यह पक्षी इस्कॉन मंदिर वृंदावन में रोजाना खिचड़ी परसाद खाने आता रहता है और वहां ब्रह्मचारी भक्तों से हरे कृष्णा बोलता है। देखा जाए पक्षी की यह जाति इंसान की तरह नहीं बोलती हा कुछ तोता बोल लेते है। पर यह पक्षी बोल रहा है।।देखे ध्यान से और जपें हरे कृष्णा हरे राम
जिस दिन इंसान को “मैं शरीर नहीं हूँ” यह अनुभव हो जाता है, उसी दिन उसका डर टूटना शुरू हो जाता है
पूरी दुनिया एक ही चीज़ को बचाने में लगी हुई है — अपनी बनाई हुई पहचान को।
कोई शरीर को सजाने में लगा है।
कोई नाम कमाने में।
कोई धन इकट्ठा करने में।
कोई लोगों से सम्मान लेने में।
लेकिन उपनिषद एक बहुत खतरनाक प्रश्न पूछते हैं:
“अगर यह सब तुमसे छिन जाए… तब तुम कौन हो?”
यहीं से वास्तविक अध्यात्म शुरू होता है।
गहराई से समझो — उपनिषदों की पूरी साधना इंसान को उसकी झूठी पहचान से बाहर निकालने के लिए है।
आज इंसान जो भी दुख झेल रहा है, उसका मूल कारण यही है कि उसने अस्थायी चीजों को “मैं” मान लिया है।
शरीर बूढ़ा होगा — दुख।
लोग सम्मान न दें — दुख।
धन चला जाए — दुख।
संबंध टूट जाए — दुख।
क्यों?
क्योंकि इंसान भीतर से इन सबमें अपनी पहचान बना चुका है।
कठोपनिषद में यमराज नचिकेता से कहते हैं:
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।”
— कठोपनिषद
अर्थ: आत्मा केवल वाद-विवाद, बुद्धि या अधिक सुन लेने से प्राप्त नहीं होती।
ऋषि कहते हैं कि आत्मा को केवल पढ़ा नहीं जा सकता, उसे अनुभव करना पड़ता है।
सीधी बात यह है कि जब तक इंसान केवल शरीर और मन में जीता रहेगा, तब तक भय उसका पीछा नहीं छोड़ेगा।
क्योंकि शरीर नश्वर है।
मन बदलता रहता है।
भावनाएँ स्थायी नहीं हैं।
और जो चीज बदलती है, उसे पकड़कर रखने वाला हमेशा डर में रहेगा।
यही कारण है कि आज पूरी दुनिया भीतर से डरी हुई है।
• कोई भविष्य से डर रहा है
• कोई अकेलेपन से
• कोई असफलता से
• कोई मृत्यु से
• कोई rejection से
लेकिन उपनिषद कहते हैं कि इन सब डरों की जड़ एक ही है — आत्मा को भूल जाना।
गहराई से समझो — जो स्वयं को शरीर मानता है, वही सबसे अधिक डरता है।
पुराने ऋषि जंगलों में केवल शांति के लिए नहीं जाते थे। वे अपनी चेतना को शरीर और मन से परे अनुभव करना चाहते थे। वे घंटों ध्यान में बैठते थे ताकि भीतर उस साक्षी को पहचान सकें जो हर अनुभव को देख रही है।
जब साधक पहली बार उस चेतना की झलक पाता है, तब उसका दृष्टिकोण बदलने लगता है।
धीरे-धीरे उसे समझ आने लगता है:
“विचार बदल रहे हैं… लेकिन देखने वाला नहीं बदल रहा।”
“शरीर बदल रहा है… लेकिन भीतर कुछ स्थिर है।”
“भावनाएँ आ-जा रही हैं… लेकिन साक्षी शांत है।”
यही आत्मा की दिशा है।
आज का मनुष्य बाहर इतना उलझ चुका है कि उसे अपने भीतर उतरने का समय ही नहीं मिलता। पूरा दिन भागदौड़, इच्छाएँ, comparison और distraction में निकल जाता है।
इसीलिए उपनिषद बार-बार कहते हैं:
“रुको… और खुद को देखो।”
क्योंकि जिसने खुद को नहीं जाना, उसने जीवन को केवल सतह पर जिया।
गहराई से समझो — अध्यात्म भागना नहीं है। अध्यात्म सबसे बड़ी वास्तविकता का सामना करना है।
ऋषियों ने कभी नहीं कहा कि संसार छोड़ दो। उन्होंने कहा:
संसार में रहो, लेकिन उसमें खो मत जाओ।
धन रखो, लेकिन धन में अपनी आत्मा मत खोजो।
संबंध रखो, लेकिन उनमें पूरी पहचान मत बना लो।
शरीर का ध्यान रखो, लेकिन खुद को केवल शरीर मत समझो।
यही जागरूकता धीरे-धीरे मुक्ति बनती है।
एक छोटा अभ्यास करो:
आज कुछ मिनट अकेले बैठो और खुद से पूछो:
• अगर मेरा नाम बदल जाए, तो क्या मैं बदल जाऊँगा?
• अगर शरीर बूढ़ा हो जाए, तो क्या “मैं” समाप्त हो जाऊँगा?
• क्या मैंने कभी भीतर उस शांत देखने वाले को महसूस किया है?
इन प्रश्नों को केवल सोचो मत… भीतर उतरने दो।
धीरे-धीरे तुम्हें समझ आने लगेगा कि जीवन केवल शरीर और विचारों तक सीमित नहीं है।
उपनिषद कहते हैं कि जिस दिन इंसान अपने वास्तविक स्वरूप की एक झलक भी पा लेता है, उसी दिन उसका जीवन बदलना शुरू हो जाता है।
क्योंकि अब वह बाहर की बदलती चीजों में पूरी तरह नहीं खोता।
अंतिम सत्य:
जो स्वयं को आत्मा के रूप में जान लेता है, दुनिया उसका शरीर तो छीन सकती है… लेकिन उसकी शांति नहीं।
ॐ क्या है? – नाम नहीं, नाद है**
`ॐ` को ‘प्रणव’, ‘ओंकार’, ‘उद्गीथ’, ‘तारक मंत्र’ कहते हैं। ये कोई शब्द नहीं, ‘ध्वनि’ है – ब्रह्मांड की पहली ध्वनि।
वेद कहते हैं – "सृष्टि से पहले कुछ नहीं था, सिर्फ़ अंधकार। फिर एक कंपन हुआ – ॐ। उसी कंपन से आकाश बना, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी।"
**विज्ञान भी मानता है:** बिग-बैंग के समय जो ‘कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड’ ध्वनि रिकॉर्ड हुई, उसकी फ्रीक्वेंसी 7.83 Hz है – यही पृथ्वी की ‘शुमान रेजोनेंस’ है। और आश्चर्य – ॐ का उच्चारण करने पर हमारी जीभ-तालु से यही 7.83 Hz निकलती है।
इसलिए ॐ को ‘अनाहत नाद’ कहते हैं – जो बिना दो चीज़ों के टकराए पैदा होता है। ये दिल की धड़कन है ब्रह्मांड की।
मैं ध्यान हूँ, मौन हूँ, एकांत हूँ, होश हूँ
में मगन खोया सा,जागरूकता अतंर आकाश हूँ ,
शांति, तृप्ति, आनंद, प्रेम में ही हर प्यास हूँ,
में निरस, निर्गुण, रंगहीन, निर्दोष, निर्विकार, निर्विचार अवस्था हूँ... शाश्वत, खालिपन और मुक्ति हूँ 🥰...
मुझे नहीं पता में कौन हूँ क्या हूँ क्यों हूँ, में सबका ज्ञाता हूँ, होकर भी नही हूँ , नहीं होकर भी हूँ 😅
जब हम सहस्रार चक्र में पहुंचते हैं तो समय शून्य हो जाता है।
हमारे सहस्रार चक्र में एक स्थान है शून्य चक्र,
जब हम कुण्डलिनी साधना के दौरान सहस्त्रार चक्र के नजदीक पहुंचने लगते हैं तो हमारे विचारों में लगने वाला सामान्य समय अचानक कम होने लगता है। जैसे-जैसे हम उस केंद्र के पास जाने लगते हैं तो हमारे विचारों का प्रवाह बहुत तेज होने लगता हैं। एक सेकंड में एक मिनट के विचार निकलने लगते हैं। शून्य समय में विचार बहुत तेज चलने लगते हैं या फिर अनंत हो जाते हैं।
कुंडलिनी साधना में बहुत ही गहरी साधना है। शून्य चक्र या बिंदु का ज़िक्र परंपरागत सात चक्रों में सीधे नहीं मिलता, पर योगतंत्र में सहस्रार के भीतर "निर्वाण चक्र", "महाशून्य" या "ब्रह्मरंध्र" के आसपास एक सूक्ष्म केंद्र होता है। जो समय, मन और अहंकार के पार की अवस्था है।
कुंडलिनी साधना के दौरान जैसे-जैसे चेतना सहस्रार/शून्य की ओर उठती है, मन की सामान्य गति टूट जाती है। एक सेकंड में एक मिनट के विचार वाला अनुभव "काल-संकोच" जैसा है। समय सापेक्ष लगने लगता है। ये ध्यान की गहरी अवस्थाओं में आम है।
साधना के दौरान अगर घबराहट होती है और अगर साधना रुकती है तो कुंडलिनी का रुकना शरीर-मन का सुरक्षा तंत्र है। जब ऊर्जा और चेतना सामान्य क्षमता से तेज़ बहने लगती है, तो नाड़ी तंत्र घबरा जाता है। घबराहट, धड़कन, पसीना - ये संकेत हैं कि सिस्टम ओवरलोड हो रहा था। कुंडलिनी का रुक जाना खुद को बचाने का तरीका है।
"शून्य" का अर्थ है विचारों का तेज़ होना नहीं, विचारों का मिट जाना।
जैसे नदी समुंदर में मिलकर नदी नहीं रहती। गति इतनी बढ़ जाती है कि वो रेखा से हटकर बिंदु बन जाती है। फिर बिंदु भी मिट जाता है। इसे "निर्विकल्प समाधि" कहते हैं। वहाँ विचार नहीं, सिर्फ बोध रहता है। एक सेकंड में अनंत विचार नहीं, विचार-शून्यता होती। काल का अनुभव ही खत्म हो जाता।
कुंडलिनी साधना के दौरान अगर घबराहट के बावजूद टिके रहते, तो अहंकार गल जाता है। "मैं" का भाव छूट जाता और गहरी शांति एवं एकत्व का बोध हो जाता है।
अगर कुंडलिनी साधना के दौरान घबराहट को शरीर सह न पाए तो कुंडलिनी मूलाधार में वापस गिर जाती है। कई बार साधक को महीनों असंतुलन का सामना करना पड़ता है।
कुंडलिनी साधना के दौरान अगर सब कुछ ठीक रहा तो सहज उत्थान होता है और साधक में ऊर्जा सहस्रार को पार कर पूरे शरीर में फैल जाती, "सहजावस्था" आती है।
शून्य केंद्र पर जबरदस्ती पहुँचना खतरनाक हो सकता है। बिना गुरु, बिना नाड़ी-शुद्धि, बिना प्राणायाम की तैयारी के ये अनुभव साइकॉसिस जैसा लग सकता है। घबराहट आई, इसका मतलब शरीर ने कह दिया "अभी नहीं"। ये गलत नहीं, सही सिग्नल है।
मूलाधार, स्वाधिष्ठान पर ज्यादा काम करो। दौड़ना, नंगे पैर मिट्टी पर चलना, भारी भोजन।
कुंडलिनी जागरण साधना अकेले करना जोखिम भरा है। किसी अनुभवी गुरु के सानिध्य में कीजिए जो ऊर्जा को समझता हो।
साधना के दौरान घबराहट आई तो रुक जाना ही समझदारी थी। सिद्धियों के पीछे मत भागो। तैयारी पहले, अनुभव बाद में।
इस अवस्था को पतंजलि "असम्प्रज्ञात समाधि" कहते हैं - जहाँ द्रष्टा, दृश्य और दर्शन एक हो जाते हैं। वहाँ समय नहीं बचता, इसलिए विचार तेज़ या धीमे का सवाल ही नहीं रहता।
क्या तुम्हारे गुरु हैं जो इस मार्ग पर तुम्हें गाइड कर रहे हैं........?
आज बस इतना ही......
चैतन्य की चार अवस्थाएँ
मनुष्य केवल यह स्थूल शरीर नहीं है। उसके भीतर चेतना की एक अखण्ड धारा प्रवाहित होती रहती है।
ऋषियों ने उस चेतना की चार अवस्थाएँ बताई हैं।
जागृत — जहाँ इन्द्रियाँ बाह्य जगत का अनुभव करती हैं।
स्वप्न — जहाँ मन स्वयं अपना संसार रच लेता है।
सुषुप्ति — जहाँ न जगत रहता है, न अहंकार; केवल गहन विश्रांति रहती है।
तुरीय — जो इन तीनों का साक्षी है, शुद्ध चैतन्य स्वरूप।
जन्म और मृत्यु भी उसी चेतना के प्रवाह में घटित होने वाले परिवर्तन मात्र हैं। जैसे रात्रि के पश्चात पुनः प्रभात होता है, वैसे ही देह परिवर्तन के पश्चात चेतना पुनः नवीन यात्रा आरम्भ करती है।
साधना का वास्तविक उद्देश्य बाह्य जगत से पलायन नहीं, अपितु उस साक्षी को पहचानना है, जो जागृत में भी उपस्थित है, स्वप्न में भी, और सुषुप्ति में भी।
जब साधक यह जान लेता है कि
“मैं शरीर नहीं, मन नहीं, अपितु शुद्ध चैतन्य हूँ,”
तभी तुरीय के द्वार उद्घाटित होने लगते हैं।
दृश्य बदलते रहते हैं, परन्तु साक्षी चिरस्थिर रहता है।
॥ हरिः ॐ ॥
।। जय सनातन।।
क्या केवल किसी चीज़ को देखने से उसकी वास्तविकता बदल सकती है… सुनने में यह असंभव लगता है… लेकिन विज्ञान और अध्यात्म दोनों एक ऐसे रहस्य की ओर संकेत करते हैं जहाँ देखना केवल देखना नहीं रह जाता… बल्कि एक शक्ति बन जाता है। विज्ञान की दुनिया में इसे द्रष्टा प्रभाव कहा जाता है… और अध्यात्म की भाषा में इसे साक्षी भाव कहा गया है। पहली दृष्टि में ये दोनों बिल्कुल अलग लगते हैं… लेकिन जितना गहराई में उतरते हैं, उतना ही महसूस होता है कि दोनों किसी एक ही गहरे सत्य की ओर इशारा कर रहे हैं। विज्ञान कहता है कि सूक्ष्म स्तर पर किसी कण को देखने मात्र से उसका व्यवहार बदल जाता है… अर्थात देखने वाला केवल बाहर खड़ा दर्शक नहीं है… उसकी उपस्थिति स्वयं परिणाम को प्रभावित कर सकती है। वहीं अध्यात्म हजारों वर्षों से कहता आया है कि जब मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को साक्षी बनकर देखने लगता है, तो भीतर परिवर्तन शुरू हो जाता है। यहाँ सबसे गहरी बात यह है कि दोनों ही जगह पहचान बदलती है। विज्ञान में देखने वाला प्रयोग का हिस्सा बन जाता है… और अध्यात्म में मनुष्य अपने विचारों से हटकर देखने वाला बन जाता है। साक्षी भाव का अर्थ है बिना प्रतिक्रिया दिए, बिना निर्णय किए, केवल देखना। जैसे आकाश बादलों को देखता है… बादल आते हैं, जाते हैं… लेकिन आकाश उनसे चिपकता नहीं। उसी प्रकार जब व्यक्ति अपने मन को साक्षी बनकर देखने लगता है, तो धीरे-धीरे वह समझने लगता है कि वह विचार नहीं है… वह उन्हें देखने वाली चेतना है। और यही बिंदु भीतर की स्वतंत्रता की शुरुआत है। क्योंकि सामान्य अवस्था में मनुष्य हर विचार से जुड़ जाता है… क्रोध आया तो स्वयं को क्रोधित मान लेता है… दुख आया तो स्वयं को दुखी मान लेता है। लेकिन साक्षी भाव में धीरे-धीरे यह बदलता है। अब वह देखता है कि क्रोध उठ रहा है… दुख अनुभव हो रहा है… अर्थात पहचान विचारों से हटकर चेतना में आने लगती है। अब द्रष्टा प्रभाव और साक्षी भाव पूरी तरह एक ही चीज़ हैं या नहीं… यह कहना आसान नहीं। लेकिन दोनों एक गहरे संकेत अवश्य देते हैं कि देखने वाले की अवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण है। अध्यात्म कहता है कि जिस चेतना से आप जीवन को देखते हैं… वही आपके अनुभवों की गुणवत्ता निर्धारित करती है। यदि भीतर भय है… तो संसार भयपूर्ण प्रतीत होगा। यदि भीतर शांति है… तो वही संसार अलग अनुभव होगा। यही कारण है कि दो व्यक्ति एक ही परिस्थिति में होकर भी बिल्कुल अलग अनुभव करते हैं। अब साक्षी भाव का अभ्यास कैसे करें… सबसे पहले अपने विचारों को देखना प्रारंभ कीजिए। उन्हें रोकने का प्रयास मत कीजिए… केवल देखिए कि वे कैसे आते हैं और चले जाते हैं। दूसरा… भावनाओं को महसूस कीजिए… लेकिन उनमें डूबिए मत। तीसरा… दिन में कुछ समय अपनी श्वास पर ध्यान दीजिए। क्योंकि श्वास आपको वर्तमान में लाती है… और वर्तमान ही साक्षी भाव का द्वार है। धीरे-धीरे आप अनुभव करेंगे कि आपके भीतर एक ऐसी स्थिर उपस्थिति है… जो हर अनुभव को देख रही है… लेकिन स्वयं कभी नहीं बदलती। और शायद यही वह स्थान है जहाँ विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे को स्पर्श करते हैं। दोनों यह संकेत देते हैं कि देखने वाला उतना साधारण नहीं है जितना हम समझते हैं। संभव है वास्तविक परिवर्तन बाहर की दुनिया को बदलने से पहले देखने वाले की चेतना में होता हो… और जब देखने वाला बदलता है… तब अनुभव की पूरी दुनिया बदलने लगती है…
गुरु से काम नहीं चलेगा सद्गुरु की शरण में जाएँ |
*सद्गुरु हमारे अंतःकरण में निवास करता है यह "प्रकाश" केवल रोशनी नहीं, बल्कि सही मार्ग की प्रेरणा है, जिसे ऋतम्भरा प्रज्ञा भी कहा गया है। सद्गुरु का उपदेश बाहरी गुरु की तरह विविध और भौतिक नहीं होता, बल्कि एक ही मूल संदेश देता है—अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर चलने का।...
🔹 जीवात्मा क्या होती है? (श्रीकृष्ण–अर्जुन संवाद के आधार पर)🍁
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच जो संवाद हुआ, उसमें “जीवात्मा” का गहरा रहस्य बताया गया है।
👉 जीवात्मा वह शाश्वत (नित्य) आत्मा है जो हर जीव के भीतर निवास करती है।
यह न जन्म लेती है, न मरती है
शरीर बदलता है, लेकिन आत्मा नहीं
जैसे इंसान पुराने कपड़े छोड़कर नए पहनता है, वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा धारण करती है
📖 श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं:
“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः…”
अर्थात आत्मा को कोई हथियार काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती।
👉
हम शरीर नहीं, आत्मा हैं
मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है, अंत नहीं
🔸
जीवन और मृत्यु के बीच जो सत्य छुपा है, वही है जीवात्मा।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है।
जब हम इस सत्य को समझ लेते हैं, तब डर, मोह और भ्रम अपने आप समाप्त हो जाते हैं।
जीवन का असली अर्थ तब सामने आता है—अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा से निभाना।
✨ हम शरीर नहीं, आत्मा हैं… और आत्मा अमर है।
**विशुद्धि चक्र की शक्ति : कंठ में छुपा ब्रह्मांड का द्वार**
*जब आपकी वाणी ही वरदान बन जाए*
विशुद्धि चक्र सिर्फ "गला" नहीं है। यह 72,000 नाड़ियों का जंक्शन है, जहां से आपकी चेतना शब्द बनकर ब्रह्मांड में जाती है। ऋषि कहते हैं - "जिसका विशुद्धि जागृत, उसकी वाणी वेद के समान।" यह चक्र आपको इंसान से "स्रष्टा" बनाता है। क्योंकि सृष्टि की शुरुआत भी "शब्द" से हुई थी - "नाद ब्रह्म"।
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विशुद्धि चक्र की शक्ति का रहस्य: क्यों है ये सबसे खास?**
सेतु चक्र**: 7 चक्रों में विशुद्धि बीच में है। नीचे के 3 चक्र - मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर - पशु प्रवृत्ति, भावना, अहंकार के हैं। ऊपर के 2 चक्र - आज्ञा, सहस्रार - देवत्व, ज्ञान के हैं।
विशुद्धि वो "फ़िल्टर" है जो पशु को देवता बनाता है। यहां आकर काम, क्रोध, लोभ "शुद्ध" होकर करुणा, सत्य, रचनात्मकता बनते हैं। इसलिए नाम "विशुद्धि" - विशेष शुद्धि।
आकाश तत्व का केंद्र**: पंच तत्वों में आकाश सबसे सूक्ष्म है। यह सब तत्वों को जगह देता है। आपका विशुद्धि जागृत हो तो आप "स्पेस" बन जाते हैं - दूसरों की बात सुनने की जगह, नए विचार आने की जगह, ब्रह्मांड की ध्वनि सुनने की जगह।
कर्म का बीज**: गीता में कृष्ण कहते हैं - "अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्"। यानी ऐसी वाणी जो उद्वेग न करे, सत्य हो, प्रिय हो, हितकारी हो - वो तप है। विशुद्धि की शक्ति से आपकी हर बात "तप" बन जाती है।
वाक्य से राक्षस कांप गए।
- **सीता जी से संवाद**: इतने मधुर शब्द कि सीता जी को पुत्र जैसा विश्वास हुआ।
- **रावण की सभा**: निर्भय होकर धर्म का उपदेश। ये वाक् सिद्धि है।
**B. सरस्वती माता**: वीणा की झंकार = नाद ब्रह्म। जो सरस्वती की कृपा पा ले, उसकी जिह्वा पर सरस्वती बैठ जाती है। कालिदास गूंगा था, माँ की कृपा से "महाकवि" बना।
**C. नीलकंठ शिव**: दुनिया का विष पीकर भी "शिव" बने रहे। ये विशुद्धि की सबसे बड़ी शक्ति - नकारात्मकता को पॉजिटिव में बदलना। आज ट्रोल, गाली, ऑफिस पॉलिटिक्स = कलयुग का हलाहल। जागृत विशुद्धि वाला सब पचा लेता है।
सुकरात**: जहर का प्याला पीने से पहले बोला - "मृत्यु से नहीं डरता, असत्य से डरता हूं"। ये विशुद्धि का बल है।
4. विशुद्धि चक्र बंद है तो क्या होता है? शक्ति का उल्टा रूप**
**शक्ति का श्राप बन जाना**:
| बंद विशुद्धि | परिणाम |
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| **झूठ बोलना** | धीरे-धीरे आत्मा की आवाज सुनना बंद, Intuition खत्म |
| **गाली, चुगली** | वाणी की शक्ति नष्ट, बोला हुआ उल्टा पड़ता है |
| **बात मन में रखना** | थायरॉइड, टॉन्सिल, सर्वाइकल, डिप्रेशन |
| **बहुत बोलना** | ऊर्जा लीक, लोग सीरियस नहीं लेते, सम्मान कम |
| **दूसरों को टोकना** | दिव्य श्रवण बंद, सिर्फ अपना ही शोर सुनाई देता है |
**कलयुग की बीमारी**: आज 80% लोगों का विशुद्धि ब्लॉक है। कारण - बचपन से "चुप रहो", सोशल मीडिया पर ट्रोल का डर, 9-5 जॉब में "Yes Boss" बोलने की मजबूरी। नतीजा - थायरॉइड महामारी, एंग्जायटी, वॉयस इश्यू 7. विशुद्धि चक्र जागरण के 9 शारीरिक संकेत**
1. **गले में गुदगुदी**: जप करते समय चींटी चलने जैसा लगे
2. **आवाज बदलना**: ज्यादा गंभीर, मधुर या भारी हो जाना
3. **नीले रंग का आकर्षण**: अचानक नीले कपड़े, आकाश अच्छा लगना
4. **सपने**: नीला कमल, आकाश, पक्षी, सरस्वती दिखना
5. **संगीत प्रेम**: भजन, राग, बांसुरी से रोमांच होना
6. **सच से बेचैनी**: झूठ बोलते ही गला सूखना, घबराहट
7. **कान में ॐ**: मेडिटेशन में भंवरे/शंख जैसी आवाज
8. **गर्दन दर्द फिर आराम**: पहले ब्लॉक खुलने से दर्द, फिर हल्कापन
9. **लोगों का ध्यान**: आप बोलो तो पिन-ड्रॉप साइलेंस हो जाए
ये संकेत दिखें तो समझो शक्ति जाग रही है। डरो मत, अभ्यास जारी रखो।
8. सावधानियां: शक्ति का दुरुपयोग मत करो**
विशुद्धि की शक्ति "परमाणु ऊर्जा" जैसी है। गलत इस्तेमाल से खुद का नाश:
1. **श्राप मत दो**: गुस्से में बोला शब्द लग जाता है। कर्म वापस आता है।
2. **गुरु निंदा मत करो**: विशुद्धि सीधा गुरु तत्व से जुड़ा है। निंदा से 12 साल ब्लॉक।
3. **डींग मत हांको**: "मैं ज्ञानी हूं" बोलते ही शक्ति क्षीण। मौन रहो।
🌿 मन शांत रखना भी एक साधना है 🌿
हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता। ज़िंदगी में कई बार हम सिर्फ़ इसलिए थक जाते हैं क्योंकि हर सवाल का उत्तर देना, हर बात का हिसाब रखना, और हर व्यक्ति को संतुष्ट करना चाहते हैं। पर सच तो ये है कि कुछ बातें समय और भगवान पर छोड़ देना ही बेहतर होता है। 🙏
जब मन भगवान की भक्ति में लग जाता है, तो चिंता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। क्योंकि फिर इंसान को भरोसा हो जाता है कि — “जो हो रहा है, प्रभु की इच्छा से हो रहा है।”
सच्ची भक्ति वही है, जो मुश्किल समय में भी विश्वास टूटने न दे।
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1. मन की शांति: सबसे बड़ी साधना
हम रोज़ मंदिर जाते हैं, दिया जलाते हैं, माला फेरते हैं। पर क्या सच में हमारा मन शांत है? साधना का अर्थ सिर्फ घंटों आँख बंद करके बैठना नहीं है। असली साधना है — भीड़ में रहकर भी भीतर से मौन रहना। तानों के बीच भी मुस्कुराना। नुकसान में भी ये मानना कि प्रभु कुछ बेहतर तैयार कर रहे हैं।
आज की दुनिया में सबसे ज़्यादा शोर बाहर नहीं, हमारे मन के अंदर है। नोटिफिकेशन, तुलना, अधूरी इच्छाएँ, कल की चिंता, पुराने रिश्तों का बोझ — ये सब मिलकर मन को अशांत कर देते हैं। ऐसे में मन को शांत रखना किसी तपस्या से कम नहीं।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं — “अशांत मन वाले को न इस लोक में सुख है, न परलोक में।” यानी अगर मन बेचैन है, तो पूजा-पाठ भी अधूरी लगती है। इसलिए पहले मन को साधो, फिर माला को।
2. हर बात का जवाब क्यों नहीं?
हमारा अहंकार चाहता है कि हम हर बार सही साबित हों। कोई कुछ कह दे तो तुरंत जवाब दें। कोई गलत समझे तो सफाई दें। पर याद रखो — जो लोग समझना ही नहीं चाहते, उन्हें लाख सफाई भी कम लगेगी।
कबीर दास जी कहते हैं:
*“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”*
जब हम खुद के अंदर झाँकते हैं, तो पता चलता है कि लड़ाई बाहर नहीं, भीतर है। हर बात का जवाब देकर हम सिर्फ़ अपनी ऊर्जा खर्च करते हैं। कभी-कभी मौन सबसे बड़ा उत्तर होता है।
मौन के तीन फायदे:
ऊर्जा बचती है — बहस में जो शक्ति जाती है, वही प्रार्थना में लगाओ तो जीवन बदल जाता है।
कर्म का नियम काम करता है — जो आज गलत कर रहा है, समय उसे खुद जवाब दे देगा। तुम्हें वकील बनने की ज़रूरत नहीं।
प्रभु पर भरोसा बढ़ता है — जब तुम छोड़ देते हो, तो भगवान संभाल लेते हैं।
3. समय और भगवान पर छोड़ना: समर्पण का अर्थ
“समय पर छोड़ दो” का मतलब निष्क्रिय हो जाना नहीं है। इसका मतलब है — अपना 100% कर्म करो, और परिणाम की चिंता प्रभु पर छोड़ दो।
एक किसान बीज बोता है, पानी देता है, खाद डालता है। पर ये तय नहीं कर सकता कि बारिश कब होगी या फसल कितनी होगी। वो हिस्सा प्रकृति के हाथ है। वैसे ही हमारा काम है पूरी निष्ठा से कर्म करना। फल देना भगवान का काम है।
जब हम हर चीज़ कंट्रोल करना चाहते हैं, तभी तनाव आता है। बेटा नहीं सुन रहा, व्यापार धीमा है, सेहत ठीक नहीं — इन सबका रिमोट हमारे हाथ में नहीं है। पर प्रार्थना का बटन हमेशा हमारे हाथ में है।
समर्पण का मंत्र: “हे प्रभु, जो मेरे लिए सही है वो दे देना, और जो गलत है वो मुझसे दूर कर देना — चाहे मुझे उस वक़्त समझ न आए।”
4. भक्ति में मन लगे तो चिंता कैसे जाए?
चिंता और भक्ति एक साथ नहीं रह सकतीं। जैसे अंधेरे और रोशनी। जहाँ दीया जलेगा, अंधेरा खुद हट जाएगा।
जब हम मान लेते हैं कि एक बड़ी शक्ति 24x7 हमारे साथ है, तो डर किस बात का? बच्चे को भरोसा होता है कि पिता उंगली पकड़े हैं, तो वो भीड़ में भी नहीं रोता। वैसे ही जब मन ये मान ले कि “मेरा कान्हा, मेरा महादेव, मेरी माँ दुर्गा मेरे साथ हैं”, तो चिंता की जगह श्रद्धा ले लेती है।
भक्ति मन को कैसे बदलती है:
नाम-जप — जब जुबान पर “राम”, “ॐ नमः शिवाय”, “राधे-राधे” चलता है, तो दिमाग फालतू सोच से हट जाता है।
सेवा — किसी भूखे को खाना खिलाओ, किसी उदास को हँसाओ। जब तुम दूसरों का दुख कम करते हो, भगवान तुम्हारा दुख कम कर देते हैं।
कथा-श्रवण — जब हम भगवान के चरित्र सुनते हैं कि उन्होंने कितने संकट हँसते-हँसते निकाले, तो अपना दुख छोटा लगने लगता है।
5. “प्रभु की इच्छा” — ये सिर्फ शब्द नहीं, ढाल है
“जो हो रहा है, प्रभु की इच्छा से हो रहा है” — ये वाक्य हमें कमजोर नहीं, निडर बनाता है।
मीरा को ज़हर दिया गया, प्रह्लाद को पहाड़ से फेंका गया, सीता माँ को वनवास हुआ। क्या ये उनकी गलती थी? नहीं। ये लीला थी, परीक्षा थी, और बाद में उन्हीं कष्टों ने उन्हें अमर कर दिया।
6. सच्ची भक्ति की पहचान: मुश्किल में विश्वास
सुख में तो सभी भगवान को याद करते हैं। असली परीक्षा दुख में होती है।
7. मन शांत रखने के व्यावहारिक उपाय
भाव के साथ-साथ कुछ कर्म भी ज़रूरी हैं।
अधिक मास* _( पुरुषोत्तम मास)_ महिमा.
17 मई से 15 जून तक
जप, ध्यान, सत्संग* विशेष ,पुण्यदायी है
धरती पर शयन, पत्तल में भोजन और ब्रह्मचर्य व्रत पालन से विशेष पुण्य होता है
रोज दोपहर को 🍲भोजन से पहले
श्रीमद्भगवद्गीता जी के 15 वें अध्याय का पाठ करें
तो 💰लक्ष्मी माता विशेष 🙌🏼प्रसन्न होती हैं l
दीप दान करें* - मंदिर, गुरु द्वार, पीपल देव में
जो व्यक्ति चतुर्मास में अथवा अधिक मास ( पुरूषोत्तम ) में भगवान को कनरे के पुष्प अर्पित करता है*, उस पर लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती हैं ।उसे आरोग्य एवं शांति की प्राप्ति होती है तथा उसके संकट दूर होते हैं
10, 000 वर्ष गंगा स्नान करने से जो पुण्य मिलता है वही पुण्य* _इस पुरुषोत्तम मास में *सूर्योदय से पूर्व* स्नान करने से प्राप्त होता है
इस माह में केवल ईश्वर के उद्देश्य से* जो जप, सत्संग व सत्कथा-श्रवण, हरिकीर्तन, व्रत, उपवास, स्नान, दान या पूजनादि किये जाते हैं, *उनका अक्षय फल होता है और व्रती के सम्पूर्ण अनिष्ट नष्ट हो जाते हैं
इस मास में श्रीमद्भगवद्गीता जी के 15वें अध्याय का अर्थसहित प्रेमपूर्वक पाठ* _करना और 🐂गायों को घास व दाना खिलाना चाहिए । इस मास में आँवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करना अधिक प्रसन्नता और स्वास्थ्य देता है
पुरुषोत्तम मास में जप, सत्संग, ध्यान, पुण्यकर्म, आत्म-चिंतन आदि करना विशेष लाभकारी है। न* _इस मास में मांगलिक कार्य विवाह, नामकरण, जनेऊ संस्कार गृहप्रवेश आदि वर्जित हैं
अधिक मास में आँवले और तिल का उबटन शरीर पर मलकर स्नान करना और आँवले के वृक्ष के नीचे भोजन करना* - _यह भगवान श्री पुरुषोत्तम को अतिशय प्रिय है, साथ ही स्वास्थ्यप्रद और प्रसन्ताप्रद भी है।_ *यह व्रत करने वाले लोग बहुत पुण्यवान हो जाते हैं
अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में तुलसी पूजन से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है*_जिससे घर में सुख-समृद्धि, धन और आरोग्य आता है। इस दौरान सुबह जल अर्पित करना और शाम को घी का दीपक जलाना अत्यंत फलदायी है, जो घर से नकारात्मकता दूर करता है
अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में भगवान विष्णु के सामने *तुलसी की सूखी लकड़ी का दीपदान करना अत्यंत पवित्र और 1000 गुना अधिक फलदायी* माना गया है, जो कार्तिक मास के बराबर पुण्य देता है।
जय श्रीराम
11 मई 2026 मंगल का मेष राशि में प्रवेश
11 मई को मंगल ग्रह मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र में गोचर करेगा, जिसका सिंह, कन्या, तुला और वृश्चिक राशियों पर विशेष प्रभाव पड़ेगा। इस गोचर से रुके हुए काम पूरे होंगे, शिक्षा में सफलता मिलेगी और आत्मविश्वास बढ़ेगा, हालांकि वाणी पर नियंत्रण रखना होगा।
राशियों पर प्रभाव (2026)
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A- मेष राशि आत्मविश्वास बढ़ेगा, रुके कार्य पूरे होंगे।
B- वृषभ/कर्क/तुला/मकर/मीन: इन राशियों को मानसिक अशांति, आर्थिक नुकसान या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए सावधान रहना चाहिए।
C- मिथुन/सिंह/धनु/कुंभ: करियर में तरक्की और आर्थिक लाभ मिलने की संभावना है।
इस गोचर पर खास प्रभाव सिंह, कन्या, तुला और वृश्चिक राशियों पर पड़ेगा। रुके हुए काम पूरे होंगे। शिक्षा के क्षेत्र में कोई खुशखबरी मिलेगी। वाणी पर काबू रखें। आत्मविश्वास में वृद्धि देखने को मिलेगी। मंगलदेव का मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र में गोचर का समय 4 राशियों के लिए कैसा रहेगा।
इन चार राशियों पर शुभ प्रभाव
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1. सिंह राशि
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मंगलदेव आपके नवम भाव (भाग्य और धर्म का क्षेत्र) में गोचर कर रहे हैं। भाग्य का सहयोग मिलने से आपके रुके हुए काम पूरे होंगे। लंबी दूरी की यात्रा या शिक्षा के क्षेत्र में शुभ परिणाम प्राप्त होंगे। आप पूरे साहस के साथ अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ेंगे, बस घर के सदस्यों के साथ तालमेल बनाए रखें।
उपाय: अपने पिता या गुरुजनों का आशीर्वाद लें और फिजूलखर्ची से बचें।
2. कन्या राशि
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मंगलदेव आपके अष्टम भाव (आयु और परिवर्तन का क्षेत्र) में गोचर कर रहे हैं। यह समय जीवन में कुछ अचानक बदलाव ला सकता है। मानसिक रूप से थोड़े उतार-चढ़ाव महसूस हो सकते हैं। वाणी पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि आपकी कड़ी भाषा रिश्तों पर बुरा असर डाल सकती है।
उपाय: जोखिम भरे कार्यों और झगड़ों से खुद को दूर रखें। मंगलवार को लाल वस्त्र का दान करें।
3. तुला राशि
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मंगलदेव आपके सप्तम भाव (विवाह और साझेदारी का क्षेत्र) में गोचर कर रहे हैं। यह गोचर आपके दांपत्य जीवन और व्यापारिक साझेदारियों पर प्रभाव डालेगा। जीवनसाथी के साथ वर्चस्व की लड़ाई से बचें। करियर में आपको तरक्की के नए मौके मिलेंगे और आपके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होगी।
उपाय: रिश्तों में शांति बनाए रखें और नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करें।
4. वृश्चिक राशि
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मंगलदेव आपके षष्ठ भाव (रोग, ऋण और शत्रु का क्षेत्र) में गोचर कर रहे हैं। यह स्थिति आपको अपने विरोधियों और प्रतियोगिताओं में जीत दिलाएगी। आप पहले से अधिक ऊर्जावान और लक्ष्य के प्रति समर्पित रहेंगे। कार्यक्षेत्र में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बहस से बचें और अपने अनुशासन पर ध्यान दें।
उपाय: प्रतिदिन उगते सूर्यदेव को जल चढ़ाएं और विवादों से दूर रहें।
ज्योतिषविद् वरुण शास्त्री
इन चार राशियों पर अशुभ प्रभाव
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1- कर्क राशि: करियर और घर में बढ़ सकता है तनाव
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कर्क राशि वालों के लिए मंगल का यह गोचर मानसिक अशांति ला सकता है। कार्यस्थल पर सहकर्मियों या बॉस के साथ वाद-विवाद होने की आशंका है। वाणी पर नियंत्रण न रखने से बनते काम बिगड़ सकते हैं। इस दौरान माता के स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता बनी रह सकती है।
2. तुला राशि वैवाहिक जीवन और पार्टनरशिप में दरार
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तुला राशि के जातकों के लिए मंगल का प्रभाव रिश्तों में कड़वाहट घोल सकता है। जीवनसाथी के साथ छोटी-छोटी बातों पर बड़ा झगड़ा होने के योग हैं। अगर आप पार्टनरशिप में बिजनेस कर रहे हैं, तो पैसों के लेनदेन को लेकर पारदर्शिता रखें, वरना बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
3. मकर राशि: प्रॉपर्टी विवाद व एक्सीडेंट का डर
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मकर राशि वालों को इस गोचर के दौरान वाहन चलाते समय बेहद सावधान रहना चाहिए। चोट लगने या दुर्घटना होने की संभावना है। घर-परिवार में संपत्ति को लेकर विवाद गहरा सकता है। घरेलू सुख- सुविधाओं में कमी महसूस होगी और बेमतलब के खर्चों से बजट बिगड़ सकता है।
4. मीन राशि: धन हानि और वाणी दोष
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मीन राशि के जातकों के लिए मंगल का मेष में जाना 'धन हानि' के संकेत दे रहा है।आपकी कटु वाणी आपके अपनों को नाराज कर सकती है। निवेश के लिए यह समय बिल्कुल सही नहीं है, पैसा डूबने का खतरा है। आंखों या पेट से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं परेशान कर सकती हैं।
(मंगल के इस गोचर में शुभ फल बढ़ाने और अशुभ फल से बचने हेतु श्री महाबली हनुमान जी की आराधना करनी चाहिए। इस समय बड़ा मंगल मास भी चल रहे है।
दूसरों को बदलने की कोशिश अक्सर टकराव पैदा करती है, लेकिन उन्हें समर्थ बनाने की शुभभावना जीवन में शान्ति लाती है। *जब हम किसी की कमियों पर ध्यान देने के बजाय उनकी आत्मिक शक्ति को पहचानते हैं, तब हमारा व्यवहार स्वतः सहयोगी बन जाता है
सच्चा दान उपदेश देने में नहीं, बल्कि अपने गुणों, अपनी स्थिरता और अपने शुभ संकल्पों से दूसरे को सशक्त बनाने में है
जब हमारी दृष्टि सुधारने की नहीं, समर्थ करने की होती है, तब सामने वाली आत्मा भी स्वयं को बदलने की प्रेरणा पाती है
यही रूहानी दान है, जो बिना शब्दों के भी गहराई से कार्य करता है
@Jaya__Kishori__ दुर्योधन, भोजन के केवल दो कारण होते हैं—या तो खिलाने वाले के मन में प्रेम हो, या खाने वाले को बहुत भूख हो। यहाँ न तो तुम्हें मुझसे प्रेम है और न ही मुझे भूख है
हृदय के भाव
कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध को रोकने के लिए भगवान कृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए थे दुर्योधन ने कृष्ण को प्रभावित करने के लिए बहुत बड़ी तैयारी की थी उसने सोने की थालियों में छप्पन प्रकार के व्यंजन बनवाए और सोचा कि कृष्ण इन सुख-सुविधाओं से प्रसन्न हो जाएंगे।
जब कृष्ण सभा में पहुँचे, तो दुर्योधन ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। लेकिन कृष्ण ने बड़ी विनम्रता और स्पष्टता से कहा
दुर्योधन, भोजन के केवल दो कारण होते हैं—या तो खिलाने वाले के मन में प्रेम हो, या खाने वाले को बहुत भूख हो। यहाँ न तो तुम्हें मुझसे प्रेम है और न ही मुझे भूख है
इसलिए तुम्हारा यह अहंकारी भोजन मुझे स्वीकार नहीं
दुर्योधन के राजमहल को छोड़कर कृष्ण सीधे महात्मा विदुर के घर पहुँचे। विदुर जी उस समय घर पर नहीं थे, केवल उनकी पत्नी सुलभा (विदुरानी) घर पर थीं जब उन्होंने देखा कि साक्षात द्वारिकाधीश उनके द्वार पर खड़े हैं, तो वे सुध-बुध खो बैठीं
वे इतनी भावुक हो गईं कि उन्हें समझ नहीं आया कि भगवान का स्वागत कैसे करें उनके पास न तो बैठने के लिए कोई कीमती आसन था और न ही खिलाने के लिए कोई पकवान
विदुरानी जी ने भगवान को बिठाया और घर में रखे हुए कुछ केले लेकर आईं भगवान कृष्ण ने कहा, "काकी, मुझे बड़ी भूख लगी है, जल्दी से कुछ खाने को दो
भगवान की भूख का सुनकर विदुरानी और भी व्याकुल हो गईं वे कृष्ण के चेहरे को एकटक निहारते हुए केले छीलने लगीं प्रेम की अतिशयता और तल्लीनता में उन्होंने केला तो फेंक दिया और छिलका कृष्ण के हाथ में दे दिया
भगवान कृष्ण भक्त के उस प्रेममयी पागलपन को देख रहे थे। उन्होंने बिना कुछ कहे बड़े चाव से वह छिलका खाना शुरू कर दिया। वे ऐसे खा रहे थे जैसे उन्होंने इससे अधिक स्वादिष्ट वस्तु कभी चखी ही न हो
इतने में विदुर जी घर आए और यह दृश्य देखकर चौंक गए। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "अरी ओ पगली! यह तू क्या कर रही है? साक्षात भगवान को केले के छिलके खिला रही है
विदुरानी होश में आईं और अपनी भूल पर लज्जित होकर रोने लगीं। विदुर जी ने तुरंत केले का गूदा (फल) कृष्ण की ओर बढ़ाया। कृष्ण ने एक ग्रास खाया और मुस्कुराकर कहा
विदुर जी, इस केले में वह स्वाद कहाँ, जो काकी के उन छिलकों में था! वह छिलके केवल छिलके नहीं थे, वे शुद्ध प्रेम में डूबे हुए थे
यह *कथा* हमें 'प्रेम-लक्षणा भक्ति' का परिचय देती है.
निष्कपटता:* भगवान को दिखावा पसंद नहीं है
*शरणागति:* विदुरानी के पास कुछ नहीं था, लेकिन जो था (प्रेम), वह पूर्ण था
ईश्वर का स्वभाव:* भगवान भक्तों के दोष नहीं देखते, वे केवल उनके हृदय के भाव को ग्रहण करते हैं
इसीलिए भक्त गाते हैं
सबसे ऊँची प्रेम सगाई, दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर खाई
@Jaya__Kishori__ राहु कई जातक/जातिकाओ पर वर्तमान महादशा समय मे चल रही होगी तो भविष्य में अब कुछ जातको पर आने वाली होगी पहले तो यह स्पष्ट कर दूं कि राहु जो राजयोग देता है वह बहुत ज्यादा लाभ वाला राजयोग होता है
राहु महादशा, अन्तरर्दशा क्या राजयोग देगी
राहु कई जातक/जातिकाओ पर वर्तमान महादशा समय मे चल रही होगी तो भविष्य में अब कुछ जातको पर आने वाली होगी पहले तो यह स्पष्ट कर दूं कि राहु जो राजयोग देता है वह बहुत ज्यादा लाभ वाला राजयोग होता है और बहुत कम समय मे बहुत कुछ हासिल करा देगा क्योंकि राहु जब राजयोग में होता है तब सभी ग्रहों की राजयोग कारक शक्ति को यह अपने अंदर समाहित कर लेता है और वर्तमान युग राहु का ही है
आज सब काम ऑनलाइन होते है जो कि ऑनलाइन, इंटरनेट राहु है, पलक छपकते ही बहुत अच्छी कामयाबी, पलक छपकते ही ज़िन्दगी चमक जाना, यह राहु से मिलने वाले राजयोगों का ही कमाल होता है अन्य किसी ग्रह में इतनी शक्ति नही की राजयोग पलक छपकते दे सके,मतलब बहुत जल्द सर्व सुख जैसे मकान, वाहन, संपत्ति ,धन, ऐश्वर्य, प्रतिष्ठत रोजगार आदि राजयोग देता है।अब राजयोग मतलब जब भी केंद्र और त्रिकोण के स्वामी आपस मे बैठे होंगे और राहु केतु इनके साथ शुभ सम्बन्ध में होंगे या राहु कुंण्डली में जिस राशि मे बैठा हो, उस राशि का स्वामी राजयोग बनाकर बैठा हो और राहु केतु दोनों शुभ स्थिति में हो तब राहु और राहु की महादशा-अन्तरदशाये बहुत बड़े स्तर पर राजयोग के उपरोक्त फल दिलाता है
अब राहु कैसे और अपनी दशा में कैसे राजयोग किन जातक/जातिकाओ को देता है इस बात को उदाहरण से समझते है
उदाहरण अनुसार वृष लग्न
वृष लग्न में जैसे शुक्र शनि सम्बन्ध बनने से यह राजयोग बनेगा,अब राहु इन्ही शुक्र शनि के साथ राजयोग में शुभ स्थिति में बैठ जाये जैसे शनि शुक्र राहु 11वे भाव मे जाकर बैठ जाये तब ऐसी स्थिति में व्यक्ति ने जो सपने देखे होते है उससे अच्छा राजयोग सुख मिलेंगे क्योंकि राहु यहां लग्नेश शुक्र+भाग्येश-कर्मेश शनि के साथ प्रबल राजयोग में है.
उदाहरण अनुसार कन्या लग्न
कन्या लग्न में दसवे भाव मे बैठा हो मिथुन राशि का,मिथुन राशि मे राहु उच्च होकर बलवान भी होता है, अब राहु का राशि स्वामी(मिथुन राशि) बुध राजयोग बनाकर शुक्र या शनि के साथ हो या शुक्र शनि दोनों के साथ हो या गुरु के साथ को और बुध से बनने वाला राजयोग पीड़ित या अशुभ किसी भी तरह न हो और न राहु से बुध से बनने वाला राजयोग पीड़ित हो रहा हो तब राहु इतना शक्तिशाली उच्च राजयोग देगा की फर्श से अर्श तक जातक जाएगा, राजनीति/व्यापार आदि से बड़ी सफलता , बड़ा राजयोग सुख मिल जाता है क्योंकि राहु राजनीति है और राजनीति के घर 10वे भाव मे है और राहु राशि स्वामी बुध राजयोग ने होने से राहु राजयोग बहुत बड़े स्तर पर देगा
कुंभ लग्न में केंद्र त्रिकोण स्वामी शुक्र और त्रिकोण स्वामी बुध एक साथ बैठे हो राजयोग बनाकर और अब राहु भी बुध शुक्र के साथ बैठ जाये या इनके दृष्टि सम्बन्ध बना ले , जैसे शुक्र बुध राहु दूसरे भाव(धन भाव) मे बैठ जाये तब यहाँ एक तो राहु आर्थिक रूप से बहुत ज्यादा उन्नति देगा और बड़े स्तर का राजयोग देकर जातक की किस्मत ही चकमायेगा क्योंकि धन के घर मे राजतोग बनाकर शुक्र बुध के साथ यहाँ राहु बैठा हैं
राहु या केतु कुंण्डली मे राजयोग बनाकर बैठे होते है तब राहु केतु का थोड़ा उपाय करते रहने से राजयोग ज्यादा मात्रा में फलित होता है क्योंकि राहु केतु जिन ग्रहों के साथ राजयोग में बैठें हो यदि उन ग्रहों की राशियों को पीड़ित करेंगे तो बिघ्न थोड़ा फल में कर देते है इस कारण राहु राजयोग में हो तब बहुत बड़े स्तर पर राजयोग मिलते है दूसरी बात आज के इस युग मे सभी ज्यादातर चीजे उपभोग की राहु के अधिकार में ही है जैसे ऑनलाइन काम , मोबाइल वर्क , मकान आदि की बनाबट, रोजगार आदि इस कारण आज के समय मे असली राजयोग राहु के सहयोग से मिलता है जिनकी कुण्डली मे राहु राजयोग में है और जिनकी कुंडली मे राहु राजयोग में नही है और राहु के बिना राजयोग है तब बिना राहु वाले राजयोगों की अपेक्षा राहु से बनने वाले राजयोग वाले जातक जातिक जीवन मे ज्यादा चमकते है
How the Gunas Quietly Control Human Behaviour
The Gita and Sankhya teachings state that behaviour is not entirely self directed... It is shaped by the constant interplay of three forces… the gunas.
Sattva… the quality of clarity and balance
It produces calmness, understanding, compassion, and stable judgement
Rajas… the quality of activity and desire
It drives ambition, restlessness, comparison, and constant movement
Tamas… the quality of inertia and obscuration
It produces laziness, confusion, resistance, and dullness
Every thought, emotion, and action arises under the influence of these three
When Sattva dominates… actions are thoughtful and aligned
When Rajas dominates… actions become driven and reactive
When Tamas dominates… actions become careless or absent
The sense of “I am choosing freely” is often incomplete
Choices are conditioned by the current state of the gunas
This is why the Gita says… the gunas act upon the gunas... Yet the deluded self thinks… I am the doer
Spiritual growth is not suppressing action
It is understanding and refining the gunas
What appears as personality... is the shifting dominance of sattva, rajas, and tamas.
Observe the gunas... and behaviour becomes intelligible
Karmanye Vādhikāraste” (Gita 2.47) Action Without Attachment Explained
This verse teaches one of the most profound principles of the Bhagavad Gita… you have a right to action, but not to the fruits of action
It does not ask you to stop acting, but to stop binding your identity to outcomes
Attachment to results creates anxiety, fear, and disappointment, because the outcome is never fully in your control
Action, however, is always in your hands. When you shift focus from results to right effort, the mind becomes steady and free from agitation
Act with full sincerity and skill… but let go of the need to control the result. This is not indifference… it is inner freedom