12 साल बाद मोदी सरकार का रिपोर्ट कार्ड देखें तो तस्वीर पूरी तरह काली भी नहीं है और पूरी तरह उजली भी नहीं।
UPI ने पेमेंट सिस्टम बदल दिया, जनधन खातों ने करोड़ों लोगों को बैंकिंग से जोड़ा, DBT ने बिचौलियों की भूमिका कम की, उज्ज्वला, हर घर जल, ग्रामीण विद्युतीकरण, शौचालय निर्माण और पूर्वोत्तर में उग्रवाद पर नियंत्रण जैसी उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन सवाल यह है कि जिन बड़े सपनों के दम पर "New India" का वादा किया गया था, उनका क्या हुआ?
• Make in India का लक्ष्य था भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना। 10 साल बाद भी GDP में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा लगभग वहीं का वहीं है।
• हर साल 2 करोड़ नौकरियों का वादा हुआ था। आज लाखों युवा सरकारी भर्ती, पेपर लीक और बेरोजगारी के चक्र में फंसे हैं, जबकि बड़ी संख्या गिग इकॉनमी में अस्थायी रोजगार कर रही है।
• ब्लैक मनी वापस लाने और भ्रष्टाचार खत्म करने के दावे हुए। नोटबंदी हुई, लेकिन 99% से ज्यादा नोट वापस बैंकों में लौट आए और काला धन आज भी चर्चा का विषय है।
• Smart Cities Mission के नाम पर हजारों करोड़ खर्च हुए, लेकिन अधिकांश शहर आज भी ट्रैफिक, ड्रेनेज, प्रदूषण, सीवेज और फुटपाथ जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
• Namami Gange पर भारी खर्च हुआ, लेकिन गंगा और यमुना की सफाई आज भी अधूरी कहानी बनी हुई है।
• किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का वादा था। 2026 आ गया, लेकिन किसानों की आय और खेती की समस्याएं अब भी राजनीतिक भाषणों से ज्यादा जमीन पर दिखाई देती हैं।
• अवैध घुसपैठ रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के बड़े वादे हुए, लेकिन यह मुद्दा भी आज तक पूरी तरह सुलझता नहीं दिखा।
सच्चाई यह है कि भारत ने कुछ क्षेत्रों में शानदार प्रगति की है, लेकिन कई बड़े वादे अधूरे रह गए।
लोकतंत्र में किसी भी सरकार का मूल्यांकन उसकी उपलब्धियों और उसकी विफलताओं दोनों से होना चाहिए।
न अंधभक्ति समाधान है, न अंधविरोध।
सरकारें बदल सकती हैं, नीतियां बदल सकती हैं, लेकिन अपने भविष्य की जिम्मेदारी आखिरकार हमें खुद ही उठानी पड़ती है।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि सरकार ने क्या किया।
सवाल यह भी है कि 140 करोड़ लोगों के देश को अगले 10 साल में कहाँ पहुंचाना है।यह पोस्ट बहस छेड़ सकता है, लेकिन इसमें उपलब्धियां और कमियां दोनों शामिल हैं, इसलिए संतुलित लगता है।