ईरान अमेरिका युद्ध विराम की घोषणा के बाद दोनों देश पाकिस्तान को शुक्रिया बोल रहे हैं।
भारत ने भी ये सारे युद्ध रुकवाए हैं इतिहास पर एक नजर डाल लीजिए।
भारत ने अपनी स्वतंत्रता के बाद से विश्व शांति के लिए कई महत्वपूर्ण देशों में युद्ध विराम (Ceasefire) और शांति स्थापना में निर्णायक भूमिका निभाई है। भारत का सबसे प्रमुख योगदान संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों (UN Peacekeeping) के माध्यम से रहा है।
भारत द्वारा मध्यस्थता और युद्ध विराम में निभाई गई मुख्य भूमिकाएँ यहाँ दी गई हैं:
कोरिया (1953): भारत ने कोरियाई युद्ध को समाप्त करने के लिए आर्मिस्टिस समझौता (Armistice Agreement) कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत 'न्यूट्रल नेशंस रिप्रैट्रिएशन कमीशन' (NNRC) का अध्यक्ष था, जिसने युद्धबंदियों की अदला-बदली की समस्या को सुलझाया था।
वियतनाम, लाओस और कंबोडिया (1954): भारत ने इंडो-चाइना में युद्ध विराम की निगरानी के लिए बनाए गए 'इंटरनेशनल कमीशन फॉर सुपरविज़न एंड कंट्रोल' (ICSC) के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था।
मिस्र (स्वेज संकट, 1956): स्वेज नहर के संकट के दौरान जब ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल ने मिस्र पर हमला किया था, तब भारत ने तत्काल युद्ध विराम के लिए कड़ा रुख अपनाया और शांति बहाल करने में मदद की थी।
कांगो (1960-1964): कांगो संकट के दौरान गृहयुद्ध को रोकने और शांति व्यवस्था बनाने के लिए भारत ने अपनी सेना भेजी थी, जिसे आज भी संयुक्त राष्ट्र के सबसे सफल मिशनों में गिना जाता है।
ऑस्ट्रिया (1955): भारत ने सोवियत संघ और ऑस्ट्रिया के बीच मध्यस्थता की थी, जिसके परिणामस्वरूप सोवियत सैनिकों की वापसी हुई और ऑस्ट्रिया ने अपनी निष्पक्षता घोषित की थी।
इसके अलावा, भारत ने लेबनान, सूडान, दक्षिण सूडान, साइप्रस, लाइबेरिया, सोमालिया और रवांडा जैसे देशों में भी शांति मिशनों के माध्यम से युद्ध विराम बनाए रखने में मदद की है।
#Israël
#Irán
अगर वाजपेई प्रधानमंत्री होते या इंदिरा गांधी होती तो इस महायुद्ध का समझौता भारत करा रहा होता । भारत निसंदेह ईरान से लेकर GCC देशों का सबसे प्रिय और पुराना मित्र रहा है।
अफसोस है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश दुनिया के इस बड़े फैसले में कहीं नहीं है ?
हमारी गलत विदेश नीतियों के कारण जो मुल्क आज दिवालिया है वो हैसियत से बढ़कर रोल निभा रहा है !
और हम तमाशबीन बनकर खड़े हैं ।
चलिये आईपीएल का मजा लीजिये और चुनावी रैलियां करिये ! यही आपके बस में है | यही आपका लक्ष्य भी है।
@Profdilipmandal सबसे पहले तो obc का वर्गीकरण करना चाहिए, मूल पिछडी जातियों को आरक्षण का लाभ अभी तक मिला ही नही
Obc आरक्षण का लाभ कुछ ही जातियां ले रही हैं
लाइब्रेरी, जला दी गई..
या जल गई। पता नही, पर कहा जाता है कि अलेग्जेंड्रिया की लाइब्रेरी, दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी थी। इतनी बडी, कि केवल किताबो की सूची ही, 192 खंडों में हुआ करती थी।
●●
सिकन्दर महान ने दुनिया जीती। पहले इजिप्ट जीता, और वहां अपने नाम का शहर बसाया। उसकी तमन्ना थी, अपने गुरु एरिस्टोटल को दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी बनाकर दे।
लेकिन वो तमन्ना रह गयी, सिकन्दर चल बसा। टॉलमी में ये बीड़ा उठाया। औऱ दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी तामीर कर दी।
समुद्र तट पर, एक गगनचुंबी लाइट हाउस बना, जो दुनिया के सात अजूबों में गिना गया। लेकिन उसके पास ही तट पर बनी ये लाइब्रेरी,
पूरी दुनिया के लिए ज्ञान का लाइट हाउस थी।
●●
टॉलमी को जुनून था, कि दुनिया की हर बुक, हर मैन्युस्क्रिप्ट की एक कॉपी उस लाइब्रेरी में हो। जहाज जो बंदरगाह पर आते, उन्हें किताबे लाने का आदेश था।
उसकी प्रतिलिपि बनती, और जहाज पर लौटा दी जाती। ये शहर, समुद्र का चौराहा था। तो हर संस्कृति की किताब, उसका ज्ञान वहां था।
टॉलमी और उसके वंशज, उस लाइब्रेरी में पढ़ने, शोध करने के लिए दुनिया भर से स्कॉलर्स बुलाते। मुफ्त रहना खाना और इज्जत देते। स्कॉलर के शोध भी लाइब्रेरी का हिस्सा बनते।
विज्ञान, गणित, भूगोल, नेविगेशन, कलाएं तमाम विषयो पर अन्वेषण के लिए अलेग्जेंड्रिया विश्व की राजधानी बन गया।
●●
कहते हैं, जब जूलियस सीजर नें यहां आक्रमण किया, तट की रक्षा कर रहे जहाजो पर अग्निबाण चलवाये।
ये आग शहर में फैली लाइब्रेरी खाक हो गई।मगर इस पर डाउट है। क्योकि लाइब्रेरी का, उसके स्कॉलर्स का विवरण सीजर के 500 साल बाद तक मिलता है।
मगर यह लाइब्रेरी पांचवी शताब्दी आते आते, खत्म हो गयी। साथ ही अलेग्जेंड्रिया से ज्ञान का सूरज अस्त हो गया।
माना जाता है कि इसकी किताबो, ज्ञान, विज्ञान से डरे सहमे राजवंशों ने, और उस दौर के धार्मिक नेताओं ने इसे धीमी मौत दे दी, या जलवा दिया।
यह कारण, अधिक सम्भव प्रतीत होता है। हिट'लर से लेकर मा'ओ ने किताबो की होली जलवाई है, नया इतिहास गढ़ा, पुराना मिटाया है।
चर्च और फतवा देने वाले आलिमो ने गैलीलियो, कोपरनिकस और सुकरात का क्या हाल किया, आप जानते हैं।
●●
नालंदा जलाने वाले बख्तियार खिलजी जैसे ज्ञान के दुश्मन भारत मे भी हुए। मगर सच्चे हिन्दू ज्ञान के दुश्मन कभी न रहे।
भारत ज्ञान का कोष रहा। शिक्षा, शिक्षक, ज्ञान, किताबो का सम्मान हर हिन्दू करता है, यह गर्व हमारे साथ हमेशा रहा।
जब तक कि पिछली राम नवमी, बिहार शरीफ में 110 साल पुरानी लाइब्रेरी में आग लगा न दी गयी।
हालांकि इसके पहले मैसूर में एक लाइब्रेरी को 2021 में आग लगा दी गयी थी। एक मुस्लिम मजदूर द्वारा संचालित इस लाइब्रेरी में गीता और कुरान की कन्नड़ प्रतियां भी थी।
●●
लाइब्रेरियों का जलना, उसके बाद आने वाले दौर की आहट होती है।
तो एलेक्जेंड्रिया के पराभव के बाद, यूरोप में पांचवी से लेकर 15 शताब्दी का काल, अंधकार युग कहा जाता है।
इस युग मे कोई वैज्ञानिक, बौद्धिक प्रसार न हुआ। ज्ञान का एकमात्र स्रोत धर्म रहा।धर्मगुरुओं का वचन ही विज्ञान था।
धरती ईश्वर चलाता, उसकी मर्जी से पत्ते खड़कते। डेढ़ हजार साल मानवता धर्म के चंगुल में फंसी रही।
●●
15 वीं शताब्दी के बाद पुनर्जागरण हुआ, तो मार्टिन लूथर, न्यूटन, डार्विन, आईंस्टीन हुए। 400 साल में औद्योगिक क्रांति, चिकित्सा क्रांति, डिजिटल क्रांति हुई।
राजतन्त्र खत्म हुए, रिपब्लिक बने, लोकतन्त्र आया। आज हम मानव इतिहास के सबसे आजाद लोग हैं।
मानवता तकनीक के शीर्ष पर है। भारत उसका सरमौर बन सकता था। ऐसे वक्त हमने बीते युग की ओर मुड़ना तय किया।
गोमूत्र और ज्योतिष पर नए कोर्स शुरू किए। धर्म के नए ठिये बनाये। ठान लिया कि यूरोप में हुए 1000 साल के प्रयोग को दोहराएंगे।
ताजा इतिहास मिटेगा, विज्ञान हटेगा। हम वैदिक युग, सिंधु घाटी सभ्यता, और बिजली विहीन राम राज में जाएंगे। धर्म की सुप्रीमेसी, अंधकार का युग लाएंगे।
●●
इस युग का शुभारंभ, लॉइब्रेरियाँ जलाकर, सिलेबस बदलकर, शिक्षा महंगी बनाकर हुआ है। दौर की ताकतों ने हमारे माथे पर ध्वंस लिख दिया है, जो हम सगर्व अपना तिलक बनाकर घूम रहे हैं।
किताबें जलाकर रौशन होने वाले नए भारत मे, जब अंधकार की आहट है, एलेग्जेंड्रिया में एक नई लाइब्रेरी बनी है।
11 मंजिले है, 80 भाषाओं में लाखो किताबे है। डिजिटल वर्जन है, और हार्ड कॉपी भी। आप किताबे पढ़ सकते है, डाउनलोड कर सकते हैं।
●●
टूर इटनेरी में लाइब्रेरी न थी, तो शामिल कराया। भीतर जाकर पत्नी- बच्चों ने भी देखा। सबके लिए अद्भुत अहसास रहा।
वापस जाकर, इस गर्मी छुट्टी, वे शहर की लाइब्रेरी से कुछ किताबें ईशु करवाएँगे, तो आज का दिन सफल बनेगा।
❤️
@RahulGandhi सर सबसे पहले तो रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने के लिए वादा करिये।
वास्तव में सामाजिक न्याय तभी होगा जब obc कोटे का वर्गीकरण होगा, देश की 45 प्रतिशत से ज्यादा आबादी की प्रशासन में हिस्सेदारी सिर्फ 2 से 4 % तक ही सीमित है।
जो रोहिणी कमीशन की लागू करेगा वोट उसी को पड़ेगा ।
@narendramodi@BillGates सर रोहणी कमीशन कब लागू कर रहे हैं obc का वर्गीकरण अत्यंत आवश्यक है obc आरक्षण का लाभ सिर्फ 4 से 5 जातियाँ ही उठा रही हैं obc की अन्य जातियों को भी हिस्सेदारी मिलनी चाहिये ।
दो मिनट के इस वीडिओ से समझिये कि राजनीति और मीडिया कहां से कहां पहुंच गई:
बात 1988 के इलाहाबद के उपचुनाव की है जहां से राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गई थी. बोफोर्स मामले पर सरकार से इस्तीफ़ा देकर वीपी सिंह चुनाव में मैदान में थे.
कांग्रेस ने रामायण सीरियल में राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल को चुनाव प्रचार में उतारा जिसका जम कर विरोध हुआ था उस वक़्त.
मुझे याद है कि इलाहाबाद के पीडी टंडन पार्क में अरुण गोविल भगवान राम के पूरे कॉस्टयूम में पहुंच गये. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने इतना विरोध किया कि अरुण गोविल को सभा छोड़ कर जाना पड़ा.
जिस दूरदर्शन में आप विनोद दुआ को सत्ता धारी दल के नेता ग़ुलाम नबी आजाद से तल्ख सवाल लहजे में सवाल पूछता देख रहे हैं वो लोकसभा में 414 सीट वाली बहुमत की सरकार का दूरदर्शन है.
इसके बाद विनोद दुआ बरसों दूरदर्शन से जुड़े रहे. उन्हे हटाया नहीं गया, न ही उनके घर ईडी चली गई थी.
अरुण गोविल फिर खबरों में हैं. मेरठ से बीजेपी के उम्मीदवार हैं. उन्हे सीरियल में भगवान राम का किरदार निभाने के लिये चुनाव में उतारा गया है - इसके अलावा उनके पास क्या योग्यता है.
दूरदर्शन तो दूर की बात है क्या आज का प्राइवेट मीडिया भी बीजेपी से वैसे सवाल नहीं कर सकता है.
दोष सिर्फ़ मोदी का नहीं है - आज की पीढ़ी लोकतांत्रिक मूल्य समझ ही नहीं पायी.
तैमूर लंग ने 1398 में दिल्ली सल्तनत पर हमला किया. तैमूर लंग की सेना के रास्ते में जो आया उन्हें मिटा दिया गया.
इंसानों का कत्लेआम कर उनकी लाशों की ऊंची मीनार खड़ी कर दी गई.
एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में तीन दिनों तक तैमूर लंग की सेना ने 1,00,000 से ज्यादा लोगों का नरसंहार किया.
इस घटना को भारतीय मनुवादी इतिहासकार हिन्दू - मुस्लिम बाइनरी के नजरिए से देखते हैं.
क्या सच में तैमूर लंग हिंदू विरोधी था. क्या वो धार्मिक उद्देश्य से भारत आया था या संपत्ति लूटने आया था ?
दिल्ली को लूटकर तैमूर लंग समरकंद लौट गया. लेकिन इसके बाद उसने जो किया उसकी अमानवीय हरकतों से मिडिल ईस्ट के मुसलमान कांप उठे.
◆◆◆
तैमूर लंग बेहद क्रूर शासक था इसमें कोई दो राय नही है.
सेंट्रल एशिया के खानाबदोश काबिले का सरदार अब भेड़ बकरी नही सोना चांदी का लुटेरा बन गया था.
वो शक्तिशाली सुल्तान बन गया था जिसके पास अपने जनजाति के भरोसेमंद लड़ाकुओं की विशाल सेना थी.
जो भूख लगने पर घोड़े मांस खाते, प्यास लगने पर घोड़ी का दूध पीते और अपने सुल्तान तैमूर लंग के लिए पृथ्वी के हर भूभाग को फतेह करने का इरादा रखते.
1400 A.D में तैमूर लंग का मन फिर हुआ लूटपाट और नरसंहार करने का, लेकिन इस बार वो भारत नही, पश्चिम की ओर इजिप्ट जाने वाले था.
◆◆◆
तैमूर लंग ने अपने एक राजदूत को इजिप्ट के मामलुक सल्तनत के पास भेजा.
मामलुक साम्रज्य इजिप्ट से लेकर सीरिया तक फैला हुआ था.
तैमूर लंग की ख्वाहिश थी मामलुक साम्राज्य तैमूरी साम्राज्य का हिस्सा बन जाए.
मामलुक शासकों ने तैमूर लंग के राजदूत का सिर कलम कर वापस तैमूर को भेज दिया गया.
बदले की भावना लिए तैमूर लंग की जंगली खानाबदोश सेना ने मामलुक साम्राज्य की ओर कूच कर दिया.
◆◆◆
तैमूर लंग की सेना ने सीरिया में कहर बरपा दिया. सीरिया मामलुक साम्राज्य का हिस्सा था और व्यापार का बड़ा केंद्र.
तैमूर लंग अलेप्पो, होम्स और बालबुक जैसे सीरियाई शहरों को जीतकर नेस्तनाबूद कर दिया.
इन शहरों रहने वाले हर इंसानी जिंदगी को खत्म कर उनकी लाशों की ऊंची मीनार खड़ी कर दी गयी.
मामलुक सुल्तान नासिरात-अद-दीन फराज ने दमिश्क शहर को बचाने की कोशिश की. लेकिन तैमूर लंग ने उसे हरा दिया.
◆◆◆
खूबसूरत दमिश्क शहर का नक्शा बदल गया. सड़कें खून से लाल हो गयीं. लाशों को खाने के लिए गिद्धों का हुजूम उमड़ पड़ा.
दमिश्क के इमाम, मुल्लाओं और आम लोगों ने तैमूर लंग के आगे बिनती की उनकी जान को बख्श दिया जाए.
तैमूर लंग ने जान बख्श देने वादा किया, और एक बड़ी मस्जिद में महिलाओं और बच्चों सहित सभी को पनाह लेने की हिदायत दी.
मस्जिद में 30,000 से अधिक के लोगों के पनाह लेने के बाद, तैमूर लंग की सेना ने मस्जिद के दरवाजे बाहर से बंद कर उसमें आग लगा दी.
प्रसिद्ध उमय्यद मस्जिद में भी आग लगा दी गई.
शहर के कारीगरों और जवान महिलाओं को गुलाम बनाकर समरकंद ले जाया गया.
तैमूर लंग ने दमिश्क में वही किया जो वो दिल्ली में कर चुका था.
तैमूर लंग अपने दुश्मनों को धर्म के नजरिए से नही देखता था और ना ही हमें उसे धर्म के नजरिए से देखना चाहिए.
■■■■■
गद्दार वामपन्थी ..
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी नाम का संगठन जहाँ बना, उसे फिरोजशाह कोटला कहते है।
स्टेडियम नही, उसके पीछे के खंडहर.. जो कभी सुल्तान फिरोजशाह की आरामगाह था।
मुस्लिम सुल्तान जिसने अशोक के उपेक्षित स्तम्भ, मखमल में लिपटा कर मंगाए, और उसे बाइज़्ज़त दिल्ली में लगवाया।
उन अशोक स्तम्भो की ब्राह्मी लिपि को किसी ब्राह्मण-ठाकुर ने नही, अंग्रेजो ने पढ़ा।
पढ़कर तथ्य निकाले, जिसे इतिहास के रूप में लिखा। जिसे वामपन्थी इतिहास कहकर आप खारिज करते हैं।
●●
तो अशोक स्तम्भ की छाया तले, सल्तनत युग के खंडहरों में चंद्रशेखर आजाद,अशफाकउल्लाह, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और तमाम बड़े नाम जिन्हें आप रेवल्यूशनरी समझते है।
जुटे ... और बनाई आर्मी !!!
"हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी"
भगत ने टोका- सोशलिस्ट शब्द जुड़वाया। HSRA का जन्म हुआ।
●●
ये सोशलिस्ट आर्मी, क्रांति से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के नाश के स्वप्न देखती। तो भगतसिंह और उनके दो साथी जब सेंट्रल असेम्बली में बम फेंकते है। नारे लगाते है-
- इंकलाब जिंदाबाद
- साम्राज्यवाद का नाश हो
नोट करें -
वे भारत माता की जय, या जय श्रीराम के नारे नही लगाते। उनके नारे 8 साल पहले हुई, रूसी क्रांति के नारों का उर्दू तर्जुमा थे ।
●●
इंकलाब, याने क्रांति।
तो इंकलाब जिंदाबाद याने "लांग लिव रिवोल्यूशन"। रशियन बोल्शेविक्स यही नारा लगाते थे।
और कहते थे "डाउन विद इम्पीरिलिज्म"
याने साम्राज्यवाद का नाश हो।
रशियन क्रांति से प्रभावित, बोल्शेविक नारे लगाते पण्डित (चंद्रशेखर) , मुल्ले (अशफाक) और सरदार (भगतसिंह) ने अंग्रेजो को हलाकान कर दिया।
और वो सरदार तो जब फांसी के लिए जाने लगा, तो आखरी पल तक लेनिन की जीवनी का एक और पन्ना पढ़ जाने को लालायित था।
●●
दुनिया मे दक्षिणपंथ का कोई आईड़ियोलॉजिकल इतिहास नही है।
जब आम जनता, शोषित, मजदूर और किसान के हितों में वामपंथ खड़ा हुआ। सत्ता को चुनौती दी।
तो जिनके पास सत्ता और ताकत थी, वे प्रतिक्रिया में जान, धंधा, पैसा, प्रभुत्व बचाने के लिए एकजुट हुए।
पुराना राज, पुराना सिस्टम कायम रखने की कोशिश में लगे ये लोग दक्षिणपंथी कहलाये।
वे राजा या तानाशाह के समर्थन में खड़े होकर उसे ही देश बताने लगे।
और राजा के खिलाफ बोलने वाले को देशद्रोही, गद्दार। अपने पुराने प्रभुत्व को देश की संस्कृति कहकर बचाने की कोशिश की। और धर्म के नाम पर विरोधियो को बांटने का तरीका ईजाद किया।
बांटना, तोड़ना, ऊंच नीच, रेसिज्म, धर्म, धमकी, एब्यूज - ये दक्षिणपन्थ के लक्षण है। यही उसका दर्शन है।
ये टुकड़े टुकड़े गैंग है।
●●
याने दक्षिणपंथ कोई विचारधारा नही है। फिक्स नियम, उद्देश्य, तरीके, साहित्य या फिलासफी.. ऐसा कुछ नही है।
असल मे वामपंथ जो-जो कहता है,
जो करना चाहता है उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया में जो-जो रंग बिरंगा कहा जा सकता है, दक्षिणपन्थ उन सारी बातों का समुच्चय है।
ये जरूरत के मुताबिक, बदल दिया जाता है।इसलिए आपको बहस करते दक्षिणपंथी की बात में कोई क्लियर लाइन, कोई दर्शन, इतिहास या साहित्य नही मिलेगा।
केवल आपके कथन, विचार, इतिहास, साहित्य, दर्शन में "ऐसा क्यो" "वैसा क्यो नही" के सवाल भर मिलेंगे।
लेकिन गालियां, दोषारोपण, मूर्तिभंजन, फैक्ट ट्विस्टिंग टन भर मिलेंगे।
●●●
याने राजा के समर्थन में गाली या गोली चलाने वाले, दक्षिणपन्थी है। गाली-गोली खाने वाले, वामपन्थी हैं।
- सत्ता चाहे अंग्रेजो (इम्पीरियलिस्ट) की हो,
- माओ (कम्युनिस्ट) की हो
- मुसोलिनी ( फासिस्ट) की हो
- हिटलर (सोशलिस्ट) की...
"गवरमेंट ऑफ द डे" की संवेदनहीन निरंकुशता के विरुद्ध दमदार होकर खड़े होने वाले, सारे वामपन्थी है,
रेजीम की वंदना करने वाले दक्षिणपन्थी। यह ठीक से समझे जाने की जरूरत है।
●●
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी 1925 में बनी, और लकीर की फकीर बनकर रह गयी। उसके दिमाग मे रूस और चीन घूमते रहे।
वो कभी भारतीय परिप्रेक्ष्य से तादात्म्य न बिठा पाई।भारतीयकृत वामपन्थ का प्रणेता, चंद्रशेखर आजाद को कहना चाहिए, जो HSRA के संस्थापक थे।
और भारत के मौलिक, मार्क्सिस्ट- लेनिनिस्ट थिंकर- भगतसिंह थे।
●●
पक्के रेशनलिस्ट, इन्टरनेशनलिस्ट औऱ एथिस्ट। वो शख्स जो अपने पत्रों, लेखों में वामपंथ के फ़लसफों को, भारतीय परिदृश्य में रिडिफाइन करता है।
जो जाति, वर्ण, धर्म के नाम पर संसाधनों पर काबिज जमात की ठीक ठीक पहचान करता है। वही जमात जो आज फिर, स्टेट पॉवर के साथ काबिज है। खुद को सगर्व दक्षिणपन्थी कहती है।
23 साल में धरती छोड़ चुका ये लड़का, पकी उम्र तक जीता, तो शायद भारत का सबसे बड़ा वामपन्थी होता। इनसे लड़ता..
और ये रेजीम, इनकी ट्रोल आर्मी उन्हें चीखकर कहती..
गद्दार वामपन्थी!!