चवन्नी फिर पलट गई।
जयंत चौधरी ने गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की जयंती पर बधाई दी।
लेकिन BJP के ठाकुर नेताओं ने कान खींचे तो
जयंत चौधरी ने पोस्ट डिलीट कर दी।
गुर्जर सम्राट का अपमान करने वाले ऐसे पलटीमार को क्या गुर्जर समाज माफ करेगा।
उत्तर प्रदेश में ठाकुरों का आतंक चरम पर है और यह ठाकुरवादी आतंक ठाकुरवादी मुख्यमंत्री बिष्ट ठाकुर आदित्यनाथ के जातिवादी गुंडाराज को संरक्षण देने के परिणाम स्वरुप उत्पन्न हुआ है, जो कि साढ़े 9 साल से बदस्तूर जारी है
मथुरा के वृंदावन में यमुना घाट पर निषाद समाज के नाविकों पर ठाकुर समाज के मनबढ़ गुंडे दबंग युवाओं ने धारदार हथियार से हमला कर दिया और मार मार कर गंभीर घायल कर दिया, जिनमें से दो लोगों की हालत बेहद गंभीर है
पिछड़े और दलित समाज के ऊपर यह ठाकुरवादी गुंडाराज और अत्याचार भाजपा सरकार के द्वारा स्थापित जातिवादी दबंग आपराधिक साम्राज्य का साक्षात प्रमाण है
सुल्तानपुर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर कुछ वर्चस्वादियों ने जिस तरह जन्माष्टमी के आयोजन में बाधा-अड़चन डालकर पूजा-अर्चना का खंडन किया है वो सिर्फ़ किसी समुदाय की आस्था पर प्रहार ही नहीं पाप भी है और अपराध भी।
इस मामले की उच्च स्तरीय जाँच हो और दोषी प्रभुत्ववादियों को ऐसी सज़ा मिले कि फिर कभी किसी का घमंड सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का दुस्साहस न कर सके।
इन जैसी घटनाओं के पीछे उच्चता की दुर्भावना काम करती हैं और ऐसा करने के पीछे ‘सत्ता सजातीय होने का अहंकार’ मूल कारण होता है।
सब जानते हैं कि धर्म-कर्म में बाधा उत्पन्न करनेवालों को क्या कहते हैं।
घोर निंदनीय!
Hello @grok
क्या भारतीय पुलिस कानूनन किसी व्यक्ति को बीच सड़क पर बांधकर पीट सकती है?
क्या भारतीय न्याय व्यवस्था में सज़ा के तौर पर लाठियाँ मारी जा सकती हैं?
अमित शाह के कानून व्यवस्था पर तिरछी धार से मूत्र विसर्जन करता हुआ गुंडा स्वतंत्रत सिंह 😡😡
पत्रकार— CJP प्रोटेस्ट मे आपके हाथ मे जो डंडा था वो कहां से लेकर आए थे
स्वतंत्रत — (अपना जूता दिखाते हुए)
ये जो जूता आप देख रही हैं, ये दिल्ली पुलिस का जूता है 😳
नेहा— क्या बात कर रहे 😳
स्वतंत्र— हां, हम बिना फार्म भरे दिल्ली पुलिस बनकर चलते है, हमारे पास सब है दिल्ली पुलिस का 😳
दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के हाथ में हैं, गृह मंत्रालय अमित शाह जी के हाथ में है और अमित शाह जी आरएसएस के हाथ में है!
ये मुसलमान है। ये महिला है। ये पत्रकार है। ये Gen-Z है।
जुर्म इतना है कि देशभक्त महिला पत्रकार ने दिल्ली के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री से सवाल पूछ लिया। फिर अमित शाह की दिल्ली पुलिस ने बेरहमी से इस बहन की पिटाई कर दी।
मोदी जी के अमृतकाल वाले कथित न्यू इंडिया में अब मुसलमान होना, महिला होना और निष्पक्ष पत्रकार होना, सबसे बड़ा गुनाह है।
भाजपा ने पूरे देश में सत्ताई निरंकुशता की हर सीमा को लाँघ दिया है। निरंकुश भाजपा सरकारों से अब सवाल पूछना उनकी आलोचना करना ही सबसे बड़ा अपराध है।
दिल्ली हो या बिहार, हर जगह कायर भाजपाई अब पुलिस से पत्रकारों को पिटवा रहे हैं, डरा रहे हैं। भाजपा के शासनकाल में संवैधानिक संस्थाएं और पुलिस लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन का प्रतीक बन गई है।
आरक्षण को अपमानित कर के थक गए हो तो अब जरा काम की बात की जाए.
अब चलो आंकड़ों की बात करते हैं. देश के टॉप प्राइवेट लक्ज़री अस्पताल हैं. जो सरकार की जमीनों पर कुछ शर्तों के साथ बने हैं.
1. Apollo 76+ हॉस्पिटल
2. Medanta 5 हॉस्पिटल
3. Fortis 36 हेल्थकेयर फैसिलिटी
4. Asian Heart केअर हॉस्पिटल
5. Max Super हॉस्पिटल
इन अस्पतालों में डॉक्टरों की नियुक्ति कैसे होती है. इन अस्पतालों में कितने डॉक्टर OBC SC ST समाज से हैं ?
ऐसा क्या कारण है प्राइवेट अस्पतालों में बहुजन समाज के डॉक्टर नजर नही आते ?
इस सभी अस्पतालों को डाइवर्सिटी रिपोर्ट जारी करनी चाहिए. मैरिट के मिथ के नाम पर जातीय घोटाला करने की छूट नही दे सकते.
यूपी पुलिस ने नई टेक्नोलॉजी के जरिए ट्रैफिक नियमों का पालन न करने वालो पर कार्यवाही हेतु एक नुकीला यंत्र तैयार किया है -
ये मोटा सा नुकीला यंत्र पुलिस कर्मी अपनी मनमर्जी अनुसार जितनी बार चाहे उतनी बार बाइक के टायर पर मारकर उसे छलनी कर सकता है..!
मथुरा की वृंदावन पुलिस इसका परीक्षण
कर रही है -
आप वीडियो में देख सकते हैं -👇👇
मेलोनी पर संदीप दीक्षित और राहुल गांधी की टिप्पणियों को लेकर ट्वीट्स की संख्या
अमन चोपड़ा:- 04
अमिश देवगन:- 02
रुबिका लियाकत:- 02
चित्रा त्रिपाठी:- 02
सुशांत सिन्हा:- 03
सुधीर चौधरी:- 02
मल्लिकार्जुन खड़गे के भाषण के बाद हल्द्वानी में हुए सुंदरीकरण पर ट्वीट्स की संख्या
अमन चोपड़ा:-00
अमिश देवगन:- 00
रुबिका लियाकत:- 00
चित्रा त्रिपाठी:- 00
सुशांत सिन्हा:- 00
फिर जब कोई इन्हें “गोदी मीडिया” कह देता है, तो इन्हें गुस्सा आ जाता है😭😭
"मोदी और मेलोनी का अपमान सही है?"
जवाब- जो बोओगे वही तो काटोगे, लम्पट दुबे इंदिरा जी और कास्त्रो के गले मिलने वाले फोटो को 'कामाग्नि' कहता है। ये दुबे घर की बहनों से ऐसे पेश आता है?
इसी दुबे ने तेजस्वी जी को औरंगजेब बोला, पलट के हमने तो नहीं कहा कि "दुबे तुम बाबर और मुगल पुत्र तो नहीं हो?"
हमारे बिहार की महिलाओं का रेट लगाने वाले लम्पट भाजपाई नेताओं को ट्यूशन कौन देता है?
मोदी जी ने 50 करोड़ की रेट लगाई वही से सबने सीखा, अब गाली बोया है तो गाली काटना भी तो होगा।
अहमदाबाद में प्लेग फैला।
मजदूर शहर छोड़कर भागने लगे। फैक्ट्रियां बन्द होने का खतरा था। सेठो ने दांव खेला- मजदूरी दोगुनी कर दी।
जो केवल पेट और तन भर का कमाते थे, उन्हें उम्मीद दिखी। रुक गए, जान पर खेलकर। चिमनियों से धुंआ नही रुका। प्लेग के बावजूद अहमदाबाद की मिलें चलती रही।
और जब प्लेग खत्म हो गया,
मजदूरी वापस घटा दी गई।
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मजदूरों ने विरोध किया। गांधी से सहायता मांगी। गांधी ने मलिकों बात की। वे नही माने, तो मजदूरों के साथ बैठकर उन्होंने हड़ताल का आव्हान किया।
मिलें रुक गयी।
अब सेठों ने फिर दांव खेला।
जो मजदूर, हड़ताल में शामिल थे, उन्हें नौकरी से निकालने लगे। मजदूर डर गए। हड़ताल से खिसक कर वापस काम पर लौटने लगे। अब गांधी ने वो किया..
जो अनोखा था।
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अनशन पर बैठ गए। सेठों के खिलाफ नही, अपने ही उन समर्थकों के खिलाफ, जो मिलो में जाकर वापस काम करने लगे थे। अब मजदूरों को शर्म आयी।
एक एक कर सारे लौट आये।
गांधी ने अनशन तोड़ा।
अहमदाबाद की मिलो की वो हड़ताल, ऐतिहासिक थी। चंपारण में किसानों की लड़ाई लड़ने के बाद, गांधी का यह दूसरा समर था- मजदूरों के लिए।
अपने ही देशवासी सेठों से लड़ गए। धनपतियों को झुकना पड़ा। मजदूरी की नई दरें तय हुई।
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नेहा का यह उदास मुखमण्डल देखकर बुरा लगा।
जिनके संघर्ष के शामिल होने गयी, उन्ही में से किसी ने मुंह पर स्याही फेंक दी। कारण पूछने पर वामपन्थी, देशद्रोही, उमर खालिद समर्थक होने के इल्जाम धर दिये।
लेकिन आंदोलन, एक्टिविज्म, न्याय की लड़ाई में ऐसा अक्सर होता है। कि जिसके लिए आप लड़ते हैं, वही कम्प्रोमाइज्ड हो जाता है।
कारण भय, भ्रम, या लोभ- कुछ भी हो, मगर यह लड़ने वाले के बिलीफ सिस्टम को तोड़ता है।
उदास करता है।
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कभी गांधी ने इसका स्वाद चखा, आज नेहा ने चखा है। लेकिन इस युवा लड़की ने जब संघर्ष, औऱ नेतृत्व की राह, राह चुनी है, तो उसे ऐसे बिट्रियल का से निराश नही होना चाहिए।
कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचनम!! 1918 में अहमदाबाद के गांधी की तरह, अपने भीतर की रोशनी पर, अपने उद्देश्य की पवित्रता पर यकीन रखकर वह आगे बढ़ती रहे। यही संदेश है।
और शुभकामनाएं हैं।