Updated DNA (Ancestry Test) Dataset of Yadav-Ahirs of the Gwalvansh Subdivision from Eastern Uttar Pradesh.
• Chandauli District (Varanasi Region), Uttar Pradesh
- 3 Academic samples, published in Nakatsuka et al. 2017/Narasimhan et al. 2019
· Yadav_UP:stockplate9_B2
· Yadav_UP:stockplate9_B3
· Yadav_UP:stockplate9_B4
• Gorakhpur District, Uttar Pradesh
- Sample from a privately tested individual
Yadav_UP:stockplate9_B3
Yadav_UP:stockplate9_B2
Yadav_UP:stockplate9_B4
are all have been traced as the samples of Ahirs from Gwal Bans sub-caste in Chandauli district of Uttar Pradesh.
Study: Nakatsuka et al (2017)
#Repost
The 980 CE Gwalior Inscription of "Madhavavanshi Vachchhilla Abhira" of the Nandakula, a Minister of the Kachchhapa Dynasty: The Earliest Epigraphically Attested Claimant of Krishna Descent Whose Tribe Still Exists Today - A Thread 🧵
Keyword- Informative
नमन: गाज़ीपुर के महान स्वतंत्रता सेनानी 🙏🇮🇳
उत्तर प्रदेश की क्रांतिकारी माटी, जिला गाज़ीपुर (ग्राम: चक मुकुंद-बरतर , थाना व तहसील: मोहम्दाबाद) के गौरव, श्री रामराज अहीर (पुत्र श्री अयोध्या अहीर) को कोटि-कोटि नमन, जिन्होंने सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के महासंग्राम में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।
देश की आज़ादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने के कारण उन्हें अप्रैल 1943 में '35 DIR' के तहत एक साल की कठोर सजा सुनाई गई। मातृभूमि की रक्षा के लिए उन्होंने पहले ग़ाज़ीपुर जिला जेल और फिर लखनऊ सेंट्रल जेल की कालकोठरी में रहकर देश के लिए हंसते-हंसते यातनाएं झेलीं।
राष्ट्र की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले ऐसे निर्भीक योद्धा और उनके इस ऐतिहासिक संघर्ष को हमारा सादर नमन।
इनके पौत्र श्री संदीप यादव का जानकारी उपलब्ध कराने के लिए सप्रेम धन्यवाद।
#GwalvanshiAhir #FreedomFighterRamrajAhir #Ghazipur
अमर शहीद गार्डसमैन राजनाथ सिंह यादव
निवास: ग्राम मुस्तफाबाद (नगाईन), ब्लॉक सादात, तहसील सैदपुर, जिला गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश
यूनिट: 8 Guards
रेजिमेंट: The Brigade of the Guards
युद्ध: भारत–पाक युद्ध 1971
गार्ड्समैन राजनाथ सिंह यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में पिता देवनंदन यादव और माता सुंदरी देवी के परिवार में हुआ था। उन्होंने ब्रिगेड ऑफ द गार्ड्स (भारतीय सेना की एक एलीट मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री रेजिमेंट) की 8वीं बटालियन की अल्फा कंपनी में भर्ती होकर भारतीय सेना की सेवा प्रारंभ की। वर्ष 1971 में 8 गार्ड्स की कमान लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह के हाथों में थी, जबकि अल्फा कंपनी का नेतृत्व मेजर हेमंत मांजरेकर कर रहे थे।
8 गार्ड्स को बांग्लादेश के हिली क्षेत्र में स्थित मोरापाड़ा को मुक्त कराने का दायित्व सौंपा गया था, जो पाकिस्तानी रक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण गढ़ था। मोरापाड़ा की रक्षा पाकिस्तानी सेना की 205 इन्फैंट्री ब्रिगेड की 4 फ्रंटियर फोर्स कर रही थी। यह क्षेत्र मजबूत बंकरों, कमर-गहरे पानी, बारूदी सुरंगों और बूबी ट्रैप्स से सुसज्जित था।
मेजर मांजरेकर के नेतृत्व में अल्फा कंपनी और मेजर आर. नाथ के नेतृत्व में ब्रावो कंपनी को अग्रिम आक्रमण का कार्य सौंपा गया। 22-23 नवंबर 1971 की मध्यरात्रि से पहले 38 मीडियम रेजिमेंट, 100 माउंटेन रेजिमेंट और 37 माउंटेन रेजिमेंट की तोपों ने पाकिस्तानी ठिकानों पर भीषण गोलाबारी शुरू कर दी। इस बीच ब्रावो कंपनी ने घासुरिया पर कब्ज़ा कर लिया, जबकि मेजर पी.पी. सिंह के नेतृत्व में चार्ली कंपनी ने बिना अधिक प्रतिरोध के मोरापाड़ा के उत्तर में स्थित नोआपाड़ा को मुक्त करा लिया।
रात 1 बजे, गार्ड्समैन राजनाथ सिंह यादव और उनके साथी सैनिकों ने मेजर मांजरेकर के नेतृत्व में अल्फा कंपनी तथा ब्रावो कंपनी के साथ आगे बढ़ते हुए हमला शुरू किया। लेकिन पाकिस्तानी रक्षा पंक्तियाँ अत्यंत मजबूत थीं और उन्होंने भारतीय सैनिकों की प्रगति रोक दी। इसी दौरान मेजर मांजरेकर पाकिस्तानी मीडियम मशीन गन (MMG) की गोली से सीने में घायल हो गए, फिर भी उन्होंने एक पाकिस्तानी बंकर में ग्रेनेड फेंककर उसे नष्ट कर दिया। इसके बाद सिर में गोली लगने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए।
सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह समरा और लांस नायक श्रीलाल ने आक्रमणकारी प्लाटून की कमान संभाली। इसी समय गार्ड्समैन राजनाथ सिंह यादव अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए युद्ध के सबसे भीषण मोर्चे पर पहुँच गए। अपने साथियों की कवरिंग फायर के बीच उन्होंने आगे बढ़कर एक पाकिस्तानी बंकर में ग्रेनेड फेंका और उसे ध्वस्त कर दिया। इसके बाद उन्होंने साहसपूर्वक अगले बंकर पर धावा बोला और उसे भी विस्फोट से नष्ट कर दिया।
दूसरी ओर, अल्फा कंपनी को भारी क्षति उठानी पड़ रही थी। हवलदार कैलाशनाथ तिवारी और हवलदार मनभाल उपाध्याय घायल हो गए। सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह समरा वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि ब्रावो कंपनी भी दुश्मन की गोलाबारी में फँस गई। उसके कमांडर मेजर आर. नाथ घायल हो गए और कंपनी की कमान कैप्टन एस.के. बंसल ने संभाली। इसी बीच अल्फा कंपनी के युवा अधिकारी सेकंड लेफ्टिनेंट परमानंद गुप्ता ने ब्रावो कंपनी को राहत पहुँचाने की जिम्मेदारी संभाली।
मोरापाड़ा अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हुआ था और लड़ाई जारी थी। गार्ड्समैन राजनाथ सिंह यादव लगातार रेंगते हुए आगे बढ़ते रहे ताकि दुश्मन के अगले MMG ठिकाने को नष्ट किया जा सके। उन्होंने अपने साथियों के साथ आगे बढ़कर व्यक्तिगत रूप से तीन पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया। तभी एक पाकिस्तानी रिकॉयलेस राइफल (Recoilless Rifle) दस्ते की नजर उन पर पड़ गई। उन्होंने एक रॉकेट दागा, जिसने गार्ड्समैन राजनाथ सिंह यादव को सीधे आघात किया और वे रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हो गए।
मोरापाड़ा की लड़ाई में अल्फा कंपनी को भारी हानि उठानी पड़ी, जिसके बाद मेजर के.के. राव के नेतृत्व में डेल्टा कंपनी को भेजा गया। बाद में 5 गढ़वाल राइफल्स की एक कंपनी भी सहायता के लिए पहुँची। 24 नवंबर तक भारी टी-55 टैंक कीचड़ में फँस चुके थे, लेकिन डेल्टा कंपनी, 69 आर्मर्ड रेजिमेंट के पीटी-76 टैंकों तथा अल्फा और ब्रावो कंपनी के बचे हुए जवानों के संयुक्त प्रयास से अंततः मोरापाड़ा पर कब्ज़ा कर लिया गया और 4 फ्रंटियर फोर्स को वहाँ से खदेड़ दिया गया।
गार्ड्समैन राजनाथ सिंह यादव जैसे वीरों के लिए ही ये शब्द कहे गए हैं—
“मृत्यु, तुम गर्व मत करो!”
बांग्लादेश की मुक्ति के लिए गार्ड्समैन राजनाथ सिंह यादव के परिवार ने अत्यंत बड़ी कीमत चुकाई। उनके पुत्र संतलाल यादव का जन्म उनकी शहादत के लगभग दो महीने बाद हुआ था।
6 सितंबर 2022 को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने उन भारतीय सैनिकों के परिवारजनों को सम्मानित किया, जिन्होंने बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया था।
गार्ड्समैन राजनाथ सिंह यादव के पौत्र श्री सोनू यादव को स्वयं प्रधानमंत्री शेख हसीना द्वारा सम्मानित किया गया। गार्ड्समैन राजनाथ सिंह यादव का जीवन और बलिदान भारतीय सेना के साहस, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च त्याग का अमर प्रतीक है।
गार्ड्समैन राजनाथ सिंह यादव जी के पौत्र श्री सोनू यादव का धन्यवाद, जिन्होंने इस लेख के लिए महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई।
जय हिन्द। 🇮🇳
#GwalvanshiAhir #MartyrGuardsmanRajnathSinghYadav #Ghazipur
Academic 'Yadav' Samples from Historic Paper "The Formation of Human Populations in South and Central Asia" by Narsimhan et al. 2019, Harvard University.
Jaipur,RJ(N=5) ; Chandauli,UP(N=3)
• Steppe_MLBA = 27.2 ; 25.0
• Iran_N = 44.4 ; 42.8
• AASI = 28.4 ; 32.2
Informative
Yadav_UP:stockplate9_B3
Yadav_UP:stockplate9_B2
Yadav_UP:stockplate9_B4
are all have been traced as the samples of Ahirs from Gwal Bans sub-caste in Chandauli district of Uttar Pradesh.
Study: Nakatsuka et al (2017)
#Repost
-Genetic heritage of the reverred Gwalbansi Ahirs-
*samples were taken from CHANDAULI region of Eastern Uttar Pradesh (was a part of the erstwhile Benaras district) (Nakatsuka 2017/Narasimhan 2019)
*the folks were Gwalbansi Ahirs from Saiyadraja
*A Thread 🧵
Ancestry Test (DNA) results of Ahir (Aheer) of 'Gwalvansh' Subdivision (Kuri/Khaap) from Gorakhpur, Eastern Uttar Pradesh.
Paternal Haplogroup (Y-DNA): R1a-Z93
Ancestry Composition:
• Steppe_MLBA: 26.6%
• Iran_N: 41.0%
• AASI: 32.2%
Genetic Distance Analysis:
Based on genetic distance metrics, the closest population match is with the Rajasthani Ahir of Jaipur, followed by the Gwalvanshi Ahirs of Chandauli (Varanasi region).
Following the academic DNA samples of Gwalvanshi Ahirs/Yadavs from Chandauli (Varanasi region), this is the first private DNA sample from a Gwalvanshi Ahir individual, bringing the total sample size for this subdivision to 4 (3 academic + 1 private).
स्वर्गीय जागेश्वर यादव (1917–1991) उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के एक प्रतिष्ठित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, किसान नेता और प्रखर राजनेता थे। उनका जन्म 11 जुलाई 1917 को बांदा के ग्राम पतवन में श्री भरोसा अहीर और श्रीमती छितिया के घर हुआ था। उनके परिवार की पृष्ठभूमि अत्यंत राष्ट्रभक्त थी; उनकी माताजी बांदा के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी श्री भिखारी अहीर की बहन थीं, जबकि उनके दो भाई, श्री भोला यादव और श्री बांके यादव, ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे और उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
जागेश्वर यादव ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम पतवन से ही पूर्ण की। यद्यपि उस युग में शिक्षा का स्तर सीमित था, किंतु उन्होंने न केवल अध्ययन किया, बल्कि शैक्षणिक चेतना के प्रसार में भी महती भूमिका निभाई। उन्होंने नगनेधी (बड़ीबड़ोखर) में शिक्षण कार्य किया और ग्राम पतवन तथा पुनाहुर में विद्यालयों की स्थापना की। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण उन्हें ब्रिटिश शासन के दमन का सामना करना पड़ा और उन्होंने 18 सितंबर 1942 से 19 मई 1944 तक कठोर कारावास की सजा भुगती।
स्वतंत्रता के उपरांत, उन्होंने स्वयं को जनसेवा और सामाजिक संगठनात्मक कार्यों में समर्पित कर दिया। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) के साथ कार्य किया और 1957 में PSP द्वारा संचालित 'खाद्य आंदोलन' में भाग लेने के कारण उन्हें पुनः 14 दिनों के कारावास का सामना करना पड़ा। वे मवल कांग्रेस समिति (बाबेरू) के महासचिव (1947–48) और जिला कांग्रेस समिति के सदस्य जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। साथ ही, उन्होंने चित्रकूट में 'यादव आश्रम' के प्रबंधक और 'श्री कृष्ण जूनियर हाई स्कूल' (पुनाहुर) के ऑडिटर के रूप में शिक्षा व समाज सेवा का कार्य किया।
उनके राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम अध्याय 1967 में तब आया, जब उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के टिकट पर बांदा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही वे बांदा के प्रथम स्थानीय निवासी बने जिन्होंने चतुर्थ लोकसभा में जिले का प्रतिनिधित्व किया। 1967 से 1971 तक सांसद रहने के दौरान उन्होंने किसानों की आवाज को संसद में प्रमुखता से उठाया। सांसद पद से हटने के बाद और पार्टी में टिकट की उपलब्धता न होने पर वे पुनः कांग्रेस में शामिल हो गए।
साहित्य और दर्शन के प्रति उनकी रुचि का प्रमाण इस बात से मिलता है कि उत्तर-जीवन में उन्होंने संस्कृत का गहन अध्ययन किया। वे आर्य समाज से भी जुड़े और यादव महासभा जैसे मंचों के माध्यम से समाज को संगठित करने के निरंतर प्रयास किए। किसान नेता के रूप में उनकी साख इतनी सुदृढ़ थी कि तत्कालीन दिग्गज नेता चौधरी चरण सिंह भी उनसे अत्यंत प्रभावित थे, जिन्हें जागेश्वर यादव ने बांदा में आमंत्रित भी किया था। सामाजिक एकता को नया आयाम देने के लिए उन्होंने चित्रकूट में यादव धर्मशाला का निर्माण कराया और श्री परसन सन्यासी के सहयोग से पूरे जिले में सामाजिक जागरण का कार्य किया। 14 मई 1991 को इस जननायक का देहावसान हो गया। उनके पुत्र, श्री आलोक सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश पुलिस में उप-निरीक्षक के पद पर अपनी सेवाएं प्रदान कर परिवार की सेवा-परंपरा को आगे बढ़ाया।
#GwalvanshiAhir #MPJageshwarYadav #BandaLokSabhaConstituency
इंडियन एथलेटिक्स सीरीज़–9 में रोहित यादव (जौनपुर) ने 83.76 मीटर के व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ स्वर्ण पदक जीतकर 2026 राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth Games) के लिए क्वालीफाई किया, जबकि आशीष यादव (मिर्ज़ापुर) ने 72.27 मीटर के प्रभावशाली थ्रो के साथ कांस्य पदक हासिल कर 2026 विश्व एथलेटिक्स अंडर-20 चैंपियनशिप के लिए अपना स्थान सुनिश्चित किया।
दोनों खिलाड़ियों को इस शानदार उपलब्धि पर हार्दिक बधाई तथा आगामी प्रतियोगिताओं के लिए शुभकामनाएँ। 🇮🇳
#RohitYadav #AshishYadav #IndianAthleticsSeries9 #GwalvanshiAhir
ग्राम बम्हौर, मुबारकपुर, आजमगढ़ के गौरव यादव, पुत्र श्री रामअवतार यादव (Army), ने भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बनकर जिले का मान बढ़ाया। राष्ट्र सेवा के उनके इस गौरवपूर्ण दायित्व के लिए उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना।
#GwalvanshiAhir#LieutenantGauravYadav #BamhaurAzamgarh
Academic 'Yadav' Samples from Historic Paper "The Formation of Human Populations in South and Central Asia" by Narsimhan et al. 2019, Harvard University.
Jaipur,RJ(N=5) ; Chandauli,UP(N=3)
• Steppe_MLBA = 27.2 ; 25.0
• Iran_N = 44.4 ; 42.8
• AASI = 28.4 ; 32.2
Informative
At the Indian Athletics Series-9:
• Rohit Yadav (Jaunpur): Gold 🥇 | 83.76m (PB) → Qualifies for Commonwealth Games 2026
• Ashish Yadav (Mirzapur): Bronze 🥉 | 72.27m → Qualifies for World U20 Championships 2026
The 'Janeodhari Ahirs' of Banaras, who call themselves the offspring of the cowherds of Krishnas fame, as sons of Nandmohar & Jasoda i.e. Gwalvanshi Ahirs, influenced Hariharganj & Chhatarpur residents through Ahirs who had visited Kashi & come into contact with them
Informative
वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर निवासी युवा हॉकी खिलाड़ी राहुल यादव ने एशिया अंडर-18 हॉकी चैंपियनशिप में अपने शानदार प्रदर्शन से देश का गौरव बढ़ाया है। जापान में आयोजित इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता के फाइनल मुकाबले में भारत ने मेजबान जापान को 4-1 से पराजित कर खिताब अपने नाम किया। इस ऐतिहासिक जीत में राहुल यादव ने महत्वपूर्ण गोल दागकर निर्णायक भूमिका निभाई।
राहुल की यह उपलब्धि न केवल वाराणसी, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश और भारत के लिए गर्व का विषय है। उनकी अथक मेहनत, समर्पण और संघर्ष ने उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया है, और आज वे लाखों युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं।
राहुल यादव को इस ऐतिहासिक सफलता के लिए हार्दिक बधाई एवं उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएँ।
Pilot Officer Dharamraj Ahir: A Forgotten Hero of Two Continents
Born on September 10, 1918, in South Africa, Pilot Officer Dharamraj Ahir embarked on a journey to India to pursue a career in medicine. However, the outbreak of World War II changed his course.
Driven by a sense of duty, he volunteered for the Royal Indian Air Force, becoming the first known South African of Indian origin to serve as a military pilot. Dharamraj flew the Westland Lysander II with No. 4 Squadron of the Royal Indian Air Force, stationed in Kohat—then part of British India, now in Pakistan. On April 21, 1942, tragedy struck when his aircraft crashed shortly after takeoff. Just 24 yrs old, Dharamraj succumbed to his injuries in the line of duty. His courage and sacrifice are commemorated at the Cenotaph in Durban and Delhi–Karachi 1939–1945 War Memorials.
Ahir’s legacy traces back to Hari Kheda village near Sisendi in the Lucknow district of Uttar Pradesh, India, from where his family hailed. His father, Goordeen, a Gwalvanshi Ahir, migrated from India to France in 1881, before eventually settling in Newcastle, in the Natal province of South Africa. A man of resilience and vision, Goordeen Ahir was a farmer, a businessman, a respected community leader, and a skillful wrestler whose strength and discipline earned him admiration within the Indian diaspora.
During the Anglo-Boer War, he earned the unique distinction of being the sole Indian businessman authorized to trade horses with the military. Beyond his commercial ventures, he played a significant role in political affairs, contributed actively to the resistance movement, and was held in high esteem for his philanthropic endeavours. His contributions were instrumental in the construction of Hindu temples in Newcastle, leaving a spiritual and cultural legacy that still endures.
#GwalvanshiAhir #PilotDharamrajAhir #GoordeenAhir #Lucknow
Ancestry Test (DNA) results of Ahir (Aheer) of 'Gwalvansh' Subdivision (Kuri/Khaap) from Gorakhpur, Eastern Uttar Pradesh.
Paternal Haplogroup (Y-DNA): R1a-Z93
Ancestry Composition:
• Steppe_MLBA: 26.6%
• Iran_N: 41.0%
• AASI: 32.2%
Genetic Distance Analysis:
Based on genetic distance metrics, the closest population match is with the Rajasthani Ahir of Jaipur, followed by the Gwalvanshi Ahirs of Chandauli (Varanasi region).
Following the academic DNA samples of Gwalvanshi Ahirs/Yadavs from Chandauli (Varanasi region), this is the first private DNA sample from a Gwalvanshi Ahir individual, bringing the total sample size for this subdivision to 4 (3 academic + 1 private).