This is not a cinema scene. 🎬
This is Rahul Gandhi Ji’s press conference exposing the “Vote Chor” system Ganesh Kumar and company.
मोदी जी के बस की बात नहीं है ऐसी प्रेस कॉन्फ्रेंस करना। 🔥
बीजेपी गुजरात में पटेलों को,
महाराष्ट्र में मराठों को,
हरियाणा में जाटों को,
UP, बिहार में यादवों को
और देश भर में मुसलमानों को बदनाम करके राजनीति करती है,
यानी की नकारात्मक राजनीति,
बीजेपी कभी अपने विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी पर वोट नहीं मांगती है,
जानती है NOTA से भी कम वोट मिलेगा,
दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के चुनावों में दिल्ली एनसीआर की दो प्रमुख किसान जातियों के छोरों का दबदबा कितने दिन का मेहमान है?https://t.co/LJjTWHDwmj
दिल्ली जाटो/ठाकुरो/गुज्जरों/अहिरो की है
लेकिन जब आप इन गप्प कहानियों और कपोल कल्पनाओं से बाहर निकलोगे और वर्तमान की परिस्थितियाँ देखोगे तो पता चलेगा कि दिल्ली बनियों खत्रियों की है
समाचार समाप्त हुए
विनोद जाखड़ दिल्ली यूनिवर्सिटी का चुनाव हार गया हो लेकिन बिरादरियों के हुक्के में तंबाकू का स्वाद जरूर फीका कर दिया है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी में आजतक कभी कोई दलित तबके का छात्र छात्रसंघ का अध्यक्ष नहीं बन पाया है। बिरादरियों के इर्द - गिर्द मूँछों के सवाल पर लड़ा जाना वाला ये चुनाव अब मूँछों की जोर आज़माइश का ही रंगमंच बन चुका है। वरना क्या कारण है कि बीते डेढ दशक से कोई जाट - गुर्जर से इतर छात्रसंघ अध्यक्ष नहीं बन पाया ? “दिल्ली जाटा की सै भाई” के ऐलानिया तिलिस्म पर NSUI दो साल से क़ाबिल चोट करने की फ़िराक़ में है। पिछली बार जोसलीन और इस बार विजय मीणा को अध्यक्ष पद के लिए लड़ाना दो जातियों के वर्चस्व को निचोड़ने की एक कोशिश भर थी। लेकिन दशकों के जिस किले को छान-छान पर बुना हो वह एक दो साल में ढह जाए ये संभव काम नहीं है। तो क्या कोशिशें नहीं की जानी चाहिए ? और ये कोशिश विनोद जाखड़ ने की है जो मुकम्मल होते - होते अंतिम पायदान धराशायी हो गई।
मंडल कमीशन के बाद राजीव गोस्वामी के आत्मदाह ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की दीवारों को जातीय नारों से रंग दिया था। और इस कालखंड में ब्राह्मण - बनिया वर्चस्व की ईंटें खिसकने की शुरुआत हुई थी। कांग्रेस के पास उस दौर में राष्ट्रीय फ़लक पर मजबूत जाट क्षत्रप हुआ करते थे, जो जब चाहे तब एक नकेल इंदिरा से लेकर राजीव तक के लिए रखते थे। इनकी एंटी बायोटिक के तौर पर कांग्रेस ने राजेश पायलट को क्षत्रप बनाया। अब दिल्ली में जाटों के काउंटर के लिए गुर्जर जुटने शुरू हुए और ये कंधे भिड़ने की लड़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी में पहुंचीं। गुर्जरों के उभार का असल फ़ायदा ABVP ने उठाया इन्हें टिकिट देना शुरू किया।
दो धनबल, दो बाहुबल और दो हल्के अपना - अपना ध्रुव खड़ा करके दिल्ली यूनिवर्सिटी के इर्द - गिर्द खड़े हो गए। बीते डेढ़ दशक में सारे छात्रसंघ अध्यक्ष इन दो जातियों के अलावा नहीं बन सका है। बीच - बीच में पूर्वांचल के ठाकुर और उत्तर प्रदेश के यादव अपना हुक्का जमाने को कोशिश जरूर करते हैं लेकिन उलटे पांव लौटना पड़ता है। इस बार ABVP का पूरा पैनल देखिए प्रॉपर अजगर थ्योरी - जाट,गुर्जर, राजपूत लेकिन यादव पैनल में जगह नहीं बना पाया। बलिया से आने वाले शक्ति सिंह ने ठाकुर वर्चस्व की कहानी लिखने के जतन किए और कुछ वक़्त के लिए पूरे NCR में खलबली मचा दी। लेकिन परमानेंट हुक्का नहीं जम पाया। लेकिन शक्ति सिंह इतना छेद कर गया कि ABVP के पैनल में गिरते-पड़ते उसकी बिरादरी का एक ठाकुर कहीं लटक पड़ता है।
इस बार विनोद जाखड़ ने मीनाओ पर अपना घोड़ा कसा और जातीयों के मैदान में दौड़ लगाई है। दांव ग़लत नहीं था और घोड़ा भी लंगड़ा नहीं था। बस वक़्त के सितम ने शिकस्त दे दी। लेकिन इस चुनाव ने इतना जरूर कर दिया है कि दलित छात्रों के प्रतिनिधित्व हेतु एक जगह छात्रसंघ में सुरक्षित कर दी है। यही इस चुनाव का कुल हासिल है।
DU में अब मीणा कम्युनिटी दोनों छात्र संगठनों के लिए एक सब्जेक्ट बन चुकी है। मीणाओं के साथ अन्य दलित कॉम्बिनेशन समीकरणों के नई इमारत खड़ी कर सकता है। मसला ये है कि विनोद जाखड़ के इस प्रयास को धार दी जाए और लगातार दी जाए। अगर NSUI इस समीकरण को धार ना दे पाई तो मैं आज ही लिखकर दे सकता हूँ कि ABVP अगले चुनाव में एक मीणा छात्र को अपने पैनल में यकीनन जगह देगी। एक नया और मजबूत खेमा जो जाति की शक्ल में खड़ा होगा लेकिन छात्र संगठन और राजनीतिक दलों को कोशिश ये करनी चाहिए कि इस सिनेरियो को दलित खेमे के तौर पर खड़ा किया जाए ताकि दलित वर्ग का देश की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी में माकूल प्रतिनिधित्व तैयार हो सके।
साथ ही जमी जमाई बिरादरियों के लिए ये चुनाव एक चुनौती की आहट है क्योंकि “जमुना पार के लोग आ चुके हैं”
Dusu में कोई संगठन चुनाव नहीं लड़ता बल्कि दिल्ली देहात और हॉस्टल के गुटों का डोमिनेंस होता है।
जाट, गुर्जर , पंजाबी का खेल अब भी nsui हो या एबीवीपी उसमें भारी है।
संगठन से टिकट लेकर भी पूर्वांचली,बिहारी,उत्तराखंडी आदि हार जाते हैं।
नहीं तो क्या लॉजिक है सिर्फ उपाध्यक्ष हार जाने का । दरअसल यह गुटों का समझौता होता है अंदरूनी और वोट ट्रांसफर हो जाते हैं।।
आम छात्र वैसे भी वोट नहीं करता और यूनिवर्सिटी के आधे कॉलेज में dusu ban है।
2010 में सौरभ उनियाल हारा था बाकी 3 पर जीत । इस बार भी इशू मौर्य हार गया बाकी तीनों पर जीत ।
उपाध्यक्ष पद पर भी जाट लॉबी ने खेल किया और संगठन का टिकट काम नहीं आया।
दिल्ली यूनिवर्सिटी का पद बीते काफी वर्षों जाट गुर्जरों के राजनीति का लॉन्च पैड समझा जाता है लेकिन एक भी मुख्यधारा की राजनीति में बड़ा चेहरा नहीं बन पाया ।
क्योंकि पैसे से सबकुछ नहीं खरीदा जा सकता है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस ने अध्यक्ष पद के लिए विजयकुमार मीणा को उम्मीदवार चुना, गाँव की पगडंडियों से निकले आदिवासी समाज के युवा के माध्यम से उपेक्षित समाज को मुख्य धारा में लाने का ये भी एक प्रयास था,
नेता विपक्ष @RahulGandhi के इसी विजन को आगे बढ़ाते हुए @VinodJakharIN ने ये ऐतिहासिक फैसला लिया,
वहीं निजी महत्त्वाकांक्षा को दीपांशु शौकीन ने विचारधारा पर तरजीह दी,
विजय मीणा 18वें राउंड तक लीड कर रहे थें,
लेकिन अंत में ABVP ने अपने साम दाम दंड भेद से विजय की जय को पराजय में बदल दिया,
इस नतीजे के बाद सामंती विचारधारा के पत्रकार विनोद जाखड़ पर अटैक कर रहे हैँ,
दरअसल इन सामंती पत्रकारों की मानसिकता दो बहुजन नायकों के उभार को हज़म नहीं कर पा रही है
एनएसयूआई ने दीपांशु शौकीन को प्रेसिडेंट पद के लिए टिकट ऑफर किया था, लेकिन उसने यह कहकर रिजेक्ट कर दिया कि वह सामने वाले के पैसे से नहीं लड़ सकता। वहीं, हकीकत यह भी थी कि वह शुरुआत से ही यश डबास के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहता था और उसे सिर्फ वाइस प्रेसिडेंट का टिकट चाहिए था। यह बात ओपन थी कि वह प्रेसिडेंट का टिकट क्यों नहीं ले रहा था और उसे वाइस प्रेसिडेंट का टिकट क्यों चाहिए था। इसलिए दीपांशु शौकीन को कोई भी टिकट देना सिर्फ पैनल को कमजोर करना होता।
इसमें कोई डाउट नहीं है कि यश डबास और दीपांशु शौकीन चुनाव से पहले से ही मिले हुए थे और दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा। शायद यही वजह रही कि इस पोस्ट पर एबीवीपी के वोट बहुत कम रहे।
यह विनोद जाखड़ ही था जिसने एनएसयूआई को बेस्ट पॉसिबल टिकट दिया, जो न केवल सामाजिक स्थिति के हिसाब से सही था, बल्कि कांग्रेस की मजबूती के लिए भी जरूरी था। यही कारण रहा कि यह चुनाव इतना अच्छा उठ पाया। वो तो खुद को बारह महीने कांग्रेसी बोलने वाले गद्दार गद्दारी कर गए, नहीं तो चुनाव निकल जाता।
कौन सी टिकट कैसे गई, यह समझे बिना बहुत लोग कमेंट कर रहे हैं। लेकिन दीपांशु शौकीन की हकीकत पता करो, आइडिया लग जाएगा कि उसने एनएसयूआई का टिकट क्यों नहीं लिया और उसे टिकट क्यों नहीं मिला #Learn #Basics #DUSU
दीपांशु शौक़ीन ने NSUI अध्यक्ष पद का टिकट नहीं लिया क्यूंकि वो अपने जाट भाई के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ना चाहता था.
दीपेंद्र हूडा ने प्रचार नहीं किया क्यूंकि वो ABVP के जाट केंडिडेट के खिलाफ चुनाव प्रचार नहीं करना चाहते थे
NSUI के जाट नेता गरीब आदिवासी के खिलाफ ABVP के सजायीय के लिए वोट मांग रहे थे
और जातिवादी सामंती अगड़ी जातियों को बोला जाता है?
लठैत वर्ग ही असली शोषक, सामंती और जातिवादी है, यह बात लोगों को जितनी जल्दी समझ आजाये उतना बेहतर.
बीजेपी यादव, मुसलमानों को UP, बिहार में टिकट नहीं देती है, पद नहीं देती है,
क्योंकि ये दोनों बीजेपी को वोट नहीं देते हैँ,
कांग्रेस UP बिहार में 70 फीसदी सब बड़े पद ब्राम्हणों को देती है,
क्योंकि कांग्रेस को उम्मीद है कि
क़यामत से पहले कभी ना कभी ब्राम्हण उसे वोट देगा,
कांग्रेस में जब तक 90 फीसदी बड़े पद पर दलित, पिछड़े नहीं नियुक्त किए जाएंगे,
तब तक कांग्रेस चुनाव दर चुनाव हारती रहेगी,
ब्राम्हण कॉंग्रेस को वोट नहीं देते,
लेकिन @RahulGandhi का ब्राम्हण मोह फिर भी नहीं छूट रहा है,
अब देखो #DUSU में ABVP ने NSUI और कांग्रेस के साथ खेल कैसे किया
>कांग्रेस नेता बेटे को टिकट देकर शौकीन को साइड किया वो जीता
>शौकीन और यश अच्छे दोस्त हैं,शौकीन चाहता तो प्रेसीडेंसी भी लड़ सकता था और जीत सकता था
>उसने अपने दोस्त यश को बरकरार रखा
>विजय शंकर मीणा के साथ कुछ अंदुरुनी सपोर्ट शौकीन ने कट किया
>इधर दीपांशु ने विशेष यादव के साथ मेहनत किया और उसको पूरा PDA को वोट मिला
>लेकिन विशेष यादव के सामने शौकीन का ही सजातीय कैंडिडेट है तो वो वोट विशेष को नहीं मिला
नतीजा NSUI हर पद पे हार रही है
कांग्रेस के दफ़्तर में बैठे लोगों ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ में NSUI का सूपड़ा साफ़ करने के लिए जो शानदार मेहनत की है, उसके लिए उन्हें विशेष सम्मान मिलना चाहिए।
बधाई हो आप लोग एक और बार सफल हुए और नई पीढ़ी को मैसेज दिया कि मेहनत से यहाँ कुछ नहीं होता, सेटिंग ज़रूरी है।
राहुल जी, भीतर के छात्रों की गूँज नहीं सुनेंगे तो बाहर के छात्रों की गूँज का असर नहीं होगा।
आपके आसपास जो लोग बैठे हैं वे इस देश में सांप्रदायिक ताक़तों को मज़बूत बनाने के लिए जो अथक मेहनत कर रहे हैं, वह आपकी मेहनत को कामयाब नहीं होने देगी।
शुभकामनाएं