Hello Cockroaches 🪳
6 जून को कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिषेक दीपके भारत आ रहे है, साथियों तैयार रहो
जंतर-मंतर पर बड़ा आंदोलन करना है, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना ही होगा
इस खबर को पूरे देश में फैला दो, 6 जून को दिल्ली चलना है और कॉकरोच आर्मी की ताक़त दिखानी है
एक बार फिर कह रहा हूँ...
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना ही होगा
हम सारे कॉकरोचों ने मिलकर अपना विज़न तैयार कर लिया है।
अगर सरकार होश में नहीं आई तो वो सोच नहीं सकती कि हम काकरोच मिलकर क्या कर सकते हैं।
अब हम सारे काकरोच मिलकर खुद एक दूसरे के मुद्दे उठाएंगे।
जुड़िए और संगठन को मजबूत शक्ति प्रदान करिए ✊✊
एक भारत, एक संविधान—
अनेकता में एकता की सबसे मजबूत डोर...
77 वर्षों की इस यात्रा में
यही हमारी सबसे मजबूत नींव रही है.
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं
#HappyRepublicDay#77thRepublicDay
ये समाज का कड़वा सच है,
तुम किसी की सौ बार मदद करो,
वो सब भूल जाएगा...
लेकिन एक बार मना कर दो,
वो जिंदगी भर याद रखेगा।
यही इस दुनिया की हकीकत है,
लोग तुम्हारी अच्छाई को हक समझते हैं,
ये इंसान की फितरत है,
अच्छाई को भूलना आसान,
बुराई को सीने से लगाना आसान।
साथ तेरे हर राह हसीन लगती है,
हाथों में हाथ हो तो जमीं भी जन्नत लगती है।
तू ही मेरा हमसफर, तू ही मेरा प्यार,
तेरी मुस्कान में बसती मेरी हर ख़ुशी हर बार।
@manojmeena एग्जाम हॉल मे छात्र से जैकेट भी खुला लिया जाता है ऐसा बोलके कि आप नकल कर सकते हो और कांड तो बोर्ड के अंदर बैठे बिन पेंदे के ऑफिसर्स कर रहे है ।
एक मध्यम वर्गीय छात्र कितनी मुश्किल से पढ़ पाता है
@manojmeena@alokrajRSSB चतुर्थ श्रेणी में भी 200% घपलेबाजी हुई है… भाइयो जाग जाओ अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाओ.. चतुर्थ श्रेणी की जाँच होनी चाहिए हम रिजल्ट से संतुष्ट नहीं है @manojmeena
@BJP4India मोदी जी जैसे किसान आंदोलन पर पीछे हटे थे, अरावली आंदोलन में भी पीछे हटना होगा I मोदी सरकार द्वारा उत्तर भारत में अरावली को काट कर जो गैस चैम्बर बनाने की कोशिश की जा रही हैँ उसे नाकाम देश की आम जनता करेगी I
पर्वत अगर 100 मीटर से कम ऊंचे हो तो बेकार हो जाते हैं।
छात्र अगर आंदोलन करें तो देशद्रोही हो जाते हैं।
किसान आंदोलन करे तो खालिस्तानी हो जाते हैं।
सोनम वांगचुक अगर लद्दाक बचाने की बात करें तो देशद्रोही हो जाते हैं।
एक दिन सबको देशद्रोही घोषत कर देंगे।
अड़ानी अंबानी इनके चक्कर में फंसकर हजारों नहीं लाखों वर्ग किलोमीटर का रेगिस्तान व वहां की वनस्पति को बेच दिया गया जिससे जैसलमेर बाड़मेर बीकानेर क्षेत्र में लाखों पेड़ों को काट दिया जा रहा है व काटा जाना शेष है और अब अरावली पर्वतमाला का नंबर आ गया, ख़तरे में है पुरा प्रदेश।
मोदी जी को दो चीज़ों से पक्की नफ़रत है - महात्मा गांधी के विचारों से और गरीबों के अधिकारों से।
मनरेगा, महात्मा गांधी के ग्राम-स्वराज के सपने का जीवंत रूप है - करोड़ों ग्रामीणों की ज़िंदगी का सहारा है, जो कोविड काल में उनका आर्थिक सुरक्षा कवच भी साबित हुआ।
मगर, प्रधानमंत्री मोदी को यह योजना हमेशा खटकती रही, और पिछले दस सालों से इसे कमजोर करने की कोशिश करते रहे हैं। आज वो मनरेगा का नामो-निशान मिटाने पर आमादा है।
मनरेगा की बुनियाद तीन मूल विचारों पर थी
1. रोज़गार का अधिकार - जो भी काम मांगेगा, उसे काम मिलेगा
2. गांव को प्रगति कार्य खुद तय करने की स्वतंत्रता
3. केंद्र सरकार मज़दूरी का पूरा खर्च और समान की लागत का 75% देगी
अब प्रधानमंत्री मोदी इसी मनरेगा को बदलकर सारी ताकत सिर्फ़ अपने हाथों में केंद्रित करना चाहते हैं -
1. बजट, योजनाएं और नियम केंद्र तय करेगा
2. राज्यों को 40% खर्च उठाने के लिए मजबूर किया जाएगा
3. बजट खत्म होते ही या फसल कटाई के मौसम में दो महीने तक किसी को काम नहीं मिलेगा
यह नया बिल महात्मा गांधी के आदर्शों का अपमान है - मोदी सरकार ने पहले ही भयंकर बेरोज़गारी से भारत के युवाओं का भविष्य तबाह कर दिया है, और अब ये बिल ग्रामीण गरीबों की सुरक्षित रोज़ी-रोटी को भी खत्म करने का ज़रिया है।
हम इस जनविरोधी बिल का गांव की गलियों से संसद तक विरोध करेंगे।
छत्तीसगढ़ के अमेरा, सरगुजा में जो संघर्ष चल रहा है, वह सिर्फ़ कोयला खदान के खिलाफ़ नहीं अस्तित्व, सम्मान और वंशजों के भविष्य की रक्षा का आंदोलन है। आदिवासी समुदाय जिन पहाड़ियों, जंगलों और नदियों को सदियों से अपनी माँ की तरह बचाते आए हैं, आज उन्हीं पर खदान थोपकर उन्हें उजाड़ने की कोशिश की जा रही है। मोदी सरकार के संरक्षण में अडानी कंपनी जबरन जमीन हड़पना चाहती है, और विरोध में खड़े लोगों पर पुलिस की लाठियाँ बरसाई जा रही हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि आंदोलन अब खूनी संघर्ष के कगार पर पहुंच गया है, लेकिन आदिवासी पीछे हटने को तैयार नहीं क्योंकि घर, जल और जंगल बेचने की चीज़ नहीं, जीने की बुनियाद हैं।
पृथ्वी पर इंसानों को खतरा “राहु–केतू” से नहीं, उन लालची कॉर्पोरेट सोच से है जो जंगल, पानी और पहाड़ को सिर्फ मुनाफ़े का साधन समझती है। जब तक विकास की जगह विनाश को बढ़ावा मिलता रहेगा, धरती जलती रहेगी।
हसदेव का जंगल कभी जीवन और हरियाली से भरा था, आदिवासी संस्कृति की धड़कन और प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक था। आज कॉरपोरेट लालच और सरकारी उपेक्षा ने इसे सूखा और उजाड़ बना दिया है। क्या हम अपनी इन अनमोल धरोहरों को ऐसे ही खोते हुए देखते रहेंगे, और भविष्य की पीढ़ियों को क्या देंगे?
यदि ये विकास है तो फिर विनाश क्या है?😢