अजीत जी को करीब दस बारह साल से जानता हूं। शायद ज्यादा भी हो!
दोस्त भी कह सकता हूं।
उनकी सफलता से प्रसन्नता होती है तो नहीं बताता उनको किन्तु जब आजकल की तरह के हालात होते है तो सिर्फ इतना पूछता हूं कि, ठीक है आप!
जवाब आता है।
"मस्त"!
सो जो लोग सोचते है कि अजीत डर जाएगा, पैसे से बिक जाएगा आदि इत्यादि...
सूतिया है सब!
यह आदमी अलग है!
इस अलग की डेफिनिशन मुझे भी नहीं पता पर यह समझौता नहीं करेगा।
करेगा तो पाने टर्म्स पर
झुकेगा नहीं!!!
लेकिन देखिए कि एक तरफ़ दलित माता डॉट कॉम चल रहा था, दूसरी तरफ़ किन्नरों ने मोदी जी को अपना भगवान मानते हुए, उनकी पूजा अर्चना दिल्ली प्रेस क्लब में कर दी।
ये वही व्यक्ति है जिसने कुछ दिन पूर्व पटना में विश्व के सबसे बड़े मंदिर के लिए भूमि माँग रहा था ताकि मोदी जी की प्राण प्रतिष्ठा की जा सके। वैसे जिस तरह से CAA, किसान आंदोलन और तिलचट्टों को मोदी जी की सरकार ने ट्रीट किया है, सही लोगों ने उनको अपना भगवान माना है।
जैसे किन्नर आपको ट्रेन में ए चिकने कह कर 10 रुपये माँगते हैं, यहाँ मोदी जी की सरकार ए शारुख दीपके से ले कर ए चिकने सौरव दास पर फिसल गई।
मोदी चालीसा भी गाई गई। इस पर कुछ पुराने समर्थक हैं, वो थोड़े नाराज हो गए कि उनको ये आईडिया क्यों नहीं आया। यह कार्य बहुत पहले हो जाना चाहिए था। मोदी जी ने देश के लिए कितना कुछ किया है, जैसे ब्रह्मा जी ने मुख से ब्राह्मण, छाती से क्षत्रिय उत्पन्न किया वैसे ही मोदी जी ने अपने भागवत प्रभाव से इन दोनों ही प्राणियों को जन्मजात अपराधी बना दिया।
ब्रह्मा जी केवल जन्म देते हैं, मोदी जी उनकी मार लेते हैं कि अच्छा, तू ब्राह्मण है, तू भूमिहार है, तू राजपूत… तेरी तो कब्र खुदेगी और तू चिल्लाता रहेगा, कोई सुनेगा नहीं। भगवान मोदी जी आपको दुनिया से गायब कर सकते हैं कि तू है, पर तेरे होने का कोई मतलब नहीं है। चालीसा में कुछ पंक्तियाँ जोड़ी जा सकती है:
हैं मोदी जी ज्ञान के सागर, हैं मोदी जी सबके फादर!
एससी एसटी एक्ट प्रबल बनाये, सवर्णों को तब बाँस कराए!
रुका नहीं गया जब उनसे, यूजीसी तब निकला मन से!
दलित जाति ही चित्त में धरईं, मोदी जी पे सर्व सुख करहीं!
राम मंदिर में डाका पड़ाए, अंबेडकर जी के तीर्थ बनाए!
आपन तेज सम्हलता ना आपे, सवर्ण जाति है थर-थर काँपे!
कैबिनेट मंत्री, पुलिस प्रशासन, तिलचट्टों को बाप बनावन!
OBC तनय, अति पिछड़न, डायमंड फेसिअल रूप, दलित पीड़ित वंचित सहित, हृदय बसहूँ दलीभूप!
अजीत जी, दलीभूप नहीं समझा! अरे, त साइलेंट हैं, पोएटिक लाइसेंस है! बाक़ी समझ तो गए ही ना मोदी जी की महिमा अपरम्पार है!
आज का लाइव ऐसा होगा
फिर कभी नहीं जैसा होगा
एट्रोसिटी एक्ट के खोलेंगे धागे
रख कर दलितों को ही आगे
चुन-चुन कर वीडियो लाएँगे
सब तथ्य दिखाए जाएँगे
मंचों के बोल भी आएँगे
हर इमेज सजाए जाएँगे
सवर्णों की भी बेटी होती है
उसकी भी इज्जत होती है
वो राह चलती वेश्या नहीं
मैं चुप सुनने वाला प्रेश्या नहीं
हर रंग दिखाऊँगा तुमको
धो-धो के सुखाऊँगा सबको
—
मित्रों, आप सबके स्नेह और समर्थन का आभार! मेरी बहन आपकी भी बहन है, और आपकी बहन मेरी भी बहन है। मेरे वचन तब कटु हुए जब किसी ने उसे राह चलती किसी वस्तु की तरह देखा। मेरी बहन का ऑब्जेक्टिफिकेशन किसी नारीवादी को नहीं दिखा, पर जब एक कथित रावण समर्थक को मैंने लक्षित करके कुछ कहा तो तुम्हें ध्यान आया कि मेरी मानसिकता सड़ी हुई है।
मैं जहाँ से आता हूँ, यदि यह बात मुझे कोई सामने से कहता तो मेरे ऊपर यह धाराएँ नहीं लगती, वो कोई और धारा होती। मैं आत्मनियंत्रण वाला व्यक्ति हूँ और ट्रोल की ट्रोलिंग को उसी तरह से थामना जानता हूँ।
बाकी, जो भी होगा वह प्रारब्ध है। पर हाँ, सवर्णों की बेटियाँ किसी भी शोषित-वंचित के डिजिटल उपभोग या विकृत यौन मानसिकता के प्रयोग की वस्तु नहीं।
मेरे ऊपर SC/ST एक्ट में FIR पर कुछ बातें सवर्ण समाज से
कोई मेरी माँ या बहन पर सीधे बलात्कारी मानसिकता के साथ यह कहे कि उसका विवाह मैं चंद्रशेखर के साथ करा दूँ, और मैं चुप रह जाऊँ तो आप बताइए कि मैं कैसा पुत्र या भाई हूँ?
इतने पर भी चंद्रशेखर को ले कर मैंने कोई जातिसूचक शब्द नहीं बोला, जो उक्त वीडियो में है। जब स्टेज से ब्राह्मणों की बेटियों को खींचने की बातें होती हैं और किसी SC नेता का चेला सोच-समझ कर उकसाने के लिए ऐसी बात करेगा, तो मैं चुप कैसे रहूँगा?
आज व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों को समझे या न समझे, वह यह अवश्य जानता है कि SC/ST एक्ट क्या है। तो मैं जब बोलता हूँ तो मुझे अपनी सीमाएँ (चाहे वह कितनी ही अनुचित क्यों न हों) पता हैं कि क्या बोलना है, क्या नहीं।
मैं जानता हूँ कि दिल्ली पुलिस के नॉर्थ अवेन्यू स्टेशन में आजाद समाज पार्टी वालों ने कितना दवाब दे कर रात के बारह बजे यह FIR लिखवाया है जो कोर्ट में दो मिनट नहीं टिकेगा। एक भी धारा ऐसी नहीं है जो होल्ड करेगी।
मैं सैनिक स्कूल का छात्र हूँ और इतनी रैगिंग झेल चुका हूँ कि मेरा मनोबल तोड़ने के लिए दिल्ली पुलिस को कस्टडी में मेरी हत्या करनी पड़ेगी, दो-चार डंडों से मेरा मनोबल नहीं टूटने वाला। और यदि मैं जीवित बच गया तो इसी स्थिति में जंतर मंतर जाऊँगा और अपने समाज से कहूँगा कि बताओ, तुम्हारी बहन और माँ को ले कर कोई ऐसी टिप्पणी करे तो क्या करोगे?
यदि ऐसा कमेंट फिर मेरे वीडियो पर आया तो मैं पुनः उसी तरीके से उत्तर दूँगा जो मैंने दिया। कानून जब तक है, संशोधन नहीं होता, मैं उसका सम्मान करूँगा और दिल्ली पुलिस के साथ पूर्ण सहयोग करूँगा। 92% ऐसे केस केवल प्रताड़ित करने के लिए होते हैं।
अंत में, सवर्ण समाज से यह पूछना चाहता हूँ कि क्या इस तरह की टिप्पणी पर मुझे सह लेनी चाहिए थी क्योंकि किसी पार्टी के लोग नाराज हो जाएँगे? क्या ब्राह्मणों की माँ और बहनें इन रेप मैंटिलिटी से संचालित गुंडों के शाब्दिक बलात्कार के लिए जन्म लेती हैं?
आ गया स्वाद...?
सबसे ज्यादा अंधभक्ति में सवर्ण समाज ही लीन था। खैर...
लेकिन राजा साहेब को एक बात याद रखनी चाहिए, जिन लोगों पर आपकी पुलिस बर्बरता कर रही है, वे कोई ऐसे-वैसे लोग नहीं हैं।
ये उन सवर्ण महापुरुषों के वंशज हैं, जिसने ब्रिटिश हुकूमत के सामने घुटने टेकने से इनकार किया था।
सुभाष चंद्र बोस, लाला लाजपत राय, चंद्रशेखर आज़ाद, मंगल पांडे, तात्या टोपे, राम प्रसाद बिस्मिल, वीर सावरकर, खुदीराम बोस और राजगुरु जैसे अपने पूर्वज क्रांतिकारियों की विरासत को आगे बढ़ाने वाले लोग हैं।
इन्हें डराकर चुप नहीं कराया जा सकता।
जब ये अपने हक और सम्मान के लिए खड़े होंगे, तो इनकी आवाज दबाना आसान नहीं होगा।
यह सिर्फ़ एक विधायक या प्रशांत किशोर की जीत नहीं है। यह उस राजनीतिक संदेश की जीत है, जो उन्होंने पूरे अभियान में दिया।
“आप सिर्फ़ एक उम्मीदवार को नहीं, राजनीति की एक सोच को वोट दे रहे हैं।”
भाजपा पर सबसे बड़ा आरोप यही रहा कि जनता किसी को वोट देती है और मुख्यमंत्री कोई दूसरा बन जाता है। जातीय समीकरणों के नाम पर नेतृत्व तय करने की इस राजनीति से लोगों में असंतोष था। जब तेजस्वी यादव को अनपढ़ कहकर निशाना बनाया जाता है, तो फिर सम्राट चौधरी जैसे नेताओं पर भी वही कसौटी लागू होती है।
मैं पहले भी कहता रहा हूँ कि अगर प्रशांत किशोर 25–50 सीटों पर फोकस करते और स्वयं भी चुनाव लड़ते, तो उनके 20 से ज़्यादा विधायक विधानसभा में हो सकते थे। लेकिन इस बार उन्होंने पूरी ताक़त एक सीट पर लगाई और जीतकर बड़ा राजनीतिक संदेश दे दिया।
इस नतीजे ने उस दावे को भी चुनौती दी कि भाजपा के टिकट पर कोई भी उम्मीदवार जीत सकता है। भाजपा के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र में कमजोर उम्मीदवार उतारने की कीमत पार्टी को चुकानी पड़ी।
साथ ही, UGC जैसे मुद्दों और सामान्य वर्ग में बढ़ती नाराज़गी को भी पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। चुनाव से पहले ज़मीन पर इन मुद्दों की चर्चा साफ़ दिखाई दे रही थी। अगर चुनाव महत्वहीन था, तो फिर भाजपा के बड़े नेताओं ने लगातार वहाँ प्रचार क्यों किया?
यह हार भाजपा के लिए एक स्पष्ट राजनीतिक चेतावनी है कि ज़मीनी नाराज़गी और उम्मीदवार की गुणवत्ता, दोनों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव सीट के तथ्य:-
- यहाँ सवर्ण वोटर 45% हैं
- 15% कायस्थ वोटर हैं। 9% वैश्य वोटर
- बांकीपुर उपचुनाव में सारे जातिगत समीकरण फेल हो है। यहाँ के मतदाताओं ने जाति/धर्म से ऊपर उठकर वोटिंग की
- BJP के कायस्थ उम्मीदवार देने, CM और राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रचार करने के बावजूद BJP ये सीट हार गई
- प्रशांत किशोर की विधानसभा में एंट्री ना सिर्फ सत्ता पक्ष बल्कि विपक्ष के लिए भी चिंता का सबब बनेगी
A High School teacher spells:-
January as JUNGU
February, she starts with M and then gives up.
She is a teacher for last 2 decades.
Baba Saheb's legacy.
PM @narendramodi has put this disastrous policy on steroids. @DrMohanBhagwat endorses this Social INjustice.
CREEPS.
गुजरात निकाय चुनावों को UGC पर रेफरेंडम मानने वाले चोट्टों ने बांकीपुर को अभी तक 'हल्दी की खेती में व्यस्त भाजपा वोटर' या 'भाजपा ये सब छोटे उपचुनाव में रुचि नहीं लेती' टाइप के सुगम संगीत वाले पोस्ट किए या नहीं?
ऐसे लड़चट्ट समर्थक भगवान किसी पार्टी को ना दे! यहाँ धरातल पर मैया ^& पड़ी है और इनका ध्यान हवा में है! नितिन नबीन पंद्रह दिन में तीन बार पटना गए, रहे। कई बड़े नेता प्रचार करने गए और फिर भी पीके जीत गया।
तुमलोग आँड़ तौलते रहे और बताते रहो कि क्यों भाजपा का कोर वोटर इंटैक्ट है और मोदी जी की जय-जयकार कर रहा है। बह₹#%! इनसे निकम्मा और चाटुकार (और चूतिया) समर्थक नहीं देखा है मैंने!
राहुल गाँधी वाले भी बीच-बीच में हाथ खड़े कर लेते हैं, पर ये वाला खड़ा कोयला है साला! जल कर राख हो जाएगा पर उससे उठता धुआँ मोदी जी के नाम का होगा।
इस तरह से कीड़े को उड़ाकर आपको फ्रेश फूल गोभी खिलाने का जिम्मा हमारे किसान भाइयों ने उठा रखा हैं।
इसका गैर मौसम में उत्पादन करने में जरूरत से अधिक पेस्टीसाइड करने के बाद आप तक कैंसर पहुंचने का जिम्मा भी उठा रहे हैं।
A person scoring 1/800 in PG entrance has been granted MS in Orthopaedics while those scoring 500+ are denied.
The nation is going to dogs and instead of being ashamed, political jokers are presenting it as an achievement.
बिहार के DGP (जो सारण केस में नाबालिग लड़की का चरित्र चित्रण कर रहे थे) वो वामपंथी छात्र नेत्री से मिल रहे हैं। इसे क्या कहा जाए परमादरणीय @samrat4bjp जी? ऐसे आँटू-झाँटू लोगों के लिए आपके DGP खड़े हो जाते हैं? भारत तिवारी ने गोली नहीं चलायी थी, आत्मसमर्पण किया था, उसको मार दिया इसी पुलिस ने, और जिन लोगों ने पुलिस को मारा, पत्थरबाज़ी की, गाड़ियों को तोड़ा उसके सामने झुक कर सलामी कि FIR नहीं होगा?
Harsh Dubey: "Where was Sonam Wangchuk admitted?"
Activist: "Medanta."
Harsh: "No. He was at Safdarjung, but he doubted a -40 marks doctor may be treating him, so he asked to shift to Medanta."
आरक्षण पर चर्चा किसी भी पार्टी को असहज करेगी, और अब वही करना पड़ेगा। पटरी उखाड़ कर आरक्षित हो जाना, सामाजिक न्याय नहीं, राजनैतिक गिरोहबाज़ी है। अब जबकि प्रताड़ित वर्ग इस पर लामबंद हो रहा है, तो सत्ता के चाटुकारों को समस्या होने लगी है कि ये 'मूर्खता' है।
UGC, NEET, CBSE पर बोलना भी सबको मूर्खता और षड्यंत्र ही लग रहा था, फिर एक भीड़ आई, आप पर थूका और आपको चाटना पड़ा। अंततः, हुआ वही जो हम आपको बता रहे थे।
अब आरक्षण पर भी एक संगठित, सघन और गंभीर चर्चा होगी। इसके चक्कर में चुनावों पर असर पड़ना चाहिए कि कौन इन विषयों पर चर्चा से भाग रहे हैं, कौन इसे नकार रहे हैं, और कौन एक ही श्वास में 'विकसित भारत' और निजी क्षेत्र में आरक्षण ढूँढ रहे हैं।
अब मुझे यह मैटर नहीं करता कि कौन सत्ता में है और किसको होना चाहिए, मैंने पिछले 7 महीनों में जो देखा और फिर गत शनिवार को जो हुआ, उस से में आश्वस्त हूँ कि बिखरा हुआ, बिका हुआ नैरेटिव काम नहीं आता। सत्ता में रहने या निकाले जाने की चिंता राजनैतिक दलों को होनी चाहिए, आम नागरिक को नहीं।
आरक्षण की पूर्ण समाप्ति लक्ष्य है, जो की संविधान का भी लक्ष्य है, तो हम तो वही कर रहे हैं जो संविधान निर्माताओं ने सोचा था। ठीक है, समय सीमा नहीं थी, पर OBC आरक्षण भी तो नहीं था? उस समय के वंचित-पीड़ित-शोषित यदि आज भी वंचित-पीड़ित-शोषित ही हैं, तो इस पर सर्वेक्षण होना चाहिए कि तथाकथित सामाजिक न्याय तक पहुँचने के लिए कोई और मार्ग है क्या?
मेरा उद्देश्य प्रथम चरण में चर्चा का है, सरकार से इस पर संसद में आँकड़े रखवाने का है कि किस जाति समूह कि किन जातियों में कितनों को आरक्षण मिला, उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति क्या है, उन्हीं जाति समूहों में कौन ऐसे लोग हैं जो अभी तक घिसट कर जीने को विवश हैं?
सामान्य वर्ग के लोगों में कितने लोग आर्थिक रूप से विपन्न हैं, उनके लिए सरकार की क्या नीतियाँ हैं, उन्हें फॉर्म भरने से ले कर हॉस्टल और कोर्स की फीस में छूट क्यों नहीं है? यदि आरक्षण EWS से दिया है तो यह इतना घटिया रूप में क्यों है कि निर्धन सामान्य वर्ग का विद्यार्थी लोन चुकाने में ही जवानी खपा देता है?
इसके बाद, हर राजनैतिक व्यक्ति को, दल को हम चुनावों के समय पूछेंगे कि उन्हें सामान्य वर्ग वोट क्यों दे? उनका मेरिट को ले कर क्या स्टैंड है, विकसित भारत में मेरिट की कितनी जगह है और शिक्षा व्यवस्था में आरक्षण के कारण राष्ट्र को कब तक नकारात्मक दिशा में ले जाया जाता रहेगा?
यही आरम्भ है, और यदि आवश्यकता पड़ी तो हम और भी विकल्प देखेंगे। हमें इस से अब मतलब नहीं है कि कौन आ जाएगा तो क्या हो जाएगा, उसका लोड वो लें जिनकी विधायकी और सांसदी जाएगी। हमें अपने बच्चों और इस समाज की चिंता हैं। हम बस अपने हिस्से की चिंता कर रहे हैं।