हंगामा क्यों है बरपा? नाम जो पूछ लिया है ?
ये क़ानून तो 2006 में ही बन गया था। सरकार थी मनमोहन सिंह जी की।
2011 में नियम बन गए कि सभी ढाबा और रेस्टोरेंट मालिकों को अपना नाम और लाइसेंस नंबर बड़े अक्षरों में लगाना होगा ताकि ग्राहक आसानी से देख सकें..
ये सभी प्रबुद्धजीवियों के ज्ञान चक्षु आज अचानक क्यों खुल गए हैं?
2011 के नियम को सख़्ती से पालन ही तो करवाया जा रहा है।
सवाल ये है कि ये सेक्युलर चश्मा 13 साल बाद काहे लगाया जा रहा है?
(१) बार में दारू गटकते हुए वीडियो होने के बाद भी पुलिस व मेडिकल जाँच में युवक के खून में अलकोहल नहीं मिला 😯?
(२) रईसज़ादे को ज़मानत सादर भेंट करने के लिए रविवार के दिन माननीय कोर्ट भी खुल गया 😯?
(३) दो होनहार युवाओं को अपने रईस बिल्डर बाप की करोड़���ं की गाड़ी से दो सौ की स्पीड से कुचलकर मार देने पर माननीय न्यायाधीश जी ने इस रईसज़ादे को यह भीषण सजा सुना दी है-
“रईस बाप का यह बिगड़ैल अपराधी बेटा दो निरपराध युवाओं की हत्या की सजा को रुप में तीन सौ शब्दों का निबंध लिखे ।”
हे ईश्वर 😲 । यह बेचारा मासूम बच्चा, पेटभर दारू गटक कर, दो सौ की बेलगाम स्पीड पर चार करोड़ की गाड़ी व्यस्त सड़क पर दौड़ाकर, दो नौजवानों की हत्या करने के बाद इस भयानक सजा को कैस�� भुगतेगा ? ज़रा दया नहीं आई 😲?
“यस्यास्ति वित्तं सः नरः कुलीनः,
सः पण्डितः सः श्रुतवान् गुणज्ञः।
स एव वक्ता सः च दर्शनीयः,
सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति।।”