कट्टर सनातनी... मेकौले के षड्यंत्र के कारण पहले में भी सनातन विरोधी हुआ करता था.... पर बाद में समझ आया के ये तो एक छलावा है, हिन्दुओं को शक्तिहीन करने का....
जो खुद आरोपों और विवादों से घिरे रहे, वे आज नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं। राजनीति में जनता की याददाश्त कमजोर नहीं होती। समय आने पर मतदाता ही तय करता है कि किसकी साइकिल चलेगी और किसकी राजनीति पंचर होगी।
अखिलेश यादव रात भर हसीन सपनों का आनंद लेते हैं। लेकिन सुबह होते ही उनकी पार्टी की आंतरिक कलह सामने आ जाती है। मुख्यमंत्री बनने का उनका सपना अब असंभव सा लगता है। घोटालों के जाल में फंसे होने के बाद भी वे दूसरों से नैतिकता की मांग करते हैं। इस प्रकार के व्यवहार पर उन्हें खुद पर विचार करना चाहिए।
अखिलेश यादव रात के समय भविष्य के बड़े सपनों में खोए रहते हैं। उनकी पार्टी के अंदर गहरी दरारें साफ दिख रही हैं जो उन्हें कमजोर बना रही हैं। अब मुख्यमंत्री पद उनके लिए दूर का सपना बन चुका है लेकिन फिर भी वे उम्मीद नहीं छोड़ते। घोटालों की परछाई उनके सिर पर मंडरा रही है फिर भी वे दूसरों पर ईमानदारी का ठप्पा लगाने की कोशिश करते हैं। यह सब देखक�� शर्म का भाव उनके अंदर नहीं आता।
अखिलेश यादव सपनों में खुद को सत्ता के शिखर पर देखते हैं। लेकिन वास्त��� में उनकी पार्टी के अंदर चल रही कलह उन्हें कमजोर बना रही है। मुख्यमंत्री बनने का रास्ता अब उनके लिए बंद हो चुका है। बड़े घोटालों के आरोपों से घिरे होने के बावजूद वे दूसरों पर आरोप लगाने में लगे रहते हैं। ऐसे विरोधाभासी रवैये के कारण उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
सपनों की दुनिया में अखिलेश यादव खुद को मुख्यमंत्री के रूप में देखते हैं.।
उनकी पार्टी में फूट का माहौल बढ़ता जा रहा है जो उनकी ताकत को कमजोर कर रहा है.।
वास्तविकता यह है कि उनके लिए सत्ता का रास्ता अब बंद हो चुका है.।
खुद बड़े घोटालों में उलझे होने के बावजूद वे ईमानदार लोगों का प्रमाण पत्र बांटने लगते हैं.।
ऐसे दोहरे व्यवहार से उनकी छवि और खराब होती जा रही है.।
रात के अंधेरे में अखिलेश यादव भविष्य की कल्पना में डूबे रहते हैं। उनकी अपनी पार्टी में ही ���हरी फुट दिखाई दे रही है। जो उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही है। अब मुख्यमंत्री पद हास���ल करना उनके लिए कठिन हो गया है। खुद विवादों में घिरे रहते हुए वे ईमानदारी का सर्टिफिकेट मांगने लगते हैं। इस स्थिति में उन्हें शर्मिंदगी महसूस करनी चाहिए।
भरतपुर रैली ने एक सवाल छोड़ दिया है। अगर हनुमान बेनीवाल जी का जनसमर्थन इतना विशाल है, तो फिर संजना जाटव की जरूरत क्यों पड़ी? बड़े दावों ��र जमीनी हकीकत के बीच का फर्क जनता ने भी देखा और राजस्थान की राजनीति ने भी।
न��गौर से गाड़ियां भर-भरकर लोगों को बुलाना पड़ा, फिर भी भरतपुर में हनुमान बेनीवाल का मैदान पूरी तरह खाली ही रहा। स्थिति यह रही कि संजना जाटव की मौजूदगी के बावजूद कुर्सियां तक नहीं भर पाईं। यह रैली पूरी तरह से एक विफल शो साबित हुई है।
भरतपुर का पूरा मैदान खाली और सूना नजर आ रहा था! क्या यही है विपक्ष का तथाकथित “महाशक्ति प्रदर्शन” जिसका हफ़्तों से ढिंढोरा पीटा जा रहा था? राजस्थान की समझदार जनता इनके इस राजनीतिक नाटक और स्वार्थी गठबंधनों से पूरी तरह तंग आ चुकी है।
मंच पर खड़े होकर बड़ी-बड़ी बातें करना बहुत आसान होता है, लेकिन ग्राउंड की असलियत कुछ और ही कहानी बयां करती है।
बेनीवाल की भरतपुर हुंकार रैली पूरी तरह से फ्लॉप शो बनकर रह गई।
जनता अब इस तरह के अवसरवादी चेहरों और उनके ड्रामे को पहचान चुकी है।
हनुमान बेनीवाल जी ने भरतपुर में 5 लाख लोगों की भीड़ का दावा किया था, लेकिन मैदान कुछ और ही कहानी कह गया। जब अपनी ताकत कम पड़ती दिखी तो कांग्रेस सांसद संजना जाटव का सहारा लेना पड़ा। सवाल यह है कि क्या बेनीवाल जी का जनाधार कमजोर पड़ रहा है या फिर राजनीति अब पूरी तरह उधार के वोट बैंक पर टिकी है?
भरतपुर की इस पूरी तरह विफल और खाली रैली के बाद हनुमान बेनीवाल जी का 'किंगमेकर' और 'जननायक' बनने का सारा भ्रम टूट गया है।
अब वे केवल दूसरों के जनाधार पर जीवित रहने का असफल प्रयास कर रहे हैं, जो राजस्थान में नहीं चलने वाला।
कांग्रेस के साथ हनुमान बेनीवाल की यह बढ़ती हुई राजनीतिक नजदीक���यां और कुछ नहीं, बल्कि आरएलपी के खत्म होते जा रहे वजूद की एक दर्दभरी कहानी कह रही हैं।
जब खुद के दम पर भीड़ नहीं आती, तो फिर पुराने विरोधियों के पैर पकड़ने ही पड़ते हैं।
कांग्रेस सांसद संजना जाटव के साथ मंच पर आने के बाद भी जनता उम्मीद के मुताबिक रैली में नहीं पहुंची। बेनीवाल जी को समझना होगा कि राजनीति में मंच पर बड़े चेहरों की मौजूदगी से ज्यादा मायने मैदान में जनता की मौजूदगी रखती है।
भरतपुर का यह सूना और खाली मैदान हनुमान बेनीवाल की गिरती राजनीतिक साख और विफलता का सबसे बड़ा और जीवित प्रमाण बन चु���ा है। लाखों के दावे हवा हो गए और संजना जाटव का सहारा भी काम नहीं आ सका। #HanumanBeniwal #RajasthanPolitics
जो नेता सचमुच अपनी ताकत और जनता के समर्थन पर भरोसा रखते हैं, उन्हें अपनी रैलियों को सफल बनाने के लिए दूसरे दलों के नेताओं और उनके समर्थकों के सहारे की जरूर��� नहीं पड़ती। भरतपुर ने आपकी आत्मनिर्भर राजनीति का सच सामने ला दिया है।
राजस्थान की समझदार और जागरूक जनता सब कुछ अच्छी तरह समझती है। इस तरह के अवसरवादी गठबंधनों और मंच साझा करने के ड्रामे को जनता ने भरतपुर में खाली कुर्सियां दिखाकर पूरी तरह खारिज कर दिया है। अब आपकी दाल नहीं गलने वाली।
जब खुद की सांगठनिक ताकत और जमीन पर भरोसा नहीं था, तो भरतपुर में लाखों की भीड़ जुटाने के इतने बड़े दावों का नाटक ही क्यों किया? अगर आप अपनी ताकत पर विश्वास रखते हैं, तो फिर कांग्रेस नेताओं और संजना जाटव की मौजूदगी की इतनी आवश्यकता क्यों पड़ी?
बातों के शेर बनने वाले आज जमीन पर पूरी तरह ढेर होते नजर आए! भरतपुर सांसद संजना जाटव को मंच पर आगे खड़ा करके और मुख्य चेहरा बनाकर भी हनुमान बेनीवाल अपने मैदान को खाली रहने से नहीं बचा पाए। यह रैली एक बड़ी नाकामी है।
भरतपुर की इस नाकाम हुंकार रैली को देखकर यह साफ-साफ कहा जा सकता है कि यह कोई जन आंदोलन नहीं था। यह केवल दो राजनीतिक ताकतों के आपसी स्वार्थ और समझौते का एक असफल खेल था, जिसे जनता ने पूरी तरह नकार दिया।