“Patna’s Gandhi Maidan —the cradle of Indian politics—from where the JP Movement rose, reshaping the nation & challenging Indira Gandhi’s regime.
A land that once shook power, now waits on margins of power, yearning to write it's own history again.”
#Bihar#politics#History
आज जनहित याचिका पर सुनवाई का दिन था। सरकारी सेवक की हत्या के मामले में अपराधी की रिहाई संबंधी संशोधन पर माननीय पटना उच्च न्यायालय ने केस एडमिट करते हुए सरकार को आदेश दिया कि एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करें। सुनवाई की गंभीरता से सिद्ध हुआ कि बिहार में न्याय है। सत्यमेव जयते।
नीतीश कुमार जब कुतर्क करते हैं तो उनकी आदत है कि वे नर्वस होकर हँसते हैं और उनके अग़ल-बग़ल के लोग साथ देते हैं। मगर स्वर्गीय जी. कृष्णैया साहब की हत्या हँसने वाला मसला नहीं है।
अब कुतर्क का जवाब -
1. कानूनी जवाब - जब सरकारी कर्मचारी और आम आदमी की हत्या में अंतर नहीं है और सभी हत्याएँ बराबर हैं तो फिर जेल मैनुअल की धारा 481 की क्या प्रासंगिकता है? डकैती और तस्करी के दौरान हत्या ज्यादा संगीन कैसे है? तब पूरी धारा को विलोपित कीजिए। महज एक प्रावधान को हटाना tailor-made प्रयास है ताकि एक अपराधी या अपराधियों के समूह को लाभ दिया जा सके।
2. राजनीतिक जवाब - केंद्र के ऐसे अनेक प्रावधान और गाइडलाइन हैं जो राज्यों पर बाध्यकारी नहीं। और आप हर मामले में तो केंद्र और अन्य राज्यों का अनुकरण करते नहीं। उल्टे आप कहते हैं कि हमारे मॉडल की नक़ल केंद्र सरकार करे। जैसे - जातीय जनगणना, शराबबंदी इत्यादि। अच्छा है कि आप कर रहे हैं पर ये तो केंद्र की गाइडलाइन नहीं है। स्पष्ट है कि यहाँ भी आप अपने कुकृत्य को छिपाने के लिए केंद्र व अन्य राज्यों का दस्तावेज ढूँढ कर ला रहे हैं।
3. व्यक्तिगत जवाब - एक आदमी के पीछे पड़े हैं??? क्या लोग महात्मा गाँधी के पीछे पड़े हैं? क्या गाँधीजी सत्याग्रह के बाद जेल से रिहा किए गए हैं? अगरचे इस पूरे कुतर्क के दौरान आपके मुँह से अफ़सोस का एक शब्द तक उस निर्दोष IAS अधिकारी या उनके परिवार के लिए नहीं निकला। और ऊपर से आप और आपके मंत्री-संतरी ठें-ठें कर रहे हैं।
विनाश काले विपरीत बुद्धि! @NitishKumar
“बेरोज़गारी कैसे मिटेगी? कोई शब्द है जिसे लिख के मिटा देना है? जिन्हें खुद ही कोई नौकरी नहीं मिलेगी वो दूसरों को क्या नौकरी देंगे?” - पुष्पम प्रिया चौधरी (सुपौल, 18.09.2020)
वो आवाज़ जिसने 2020 में अकेले अपने दम पर बिहार की जातिवादी राजनीति में नौकरी को मुद्दा बना दिया. नतीजा सभी दलों के 2020 मेनिफेस्टो में नौकरी देने के झूठे वादे आ गए. यह उसी दिन बता दिया गया था कि जिन्हें खुद नौकरी नहीं मिल सकती, वो दूसरों को क्या नौकरी देंगे! पर लोग सुनते नहीं!
ओ मगध! कहाँ मेरे अशोक? वह चन्द्रगुप्त बलधाम कहाँ? पैरों पर ही है पडी हुई मिथिला भिखारिणी सुकुमारी, तू पूछ, कहाँ इसने खोईं अपनी अनन्त निधियां सारी? री कपिलवस्तु! कह, बुद्धदेव के वे मंगल - उपदेश कहाँ? तिब्बत, इरान, जापान, चीन तक गये हुए सन्देश कहाँ? वैशाली के भग्नावशेष से पूछ लिच्छवी-शान कहाँ? ओ री उदास गण्डकी! बता विद्यापति कवि के गान कहाँ?
(दिनकर, पुण्य तिथि 24 अप्रैल 1974)
बिहार के खर्च का 75% धन केंद्र से ही आता है। फिर भी यहाँ की नक्कारी सरकार को हर साल केंद्रीय बजट से कुछ ‘विशेष’ का लालच होता है। राज्य के राजस्व बढ़ाने को 30 साल में क्या किया गया है? केंद्रीय योजनाओं के धन भी हर साल वापस क्यों चले जाते हैं? बिहार में वेतन के भी पैसे क्यों नहीं?