*परिवर्तन*
सामान्य कहावतों में हमनें सुना है कि परिवर्तन संसार का नियम है। बच्चा पैदा होने से लेकर बूढ़ा होने तक बदलता रहता है। ये सुनो तो लगता है सच में हम बदल रहे हैं।
पर बचपन से पचपन तक अहंकार केवल विषय बदलता है पर उसकी जिंदगी के पुराने ढर्रे, उसकी मान्यताएं, नहीं बदलती।
वास्तविक बदलाव केवल बाहरी विषयों को नहीं बदलता वो अहंकार को भी बदल देता है। जो अहंकार पहले स्थिर था या और फूल रहा था वो क्षीणता की ओर, पतले होने की दिशा में गति करने लगता है।
*BEFORE* 👇
आचार्य जी की शिक्षाओं से पहले तक त्यौहार का मतलब मेरे लिए था खुद के बाहरी रूप को सजाना, नए कपड़े, नए गहने लेना। जो भीड़ कर रही है उसे ही सही मानकर उस पर चलना, त्यौहार मतलब घरो की सफाई करना, पकवान बनाना, और अपनी मान्यताओं को फॉलो करना।
ये सब करने में पहले तो मेरे बहुत सारे पैसे खर्च हो जाते थे। फिर बहुत ज्यादा ऊर्जा इनमें चली जाती थी। और परिणाम में, अंदर का खालीपन कभी नहीं भरता था, और अगले त्यौहार या विषय के आने का इंतजार करती उस खालीपन को भरने के लिए।
*AFTER* 👇
आचार्य जी की शिक्षाओं से जुड़ने के बाद सजने का मतलब समझ आया कि केवल शरीर को बाहरी कपड़े, गहने और मेकअप से भरना सुंदरता नहीं है, जहां लगातार अहंकार जितना अनुपस्थित होगा सुंदरता उतनी अधिक होगी।
भीड़ का पीछा करना छूट गया, क्योंकि अब सवाल उठने लगे कि ये क्यों, और क्या? और जहां जहां से क्यों और क्या का जवाब नहीं मिला उस भीड़ का साथ छूटता गया।
त्यौहार मतलब किसी विशेष दिनों में खुद को सजाने से ज्यादा रोज शरीर को मजबूत बनाना हो गया, घर की सफाई से पहले अहंकार की सफाई ज्यादा जरूरी हो गई, और मान्यताओं को फॉलो करने से ज्यादा जरूरी खुद का भ्रम तोड़ना और लोगों के बीच जा जा कर उन्हें उनके भ्रम से परिचित करवाना हो गया।
परिणाम में आर्थिक दृष्टि से तो सबसे बड़ा लाभ हुआ है कि मेरे बहुत सारे पैसे बचने लगे, जिन्हें मै सिर्फ अहंकार की संतुष्टि के लिए खर्च करती थी।
और परिणाम में जो भीतरी लाभ हुआ वो है खालीपन मिटता गया क्योंकि मौज आने लगी। न किसी विशेष दिन या त्यौहार की आवश्यकता है कुछ भरने के लिए, न किसी व्यक्ति या किसी विषय की।
जितनी बार मैं आचार्य जी के ऑफलाइन सत्रों को अटेंड करके आती हूं, उतनी बार और निखर जाती हूं। और स्पष्टता आती है। और नया सीखती हूं जिससे और ऊपर उठती जाती हूं।
आचार्य जी 🙏
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*आचार्य जी *
*के साथ उम्र नहीं *
*हर उम्र से परे, चेतना ऊपर उठती हैं* 💐💐💐
लाभ ही लाभ हैं
जब जीवन हर पर में हो
हर उम्र में हो
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🙏 आत्म-परिवर्तन की ओर मेरा पहला कदम 💪
आज से मैंने जिम जाना शुरू कर दिया है। यह सिर्फ शरीर को मजबूत बनाने की शुरुआत नहीं है, बल्कि अपने आलस्य, बहानों और कमजोरियों को समझकर उनसे ऊपर उठने की एक छोटी-सी कोशिश भी है।
हालांकि, आज मुझे पहले से ज्यादा कमजोरी महसूस हो रही थी। लेकिन मैं अपनी इस स्थिति को देखकर पीछे नहीं हटना चाहता, बल्कि सजगता के साथ खुद को समझते हुए आगे बढ़ना चाहता हूँ।
कल *‘संघर्ष’ ऑडियोबुक* का एक्सेस भी ले लूँगा, ताकि शरीर के साथ-साथ अपनी समझ को भी बेहतर बना सकूँ।
छोटी-सी शुरुआत कर ली है मैंने खुद को बदलने की।
मुझे अभी बहुत आगे जाना है। अब कोशिश यही रहेगी कि हर दिन थोड़ा और सजग बनूँ, अपने बहानों को पहचानूँ और खुद के प्रति ईमानदार रहूँ।
मेरा लक्ष्य सिर्फ शरीर बनाना नहीं, बल्कि अपने भीतर समझ, अनुशासन और सही दिशा विकसित करना है।
आज एक कदम बढ़ाया है, अब रुकना नहीं है।🙏
#आत्मपरिवर्तन #सजगता #संघर्ष #अनुशासन #श्रीमद्भगवद्गीता
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यह मेरा पहला ऑफलाइन सत्र था। आचार्य जी अक्सर कहते हैं कि उन्हें लाइव सुनने और अपने सामने बैठकर सुनने में बहुत अंतर है। आज इस बात को प्रत्यक्ष अनुभव किया।
ऑनलाइन सत्रों की तुलना में सामने बैठकर सुनने का प्रभाव कहीं अधिक गहरा था। बातें और भी स्पष्टता से समझ में आ रही थीं। बीच-बीच में तो ऐसा लग रहा था, मानो मैं कोई सपना देख रही हूँ! आचार्य जी को अपने सामने बैठकर सुन पाना ही मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।
वहाँ मैंने एक ऐसे समाज की झलक देखी, जिसमें मैं रहना चाहती हूँ। जिस समाज में मैं रहती हूँ, उससे कहीं ऊँचे स्तर की समझ रखने वाले लोगों का समाज। वहाँ की समझ, वहाँ का वातावरण और वहाँ के लोगों को देखकर मन में एक ही भाव आया—Beautiful! 😍
इस अनुभव को शब्दों में पूरी तरह व्यक्त कर पाना शायद संभव नहीं है।
धन्यवाद आचार्य जी, इस के लिए और सब कुछ के लिए। 🙏❤️
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*भाई गीता कम्युनिटी के लोग*
जिनके यहाँ अभी तक पति या पत्नी में से कोई एक गीता सत्र से जुड़ा हुआ है आप लोग बहुत बड़ा मौज मिस कर रहे हो यार।
जिन्दगी में अगर साथ साथ जीवन जीना है तो भाई जो जुड़ा है ना उसकी यह जिम्मेदारी है कि वह दूसरे वाले को खींच ले अपने साथ।
*मैं मैं ऐसा कभी न था यार जैसा हूँ अभी। गीता सत्र ने बदल दिया है मुझे। और अब हम दोनों को।*
अवसर जाने के बाद पछताने के अलावा और क्या पाओगे।
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*✍🏻 पोस्ट 8 | 19 अक्टूबर '26*
*💭 विषय — ग्लोबल करंट अफेयर्स*
*─────────────*
🦧 *महाराष्ट्र से इंडोनेशिया के जंगलों तक: एक ओरंगुटान की घर वापसी!*
🌏 महाराष्ट्र के डोंबिवली में नवंबर 2024 में वन विभाग ने एक लगभग तीन साल के नर ओरंगुटान को एक अपार्टमेंट से बचाया था।
उसे कथित तौर पर अवैध रूप से कैद में रखा गया था। अब भारतीय और इंडोनेशियाई अधिकारियों के सहयोग से उसे उसके प्राकृतिक आवास इंडोनेशिया वापस भेजने की प्रक्रिया पूरी की गई है।
🌳 ओरंगुटान दक्षिण-पूर्व एशिया के वन क्षेत्रों में पाए जाने वाले बुद्धिमान प्राइमेट हैं। वे अपना अधिकांश समय पेड़ों पर बिताते हैं और जंगलों के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
जंगलों की कटाई, आवास का नष्ट होना और अवैध वन्यजीव व्यापार उनके अस्तित्व के लिए बड़े खतरे हैं।
⚖️ किसी जंगली जानवर को उसके प्राकृतिक आवास से निकालकर निजी मनोरंजन या शौक के लिए कैद करना केवल वन्यजीव संरक्षण के कानूनों का मामला नहीं है।
यह सवाल भी है कि क्या हमें किसी दूसरे जीव के जीवन और स्वतंत्रता पर केवल इसलिए अधिकार मिल जाता है क्योंकि हम उससे अधिक शक्तिशाली हैं?
🧠 *यहीं से अपने भीतर देखने की ज़रूरत शुरू होती है।*
मनुष्य प्रकृति और दूसरे जीवों को अपनी सुविधा की वस्तु मान लेता है। कोई जानवर उसे आकर्षित लगता है, तो वह उसे अपने पास रखना चाहता है। जंगल, नदियाँ और जीव-जंतु भी उसकी इच्छाओं को पूरा करने के साधन बन जाते हैं। वह यह नहीं पूछता कि दूसरे जीव के लिए क्या उचित है, बल्कि यह देखता है कि उससे उसे क्या मिल सकता है।
🔍 *करुणा केवल किसी जानवर को बचा लेने का नाम नहीं है; यह उस मानसिकता को पहचानना भी है जो उसे अपनी संपत्ति समझती है।*
यदि हम एक ओर किसी ओरंगुटान की आज़ादी का समर्थन करते हैं, लेकिन दूसरी ओर अपनी सुविधा के लिए दूसरे जीवों के शोषण को सामान्य मानते हैं, तो हमें अपनी सोच की इस असंगति को भी देखना होगा।
🌱 असली प्रश्न यह नहीं कि मनुष्य जानवरों के प्रति सही बर्ताव करता है या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या वह दूसरे जीव को भी अपने जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार वाला जीव मानता है। जब तक हर चीज़ को अपने लाभ के हिसाब से देखने की प्रवृत्ति बनी रहेगी, तब तक करुणा भी हमारी पसंद और सुविधा तक सीमित रहेगी।
❓ *क्या हम सचमुच प्रकृति और दूसरे जीवों का सम्मान करते हैं, या उन्हें तभी तक महत्व देते हैं जब तक वे हमारी इच्छाओं और सुविधाओं के काम आते हैं?*
*🔗 स्रोत:*
1. https://t.co/ZclIcb4VOD
2. https://t.co/GQnJ0uE78A
#AcharyaPrashant #EnvironmentAndClimate #Operation2030 #VidyaAvidya #GlobalCurrentAffairs
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पहले मैं अपनी बेटी के करियर को लेकर बहुत सोचती रहती थी, तनाव में रहती थी और परिणामस्वरूप उस पर अनावश्यक दबाव भी बनाती थी। गेम्स में प्रतिभाग करने पर रोक लगा दी, स्कूल एक्टिविटी भी नहीं करने दी, यह कहकर कि पूरा समय पढ़ाई करो।
पढ़ाई से ही सब कुछ मिलेगा, बाकी सब बेकार है। और उसने (बेटी ने) प्रयास भी किया। मुझे खुशी मिली कि मेरी बेटी मेरी बात मानती है।
एक दिन हॉस्टल वार्डन का कॉल आया कि आपकी बेटी चिड़चिड़ी-सी हो गई है, कोई बात सुनती नहीं है। स्कूल के अध्यापकों से भी बात हुई। उन्होंने बताया कि वह क्लास में बहुत ऊहापोह की स्थिति में रहती है। कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या चल रहा है।
फिर मैंने अपनी बेटी से बात की, तो उसने मेरे साथ भी कुछ अटपटे लहज़े में, या उसे बदतमीज़ी भी कह सकते हैं, ऐसे बात की, जिसे सुनकर मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। रोने का मन किया, लेकिन रोऊँ किससे?
एक दिन फिर हॉस्टल से फोन आया कि वेदिका (बेटी) की तबीयत खराब है। हमने अपने स्तर से इलाज करा दिया है, लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ। अब आप देख लीजिए कि क्या करना है।
मैं आनन-फानन में हॉस्टल पहुँची, तो पता चला कि उसको 15 दिन से सिरदर्द की समस्या हो रही है। मैंने तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाया। डॉक्टर ने काउंसलिंग की, तो पता चला कि उसको माइग्रेन की समस्या है।
दवा लेकर घर आई और उसके जल्दी ठीक होने का इंतज़ार करने लगी, क्योंकि पढ़ाई बाधित हो रही थी। वह मेरा जो अहम था, वह मेरे ऊपर पूरी तरह से हावी था। मैं बहुत परेशान थी।
बेटी से बात की, तो बोली, “मम्मी, पढ़ाई के साथ तैयारी नहीं हो पा रही, समय नहीं मिल रहा, सो नहीं पाती हूँ।”
फिर भी मैं उसको ही समझा रही थी कि सबमें मन लगेगा। और नहीं पढ़ना, तो घर आकर बैठ जाओ। इतना पैसा क्यों खर्च कर रही हूँ?
यह मेरा अहम ही था, जिसके अंधकार में मुझे मेरी ही बेटी का दर्द, तकलीफ़, उसकी कुंठा, कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। मैं अपनी बेटी से दिन-प्रतिदिन दूर ही जा रही थी।
अब मैंने बेटी पर दबाव बनाना छोड़ दिया है। मैं उस पर धन खर्च करके उस पर एहसान नहीं कर रही हूँ। उसकी आज़ादी छीनने का मुझे कोई हक नहीं है। मैंने उसे जन्म दिया है, तो उसकी सही परवरिश करना मेरा कर्तव्य है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं उस पर हरदम हावी रहूँ। उसका जिसमें भी मन लगे, मैं उसका साथ दूँ। ये सब बातें मैंने आचार्य जी से सीखीं।
आज मेरी बेटी बिल्कुल स्वस्थ है। वह खेल भी रही है, पढ़ भी रही है, क्लास में अच्छी पोज़ीशन है, एक्टिविटी में भी प्रतिभाग कर रही है और बहुत खुश रहती है।
वह मुझसे पूछती है, “मम्मी, तुममें यह परिवर्तन कैसे आया? तुम तो बिल्कुल ही बदल गई हो!”
धन्यवाद बहुत छोटा शब्द है, लेकिन इसके अलावा मेरे पास कोई और शब्द नहीं है। मैं सदैव आपकी आभारी रहूँगी।
धन्यवाद आचार्य जी, मेरे जीवन को सरल बनाने के लिए। 🙏
#AcharyaPrashant #Parenting
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🌺 *श्रृंगार वही, समर्पण बदल गया!* 📚
आज परीक्षा सत्र की तैयारी में दुर्गासप्तशती पर आचार्य जी के वीडियो देख रही थी। वहाँ एक बात समझ आई — *आशा सहित तमाम वृत्तियाँ तो रहेंगी ही, बस देखना यह है कि वे किसको समर्पित हैं।*
आप किसको समर्पित है? मिशन बुकस्टॉल से जुड़िए और जानिए, *जुड़ने के लिए आज ही इस फॉर्म को भरे*
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और यही बात श्रृंगार पर भी लागू होती है!
✨ पहले भी सजती-सँवरती थी, आज भी सजती हूँ। फ़र्क बस इतना है कि *अब यह श्रृंगार उस काम के लिए है, जो सबसे ज़रूरी है — सही बात को लोगों तक पहुँचाना।*
लोगों को स्टॉल तक लाना है, तो स्टॉल को सजाना भी ज़रूरी है और ख़ुद सजना भी! 😊
*आज सूट भी पहना, जो मैं कम ही पहनती हूँ,* नए पोस्टर्स, नवरात्रि थीम पर स्टॉल को सजाया। कुछ इस तरह मै नवरात्रि के नौ दिन गरबा खेल रही हूँ। *और ये गरबा बस नौ दिन नहीं होता, पूरे साल होता है।*🌸
बुकस्टॉल से जुड़ने के बाद सजने-सँवरने का अर्थ
बदला है।
अब सवाल यह नहीं कि क्या किया जा रहा है, बल्कि यह है कि किसलिए किया जा रहा है?
*अहंकार की सेवा में या राम की सेवा में?* 🙏
#AcharyaPrashant
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आख़िरकार इंतज़ार ख़त्म हुआ 🔥
एशियन गेम्स के मेडलिस्ट सत्र में आ रहे हैं और बुक साइनिंग में भी।
#AcharyaPrashant#APLive!
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*बुक स्टाल- एक दर्पण* 🪞
हैमबर्ग बुक स्टाल की कुछ तस्वीरें।
मेरी पहली बुक स्टाल थी ये और जितना मैंने सीखा है वहाँ पर, उतना सोचा भी नहीं था।
मुझे लगता था कि मुझे बहुत कुछ आता है पर वहाँ जाकर पता लगा कि कितने पानी में हूँ मैं। दूसरी तरफ़ ऐसे बिन्दु ख़ुद में देखने को मिले जो मैंने कभी नहीं सोचे थें।मुझमें कुछ योग्यताएँ भी हैं ऐसी मैंने नहीं सोचा था।
घर बैठे बैठे सत्र सुनकर लगता है कि सब आता है, हमें सब समझ आ रहा है और हम बेहतर हो रहे हैं पर वहाँ खड़े होकर लोगों को बताना एक अलग चुनौती है। खुद के लिए चुनौती कि हम कितना और कैसे लोगों को बता पा रहे हैं।
मैं अंत में उतना ही बता पाई जितना मैं खुद जीती हूँ। ये भी मैंने वही जाकर देखा।
अब और देखना और उस पर काम करना बाक़ी है।🙇🏻♀️💪🏼
जिन लोगों ने अभी तक बुक स्टाल में काम नहीं किया है वो एक बार जरूर करें ताकि उन्हें अपने बारे में बेहतर पता चले। जब आपके सामने लोग होते हैं और जबाब माँगते हैं तो झुन्नु ज़्यादा देर झूठ नहीं बोल पाता है बल्कि फिर जो निकलता है उसमें हमारा अहंकार बहुत क्षीण होता है।अहंकार को सीधा चुनौती मिलती है।
✨🪔✨
ख़ासकर लड़कियाँ ज़रूर जाये बुक स्टाल पर। हम इतने अलग अलग तरह के लोगो से बात करते हैं जिससे हमारी अपनी मान्यताएं टूटती हैं।
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काश
उनके बताए मार्ग पर हम भी चल पड़े,
और यह जीत उनकी जिंदगी की भी जीत बन जाए.............
🙏🙏 आचार्य जी🙏🙏
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Posted by Parmila Yadav on Acharya Prashant App.
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ये हम हैं,
ये हमारी ज़िंदगी है
और ये हमारी पार्टी हो रही है। 🎉
~आचार्य जी
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Posted by Akhilesh on Acharya Prashant App.
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♥️*ये तो प्रेम की बात है ऊधो,*
*बन्दगी तेरे बस की नहीं हैं।*🪔
मैने जिंदगी में बहुत जान लगाई है ,बहुत ज्यादा जान लगाई हैं और ये बात मैं थोड़ी यकीन के साथ कह सकता हूं ,क्योंकि सचमुच लगाई है, मैने ही लगाई है सारी बाजी न वही आकर रुक जाती है अंत में ,वहां आदमी कुछ नहीं कर सकता निहत्था खड़ा है। नंगा खड़ा है ,*प्यार है तो है नहीं है तो नहीं हैं*और तुम होगे ज्ञानी होगे ,कि तुम नेकनीयत हो ,न तुम्हारा ज्ञान काम आता है, न तुम्हारी नीयत काम आती ,ये राज कोई नहीं जानता कि
♥️*है प्यार तो है और नहीं है तो क्यों नहीं है*
तुम 20 साल, 50 साल, 200 साल भी मेरे साथ रह लो ।
ये तो प्रेम की बात है ऊधो,
बन्दगी तेरे बस की नहीं है।
कुछ बाते समझ में ही तब आती है, जब वो प्यार होता है ,वो बात न हो तो फिर समझ मे भी नहीं आती बात।
मैं भी.........🙂🙂
आशा का मरीज हूँ एक सत्र में 400 बार पूछता हु।
*बात आ रही समझ में ?*
जैसे मेरे पूछने से समझ में आ जाएगी, ह्म्म......
एक तो होता है दिल का टूटना💔, जब कुछ गहराई से चाहा हो अपने लिए और न मिले ,और उससे भी
ज्यादा गहरा दर्द अनुभव करना हो तो, कभी बहुत गहराई से चाहना किसी ओर के लिए ।
देखना कि जब चाहत पूरी नहीं होती है, भीतर कुछ कैसे तड़पता है और तुम बेबस और लाचार हो अपने व्यक्तिगत जितने भी युद्ध हो सकते थे। तुमने जीत लिए पर किसी दूसरे का दिल कैसे बदल दोगे तुम?
पत्थर है उसपर कुछ उग नहीं रहा और तुम उस पर मुट्ठियां मार रहे हो ,सर फोड़ रहे हो ,कुछ बदल नहीं रहा क्या करोगे ?
या तो हट जाओ पर अजीब आसक्ति है न जाने कौनसा मोह है, हटा भी नहीं जा रहा ,तो हटा दो ,न जाने कौनसी आशा है, हटाया भी नहीं जा रहा।
*जिनको सिखा रहे हो कि आजाद हो जाओ खुद उन्हीं के गुलाम बन गए हो ।*
ह्म्म......क्या करे.......
*आचार्य जी*....✍️
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Posted by LALIT VISHWAKARMA on Acharya Prashant App.
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*No concert, no movie date can beat the thrill of a live session.*
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Posted by VISHAKHA EVANEY on Acharya Prashant App.
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*एक सधे तो सब सधे।*
Whether it’s playing badminton, working, or singing bhajans, the person doing all of it is the same - me.
If I’m making excuses, avoiding effort, or settling for less than what I can give in one aspect of life, how can I expect to suddenly give my hundred percent in another?
I’ve often wondered how people manage work and recreational activities together. Somewhere, I had convinced myself that giving more time and energy to one would naturally mean compromising on the other.
But ever since I joined PAF, both the intensity of work and the time I spend on these activities have increased almost tenfold.
The work here demands the best of me, and most days, there’s hardly any room to get caught up in the usual trivialities of life.
And when I look at how much has changed, I know none of this would have been possible without Acharya Ji.
Had Acharya Ji not come into my life and rescued me from the way I was living, I would probably still be wasting my time and life on the same trivialities, without even realising what I was losing.
Even now, it’s not that I’ve suddenly become disciplined or stopped making excuses. The same old tendencies are still very much there. But at least I have begun to recognise them, and I have an environment that constantly challenges me to do better.
Today was another reminder of this.
We had a badminton game scheduled, and I also had an important release at work related to the upcoming Weekend with Master for which you can register from here: https://t.co/k1TIwz0UIZ
So, I was already tired, and with the release still pending, my mind had started presenting all sorts of reasons to skip badminton.
The release might take time. I had already had a long day. I could always play some other day.
And the interesting thing is, none of these reasons seemed unreasonable at the time.
I was almost ready to skip playing without even questioning whether I really needed to.
But the people I’m surrounded by don’t let me get away with my excuses so easily.
So I finally left for the court, played until my feet could barely keep up, and then sat down afterwards to finish the release.
And both got done.
What stayed with me wasn’t that I managed to play badminton and release a feature on the same day. There was nothing extraordinary about it.
What struck me was how easily I had convinced myself beforehand that the two couldn’t go together.
How often do I do this in other areas of my life?
How often do I accept whatever the mind presents as a perfectly valid reason, without even examining it?
Sometimes it’s tiredness, sometimes a lack of time, sometimes the belief that something simply isn’t possible.
Of course, there are genuine limitations, and not every reason is necessarily an excuse. But how often do I actually examine the difference?
This reminds me of a doha by Kabir Saheb:
मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक।
जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक॥
The mind has countless reasons, and I’m often far too quick to believe them.
And that’s why एक सधे तो सब सधे has started making more sense to me.
It’s not really about becoming better at managing multiple activities. It’s about looking at the one who is doing them.
Each day at PAF brings me face-to-face with some tendency of mine that I would otherwise have conveniently ignored. And being surrounded by people who keep questioning themselves and challenging their own limitations makes it difficult to remain entirely comfortable with mine.
P.S. Don’t let Dussehra Mahotsav with Acharya Ji become another missed opportunity.
https://t.co/k1TIwz0UIZ
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Posted by Saurav Bauddh on Acharya Prashant App.
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Since I started working at PrashantAdvait Foundation (PAF) four months ago, finding time to learn beyond my routine has become difficult.
Then I discovered Vidya Vidya, a platform that truly shakes my thinking. From climate change and current affairs to women’s empowerment, it explains complex issues beautifully and, most importantly, connects them to my life.
I strongly recommend everyone in the community to spend at least 30 minutes a day exploring this channel.
As Acharyaji says, the purpose of life is to learn. So let’s keep learning, questioning, and growing. 🔥
Vidya-Avidya: https://t.co/MashJ0cQ94
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Posted by Vinay Saini on Acharya Prashant App.
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*We just made the Acharya Prashant website faster* ⚡️
You shouldn't have to wait to reach Acharya Ji's teachings - that's one less excuse for the ego to avoid what it needs.
On the outside, the website looks exactly the same. On the inside, we've rebuilt it top to bottom on an architecture built for AI-driven rapid development.
Website: https://t.co/Y34arrN7KM
Some of you ran into trouble completing your Re-Enrolment. That one's on us: we found it, fixed it, and hope it went through smoothly after. 🙏🏻
Didn't get to finish it? Here you go: https://t.co/gTkDyKOkPE
The infra, the people, the late nights do not come for free.
To keep this running, support the Mission: https://t.co/hEq2mo2eCf
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Posted by Harshit on Acharya Prashant App.
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*अवलोकन*
आचार्य जी का पोस्टर आईने जैसा लगता है। दूसरी तस्वीर एक पेंटिंग है जो मैंने स्कूल में बनाई थी। दोनों को देखते हुए कुछ गड़बड़-सा लगा। मैंने समझने की कोशिश की कि ठीक-ठीक क्या है जो फिट नहीं हो रहा। फिर रुक गई और सोचा कि मैं बेवजह ही समझने की कोशिश कर रही हूँ, और उस प्रश्न को छोड़ दिया।
लेकिन फिर मैंने एक भेद पर ध्यान दिया। आचार्य जी का पोस्टर नज़र को भीतर की ओर मोड़ देता है, जबकि पेंटिंग बाहर की ओर देखने की क्रिया को पकड़ती हुई लगती है। मुझे लगता है, यही अंतर था जो बेमेल-सा लग रहा था।
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Posted by Himaashree Borah on Acharya Prashant App.
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