यह सामान्य सी बात है कि आर्थिक दृष्टि से कमजोर और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग को लोक नियोजन के माध्यम से ही आगे बढ़ने के सर्वाधिक मौके होते हैं। जो आर्थिक असमानता को कम करता है।
सरकार स्थिति को समझे।
@GaganPratapMath शिक्षक महोदय!श्री शरद जोशी की एक रचना याद आ गई।
" शेर की गुफा में न्याय "
वर्तमान समय में यह सटीक बैठती नज़र आ रही है।
हम लोगों को मानसिक गुलामी की आदत हो गई है! अफ़सोस
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं,
हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुज़र सकता है।
~ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 🌷