Today, a memorandum was submitted in Patan, Gujarat, against what the organizers described as the authoritarian policies of the Central Government.
The memorandum was submitted to the concerned authority, expressing concerns and calling for action through democratic and constitutional means.
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गांव चाचापर, मोरबी,गुजरात
365 दिन महानायको का कारवा आगे बढ़ाने की मुहिम को लेकर चिंतन शिबिर का आयोजन कीया गया
22 बर्बादी की जड़े के बारे मे समाज को बताया गया और SSD संगठन के बारे मे बताया गया
हमें मानवतावादी राष्ट्र का निर्माण करना है।
💥 *स्वयम् सैनिक दल (SSD )💥*
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365 दिन महानायकों का करवा आगे बढ़ाने की मुहिम
22 बर्बादी की जड़े के बारे मे समाज को बताया गया और SSD संगठन के बारे मे बताया गया
2027 बेंगलुरु के 14 अप्रेल डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर जन्मजयंती के आगामी कार्यक्रम को लेकर पूर्व प्रचार प्रसार
बेंगलुरु
राज्य:कर्नाटक
हमें मानवतावादी राष्ट्र का निर्माण करना है।
💥स्वयम् सैनिक दल (SSD)
भारत में एक ऐसा समाज था जहाँ इंसान को इंसान नहीं समझा जाता था। जन्म के आधार पर ऊँच-नीच तय होती थी। उसी समय ज्योतिबा फुले का जन्म हुआ।
बचपन में ही ज्योतिबा ने अन्याय को बहुत करीब से देखा। एक दिन वे अपने ब्राह्मण मित्र की शादी में गए, लेकिन वहाँ उन्हें अपमानित कर बाहर निकाल दिया गया। उस दिन उनके दिल में एक सवाल उठा—
“क्या इंसान की कीमत उसके जन्म से तय होती है?”
यही सवाल आगे चलकर एक क्रांति बना।
ज्योतिबा ने ठान लिया कि समाज को बदलना है तो शिक्षा जरूरी है।
उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को पढ़ाया और फिर दोनों ने मिलकर 1848 में लड़कियों के लिए पहली स्कूल शुरू की।
लोग उनका विरोध करते, रास्ते में गालियाँ देते, पत्थर फेंकते…
लेकिन वे रुके नहीं।
सावित्रीबाई रोज़ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर निकलती थीं, क्योंकि लोग उन पर कीचड़ फेंक देते थे।
फिर भी वे मुस्कुराकर कहतीं —
“शिक्षा ही हमारी असली ताकत है।”
ज्योतिबा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक गुलामगिरी में समाज की कड़वी सच्चाई लिखी।
इस पुस्तक में वे एक जगह कहते हैं—
“ब्राह्मणों ने धर्म के नाम पर शूद्रों और अतिशूद्रों को मानसिक गुलाम बना रखा है।”
उन्होंने यह भी समझाया कि—
“गुलामी केवल शरीर की नहीं होती, सोच की भी होती है।”
इस किताब में उन्होंने पुराणों और कथाओं की आलोचना करते हुए बताया कि कैसे इतिहास को इस तरह लिखा गया कि कुछ लोग हमेशा ऊँचे और कुछ हमेशा नीचे रहें।
उन्होंने किसानों की हालत बताई।
वे लिखते हैं—
“किसान दिन-रात मेहनत करता है, लेकिन उसका पेट भी ठीक से नहीं भरता।”
उन्होंने सरकार और जमींदारों की नीतियों की आलोचना की और कहा कि असली भारत किसान है, लेकिन वही सबसे ज्यादा दुख झेल रहा है।
सत्य और समता के पथप्रदर्शक: गुरु घासीदास जी
अठारहवीं शताब्दी का छत्तीसगढ़ सामाजिक विषमताओं से घिरा हुआ था। समाज में छुआछूत, ऊँच–नीच, पाखंड और अन्याय का बोलबाला था। मनुष्य को जन्म के आधार पर बाँटा जाता था और सम्मान कुछ वर्गों तक सीमित था।
इसी समय रायपुर ज़िले के गिरौद गाँव में 18 दिसंबर 1756 को एक बालक का जन्म हुआ घासीदास। उनका परिवार साधारण था, परंतु उनके मन में करुणा, संवेदना और सत्य की खोज की तीव्र जिज्ञासा थी।
बचपन से ही वे समाज में फैले भेदभाव को देखकर व्यथित रहते थे। उनके मन में प्रश्न उठते “क्या सभी मनुष्य समान नहीं?” और “क्या सत्य का मार्ग सबके लिए एक जैसा नहीं?”
इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए उन्होंने तपस्या और चिंतन का मार्ग अपनाया। मान्यता है कि एक वृक्ष के नीचे गहन साधना के पश्चात उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। उस ज्ञान का सार था — सत्य, अहिंसा और समानता।
ज्ञान प्राप्ति के बाद गुरु घासीदास जी समाज में लौटे और “सतनाम” का संदेश दिया — सत्य ही जीवन का आधार है। उन्होंने जाति–पांति, छुआछूत और सामाजिक अन्याय का खुलकर विरोध किया।
उनकी शिक्षाएँ सरल थीं — झूठ का त्याग, हिंसा का त्याग, नशामुक्त जीवन, जीवों पर दया, और सभी मनुष्यों को समान दृष्टि से देखना। धीरे–धीरे एक नया सामाजिक–धार्मिक आंदोलन आकार लेने लगा सतनाम पंथ।
गुरु जी ने नारी सम्मान, अहिंसा और सामाजिक समता पर विशेष बल दिया। उनके प्रयासों से समाज में आत्मसम्मान और समानता की नई चेतना जागृत हुई।
उनके पश्चात उनके पुत्र गुरु बालकदास जी ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया, किंतु सामाजिक परिवर्तन से भयभीत शक्तियों ने उनका विरोध किया। अंततः 28 मार्च 1860 को उनकी हत्या कर दी गई।
Ravidas was a revolutionary thinker far ahead of his time. He rejected caste, religious hypocrisy, and birth-based hierarchy, and placed human dignity, labor, and equality at the center of life.
His vision of Begumpura imagined a society free from caste, poverty, fear, and injustice where everyone lives with dignity.
Ravidas was not just a saint, but a modern voice of social justice.
Remember Ravidas. Reclaim equality.
Jai Bhim Namo Buddhaya Jay Johar Jay Mulnivasi ✊☸️
SSD RAJSTHAN
On the occasion of Republic Day, through Swayam Sainik Dal at Dr. Ambedkar Memorial Welfare Society, Jaipur (Rajasthan), the ideology of Bahujan great leaders was widely propagated and they were paid respectful salutations.
चलो भीम की ओर,
चलो बुद्ध की ओर.
स्वयम् सैनिक दल -SSD
फिल्ड वर्क
365 दिन महानायकों का करवा आगे बढ़ाने की मुहि
कर्णाटक-बेलगाम(डिस्ट्रिक्ट) से आएं हुए भीम सैनिक से विचारधारा पे बातचीत, बेंगलुरु 14 अप्रैल 2027 कार्यक्रम का आमंत्रण भी दिया।
चैत्य भुमी -दादर, बोम्बे
राज्य: महाराष्ट्र
हमें मानवतावादी राष्ट्र का निर्माण करना है।
एक दिन शिक्षक ने पूछा:
“तुम्हारे समाज के लोग किन कठिनाइयों से गुजरते हैं लिखकर बताओ।”
बहुत-से बच्चे डर गए।
लेकिन उस लड़की ने अपना सच लिखने का निश्चय किया।
उन्होंने लेख लिखा:
“मांग-महारों के दुखों के बारे में”
(यह लेख बाद में द्यानोदय पत्रिका में छपा — और पूरे समाज में चर्चा हो गई।)
उस लेख में मुक्ता ने लिखा:
“हम पर जन्म से ही ऊँच–नीच का बोझ डाला गया है”
“हमसे काम करवाया जाता है, पर हमें मनुष्य नहीं माना जाता”
“भगवान सबका है — तो फिर हम मंदिर में क्यों नहीं जा सकते?”
“शिक्षा से हमें क्यों दूर रखा जाता है?”
यह लड़की राष्ट्रपिता ज्योतिराव फूले और राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फूले की पाठशाला में पढ़ने वाली दलित लेखिका मुक्ता साल्वे थी ।
मुक्ता साल्वे के जन्मदिन पर बहुजन मूलनिवासी लोगों को हार्दिक मंगलकामनाएं।