Could our media restrain itself from being used by those who intend to sharpen their image in public because displaying same news every day every time equalises terrorising their viewers and media shd keep time schedule of news without eclipsing by ads #SupremeCourtOfIndia
@NeelamWrites पेड़ से टूटे पत्ते
टूट ही गए
कोई यहाँ गिरा तो
कोई वहाँ मगर
क्या हुआ उसका
उसे क्या पता
सब माया है
तब तक जब तक
चलती हैं साँस
बाक़ी तो सिर्फ़
रहती हैं बातें।
अशोक कुमार गोयल
ट्रंप द्वारा तीसरी दुनिया के लोगों जैसे कमेंट करने से उनकी अमानवीय मानसिकता को उजागर करता है। ये पहली दूसरी दुनिया के लोग हम एशियाई लोगों को जानवरों से बदतर समझते हैं। परंतु इनका सारा वैभव हमसे ही है क्योंकि हम क्रय की ताक़त रखते हैं।
@ChhotiKavita सिलसिला जो चला
कुर्बानियों का गुलशन में
हर गुल कह उठा
मैं भी और मैं भी
लगता था जैसे
कायनात पूरी आमादा
हो सिर्फ़ क़ुर्बानी देने पे
मगर ये क्या हुआ कि
जब रुख़सत हुए हम
अपनों के बीच से तो
कोई तैयार न था
साथ चलने को हमारे।
अशोक कुमार गोयल
@tweetsahitya सिलसिला जो चला
कुर्बानियों का गुलशन में
हर गुल कह उठा
मैं भी और मैं भी
लगता था जैसे
कायनात पूरी आमादा
हो सिर्फ़ क़ुर्बानी देने पे
मगर ये क्या हुआ कि
जब रुख़सत हुए हम
अपनों के बीच से तो
कोई तैयार न था
साथ चलने को हमारे।
अशोक कुमार गोयल
@_BazamESukhan सिलसिला जो चला
कुर्बानियों का गुलशन में
हर गुल कह उठा
मैं भी ��र मैं भी
लगता था जैसे
कायनात पूरी आमादा
हो सिर्फ़ क़ुर्बानी देने पे
मगर ये क्या हुआ कि
जब रुख़सत हुए हम
अपनों के बीच से तो
कोई तैयार न था
साथ चलने को हमारे।
अशोक कुमार गोयल
@umda_panktiyaan सिलसिला जो चला
कुर्बानियों का गुलशन में
हर गुल कह उठा
मैं भी और मैं भी
लगता था जैसे
कायनात पूरी आमादा
हो सिर्फ़ क़ुर्बानी देने पे
मगर ये क्या हुआ कि
जब रुख़सत हुए हम
अपनों के बीच से तो
कोई तैयार न था
साथ चलने को हमारे।
अशोक कुमार गोयल
@thepoetichouse सिलसिला जो चला
कुर्बानियों का गुलशन में
हर गुल कह उठा
मैं भी और मैं भी
लगता था जैसे
कायनात पूरी आमादा
हो सिर्फ़ क़ुर्बानी देने पे
मगर ये क्या हुआ कि
जब रुख़सत हुए हम
अपनों के बीच से तो
कोई तैयार न था
साथ चलने को हमारे।
अशोक कुमार गोयल
@Pihu420 सिलसिला जो चला
कुर्बानियों का गुलशन में
हर गुल कह उठा
मैं भी और मैं भी
लगता था जैसे
कायनात पूरी आमादा
हो सिर्फ़ क़ुर्बानी देने पे
मगर ये क्या हुआ कि
जब रुख़सत हुए हम
अपनों के बीच से तो
कोई तैयार न था
साथ चलने को हमारे।
अशोक कुमार गोयल