हमारी कौन सी माँग अनुचित है: (24/02 का पोस्ट)
पिछले 50 दिनों में जो घटा है, घट रहा है और जो घटता रहेगा, उसे यदि भाजपा के नेतृत्व और कर्ता-धर्ता थोड़ा भी ठीक करना चाहते हैं तो मैं इनके विचार हेतु, पहले भी दिए कुछ सुझाव वापस रख रहा हूँ:
१. धर्मेंद्र प्रधान बिना किसी स्पष्टीकरण के हटाए जाएँ।
२. यूजीसी वाली संसदीय कमिटी में जो भी सदस्य भाजपा के थे, उनमें से जो भी वामपंथियों के साथ कॉम्प्रोमाइज्ड हैं, उन्हें निकाला जाए।
३. अतिमहत्वपूर्ण: सामान्य वर्ग के निर्धन छात्र-छात्राओं को अनुसूचित जाति के स्तर की निःशुल्क/सब्सिडी की सुविधा- निःशुल्क कोचिंग, परीक्षा के फॉर्म, हॉस्टल की फीस, कोर्स की फीस आदि SC के समकक्ष। ऐसा करने से किसी को कोई समस्या नहीं होगी।
४. UGC-AICTE को समाप्त करने वाले बिल को बजट सत्र में ही ला कर यह कहें कि पूर्व के जो भी नियम हैं, उन्हें वर्तमान परिस्थितियों के आलोक में समीक्षा के उपरांत ही लागू किया जाएगा एवम् समाज के हर वर्ग का उचित ध्यान रखा जाएगा। कैम्पस को पुलिस थाना नहीं बनने देंगे।
५. हर नेता की भाषा में ‘दलित-वंचित-पीड़ित’ जैसी शब्दावली का लोप और ‘हर वर्ग के लिए समर्पित’ जैसे वाक्यांशों का प्रयोग। टोन में परिवर्तन करें।
६. अम्बेडकर को बाप मानना बंद करें। जितना कर दिए, वही जितनी घृणा उत्पन्न कर रहा है, वह आपसे हैंडल नहीं हो सकेगा।
७. वैसी कोई योजना न बनाएँ जिसमें SC/ST/OBC का तुष्टिकरण स्पष्ट दिखे। जिन चीजों को माँगा न जाए, वो दे कर पागल न करें।
८. कैम्पस और सोशल मीडिया में ब्राह्मण-घृणा फैलाने वाले लोगों पर पुलिसिया कार्रवाई, हैंडलों पर भारत में प्रतिबंध। इस बात की स्वीकार्यता हो कि ऐसी कोई बात हो रही है देश में जो नारेबाजी से आरंभ हो कर अब एक ब्राह्मण छात्र को बाथरूम में बंद कर, अग्निशामक से शुष्क कार्बन डाई ऑक्साइड चला कर मारने तक पहुँच चुका है। विक्टिम कार्ड नहीं, उचित कार्रवाई का आश्वासन और एक्शन।
९. हर राज्य में कुकुरमुत्ते की तरह पास होते सामान्य वर्ग के हिन्दुओं को अपराधी बनाने वाले कानून (BC एट्रोसिटी एक्ट) पर आपकी पार्टी के वकील उसका प्रतिकार कोर्ट में करें। या, आप उसे सर्वसमावेशी बनाने पर बल दें कि जातिवादी घृणा का शिकार किसी भी जाति का व्यक्ति हो सकता है।
१०. जो भी ऐसा कानून आए, चाहे वह राज्यों में हो या अंततः कॉलेज परिसरों के लिए, शिकायतों के झूठा पाए जाने पर उचित जेल और ₹१० लाख का आर्थिक दंड प्रस्तावित हो।
११. कोर्ट यदि ऐसे मामलों में कोई निर्णय दे, तो उसे पलट कर राजीव गाँधी न बनें, मोदी भी न बनें।
लिखते हुए शर्म न आई मिश्रा जी....
सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में कांग्रेस द्वारा लाए गए UGC सही करने के कहा तो आपके महामानव ने 2026 में ऐसा सही किया कि सुप्रीम कोर्ट ही बोला इससे तो 2012 यानी कांग्रेस द्वारा लाया गया यूजीसी ही बेहतर है। तो कृपया महामानव के महिमामंडन में ऐसे घृणित
जो भी लोग ट्रेन से सफर करते हैं, उन्होंने यह नजारा जरूर देखा होगा -->
स्टेशन पर कुछ लोग बाल्टी या टोकरी में भुजिया , मिक्सचर, चना, मूँगफली , नींबू, खीरा, समोसे , ब्रेड-ऑमलेट लेकर सीधे बोगियों में घुस जाते हैं।
🚨 सवाल यह है —>
कौन देता है इन्हें अनुमति?
ना इनके पास टिकट, ना लाइसेंस, ना हाइजीन सर्टिफिकेट।
फिर भी ये रोज़ाना ट्रेन में घुसते हैं, सामान बेचते हैं, और ट्रेन स्लो होते ही कूदकर उतर जाते हैं , ये सब रेलवे अधिकारियों की आंखों के सामने होता है।
⚠️ खतरे :
इन चीज़ों की क्वालिटी पर कोई नियंत्रण नहीं कोई यात्री बीमार पड़े या मर जाए, जिम्मेदार कौन?
फूड पॉइज़निंग, संक्रमण और स्वास्थ्य जोखिम का सीधा खतरा।
ऐसे लोग सुरक्षा जोखिम भी हैं —> कोई चोरी, झगड़ा या दुर्घटना हो जाए, इनकी पहचान तक दर्ज नहीं होती।
भ्रष्टाचार का शक :
ऐसा लगता है कि यह सब रेल अधिकारियों की मिलीभगत से चलता है।
रोज़ाना इन लोगों को ट्रेन में घुसने देने के लिए रोज़ का पैसा वसूला जाता है — यानी यात्रियों की जान और सुरक्षा “रोज़ की कमाई” में बेची जा रही है।
✊ अब वक्त है जवाब मांगने का :>
हर ट्रेन में सिर्फ अधिकृत वेंडरों को ही अनुमति दी जाए।
वेंडरों की ID और यूनिफॉर्म अनिवार्य की जाए।
बिना टिकट-बिना परमिट घुसने वालों पर तुरंत कार्रवाई हो।
यात्रियों को जागरूक किया जाए कि वे अवैध विक्रेताओं से सामान न खरीदें।
और सबसे जरूरी — रेलवे को जवाब देना होगा कि ये लोग रोज कैसे घुसते हैं और किसकी जेब में जाता है यह पैसा।
👉 यह सिर्फ सफाई या खानपान का मुद्दा नहीं यह सुरक्षा, ईमानदारी और यात्रियों की जान का सवाल है।
जब आप थर्ड AC का टिकट बुक करते हैं और चार्ट बनने के बाद आपको RAC टिकट मिलता है तो आप उम्मीद करते हैं कि जैसे ही सीट खाली होगी , रेलवे आपको पूरी सीट देगा। लेकिन हक़ीकत कुछ और है।
कई यात्रियों ने लिखा है कि TT साहब सीट खाली होते ही RAC वालों को देने की बजाय, बिना टिकट यात्रियों को पैसे लेकर सीट दे देते हैं। यह खुली रिश्वतखोरी है और रेलवे की साख पर सीधा दाग।
सोचिए —>>
आप फुल किराया देकर यात्रा कर रहे हैं, फिर भी आधा सोना, आधा बैठना पड़ता है।
TT कहता है सीट नहीं है, जबकि असल में वो सीट किसी कैश वाले बिना टिकट यात्री को दे चुका होता है।
यात्री को ये तक नहीं पता चलता कि कौन-सी सीट खाली हुई, क्योंकि कोई पारदर्शी सिस्टम नहीं है।
अब सवाल है —>>
क्या TT की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि जो यात्री पूरा किराया दे चुका है, उसे प्राथमिकता दी जाए?
रेलवे की प्रतिष्ठा जनता के भरोसे पर टिकी है, न कि TT के “कलेक्शन” पर।
इस पूरे खेल को खत्म करने के लिए ज़रूरी कदम —>>
1. लाइव सीट अपडेट सिस्टम — हर कोच की खाली सीटें रेलवे ऐप पर रीयल-टाइम दिखें।
2. CCTV निगरानी — TT की हर सीट अलॉटमेंट कैमरे में रिकॉर्ड हो।
3. डिजिटल लॉग — हर सीट असाइनमेंट का डेटा पब्लिक रिकॉर्ड में जाए, ताकि गड़बड़ी पकड़ी जा सके।
4. यात्री शिकायत पोर्टल पर फास्ट-ट्रैक एक्शन रिश्वत साबित होते ही तत्काल सस्पेंशन और जुर्माना।
5. जनता को जागरूकता —>> यात्रियों को सिखाएं कि वे सीट की स्थिति कैसे चेक कर सकते हैं (NTES या IRCTC पर “Chart Vacancy” फीचर)।
अब टीम खुरपेंच ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है।
अगर किसी TT की ऐसी हरकत का सबूत मिला
तो उसे समझ में आ जाएगा कि “सीट बेचने” की कमाई कितनी महंगी पड़ सकती है।
रेलवे, सुन लो — जनता को एडजस्ट नहीं, इंसाफ चाहिए।
रेलवे का सबसे बड़ा घोटाला अब ऑनलाइन रिमोट लोकेशन बुकिंग।
लाखों लोगों की कन्फर्म/वेटिंग/पूल्ड-कोटा टिकटें रोज़ाना कैंसल हो जाती हैं, पर सुविधा शुल्क वापस नहीं मिलता। ये सफेद लूट बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
यह वक्त है सार्वजनिक हित की आवाज़ तेज़ उठाने का IRCTC एवं सम्बंधित अधिकारियों से माँगें :>
नो टिकट = नो सुविधा शुल्क — अगर टिकट जारी नहीं हुई तो शुल्क तुरंत लौटाना अनिवार्य हो।
रिमोट-लोकेशन और एजेंट कोटे की पारदर्शिता सार्वजनिक हो कौन-कितनी टिकटें किस कोटे में जा रही हैं, यह खुलकर दिखाया जाए।
रद्द/कैंसल टिकटों के लिए ऑटो-रिफंड सिस्टम लागू हो मनमानी देरी बंद हो।
टिकट देने का झूठा वादा करने वाले ऐप्स/एजेंट्स पर सख्त कार्रवाई और भारी जुर्माना।
यात्रियों के हक़ की रक्षा के लिए स्वतंत्र निगरानी और शिकायत निवारण तंत्र शीघ्र लागू किया जाए।
ये केवल पैसों का सवाल नहीं, यह ईमानदारी, न्याय और जनहित का सवाल है।
जब आप टिकट नहीं दे सकते, तो लूटने का कोई अधिकार नहीं। सरकार और रेलवे प्रबंधन को तुरंत कदम उठाने चाहिए। वरना यह व्यवस्था जनता के विश्वास का कत्ल कर रही है।
हम यात्रियों के साथ हैं , पारदर्शिता, रिफंड और जवाबदेही अब अनिवार्य हैं।
प्रिय @ajeetbharti जी सवर्णों के लिये उठी हुई आपकी आवाज को बड़े ही सुनियोजित ढंग से बंद करा दिया गया। अब आप भी स्वाद लीजिए अपनी जुबान पर जमे हुए इस अहसान के दही का।
खैर हम प्रतीक्षा करेंगे सवर्णों के लिए आपके मुखर होते स्वरों की🙏🙏🙏
सवर्णों @BJP4India का विरोध करते रहिए। 2019 में SC/ST act के नाम पर हुए बवाल में आपकी आहुति देने के बाद EWS का झुनझुना दिया गया था । फिर किसी झुनझुने की तैयारी चल ही रही होगी । आप फिर चुप हो जाना अपनी अगली पीढ़ी को सामाजिक न्याय (अन्याय) के नाम पर बलिदान करने के लिए और अपनी
आज चौथा दिन है। न तो मोहन यादव ने, ना @BJP4MP ने, न मुख्यमंत्री कार्यालय ने यह स्पष्टीकरण दिया है कि:
१. क्या हिन्दूविरोधी DMK के सांसद (एवम् वकील) को 90% हिन्दुओं वाले राज्य, मध्यप्रदेश, का ₹5.5 लाख/पेशी मिलता रहेगा?
२. क्या 22/09/25 वाला वायरल शासकीय पत्र फेक है?
३. क्या कॉन्ग्रेस कालीन महाजन कमिटी की रिपोर्ट को सरकार अमान्य घोषित करेगी?
४. क्या मोहन यादव आनुपातिक आरक्षण के राजनैतिक अजेंडे के लिए, रिपोर्ट में प्रस्तुत ‘हत्यारा जातिवादी राम’ के तर्क को मौन स्वीकृति देंगे ताकि ओबीसी पर ‘ऐतिहासिक अत्याचार’ का संदर्भ बना रहे?
५. क्या मोहन यादव जानते हैं कि उनके कथनों से @BJP4Bihar में पैनिक की स्थिति बनी हुई है और सोशल मीडिया में कैम्पेन में ठहराव की स्थिति बन गई है?
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बिहार संबद्ध स्पेस/पोस्ट में लोग आरक्षण और ‘भाजपा रामद्रोही’ के नाम पर चर्चा कर रहे हैं। इन्हें पता नहीं है कि इस कारण बिहार चुनाव पर प्रभाव पड़ेगा?
डिजिटल चर्चा में न होने से धरातली प्रभाव शून्य नहीं हो जाता। भाजपा को यह लौट कर काटेगा। धमकी नहीं है क्योंकि सवर्णों की संख्या ही कितनी है! क्या उखाड़ लेंगे!
तो मोहन यादव की चिंता 73% आरक्षण नहीं, 'रामद्रोही' का टैग है! इन्हें मैनेज करने वाली एजेंसी का कहना है कि भाई आरक्षण पर गाली सुन लेंगे, वो फैलने दो पर ये #RamDrohiMohanYadav ट्रेंड करवाना बंद करो।
तो भाजपा की चिंता 'छवि प्रबंधन' में हो रही क्षति है! इसीलिए 'महाकाल के भक्त हैं' वाले पोस्ट कल खूब चलाए गए?
आज तो भगवा पहन कर राम भगवान द्वारा रावण की विजय पर वीडियो भी आया है। मोहन जी को उसी वीडियो में यह कह देना चाहिए था कि 'महाजन रिपोर्ट' कोरी बकवास है और हम उसे सुप्रीम कोर्ट वाले केस से हटवा रहे हैं।
लेकिन, वो अच्छे से जानते हैं कि जिनके थनों में तेल लगा कर पन्हाया जा रहा है, उन्हें शंबूक वध और एकलव्य वाली हरी घास बहुत पसंद है। यही अंतर्द्वंद्व चल रहा है इनका।
भई गति साँप छछूँदर जैसी!
मोहन यादव समर्थित आरक्षण के कुछ मूल बिंदु:
१. OBC आरक्षण को 27% बता कर यह जताया जा रहा है कि हर जगह तो 27% है ही, तो इसमें समस्या क्या है? जबकि वो यह नहीं बता रहे कि आपके यहाँ ST आरक्षण 20% है।
२. पूरे प्रकरण में 73% आरक्षण का आँकड़ा गौण है। इस पर बात नहीं हो रही।
३. OBC में मुसलमानों की 38 जातियाँ सम्मिलित हैं या नहीं? इस पर मुख्यमंत्री कार्यालय को बताना चाहिए कि प्रदेश में मुसलमानों की जनसंख्या कितनी है और आरक्षण कितना?
४. बचे हुए 27% अनारक्षित सीटों में, कथित तौर पर, 9% महिलाओं के लिए आरक्षित है।
५. जिस एफिडेविट को ले कर आपने फैक्टचेक के नाम पर झूठ बोला, पेड ट्रोलिंग करवाई, उसका क्या राज्य सरकार अमान्य घोषित करेगी?
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मुझे ऐसा लग रहा है कि बिहार चुनाव में @BJP4India का कोई रैंडम नेता, जो किसी पिछड़ी जाति का होगा, वो किसी रैली में बोल देगा कि ‘मध्यप्रदेश में भाजपा ने ओबीसी को उसका अधिकार दिया, अब बिहार में भी देंगे’।
ऐसी बातें स्पष्ट नहीं बोली जाएँगी, लेकिन कोई बोल देगा तो सब चुप हो जाएँगे। मध्यप्रदेश में जो हो रहा है बिना @narendramodi की अनुमति के नहीं हो रहा।
अगर जनरल केटेगरी को नौकरियों से बाहर करना है, उनको कॉलेजों से बाहर करना है,
तो टैक्स भी उन्हीं से लो जिनको कॉलेज की सीट और नौकरी दे रहे हो!
जनरल वाले सिर्फ टैक्स देने के लिए और हिंदू एकता का झंडा उठाने के लिए नहीं बने!
सुनिए @ajeetbharti की दो टूक बात👇