आज खलीलाबाद में भारतीय जनता पार्टी गोरखपुर क्षेत्र के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष, आदरणीय बड़े भाई श्री संजीव राय जी से नेदुला स्थित उनके आवास पर आत्मीय शिष्टाचार भेंट हुई।
Hydrogen cars could be a pretty interesting chapter in India’s mobility story.
With zero tailpipe emissions, faster refuelling and potentially better range, hydrogen fuel-cell vehicles have some real advantages over traditional EVs.
But the big question is infrastructure. We’ll need hydrogen production, refuelling stations and cost-effective technology at scale.
I don’t think hydrogen will replace EVs anytime soon. But in the coming years, it could become an important option, especially for long-distance and heavy mobility.
What do you think — Hydrogen or EVs?
I got a chance to experience Hyundai’s Nexo in South Korea. They claim that the by-product of this hydrogen car, which is water, is drinkable, so we tasted it too!
See how a hydrogen car works and how its fuel is filled.
दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी को रायता फैलाने से रोकते हुए उनके कान में कहा "कुछ भी कर लो आएगा तो मोदी ही क्योंकि तुम छात्रों के लिए नहीं बल्कि 5 जी घोटाला करने के लिए परेशान हो"
आंदोलन तभी खड़े होते हैं जब धरातल की वास्तविकता को जिम्मेदार समझ नहीं पाते, देश की शिक्षा व्यवस्था में जंग लग चुका है, वर्तमान में देश की व्यवस्था इस लायक नहीं है कि युवाओं की बड़ी आबादी को रोजगार दे सके, फर्क नही पड़ता कि वो सरकारी है या प्राइवेट लेकिन अभी की व्यवस्था फेल है। इसको अगर कोई झूठला रहा तो वह जानबूझ���र सच्चाई से मुंह मोड़ रहा। यूनिवर्सिटी और कॉलेज डिग्रियां तो बांट रहे पर वो छात्र प्रोडक्टिव नहीं हैं। सच्चाई यही है हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था रोजगार नहीं पैदा कर पा रही, शिक्षण संस्थानों की चमकदार बिल्डिंग और हाई-फाई व्यवस्था भी छात्रों के प्लेसमेंट में पूरी तरह फेल है। ऐसे परिस्थितियों में जब कोई पेपर लीक की घटना हो जाती तो यह आग में घी का काम करती है। पुरानी जंग लगी व्यवस्थाओं को ब���लने का समय आ चुका है, विचार हो, चिंतन हो और हर हाल में बदलाव के लिए कठोरता से इग्जक्यूशन हो। हमारी चुनौती है हमें ही इसका हल ढूंढना होगा। छात्रों के आंदोलन को दूसरी दिशा में मोड़ा जा रहा, मुद्दे बदले जा रहे, आंदोलन की कमान घूम के फिर टुकड़े-टुकड़े गैंग के पास पहुंच चुकी है। आंदोलनों की भेंट अगर कोई निर्दोष छात्र-छात्रा चढ़ जा रहा, तो यह बहुत अधिक पीड़ादायक है। कमियों पर बहस होनी चाहिए, सुधारों पर चिंतन होना चाहिए। भाजपा पर लोगों का विश्वास अब भी मजबूती से बना है, वह टूटना नहीं चाहिए।
सरकारी कर्मचारी जिस भी सरकार को जब भी बदलना चाहते हैं, बदल देते हैं या ऐसा एजेंडा खड़ा कराने वालों का सहयोग करते हैं। इस देश को नौकरशाही ही चलाती है अपने हिसाब से। पर पेपर लीक होना दुर्भाग्यपूर्ण है, व्यवस्थाओं को ठीक करने की जिम्मेदारी अंततः सरकार की ही होती है, सरकार को ही व्यवस्था बनानी होगी की पेपर लीक की पुनरावृत्ति न हो क्योंकि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। आंदोलन के नाम पर अगर कोई अराजक यह कहेगा कि संसद को उखाड़ दिया जाएगा, नेपाल बना दिया जाएगा तो ऐसे अराजक तत्���ों को रोकना भी सरकार की ही जिम्मेदारी है ताकि उन्हें यह पता चले कि ऐसे ��ुःसाहसी विचारों का भारत कैसे दमन करता।
जबसे @irohitmishrabjp भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष बने है, तबसे तमाम फेक अकाउंट से और राजनीतिक एजेंडे के तहत कुछ पुरानी पेपर कटिंग वायरल की जा रही। आरोप प्रत्यारोप भी ऐसे लोग लगा रहे जिनकी खुद की छवि रसातल में है। ���क ही सूत्र है ब्राह्मण नेता कोई उभरने नहीं देना है, एक उहे खराब होंय बाकी लोग तो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के औलाद होंय। ब्राह्मणों को सुनियोजित तरीके से फंसाने का एजेंडा राजनीतिक का नया ट्रेंड है। पहले फर्जी FIR दर्ज कराओ फिर खतम कर दो। यह राजनीति का निम्नतम स्तर है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के बीटेक थर्ड ईयर के छात्र घनेन्द्र चौधरी का इंटरनल पेपर में 0 नम्बर मिलने के नाते फेल होने के वजह से आत्महत्या करना, किसकी गलती माने विश्वविद्यालय की उस छात्र की या हमारे एजुकेशन सिस्टम की ?? विश्वविद्यालय में प्लेसमेंट के नाम पर फर्जी प्लेसमेंट दिया जा रहा। जिन संस्थाओं में अच्छी प्रशासनिक व्यवस्था है वहां कंपनियां खुद आकर प्लेसमेंट देती हैं, यदि कोई छ���त्र शून्य नम्बर पा रहा, यह सवाल केवल उस छात्र पर नहीं उस संस्था पर भी खड़ा होता है, यार उसने कुछ तो लिखा होगा !! बदलाव की आवश्यकता है, व्यवस्थाओं को बदलना पड़ेगा, तौर-तरीकों को बदलना पड़ेगा, यही समय की मांग है, यही युवाओं की मांग है।
देश के सभी राज्यों के जिला मुख्यालय और तहसील मुख्यालय पर सरकार को प्रेस क्लब भवनों का निर्माण करना चाहिए, जहाँ मीडिया के लिए आधुनिक सुविधाएं हों, वाई-फाई, कम्यूटर लैब, प्रेस वार्ता के लिए आधुनिक कक्ष हो। साथ ही कंटेंट क्रिएशन के लिए आधुनिक पॉडकास्ट रूम की व्यवस्था भी हो। बदलते समय के साथ आवश्यकताओं को देखते हुए नीतियां बननी चाहिए।
भारत और अन्य देशों में पत्रकारों की स्थिति के बारे में अध्ययन कर रहा था, पत्रकार किसी भी देश के लोकतंत्र के मजबूत स्तंभ होते हैं, दुनिया भर में पत्रकारों का काम है कि वो सरकार और जनता के बीच में कड़ी बनने का काम करते हैं। सरकार की बातें जनता तक और जनता की बातें सरकार तक। पत्रकारों ��े अधिकार सुरक्षा और कानून की बात करें तो 'World Press Fredom Index RSF 2025' में 180 देशों की भारत 151 वें स्थान पर है। दुनिया में पत्रकारों के अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े ढेरों कानून हैं लेकिन दुर्भाग्य की भारत में पत्रकारों से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण कानून नहीं है। भारत के संविधान में 'प्रेस की स्वतंत्रता' जैसा कोई शब्द ही नहीं है। पत्रकारिता पेशे को सुरक्षा देने वाला कोई कानून भारत में नहीं है। Artical 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जो आम आदमी के लिए है वही मीडिया पर लागू है। बहुत से पत्रकारों पर UAPA राष्ट���रविरोधी गतिविधि और PMLA काले धन के नाम पर ED की कार्यवाही होती है। Defamation मानहानि, देशद्रोह sedition (अस्थाई रोक) और अदालत की अवमानना contempt of court आदि के नाम पर पत्रकारों पर कार्यवाही होते रहती है। भारत में पत्रकारिता करते हुए बहुत से पत्रकारों की हत्या और झूठे मुकदमे होते रहते है लेकिन कोई विशेष कानून न होने के नाते पत्रकारों को सुरक्षा नहीं मिल पाती। इसके सबसे ज्यादा शिकार ग्रामीण क्षेत्रों के पत्रकार हो��े हैं। इन विसंगतियों में स्वस्थ और मजबूत पत्रकारिता के लिए कानून बनना जरूरी है। स्वीडन दुनिया का पहला देश है जिसने प्रेस की स्वतंत्रता को अपने संविधान में लिखा। नार्वे वर्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 1 नम्बर पर है। नार्वे और जर्मनी में Shield Law के तहत पत्रकारों को अदालती गवाही में अपने सूत्रों (sources) की जानकारी देने से छूट मिलता है। ऐसा ही कानून UK में भी है। अमेरिका का First Amendment में यह प्रावधान है कि सरकार किसी content को pre-approve नहीं कर सकती और सच्ची खबर के लिए पत्रकारों को आम तौर पर दंडित नहीं किया जा सकता। भारत की बात करें तो यहां PIB accreditation केंद्र स्तर तक सीमित है, देश में कोई ऐसी संस्था नहीं है जो इन सबको मान्यता दे।
दुनिया के तमाम देशों के प्रावधानों को देखकर ये कुछ नियम और कानून भारत में लागू किए जा सकते हैं-
• Shield Law- सूत्र संरक्षण कानून जैसा Denmark, Finland, Germany, Norway, Sweden आदि देशों में है।
• एक राष्ट्रीय, निष्पक्ष, स्वतंत्र accreditation body बनाई जाए ��ो state, district और freelance journalists सभी को cover करे और पहचान पत्र जारी करे।
• SLAPP- विरोधी कानून
जैसे EU ने 2024 में किया जिसमें झूठे, intimidatory मुकदमों (SLAPP suits) के खिलाफ कानून बने ताकि पत्रकारों को कानूनी उत्पीड़न से बचाया जा सके।
• स्वतंत्र Media Regulator
स्वीडन की तरह बने जो एक independent media ombudsman हो जो censorship complaints सुने और पत्रकारिता को संरक्षण दे और कार्यवाही का अधिकार भी रखे।
• Media Transparency Bill बने जिसके द्वारा मीडिया के एकाधिकार और राजनीति प्रेरित मीडिया विज्ञापनों पर रोक लगाई जा सके।
• समय के साथ डिजिटल मीडिया का विकास हुआ है इसलिए Digital Journalist Recognition Law की भी जरूरत है जो यूट्यूब और वेब पोर्टल के पत्रकारों को पहचान दे सके।
• Police-Media SOP बने पुलिस और मीडिया के बीच स्पष्ट लिखित नियम हो किस स्थिति में कौन क्या करेगा, ताकि कवरेज के समय व्यवधान और टकराव न ���ो।
• पत्रकार RTI लगाए तो उसे सही सूचना त्वरित प्राप्त हो, गलत जानकारी देने पर दंडात्मक कार्यवाही हो।
• पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को ट्रेनिंग दी जाए कि मीडिया और प्रशासन के बीच व्यवहार कहाँ कैसे होगा।
• पत्रकार कल्याण बोर्ड बनाकर दुर्घटना, बीमारी में घायल या मृत्यु की दशा में सम्मानजनक आर्थिक सहायता की जाए।
• इन सभी कानूनों को व्यवस्थित करने के लिए (National Journalist Protection Act) लागू किया जाना समय की अ��ि��ार्य मांग है।
@MIB_India @PIB_India @DainikBhaskar
@JagranNews
(This blog was first published on Twitter on April 14, 2026, at 5:53 PM)
प्राथमिक शिक्षा के शुरुआती दिनों में मुझे खलीलाबाद के शिक्षा निकेतन में कुछ दिन पढ़ने के लिए भेजा गया, लेकिन वहाँ मैं पढ़ने जाना नहीं जाना चाहा, फिर कुछ दिन गन्ना विकास विद्यालय में भेजा गया, लेकिन वहां भी पढ़ाई नहीं किया फिर इसके बाद जहाँ खलीलाबाद का लक्ष्मी नारायण मंदिर है उसमें सरस्वती शिशु मंदिर चलता था उसमें पढ़ने भेजा गया तो ��स बार वहां रुक गया, मुझे स्पष्ट याद नहीं बिल्कुल धुंधली सी स्मृति है, मुझे परिवार के लोगों ने बताया कि वहां के आचार्य जी लोगों ने मुझे शुरुआत में पढ़ने के लिए बाध्य न करके बस स्कूल में रोज आने को ही बोला था, वहां शिशु और प्रथम दो वर्ष पढ़ा। उस विद्यालय द्वारा लक्ष्मी नारायण मंदिर में ही वाद्य यंत्रों के साथ मधुर स्वर में सरस्वती वंदना 'या कुन्देन्दु-तुषारहार धवला' का वह धुन आज तक भुला नहीं है। उ���के बाद धनघटा में सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में क्लास दो से आठवीं तक पढ़ाई किया, जिसमें 2-3 वर्ष सेनापति का चुनाव जीता। हालांकि धनघटा का वह विद्यालय अब बंद हो गया है जिसका मुझे हमेशा दुःख रहता है। उस विद्यालय में प्रधानाचार्य श्री ब्रह्मानंद राय जी द्वारा स्कूल की छुट्टी होने के पहले समझाई गयी बातें, छोटे बच्चों के अंतः मन में जीवन भर के लिए बैठ गईं। बहुत से नए विद्यालय बने और बंद हो गए लेकिन व��द्या भारती द्वारा संचालित इन विद्यालयों में पढ़ाई के साथ-साथ जीवन जीने की कला को बताया और सिखाया जाना उन्हें अन्य सभी विद्यालयों से बिल्कुल भिन्न बनाता है। अगर कोई अपने बच्चे के प्राथमिक शिक्षा के लिए कहीं एडमिशन के लिए स्कूल के बारे में सोच रहा रहा तो 'सरस्वती शिशु मंदिर' के बारे में एक बार विचार करना चाहिए बाकी बच्चे की आगे की शिक्षा जैसी भी कोई चाहे करवाए।