जानम समझा करो….
देश को चाहिये एक तेज तर्रार,पढा लिखा, सुझबुझ वाला,आंतरराष्ट्रीय शिष्टाचार को समझनेवाला ,
देश को न बेचनेवाला..प्रखर राष्ट्र भक्त..
प्रधानमंत्री!
vacancy जल्दी हो जायेगी!
जय हिंद!
वंदे मातरम!!
इतनी बड़ी खबर किस - किस चैनल पर चली है ?
नोएडा की DM और ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम की सैलरी से मुआवजा
वसूलने का आर्डर कोई मामूली फैसला नहीं नहीं है.
चैनल वालों ने इतनी बड़ी खबर पर खामोश की चादर क्यों ओढ़ी?
> सुभाष चंद्र गर्ग गलत हैं।
> रघुराम राजन गलत हैं।
> अरुण कुमार गलत हैं।
ये तीनों देश के सबसे बड़े अर्थशास्त्रियों में से एक हैं जिनके दावों को सरकार गलत बता रही और खुद को सही।
सब गलत हैं बस ये अनपढ़ो की फौज सही है जो पूरे देश को बेवकूफ समझती है।
सरसों की कीमत ₹75/Kg है,
ढाई से तीन किलो सरसों में 1 लीटर तेल निकलता है, इस हिसाब से एक लीटर शुद्ध सरसों के तेल की कीमत करीब ₹200 हुई,
ट्रांसपोर्टेशन, पैकेजिंग और लेबर चार्ज जोड़ ले तो एक लीटर पर करीब ₹20 का और खर्च आ जाएगा
इस हिसाब से शुद्ध सरसों के तेल की लागत मूल्य न्यूनतम ₹220 लीटर हुआ,
अगर मार्जिन मनी ₹20/ लीटर रखा गया तब जाकर ये ₹270 / लीटर होगा,
जबकि मार्केट में स्थापित बड़े ब्रांड्स ₹180/ लीटर में कच्ची घानी वाला शुद्ध सरसों का तेल बेचने का दावा करते है,
इन्हें @fssaiindia द्वारा मंज़ूरी भी मिल जाती है,
यह तो अजीब बात है 🤯
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का कहना है कि जो लोग GDP ग्रोथ के आंकड़ों की आलोचना कर रहे हैं, वे "बेरोज़गार" हैं और देश को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं।
तो क्या सरकारी डेटा पर सवाल उठाने का मतलब देश को नुकसान पहुँचाना है? 🤔
फिर आलोचकों पर हमला करने के बजाय तथ्यों के साथ सवालों का जवाब क्यों नहीं दिया जाता?
एक स्वस्थ लोकतंत्र ऐसे काम नहीं करता। 🔥
उर्जित पटेल, विरल आचार्य, अरविंद सुब्रह्मण्यम, KV सुब्रह्मण्यम, सुरजीत भल्ला, अरविंद पनगढ़िया...
इतने दिग्गज अर्थशास्त्री वक्त से पहले पद छोड़कर क्यों भागे/भगा दिए गए?
मनमुताबिक आंकड़ों की बाजीगरी (fuzzing) नहीं कर पा रहे थे?
#FuzzedGDPGrowth (?)
अडानी टीवी में इस समय मातम का माहौल होगा। चैनल को उम्मीद रही होगी कि पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ७.८% ग्रोथ रेट के पक्ष में बोलकर विपक्ष के आरोपों की धज्जियां उड़ाई देंगे लेकिन दांव उल्टा पड़ गया।
आप ज़रा ऐंकर का चेहरा ग़ौर से देखिए। बेचारी के होश उड़े हुए हैं। वह छटपटा रही है। वह बार-बार गर्ग को घेरने की कोशिश कर रही है मगर गर्ग ठंडे दिमाग़ से उसके हर हमले को नाकाम कर रहे हैं।
आज तो अडानी टीवी के सीईओ की नौकरी जानी चाहिए। प्रधानमंत्री की ऐसी भद्द पिटवा दी है कि महामानव जहां भी होंगे पसीने पोंछ रहे होंगे और अडानी को बुरा-बुरा कह रहे होंगे।
ये है 7.8% GDP ग्रोथ की असली तस्वीर
🔹 7 करोड़ लोग ₹62 से भी कम रोज़ कमाते हैं
🔹 116 करोड़ लोग ₹171 से कम रोज़ कमाते हैं
🔹 वहीं देश के टॉप 1% के पास 40% दौलत है। 🤯
नौकरियां नहीं, महंगाई बढ़ रही है, लोग परेशान हैं
लेकिन जश्न मनाइए GDP 7.8% बढ़ गई है! 😀
ग़ौरतलब है कि सुभाष चन्द्र गर्ग जी मोदी सरकार के समय 2017-19 तक वित्त सचिव रहे थे !
मोदी जी के Jumlanomics को उन्होंने क्या खूब expose किया 👏🏻
तथ्यों के साथ बताया कि GDP ग्रोथ रेट 7.8% नहीं बल्कि 2.6% है। मुद्रास्फीति 2.5% है और उसे घटा देंगे तो ग्रोथ लगभग 0% है 🥴
दुनिया का कोई भी गंभीर अर्थशास्त्री भारत की मौजूदा कथित GDP ग्रोथ 7.8% के दावे पर सिर्फ चकित है. भारतीय अर्थव्यवस्था के जानकार देश या विदेश में रहने वाले कई बडे भारतीय अर्थशास्त्री इसे अविश्वसनीय बता चुके हैं. सच सामने लाने के लिए भारत के पूर्व वित्त सचिव Subhadh Chandra Garg और पूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर Raghuram Rajan जैसे बड़े विद्वान खुलकर बोल रहे हैं और सरकारी दावे को वास्तविकता से दूर बता रहे हैं.ऐसे में सवाल उठता है, हमारी सरकार आंकड़ो में ऐसा गडबडझाला करके क्या हासिल कर लेगी? ग्रोथ रेट इस कदर ऊपर जा रही है तो अच्छा रोजगार क्यों नहीं सृजित हो रहा है? पूंजी निवेश गुणात्मक रूप से क्यों नहीं बढ़ रहा है, खासतौर पर FDI का ऐसा बुरा हाल क्यों है? बाजार में इतनी निराशा क्यों है?
बड़ी बड़ी आयु की लड़कियाँ घर में कुंवारी बैठी हैं, यदि अभी भी माँ-बाप नहीं जागे तो स्थितियाँ और भी विस्फो'टक हो सकती हैं...!
समाज में आज 27-28-32 आयु तक की बहुत सी कुँवारी लडकियाँ घर बैठी हैं क्योंकि इनके सपने हैसियत से भी बहुत अधिक हैं ! अपने चारों ओर दृष्टि डालिए इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं।
ऐसे लोगों के कारण समाज की छवि बहुत खराब हो रही है।
सबसे बडा मानव सुख, सुखी वैवाहिक जीवन होता है।
पैसा भी आवश्यक है, लेकिन कुछ सीमा तक !
पैसे की वजह से अच्छे रिश्ते ठुकराना गलत है। पहली प्राथमिकता सुखी संसार व अच्छा घर-परिवार होना चाहिये!
अधिक धन संपदा के चक्कर में अच्छे रिश्तों को नजर-अंदाज करना गलत है। ध्यान रखें "धन कमाया जा सकता है, संपत्ति खरीदी जा सकती है लेकिन गुण नहीं।"
मेरा मानना है कि घर-परिवार और लडका अच्छा देखें, लेकिन अधिकतम के चक्कर में अच्छे रिश्ते हाथ से न जाने दें।
सुखी वैवाहिक जीवन जियें।
30 की आयु के बाद विवाह विवाह नहीं होता... समझौता होता है और इसके बाद स्वास्थ्य परिस्थितियों की दृष्टि से भी देखा जाए तो बहुत सी समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं।
समाज में आज उससे भी बुरी स्थिति कुंडली मिलान के कारण हो गई है।
आप सोचिए जिनके साथ कुंडली मिलती है लेकिन घर और लड़का अच्छा नहीं और जहाँ लड़के में सभी गुण हैं वहां कुण्डली नहीं मिलती और हम सब कुछ अच्छा मिलने की आस में मात्र कुण्डली की वजह से रिश्ता छोड़ देते हैं।
आप सोच के देखें कि जिन लोगों के 36 में से 20 या फिर 36/36 गुण भी मिल गए फिर भी उनके जीवन में समस्याएं हो रही हैं, क्योंकि हमने लडके के गुण नहीं देखे...!
कुण्डली मिलान की इस परंपरा ने सभ्य, संस्कारी, शिक्षित और कथित आधुनिक समाज तक को एक सदी और पीछे धकेल दिया ! इस कुंडली मिलान के चक्कर में अच्छे रिश्ते नहीं हो पा रहे हैं।
आजकल समाज में लोग बेटी के रिश्ते के लिए (लड़के में) चौबीस टंच का सोना खरीदने जाते हैं, देखते-देखते चार पांच वर्ष यूं ही व्यतीत हो जाते हैं।
उच्च "शिक्षा" , "जॉब" या "लाईफ सेटल" होने पर विवाह करने के नाम पर भी लोग विवाह योग्य समय को व्यतीत कर देते हैं। लड़के देखने का अंदाज भी समय व्यतीत होने का अनोखा उदाहरण हो गया है?
स्वयं का मकान है कि नहीं ?
अगर है तो फर्नीचर कैसा है ?
घर में कमरे कितने हैं ?
गाडी है कि नहीं ?
है तो कौन सी है ?
खेती की जमीन है कि नहीं..?
है तो कितनी है..?
लड़का शहर में रहेगा या गांव में..?
रहन-सहन, खान-पान कैसा है ?
कितने भाई-बहन हैं ?
बंटवारे में माँ-बाप किनके गले पड़ने हैं या पड़े हैं ?
बहन कितनी हैं, उनकी शादी हुई है कि नहीं ?
माँ-बाप का स्वभाव कैसा है ?
घर वाले, नाते-रिश्तेदार आधुनिक ख्यालात के हैं कि नहीं ?
बच्चे का कद क्या है ?
रंग-रूप कैसा है ?
शिक्षा, कमाई, बैंक बैलेंस कितना है ? लड़का-लड़की सोशल मीडिया पर एक्टिव है कि नहीं ?
उसके कितने दोस्त हैं ?
सब बातों पर पूछताछ पूरी होने के बाद भी कुछ प्रश्न पूछने में और सोशल मीडिया पर वार्तालाप करने में और समय व्यतीत हो जाता है..!
इन्हीं जांच परख और देख भाल के हालातों से गुजरते हुए माँ-बाप की नींद ही खुलती है बच्चों की आयु 30 पार होने के बाद...!
चार-पाँच वर्ष की यह दौड़-धूप बच्चों की जवानी को बर्बाद करने के लिए काफी है। इस वजह से अच्छे रिश्ते हाथ से निकल जाते हैं और माँ-बाप अपने ही बच्चों के सपनों को चूर चूर-चूर कर देते हैं ।
एक समय था जब केवल घर खानदान देख कर रिश्ते होते थे। वो लम्बे भी निभते थे। समधी-समधन में मान मनुहार थी। सुख-दु:ख में साथ था। रिश्ते-नाते की अहमियत का अहसास था।
चाहे धन-माया कम थी पर खुशियाँ घर-आँगन में झलकती थीं। कभी कोई ऊँची-नीची बात हो जाती थी तो आपस में घर परिवार के बड़े-बुजुर्ग संभाल लेते थे। तलाक शब्द रिश्तों में था ही नहीं !
दाम्पत्य जीवन खट्टे-मीठे अनुभव में बीत जाया करता था। दोनों एक-दूसरे के बुढ़ापे की लाठी बनते थे और पोते-पोतियों में संस्कारों के बीज भरते थे।
अब कहां हैं वो संस्कार ?
आँख की शर्म तो इतिहास हो गई। नौबत आ जाती है रिश्तों में समझौता करने की।
लड़का-लड़की अपने समाज के नही होंगे तो भी चलेगा, ऐसी बातें भी सामने आ रही हैं।
आज समाज की लडकियाँ और लड़के खुले आम विजातीय संबंधों की ओर जा रहे हैं और दलील दे रहे हैं कि अपने समाज में अच्छे लड़के या लड़कियाँ मेरे लायक नहीं हैं। कारण है कि पश्चिमी अंधानुकरण में लडकियाँ आधुनिकता की पराकाष्ठा पार कर गई हैं।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब ये लड़के-लड़कियाँ अपने मन से अर्थात् विजातीय मैरिज करते हैं तब ये कुंडली मिलान का क्या होता है ?
Courtesy sukhbeer Singh dadwal fb post